विविध (आधुनिक भारतीय इतिहास)

Total Questions: 51

1. 19वीं सदी में अवध के अंतिम नवाब ....... के संरक्षण के तहत कथक का स्वर्णिम युग देखने को मिलता है। [CHSL (T-I) 17 मार्च, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) वाजिद अली शाह
Solution:
  • वाजिद अली शाह (19वीं सदी में अवध के अंतिम नवाब) के संरक्षण में कथक का स्वर्णिम युग देखा गया।
  • वह खुद एक बेहतरीन कलाकार और संगीतज्ञ थे, जिन्होंने कथक को दरबारी नृत्य से कला के एक परिष्कृत रूप में विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • उन्होंने कथक में 'भाव' (अभिव्यक्ति) और अभिनय के तत्वों पर जोर दिया, जिससे लखनऊ 'कथक घराना' का उदय हुआ।
  • उनका यह योगदान कथक को आज के शास्त्रीय स्वरूप में लाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
  •  वाजिद अली शाह ने 1847 से 1856 तक अवध पर शासन किया और अपनी कलात्मक रुचियों तथा संरक्षण के लिए प्रसिद्ध थे।
  • उनकी रियासत में कथक नृत्य को अत्यंत प्रोत्साहन मिला और यह कला लखनऊ में अपने अत्यंत परिष्कृत एवं संगीतमय रूप में विकसित हुई।
  • वाजिद अली शाह स्वयं भी एक कला प्रिय और कवि थे, जिसने संगीत, नृत्य, और साहित्य को बहुत महत्व दिया।
  • उनके शासन काल में कथक नृत्य को न केवल प्राचीन परंपराओं का संरक्षण मिला, बल्कि उसमें नवीनता और संवर्धन भी हुआ, जिससे यह नृत्य शैली अपने चरम उत्कर्ष पर पहुंची।
  • कथक का यह सुवर्ण युग वाजिद अली शाह के संरक्षण के कारण संभव हो पाया क्योंकि उन्होंने नृत्य और संगीत के कलाकारों को दरबार में विशेष महत्व और सुरक्षा दी।
  • अवध के इस नवाब ने लखनऊ को सांस्कृतिक और कलात्मक गतिविधियों का केंद्र बनाया, जहां कथक के साथ-साथ ठुमरी और द्रुपद संगीत का भी विकास हुआ।
  • ब्रिटिश राज द्वारा 1856 में उन्हें पदच्युत किए जाने के बाद भी उनकी कला प्रतिभा की स्मृति और कथक की प्रतिष्ठा बनी रही, जो आगे चलकर समस्त भारत में प्रसिद्ध हुई।
  • इस प्रकार, 19वीं सदी में अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह ही थे
  • जिनके संरक्षण में कथक नृत्य ने अपने प्रमुख और सुनहरे काल का अनुभव किया। उनकी सांस्कृतिक नीतियों और कला प्रेम ने इस शास्त्रीय नृत्य को अमर कर दिया.

2. 1969 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पहले कुलपति कौन बने ? [CHSL (T-I) 07 अगस्त, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (d) जी. पार्थसारथी
Solution:
  • जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की स्थापना 1969 में हुई थी। इसके पहले कुलपति जी. पार्थसारथी थे
  • जिन्होंने 1969 से 1974 तक इस पद पर कार्य किया। जी. पार्थसारथी एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद और राजनयिक थे
  • जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया था।
  • जेएनयू की स्थापना भारत में उच्च शिक्षा और अनुसंधान के एक केंद्र के रूप में की गई थी
  • पार्थसारथी ने शुरुआती वर्षों में विश्वविद्यालय की नींव रखने और उसके शैक्षणिक मानकों को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • 1969 में स्थापित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के पहले कुलपति डॉ. जी पार्थसारथी (G. Parthasarathi) थे।
  • उन्होंने JNU के प्रारंभिक वर्षों में विश्वविद्यालय की स्थापना और शैक्षणिक दिशा को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • डॉ. जी पार्थसारथी एक प्रतिष्ठित राजनयिक और गुरु थे जिन्हें विश्वविद्यालय के प्रशासन और अकादमिक दृष्टिकोण का नेतृत्व करने के लिए नियुक्त किया गया था।
  • जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की स्थापना संसद के एक अधिनियम द्वारा 1969 में की गई थी
  • इसका नाम भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नाम पर रखा गया है।
  •  जिन्होंने 1969 से 1974 तक इस पद को संभाला। विश्वविद्यालय के इस प्रारंभिक नेतृत्व ने JNU को एक अग्रणी शैक्षणिक संस्थान बनाने में मदद की।
  • इसके अलावा, प्रोफेसर मूनिस रजा संस्थापक अध्यक्ष और रेक्टर के रूप में भी कार्यरत थे।
  • डॉ. जी पार्थसारथी का योगदान JNU के शैक्षणिक और प्रशासनिक ढांचे के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण था
  • क्योंकि उन्होंने एक नई केंद्रीय विश्वविद्यालय के रूप में JNU के लिए एक मजबूत नींव तैयार की, जो भारत में शैक्षणिक नवाचार और अंतरविषयक अध्ययन को बढ़ावा देती है।
  • उनके समय में विश्वविद्यालय ने उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा और अनुसंधान को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए।
  • संक्षेप में, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का पहला कुलपति डॉ. जी पार्थसारथी था,
  • जिन्होंने 1969 में विश्वविद्यालय की स्थापना के समय इसे सफलता की ओर अग्रसर किया और उसकी नींव रखी।
  • यह भूमिका उनके शैक्षिक नेतृत्व और प्रशासनिक कौशल का प्रतीक थी, जिसने विश्वविद्यालय को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाई.​

3. ....... में ब्रिटिश सरकार ने इंग्लैंड में छापेदार सूती कपड़े - छींट (chintz) – के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाने के लिए कानून पारित किया था। संयोगवश, इस कानून को भी कैलिको अधिनियम (Calico Act) ही कहा जाता था। [CHSL (T-I) 14 मार्च, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) 1720
Solution:
  • ब्रिटिश सरकार ने 1720 में इंग्लैंड में भारतीय छापेदार सूती कपड़े, जिसे छींट (chintz) कहा जाता था, के आयात और इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए कैलिको अधिनियम पारित किया था।
  • भारतीय कपड़ों की बढ़ती लोकप्रियता ने इंग्लैंड के स्थानीय ऊनी और रेशमी वस्त्र उद्योग को गंभीर नुकसान पहुँचाना शुरू कर दिया था।
  • यह कानून इंग्लैंड के कपड़ा निर्माताओं के हितों की रक्षा के लिए एक संरक्षणवादी उपाय के रूप में लाया गया था
  • जो भारत से कपड़ा निर्यात के शुरुआती प्रभाव को दर्शाता है।
  • ब्रिटिश सरकार ने 1700 और 1721 में इंग्लैंड में छापेदार सूती कपड़े यानी छींट (chintz) के आयात और उपयोग पर पाबंदी लगाने के लिए दो प्रमुख कानून पास किए जिन्हें "कैलिको अधिनियम" कहा जाता है।
  • ये अधिनियम मुख्य रूप से भारत से आयातित कैलिको  नामक प्रिंटेड सूती कपड़ों के खिलाफ थे
  • जो उस समय इंग्लैंड के ऊन और रेशम उद्योगों के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा का कारण बन रहे थे।
  • 1700 के कैलिको अधिनियम के तहत, ब्रिटिश संसद ने इस बात पर रोक लगाई कि भारत, चीन, पर्शिया आदि से आयातित प्रिंटेड कैलिको कपड़े, सिल्क, पेंटेड या डाइड फैब्रिक्स का उपयोग इंग्लैंड में पहनावे या गृह सजावट में न किया जाए।
  • अगर किसी ने इनके उपयोग या बिक्री की कोशिश की, तो भारी जुर्माना और इनके जब्ती की सजा थी। 1721 में इसका एक सख्त संस्करण पारित हुआ
  • जिसने कैलिको कपड़ों की बिक्री पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया। इन कानूनों का उद्देश्य ब्रिटेन के घरेलू टेक्सटाइल उद्योग को विदेशी उत्पादों की प्रतिस्पर्धा से बचाना और रोजगार बढ़ाना था।
  • यह कानून आर्थिक संरक्षणवाद (Economic Protectionism) का एक उदाहरण था, जिसमें ब्रिटेन ने अपने कपड़ा उद्योग को स्थापित करने और विकसित करने के लिए विदेशी आयातित वस्त्रों को रोकने का कदम उठाया।
  • कैलिको अधिनियम ने ब्रिटिश औद्योगिक क्रांति के लिए रास्ता साफ किया, क्योंकि इससे ब्रिटेन में सूती वस्त्र उद्योग को बढ़ावा मिला और 19वीं सदी में ब्रिटेन दुनिया का प्रमुख कपड़ा उत्पादक बन गया।
  • ये अधिनियम अंततः 1774 में निरस्त हो गए, जब ब्रिटेन में यांत्रिक कपड़ा उत्पादन के साधन विकसित हो गए थे।
  • इस प्रकार, कैलिको अधिनियम 1700 और 1721 में इंग्लैंड में छापेदार सूती कपड़े (chintz) के इस्तेमाल और बिक्री पर रोक लगाने के लिए ब्रिटिश संसद द्वारा पारित कानून थे
  • जो भारतीय सूती कपड़ों की बढ़ती लोकप्रियता के कारण ब्रिटिश ऊन और सिल्क उद्योगों की सुरक्षा के रूप में बनाए गए थे।
  • यह अधिनियम औद्योगिक क्रांति की तैयारी की तरह माना जाता है
  • जिसने चीन और भारत जैसे क्षेत्रों के कपड़ा आयात को दबाया और ब्रिटेन के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दिया.​

4. निम्नलिखित में से किस शख्सियत का संबंध अलीगढ़ आंदोलन से है? [MTS (T-I) 15 मई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) सैयद अहमद खान
Solution:
  • सर सैयद अहमद खान का संबंध अलीगढ़ आंदोलन से है। यह आंदोलन 19वीं सदी के उत्तरार्ध में भारतीय मुसलमानों के शैक्षिक और सामाजिक उत्थान पर केंद्रित था।
  • सर सैयद अहमद खान का मानना था कि मुसलमानों को आधुनिक विज्ञान और पश्चिमी शिक्षा को अपनाना चाहिए ताकि वे समकालीन समाज में प्रगति कर सकें।
  • इस आंदोलन का प्रतीक मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज (MAO College) था, जिसकी स्थापना उन्होंने 1875 में की थी, जो बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) बना।
  • लीगढ़ आंदोलन का संबंध प्रमुख रूप से सर सैयद अहमद खान से है, जो इस आंदोलन के संस्थापक और नेता थे।
  • उन्होंने 1870 के दशक में भारतीय मुसलमानों के पुनरुद्धार और आधुनिकीकरण के लिए अलीगढ़ आंदोलन की शुरुआत की।
  • इस आंदोलन का उद्देश्य मुसलमानों में आधुनिक शिक्षा का प्रचार-प्रसार करना था, खासकर अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से सामाजिक और राजनीतिक हितों की रक्षा करना।
  • इसके तहत उन्होंने 1875 में मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना की, जो बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के रूप में विकसित हुआ।
  • सर सैयद अहमद खान ने मुसलमानों में शिक्षा के साथ-साथ सामाजिक सुधारों का भी प्रचार किया, जैसे कि बहुविवाह, विधवा पुनर्विवाह, दासता, और महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा देना।
  • उन्होंने इस आंदोलन के जरिये न केवल शिक्षा बल्कि एक नई सोच और धार्मिक चेतना को भी जन्म दिया।
  • उनके नेतृत्व में अलीगढ़ आंदोलन अंग्रेज़ों की सहायता से चला, जिसका मकसद था भारतीय मुसलमानों को आधुनिक युग के लिए तैयार करना और उन्हें राजनीतिक एवं सामाजिक रूप से सशक्त बनाना।
  • इस आंदोलन में अन्य प्रमुख शख्सियतों में मौलाना शिबली नोमानी, अलताफ हुसैन, नजीर अहमद, और चिराग अली जैसे लोग भी थे
  • जिन्होंने मुस्लिम समाज के सुधार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अलीगढ़ आंदोलन ने भारतीय मुसलमानों के बीच सांस्कृतिक, शैक्षणिक और सामाजिक जागरण की नींव रखी और आधुनिक मुस्लिम चेतना को जन्म दिया।
  • इस प्रकार, अलीगढ़ आंदोलन से सीधे जुड़ी मुख्य शख्सियत सर सैयद अहमद खान हैं, जिन्हें इस आंदोलन का पिता माना जाता है और जिन्होंने भारत में मुस्लिम पुनरुद्धार का मार्ग प्रशस्त किया.​

5. अहमदिया, इस्लाम का एक संप्रदाय है जिसकी शुरुआत भारत में हुई थी। इसकी स्थापना 1889 में ....... द्वारा की गई थी। [MTS (T-I) 11 मई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) मिर्जा गुलाम अहमद
Solution:
  • इस्लाम का अहमदीया संप्रदाय (या अहमदिया मुस्लिम जमात) की शुरुआत भारत में मिर्जा गुलाम अहमद द्वारा 1889 में की गई थी।
  • उन्होंने खुद को 'प्रतिज्ञा किए गए मसीहा' और 'महदी' घोषित किया। इस संप्रदाय का मुख्यालय पंजाब के कादियान में था।
  • अहमदीया आंदोलन इस्लामी सुधारों, अंतर-धार्मिक संवादों और शांति के सिद्धांतों पर जोर देता है।
  • भारत में धार्मिक और सामाजिक सुधारों के युग में इस संप्रदाय का उदय हुआ।
  • अहमदिया इस्लाम का एक संप्रदाय है जिसकी स्थापना 1889 में ब्रिटिश भारत के पंजाब के कादियान नामक स्थान पर मिर्ज़ा गुलाम अहमद (1835-1908) द्वारा की गई थी।
  • मिर्जा गुलाम अहमद ने खुद को वह वादा किया गया मसीहा और महदी बताया जिसकी मुसलमानों को इंतजार था, और उन्होंने इस्लाम के शांति और सहिष्णुता के प्रचार पर जोर दिया।
  • उन्होंने 23 मार्च 1889 को लुधियाना में अपने कुछ अनुयायों से बायाँ लेने के साथ इस आंदोलन की आधिकारिक शुरुआत की।
  • अहमदिया समुदाय इस्लाम के अंदर एक अलग मत के रूप में उभरा, जहाँ अनुयायी मिर्जा गुलाम अहमद को पैगंबर मानते हैं
  • जो इस्लाम की मुख्यधारा से अलग एक अनूठा दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। यह आंदोलन विश्व के कई देशों में फैल चुका है और इसका धर्मशास्त्र प्रेम, मानवता की सेवा और इस्लाम के सुधार पर आधारित है।
  • अहमदिया आंदोलन की स्थापना के समय मिर्जा गुलाम अहमद कादियान में रहते थे, जिसे इसलिए कभी-कभी अहमदिया समुदाय के अनुयायी 'कादियानी' भी कहे जाते हैं।
  • उनका मानना था कि अंतिम दिनों में आने वाले मसीहा और महदी की भूमिका शांति से इस्लाम को मजबूत करने की है, न कि संघर्ष से। अहमदिया इस्लाम के सुधार के लिए कार्य करते हैं और विश्व में इसकी पैठ बनी हुई है।
  • हालांकि, वे मुख्यधारा के अन्य इस्लामी समूहों से अलग समझे जाते हैं, क्योंकि इस्लाम में पैगंबर मुहम्मद को अंतिम माना जाता है
  • पर अहमदिया मिर्जा गुलाम अहमद को भी पैगंबर मानते हैं, जो विवाद का विषय रहा है।
  • संक्षेप में, अहमदिया इस्लाम का एक संप्रदाय है जिसकी स्थापना 1889 में मिर्जा गुलाम अहमद ने की थी
  • जिसने खुद को मसीहा और महदी घोषित किया और प्रेम, मानवता सेवा और इस्लाम के शांति-भरे प्रचार पर जोर दिया।
  • यह आंदोलन भारत के कादियान से शुरू होकर विश्व भर में फैल गया है, जिसका धार्मिक विश्वास और पहचान विशिष्ट है।

6. भारत में पहला उच्च न्यायालय सन् ....... में स्थापित किया गया था। [MTS (T-I) 03 मई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (b) 1862
Solution:
  • भारत में पहला उच्च न्यायालय 1862 में स्थापित किया गया था। ब्रिटिश संसद द्वारा पारित भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम, 1861 के तहत, कलकत्ता, बम्बई (मुंबई), और मद्रास (चेन्नई) में उच्च न्यायालयों की स्थापना की गई थी।
  • कलकत्ता उच्च न्यायालय भारत का सबसे पुराना उच्च न्यायालय है, जिसकी स्थापना 2 जुलाई 1862 को हुई थी।
  • ये उच्च न्यायालय पहले के सदर अदालतों और सर्वोच्च न्यायालयों का स्थान लेने वाले थे।
  • इसे भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम, 1861 के तहत 14 मई 1861 को स्थापित करने के लिए पत्र पेटेंट जारी किए गए, और यह औपचारिक रूप से 1 जुलाई 1862 को खुला था।
  • इसे पहले फोर्ट विलियम उच्च न्यायालय के नाम से भी जाना जाता था। इसका पहला मुख्य न्यायाधीश सर बार्न्स पीकॉक थे, और न्यायमूर्ति सुंबू नाथ पंडित पहले भारतीय न्यायाधीश थे जिन्होंने इस उच्च न्यायालय में सेवा दी।
  • यह उच्च न्यायालय ब्रितानी भारत में न्यायव्यवस्था को संगठित करने और उच्च न्यायालयों के रूप में तीन प्रमुख प्रेसीडेंसी टाउन—कोलकाता, मुंबई (बॉम्बे), और मद्रास में न्यायालय स्थापित करने का प्रतिबिंब था।
  • उच्च न्यायालय अधिनियम, 1861 ने इन प्रेसीडेंसी टाउनों के सर्वोच्च न्यायालयों और सदर अदालतों को समाप्त कर उच्च न्यायालयों की स्थापना की।
  • इसके बाद, 1862 में ही बंबई और मद्रास में भी उच्च न्यायालय स्थापित किए गए थे।
  • कलकत्ता उच्च न्यायालय ने भारत की न्यायिक प्रणाली में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसने न्याय के आदर्श स्थापित किए और भारतीय न्यायिक इतिहास में एक बड़ा मुकाम हासिल किया।
  • इसकी स्थापना ने भारतीय उपमहाद्वीप में न्यायिक सुधारों के युग की शुरुआत की और भारत के न्यायिक और प्रशासनिक ढांचे को आधुनिक रूप दिया

7. आज़ादी से पहले के भारत में, गरीबी रेखा की अवधारणा पर चर्चा करने वाले व्यक्ति कौन थे? [MTS (T-I) 19 जून, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) दादाभाई नौरोजी
Solution:
  • आज़ादी से पहले के भारत में, गरीबी रेखा की अवधारणा पर चर्चा करने वाले पहले व्यक्ति दादाभाई नौरोजी थे।
  • उन्होंने अपनी पुस्तक 'Poverty and Un-British Rule in India' में धन निष्कासन सिद्धांत को प्रतिपादित किया और भारत में गरीबी का आकलन किया।
  • उन्होंने 'जेल की निर्वाह लागत' के आधार पर एक शुरुआती गरीबी रेखा का अनुमान लगाया, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश नीतियों के कारण भारतीयों की दयनीय आर्थिक स्थिति को उजागर करना था।
  • इस पुस्तक में दादाभाई नौरोजी ने भारत में गरीबी का सबसे पहला अनुमान लगाया था
  • जिसमें उन्होंने न्यूनतम निर्वाह आवश्यकताओं पर आधारित गरीबी रेखा तैयार की।
  • उनकी गरीबी रेखा उस समय के भोजन, कपड़े, और आश्रय की लागत पर केंद्रित थी।
  • उन्होंने प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष 16 रुपये से 35 रुपये के बीच की गरीबी रेखा का अनुमान दिया था
  • जो मुख्यतः भोजन (चावल या आटा, दाल, मटन, सब्जियां, घी, वनस्पति तेल और नमक) की लागत पर आधारित थी।
  • दादाभाई नौरोजी को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला "भारत के ग्रैंड ओल्ड मैन" भी कहा जाता है
  • वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दूसरे और नौवें अध्यक्ष भी थे। उनकी गरीबी रेखा से जुड़ी अवधारणा ब्रिटिश शासन के दौरान भारत की आर्थिक स्थिति की आलोचना के साथ जुड़ी थी
  • जिसमें वे ब्रिटेन द्वारा भारत के संसाधनों की निकासी पर केंद्रित थे।
  • इसके अतिरिक्त, स्वतंत्रता से पहले के कुछ अन्य नेताओं और संस्थाओं ने भी गरीबी के मुद्दे पर काम किया
  • जैसे 1938 में सुभाष चंद्र बोस द्वारा गठित राष्ट्रीय योजना समिति, जिसने गरीबी उन्मूलन के लिए पहल की।
  • लेकिन गरीबी रेखा की आर्थिक और सांख्यिकीय अवधारणा का सबसे प्रारंभिक और उल्लेखनीय योगदान दादाभाई नौरोजी का माना जाता है।
  • संक्षेप में, आज़ादी से पहले भारत में गरीबी रेखा की अवधारणा पर चर्चा करने वाले प्रमुख व्यक्ति दादाभाई नौरोजी थे
  • जिन्होंने इस विषय पर सबसे पहले गंभीर आर्थिक विश्लेषण और षड्यंत्रात्मक आलोचना की थी, जो बाद में भारत में गरीबी और विकास नीति निर्धारण के लिए आधार बनी.​

8. निम्नलिखित में से कौन उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत के पठानों के बीच एक शक्तिशाली अहिंसक आंदोलन, खुदाई खिदमतगार का संस्थापक था? [MTS (T-1) 08 सितंबर, 2023 (III-पाली), GGL (T-1) 14 जुलाई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (c) खान अब्दुल गफ्फार खान
Solution:
  • खान अब्दुल गफ्फार खान उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) के पठानों के बीच खुदाई खिदमतगार ('ईश्वर के सेवक') नामक एक शक्तिशाली अहिंसक आंदोलन के संस्थापक थे।
  • इस आंदोलन की शुरुआत 1929 में हुई थी।
  • खान अब्दुल गफ्फार खान को उनकी अहिंसक विचारधारा के कारण 'सीमांत गांधी' के नाम से जाना जाता था।
  • इस आंदोलन के सदस्य लाल रंग की शर्ट पहनते थे, इसलिए इसे 'लाल कुर्ती' आंदोलन भी कहा जाता था।
  • यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अहिंसा पर आधारित एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय आंदोलन था।
  • उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (अब पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा क्षेत्र के आसपास) के पठानों के बीच एक शक्तिशाली अहिंसक आंदोलन, खुदाई खिदमतगार का संस्थापक खान अब्दुल गफ्फार खान थे।
  • इन्हें "सरहदी गांधी" (सीमांत गांधी) और "बाचा खान" के नाम से भी जाना जाता है।
  • "ईश्वर के सेवक"। यह आंदोलन महात्मा गांधी के अहिंसात्मक आंदोलन से प्रेरित था और इसका उद्देश्य था
  • ब्रिटिश शासन के खिलाफ अहिंसा के जरिए स्वतंत्रता संग्राम को आगे बढ़ाना तथा पठान समाज में शिक्षा का प्रचार करना, रक्त-प्रतिशोध की परंपरा को समाप्त करना और सामाजिक सुधार लाना।
  • इस आंदोलन ने लाल क़मीज़ के नाम से भी प्रसिद्धि पाई क्योंकि आंदोलनकारी लाल कुर्तियां पहनते थे।
  • खुदाई खिदमतगार आंदोलन ने ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ न तो हथियार उठाए और न ही हिंसा की नीति अपनाई।
  • इसके चलते 23 अप्रैल 1930 को क़िस्सा ख्वानी बाजार नरसंहार हुआ जब ब्रिटिश सेना ने अहिंसक प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई।
  • खान अब्दुल गफ्फार खान महात्मा गांधी के करीबी सहयोगी थे और स्वतंत्रता संग्राम में उनकी अहिंसा और सेवा की नीति के लिए तहे दिल से काम करते थे।
  • वे पश्तूनों के बीच गांधीजी के अहिंसा के सिद्धांतों को फैलाने वाले प्रमुख नेता थे और उन्हें "फ्रंटियर गांधी" भी कहा जाता था।
  • इस आंदोलन का राजनीतिक महत्व भी था, क्योंकि यह उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में ब्रिटिश वर्चस्व को चुनौती देने वाला बड़ा अहिंसक आंदोलन था
  • यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक महत्वपूर्ण अंग के रूप में उभरा। खान अब्दुल गफ्फार खान ने आज़ादी के बाद भी भारत-पाकिस्तान के विभाजन का कड़ा विरोध किया और सम्प्रदायिक सौहार्द और एकता के पक्षधर रहे।
  • इस प्रकार, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत के पठानों के बीच खुदाई खिदमतगार आंदोलन के संस्थापक और नेता खान अब्दुल गफ्फार खान थे
  • जिन्होंने अहिंसात्मक तरीके से अंग्रेजों के खिलाफ एक प्रभावी स्वतंत्रता संग्राम का मार्ग प्रशस्त किया.

9. निम्नलिखित में से कौन-सा आंदोलन खान अब्दुल गफ्फार खान द्वारा शुरू किया गया था? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 2 दिसंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (b) खुदाई खिदमतगार
Solution:
  • खान अब्दुल गफ्फार खान उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) के पठानों के बीच खुदाई खिदमतगार ('ईश्वर के सेवक') नामक एक शक्तिशाली अहिंसक आंदोलन के संस्थापक थे। इस आंदोलन की शुरुआत 1929 में हुई थी।
  • खान अब्दुल गफ्फार खान को उनकी अहिंसक विचारधारा के कारण 'सीमांत गांधी' के नाम से जाना जाता था।
  • इस आंदोलन के सदस्य लाल रंग की शर्ट पहनते थे, इसलिए इसे 'लाल कुर्ती' आंदोलन भी कहा जाता था।
  • यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अहिंसा पर आधारित एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय आंदोलन था।
  • यह आंदोलन 1929 में शुरू किया गया था और यह उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत (अब पाकिस्तान में) के पख्तूनों के बीच ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक अहिंसक सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन था।
  • खुदाई खिदमतगार का अर्थ है "ईश्वर के सेवक" और यह आंदोलन महात्मा गांधी के अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांतों से प्रेरित था।
  • इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य पख्तूनों के बीच एकता, सामाजिक सुधार और ब्रिटिश शासन का विरोध करना था।
  • इस आंदोलन में पुरुष लाल रंग के कर्त़ा पहनते थे, इसलिए इसे लाल कुर्ती आंदोलन कहा जाता था।
  • खान अब्दुल गफ्फार खान को उनके अहिंसक और नैतिक नेतृत्व के कारण "सीमांत गांधी" या "फ्रंटियर गांधी" की उपाधि मिली।
  • यह आंदोलन एक प्रकार का सत्याग्रह था, जिसमें पख्तून अत्यंत संगठित होकर अंग्रेजों के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध करते थे।
  • खुदाई खिदमतगार आंदोलन ने 1930 के किस्सा ख्वानी बाजार नरसंहार जैसे ऐतिहासिक घटनाओं का सामना किया
  • जिसमें ब्रिटिश सैनिकों ने अहिंसक प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाकर कई लोगों की हत्या कर दी थी। इसके बावजूद यह आंदोलन ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक महत्वपूर्ण शक्ति बना रहा।
  • खान अब्दुल गफ्फार खान ने इस आंदोलन के जरिए न केवल राजनीतिक स्वतंत्रता संघर्ष बल्कि पख्तून समाज में जागरूकता और सुधार भी लाने का प्रयास किया।
  • इस प्रकार, खान अब्दुल गफ्फार खान द्वारा शुरू किया गया प्रमुख आंदोलन खुदाई खिदमतगार (लाल कुर्ती आंदोलन) था
  • जो मुख्य रूप से अहिंसक, सामाजिक और राजनीतिक सुधार के लिए था।
  • यह आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक था और इसमें उन्होंने गांधीजी के अहिंसा के सिद्धांतों का पालन किया था.​

10. "खुदाई खिदमतगार (Khudai Khidmatgars)" नामक एक अहिंसक आंदोलन के संस्थापक कौन थे? [MTS (T-I) 15 जून, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) खान अब्दुल गफ्फार खान
Solution:
  • खान अब्दुल गफ्फार खान उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) के पठानों के बीच खुदाई खिदमतगार ('ईश्वर के सेवक') नामक एक शक्तिशाली अहिंसक आंदोलन के संस्थापक थे।
  • इस आंदोलन की शुरुआत 1929 में हुई थी।
  • खान अब्दुल गफ्फार खान को उनकी अहिंसक विचारधारा के कारण 'सीमांत गांधी' के नाम से जाना जाता था।
  • इस आंदोलन के सदस्य लाल रंग की शर्ट पहनते थे, इसलिए इसे 'लाल कुर्ती' आंदोलन भी कहा जाता था।
  • यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अहिंसा पर आधारित एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय आंदोलन था।
  • जिन्हें "फ्रंटियर गांधी" (Frontier Gandhi) के नाम से भी जाना जाता था। इस आंदोलन का उद्देश्य था सामाजिक सुधार, अहिंसा, और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना।
  • खुदाई खिदमतगारों को उनकी लाल रंग की शर्ट की वजह से "लाल शर्ट" भी कहा जाता था।
  • खान अब्दुल गफ्फार खान ने इस आंदोलन को महात्मा गांधी के अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांतों से प्रेरित होकर चलाया था, और यह आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाया।
  • खान अब्दुल गफ्फार खान एक महान पास्तून नेता थे, जिन्होंने इस क्षेत्र में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ अहिंसक तरीके से लड़ाई लड़ी।
  • उनका लक्ष्य एक संयुक्त, स्वतंत्र, और धर्मनिरपेक्ष भारत था। उन्होंने खुदाई खिदमतगार के जरिए सामाजिक न्याय, लोकतंत्र, और अहिंसा के सिद्धांतों को बढ़ावा दिया।
  • वे "बादशाह खान" और "सीमान्त गांधी" के नामों से भी प्रसिद्ध थे। इस आंदोलन को ब्रिटिश सरकार द्वारा अक्सर दमन का सामना करना पड़ा, लेकिन इसकी मुख्य ताकत इसकी अनुशासित और अहिंसक प्रकृति थी।
  • इस प्रकार, खुदाई खिदमतगार आंदोलन के संस्थापक और प्रमुख नेता खान अब्दुल गफ्फार खान थे जिन्होंने इसे एक अहम अहिंसक स्वतंत्रता आंदोलन के रूप में स्थापित किया था.​