पृष्ठभूमि: 18वीं शताब्दी के दौरान ईस्ट इंडिया कंपनी भारत मेंव्यावसायिक गतिविधियों के साथ साथ प्रशासनिक शक्तियाँ भी संचालित कर रही थी।
1773 के Regulating Act के बाद कंपनी के शासन-प्रशासन में ब्रिटिश संसद का नियंत्रण शुरू हुआ, ताकि कंपनी के कार्यों को केंद्रीय सरकार के प्रभाव के भीतर लाया जा सके।
चार्टर अधिनियम 1793 इस क्रम में एक महत्वपूर्ण कदम था जो कंपनी के चार्टर की वैधानिक वैधता और अधिकारों को निर्धारित समय के लिए बढ़ाता था
प्रमुख प्रावधान: 1793 के चार्टर अधिनियम ने ईस्ट इंडिया कंपनी के चार्टर को 20 वर्षों के लिए पुनर्नवीनीकृत किया, जिससे कंपनी के निरंतर एकाधिकार और निवेश नियंत्रण की व्यवस्था बनी रही ।
साथ ही यह अधिनियम प्रशासनिक संरचना में कुछ सुधार और नियंत्रण-तंत्र स्थापित करता था, ताकि कंपनी के राजस्व और प्रशासनिक खर्चों की निगरानी संभव रहे ।
प्रभाव: इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय प्रांतों के प्रशासन और कंपनी की शक्तियों के प्रयोग को नियंत्रण में रखना था, जबकि सुदृढ़ ब्रिटिश शासन के तहत भारत पर कंपनी का प्रभाव बना रहा।
1793 के चार्टर अधिनियम के कारण कंपनी का चार्टर एक निर्धारित अवधि के लिए मान्य रहा और इसके पश्चात आगे के कानूनों के द्वारा स्थिति में परिवर्तन होता रहा ।
संपूर्ण संदर्भ: 1793 का चार्टर अधिनियम अक्सर ईस्ट इंडिया कंपनी अधिनियम 1793 के नाम से भी जाना जाता है,
क्योंकि यह चार्टर-आधारित अधिकारों के पुनर्नवीनीकरण और विनियमन के साथ कंपनी के शासन-व्यवस्था का एक प्रमुख पूर्व-रणनीतिक कदम था ।