Correct Answer: (b) विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था और उपासना की स्वतंत्रता
Solution:- प्रस्तावना में पाँच प्रकार की स्वतंत्रता का उल्लेख है: विचार (Thought), अभिव्यक्ति (Expression), विश्वास (Belief), आस्था (Faith), और उपासना (Worship)। न्याय का उल्लेख 'सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक' न्याय के रूप में है, जबकि समानता 'प्रतिष्ठा और अवसर' की है, न कि 'स्थिति और रोजगार' की।
- भारतीय संविधान की प्रस्तावना में न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व, संप्रभुता, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र जैसे मूल्यों का स्पष्ट उल्लेख है।
- यह प्रस्तावना संविधान का प्रारंभिक भाग है जो पूरे दस्तावेज के उद्देश्यों, दर्शन और आदर्शों को संक्षेप में व्यक्त करती है।
- प्रस्तावना का पूर्ण पाठ
- प्रस्तावना इस प्रकार है: "हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को: सामाजिक
- आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता
- अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर, 1949 ई० को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं
- यह पाठ मूल रूप से 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा अपनाया गया था और 42वें संशोधन (1976) द्वारा 'समाजवादी', 'धर्मनिरपेक्ष' तथा 'अखंडता' शब्द जोड़े गए।
- प्रमुख उल्लिखित मूल्य
- न्याय (Justice): सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, जो सभी नागरिकों को समान अवसर और संसाधनों का वितरण सुनिश्चित करता है।
- स्वतंत्रता (Liberty): विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, जो मौलिक अधिकारों का आधार है।
- समानता (Equality): प्रतिष्ठा और अवसर की समता, जो भेदभाव को समाप्त कर सामाजिक समानता को बढ़ावा देती है।
- बंधुत्व (Fraternity): व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता-अखंडता, जो सामाजिक सद्भाव और एकता को मजबूत करता है।
- अन्य विशेषताएँ: संप्रभुता (बाहरी नियंत्रण से मुक्ति), समाजवाद (आर्थिक समानता), धर्मनिरपेक्षता (सभी धर्मों का समान सम्मान) और लोकतंत्र (जनता का शासन)।
- महत्व और व्याख्या
- प्रस्तावना को संविधान की 'आत्मा' कहा जाता है, जैसा कि संविधान सभा सदस्य पंडित ठाकुर दास भार्गव ने उल्लेख किया।
- यह संविधान के मूल दर्शन को प्रतिबिंबित करती है
- न्यायालय द्वारा व्याख्या में आधार बनी है, हालांकि यह विधायी शक्ति का स्रोत नहीं है।
- केशवानंद भारती मामले (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे संविधान की 'मूल संरचना' का हिस्सा माना।
- यह सामाजिक-आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना का खाका प्रस्तुत करती है।