Correct Answer: (c) मुंडक (मुंडकोपनिषद)
Solution:- भारत के राष्ट्रीय प्रतीक (अशोक स्तम्भ) के नीचे देवनागरी लिपि में लिखा गया आदर्श वाक्य 'सत्यमेव जयते' (सत्य की ही जीत होती है)
- मुंडकोपनिषद से लिया गया है। यह प्राचीन भारतीय दर्शन का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है।
- किस उपनिषद से लिया गया है
- ‘सत्यमेव जयते’ का स्रोत मुण्डक उपनिषद है, जो अथर्ववेद से सम्बद्ध प्रमुख उपनिषदों में गिना जाता है।
- भारत के राजचिह्न (अशोक स्तंभ पर आधारित राष्ट्रीय प्रतीक) के आधार भाग के नीचे देवनागरी लिपि में यही वाक्यांश राष्ट्रीय आदर्श वाक्य के रूप में अंकित है।
- मंत्र में इसका स्थान और अर्थ
- मूल मंत्र में पूरा वाक्य है कि सत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहीं; सत्य के द्वारा ही देवयान मार्ग विस्तृत होता है, जिस पर चलकर ऋषिगण सत्य के परम धाम तक पहुंचते हैं – इस लंबी व्याख्या का संक्षिप्त सार केवल यह है कि अंततः जीत सत्य की होती है।
- इस पूरे मंत्र से केवल शुरुआती अंश ‘सत्यमेव जयते’ को चुनकर राष्ट्र के आदर्श वाक्य के रूप में लिया गया, क्योंकि यह संक्षेप में भारतीय विचारधारा की नैतिक भावना को व्यक्त करता है।
- मुण्डक उपनिषद का संक्षिप्त परिचय
- मुण्डक उपनिषद 108 उपनिषदों की पारंपरिक सूची में एक प्रमुख उपनिषद है और मुक्तिका कैनन में इसे पाँचवाँ स्थान दिया गया है।
- यह काव्यात्मक शैली में लिखी गई दार्शनिक रचना है, जिसमें लगभग 64 मन्त्र हैं और इनमें ब्रह्मज्ञान, आत्मा, सत्य और ज्ञान–कर्म के भेद आदि की चर्चा की गई है।
- ‘सत्यमेव जयते’ राष्ट्रीय आदर्श वाक्य कैसे बना
- स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय प्रतीक को 26 जनवरी 1950 को अपनाते समय अशोक के सिंह स्तंभ के नीचे ‘सत्यमेव जयते’ को आधिकारिक रूप से राष्ट्र के राष्ट्रीय आदर्श वाक्य के रूप में स्वीकार किया गया।
- यह वाक्य भारतीय राज्य की उस मूल भावना को दर्शाता है कि शासन और समाज दोनों का अंतिम आधार सत्य, न्याय और नैतिकता पर होना चाहिए, न कि छल, हिंसा या अन्याय पर।
- राष्ट्रीय प्रतीक पर प्रयोग और महत्व
- राष्ट्रीय प्रतीक में चार सिंहों वाले अशोक स्तंभ के आधार भाग के सबसे नीचे, देवनागरी में ‘सत्यमेव जयते’ अंकित होता है; आधिकारिक प्रयोग में इसे निजी/व्यावसायिक लोगो आदि के लिए मनमाने ढंग से उपयोग करने की अनुमति नहीं है।
- प्रशासनिक मुहरों, सरकारी पत्रों, न्यायालयों और संसद सहित अनेक आधिकारिक संदर्भों में यह वाक्यांश यह संकेत देता है कि राज्य व्यवस्था को निर्णय लेते समय अंततः सत्य और न्याय के पक्ष में खड़ा होना चाहिए।