कर्वे समिति (1955), जिसे 'ग्राम और लघु उद्योग समिति' के रूप में भी जाना जाता है, का गठन योजना आयोग द्वारा ग्रामीण विकास और रोजगार सृजन के रास्तों की तलाश के लिए किया गया था। इस समिति के अध्यक्ष दत्तात्रेय गोपाल कर्वे थे। समिति का मुख्य तर्क यह था कि भारत जैसे श्रम-प्रधान देश में केवल भारी उद्योगों से बेरोजगारी दूर नहीं की जा सकती, इसलिए लघु और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देना अनिवार्य है।
इसकी प्रमुख सिफारिशों में ग्रामीण क्षेत्रों में औद्योगिक विकेंद्रीकरण पर जोर दिया गया ताकि शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन को रोका जा सके। समिति ने यह सुझाव भी दिया कि उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा लघु उद्योगों के लिए आरक्षित (Reserved) किया जाना चाहिए ताकि उन्हें बड़े कारखानों की प्रतिस्पर्धा से बचाया जा सके। कर्वे समिति की इन्हीं सिफारिशों ने दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956-61) के दौरान छोटे पैमाने के उद्योगों के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया, जिसे भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में एक 'रोजगार-परक' मोड़ माना जाता है।