यू.जी.सी. NTA नेट /जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर 2020 जून-2021 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY) (Shift – 1)

Total Questions: 100

1. निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर उसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

एक अर्थ में इसे अवश्य स्वीकार किया जाना चाहिए कि हम स्वयं और अपने अनुभवों के अतिरिक्त किसी वस्तु के अस्तित्व को प्रमाणित नहीं कर सकते हैं। इस प्राक्कल्पना कि जगत मुझसे और मेरे विचारों और भावनाओं और संवेदनाओं से बना है और बाकी सब कुछ मात्र कल्पना है, से कोई तार्किक बेतुकापन नहीं निकलता है।
सपनों में एक बहुत ही जटिल संसार प्रतीत हो सकता है, और फिर भी जागने पर हम पाते हैं कि वह एक भ्रम था; अर्थात, हम पाते हैं कि स्वप्न में जो चेतना तथ्य है वह भौतिक वस्तुओं से मेल नहीं खाता है, जैसा कि हमें स्वाभाविक रूप से अपने चेतना तथ्य से अनुमान लगाना चाहिए। (यह सच है कि, जब भौतिक दुनिया की कल्पना की जाती है, तो सपनों में चेतना तथ्य के भौतिक कारणों का पता लगाना संभव है: उदाहरण के लिए, एक दरवाजा खटखटाने से हमें नौसेना मुठभेड़ का सपना देखने को मिल सकता है।
लेकिन हालांकि, इस मामले में, चेतना तथ्य के लिए एक भौतिक कारण है, जिस तरह से एक वास्तविक नौसेना युद्ध के अनुरूप होगा, उस तरह से चेतना तथ्य के अनुरूप कोई भौतिक वस्तु नहीं है)। इस अनुमान में कोई तार्किक असंभवता नहीं है कि पूरा जीवन ही एक सपना है, जिसमें हम अपने सामने आने वाली सभी वस्तुओं को खुद बनाते हैं।
लेकिन यद्यपि यह तार्किक रूप से असंभव नहीं है, फिर भी यह मानने का कोई कारण नहीं है कि यह सच है; और यह, वास्तव में, एक कम सरल परिकल्पना है, जिसे हमारे अपने जीवन के तथ्यों की गणना के लिए एक साधन के रूप में देखा जाता है, जबकि सामान्य ज्ञान की परिकल्पना की तुलना में वास्तव में हमसे स्वतंत्र वस्तुएँ हैं, जिनकी कार्रवाई हमारी संवेदनाओं का कारण बनती है।
निम्नलिखित में से कौन-कौन से दार्शनिकों का सम्बन्ध संभवतः इस विचार से हो सकता है कि "एक अर्थ में इसे अवश्य स्वीकार किया जाना चाहिए कि हम स्वयं और अपने अनुभवों के अतिरिक्त किसी वस्तु के अस्तित्व को प्रमाणित नहीं कर सकते हैं?
A. बर्कले
B. देकार्त
C. ह्यूम
D. लॉक
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनेंः

Correct Answer: (a) केवल A, B और C
Solution:

"एक अर्थ में इसे अवश्य स्वीकार किया जाना चाहिए कि हम स्वयं और अपने अनुभवों के अतिरिक्त किसी वस्तु के अस्तित्व को प्रमाणित नहीं कर सकते।" इस विचार से बर्कले, देकार्त तथा ह्यूम तीनों का संबंध है। ध्यातव्य है की बर्कले तथा ह्यूम अनुभववादी हैं, ये अनुभववाद की प्रतिष्ठा करते हैं। देकार्ते बुद्धिवादी हैं। वे कहते हैं, ज्ञान के लिए इन्द्रिय प्रत्यक्ष आवश्यक है परन्तु बुद्धि द्वारा पुष्टि होने पर ही वह प्रमाणित होता है।

2. दर्शन शास्त्र की किस पुस्तक में भी यह तर्क है कि- "यह मानने में कोई तार्किक असम्भाव्यता नहीं है कि सम्पूर्ण जीवन एक स्वप्न है जिसमें हम स्वयं उन सभी वस्तुओं का सृजन करते हैं हमारे समक्ष आते हैं"

Correct Answer: (d) डिस्कोर्स ऑन मेथड
Solution:

यह मानने में कोई तार्किक असंम्भाव्यता नहीं है कि संपूर्ण जीवन एक स्वप्न है जिसमें हम स्वयं उन सभी वस्तुओं का सृजन करते हैं हमारे समक्ष आते हैं। यह तर्क 'डिस्कोर्स आन मेथड से सम्बन्धित है। इस पुस्तक की रचना बुद्धिवादी दार्शनिक रेने डेकार्ट ने की थी।

3. इस गद्यांश के अंतिम वाक्य से लेखक के दार्शनिक विचार के बारे में क्या अनुमान किया जा सकता है?

Correct Answer: (b) लेखक ज्ञान की सम्भावना के पक्ष में संशयवाद के विरुद्ध तर्क दे रहा है
Solution:

इस अनुमान में कोई तार्किक असंभवता नहीं है कि पूरा जीवन ही एक सपना है, जिसमें हम अपने सामने आने वाली सभी वस्तुओं को खुद बनाते हैं। लेकिन यद्यपि यह तार्किक रूप में असंभव नहीं है। फिर भी यह मानने का कोई कारण नहीं है कि यह सच है....... कम सरल परिकल्पना है जिसे हमारे जीवन के तथ्यों की गणना के लिए एक साधन के रूप में देखा जाता है जबकि सामान्य ज्ञान की परिकल्पना की तुलना में वास्तव में हमसे स्वतंत्र वस्तुएँ हैं जिनकी कार्यवाई हमारी संवेदनाओं का कारण बनती है। यह वाक्य संशयवाद के विरुद्ध संभावना के पक्ष में तर्क दे रहा है।

4. यह विचार निम्नलिखित में से किन-किन सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है कि "यह प्राक्कल्पना की जगत मुझसे और मेरे विचारों और भावों और संवेदनाओं से बना है। और यह कि अन्य बातें कल्पना मात्र हैं?

A. अहं मात्र वाद
B. प्रत्यय वाद
C. दृश्य प्रपंच वाद
D. सहज यथार्थवाद

Correct Answer: (a) केवल A, B और C
Solution:

"यह प्राकल्पना की जगत मुझसे और मेरे विचारों और भावों और संवेदनाओं से बना है और यह कि अन्य बातें कल्पना मात्र हैं।" यह विचार अहंमात्रवाद, प्रत्ययवाद तथा दृश्य प्रपंचवाद के विपरीत है। परन्तु यह विचार सहज यथार्थवाद के अनुकूल है। सहज यथार्थवाद एक अचेतन संज्ञानात्मक आदत है जो जागरुकता के प्रत्येक क्षण में संचालित होती है। महज यथार्थवाद के अनुसार धारणा की वस्तुएँ केवल बाहरी वस्तुओं का प्रतिनिधित्व नहीं है। बल्कि वास्तव में वे बाहरी वस्तुएँ हैं।

5. यह कथन निम्नलिखित दार्शनिक विचार के अनुरूप है। कि "इन्द्रिय दत्त के भौतिक कारण होते हैं"

A. सहज यथार्थवाद
B. प्रतिनिधानात्मक यथार्थवाद
C. प्रत्ययवाद
D. अहंमात्रवाद
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनेंः

Correct Answer: (a) केवल A और B
Solution:

कथन "इन्द्रिय दत्त के भौतिक कारण होते हैं" सहज यथार्थवाद, प्रतिनिधानात्मक यथार्थवाद के अनुरूप है। महज यथार्थवाद एक अचेतन संज्ञानात्मक विचार है जो चेतना के प्रत्येक क्षण में संचालित होती है। सहज यथार्थवाद के अनुसार धारणा की वस्तुएँ केवल बाहरी वस्तुओं का प्रतिनिधित्व नहीं है, बल्कि वास्तव में वे बाहरी वस्तुएँ हैं। प्रतिनिधानात्मक यथार्थवाद के अनुसार "हम बाहरी दुनिया को वैसा नहीं समझते जैसा वह वास्तव में है, लेकिन केवल अपने विचारों और दुनिया के व्याख्याओं के बारे में जानते हैं।

6. निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर उसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए :

मानव बुद्धि या गवेषणा के सभी विषयों को दो प्रकारों में बांटा जा सकता है- प्रत्ययों के सम्बन्ध और वस्तु स्थिति । पहले प्रकार के अंतर्गत ज्यामिति, बीजगणित और अंक गणित संक्षेपतः प्रत्येक प्रतिज्ञान जो या तो अन्तः प्रज्ञात्मक या निरूपणात्मक रूप से निश्चित हों, आते हैं। कर्ण का वर्ग दो भुजाओं के वर्ग के बराबर होता है- यह एक ऐसा तर्क वाक्य है जो इन आकृतियों के बीच सम्बन्ध को अभिव्यक्त करता है। पांच का तीन गुना तीस के आधे के बराबर होता है- यह इन संख्याओं के बीच सम्बन्ध को अभिव्यक्त करता है।
इस प्रकार के तर्क वाक्य की खोज केवल ऐसी विचार संक्रिया द्वारा ही की जा सकती है जो ब्रह्माण्ड के किसी भी अस्तित्व पर निर्भर नहीं करते हैं। यद्यपि प्रकृति में कहीं भी वृत्त या त्रिभुज नहीं है, फिर भी यूक्लिड द्वारा दर्शाए गए सत्य हमेशा अपनी निश्चितता और साक्ष्य बनाए रखेंगे। वस्तु स्थिति जो मानव बुद्धि के दूसरे विषय हैं, को इसी प्रकार निश्चित नहीं किया जाता है, न ही उनकी सत्यता का हमारे पास साक्ष्य है।
चाहे जितना भी महान हो.. ...किसी भी वस्तु स्थिति का विलोम अभी भी संभव हैः क्योंकि इसमें विरोधाभास का पुट नहीं हो सकता है और मन इसे उतनी ही सुगमता और स्पष्टता से ग्रहण करता है मानो हमेशा यथार्थ के साथ सहज हो ।
इस गद्यांश के परिप्रेक्ष्य के अनुसार वस्तु स्थिति से सम्बन्धित तर्क की प्रकृति किस पर आधारित है:

Correct Answer: (a) प्रत्यक्ष और अनुमान दोनों
Solution:

वस्तु स्थिति से सम्बनिधत तर्क की प्रकृति प्रत्यक्ष और अनुमान पर आधारित होती है। वस्तुस्थिति जो मानव बुद्धि के दूसरे विषय है, को इसी प्रकार निश्चित नहीं किया जा सकता है और न ही उनकी सत्यता का हमारे पास कोई साक्ष्य है। किसी भी वस्तुस्थिति का विलोम अभी भी संभव है क्योंकि इसमें विरोधाभास का पुट नहीं हो सकता और मन उसे उतनी ही सुगमता और स्पष्टता से ग्रहण कर सकता है मानो हमेशा यथार्थ के साथ सहज हो।

7. इस गद्यांश के परिप्रेक्ष्य में इन्द्रियानुभाविक विज्ञानों में ज्ञान निम्नलिखित में से किस प्रकार के विषय के अंतर्गत आएगा?

Correct Answer: (c) प्रत्ययों का सम्बन्ध
Solution:

प्रस्तुत गद्यांश के अनुसार इन्द्रियानुभविक विज्ञानों में ज्ञान 'प्रत्ययों के सम्बन्ध' के अंतर्गत आएगा। प्रत्ययों के सम्बन्ध के अंतर्गत ज्यामिति, बीजगणित, अंकगणित संक्षेपतः प्रत्येक प्रतिज्ञान जो या तो अन्तः प्रज्ञात्मक या निरूपणात्मक रूप से निश्चित हों आते हैं।

8. नीचे दो कथन दिए गए हैं: एक को अभिकथन (A)और दूसरे को तर्क (R) कहा गया है।

अभिकथन (A): यद्यपि प्रकृति में कहीं भी वृत्त या त्रिभुज नहीं है, फिर भी यूक्लिड द्वारा दर्शाए गए सत्य हमेशा अपनी निश्चितता और साक्ष्य बनाए रखेंगे।
तर्क (R) : इस प्रकार के तर्क वाक्य की खोज केवल ऐसी विचार संक्रिया द्वारा ही की जा सकती है जो ब्रह्माण्ड के किसी भी अस्तित्व पर निर्भर नहीं करते हैं
उपर्युक्त कथनों के आलोक में निम्नांकित विकल्पों में से सही उत्तर चुनेंः

Correct Answer: (c) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है
Solution:

यद्यपि प्रकृति में कहीं भी वृत्त या त्रिभुज नहीं है फिर भी यूक्लिड द्वारा दर्शाए गए सत्य हमेशा अपनी निश्चितता और साक्ष्य बनाए रखेंगे। इसका कारण यह है कि इस प्रकार के तर्क वाक्यों की खोज केवल ऐसी विचार प्रक्रिया द्वारा ही की जा सकती है जो ब्राह्माण्ड के किसी भी अस्तित्व पर निर्भर नहीं करते। इस व्याख्या से स्पष्ट है कि कथन और तर्क दोनों सत्य हैं तथा तर्क द्वारा कथन की स्पष्ट व्याख्या की जाती है।

9. यह तथ्य कि कल सूर्योदय नहीं होगा- यह तर्क वाक्य इस प्रतिज्ञान कि कल सूर्योदय होगा से कम सुग्राह्य और अधिक विरोधाभासी नहीं है। अतः हमें व्यर्थ ही इसके झूठेपन को दर्शाने का प्रयास करना चाहिए। इस गद्यांश के अनुसार निम्नलिखित में से कौन-सा इस कथन के लिए सर्वाधिक उपयुक्त तर्क हो सकता है?

A. कि 'कल सूर्योदय नहीं होगा' और 'कल सूर्योदय होगा' दोनों कथन वस्तु स्थिति हैं।
B. कल सूर्योदय नहीं होगा और 'कल सूर्योदय होगा' दोनों कथनों में कोई विरोधाभास नहीं है।
C. मन दोनों कथनों को उतनी ही सुगमता और स्पष्टता से ग्रहण करता है
D. इस प्रकार के तर्क वाक्य की खोज केवल विचार संक्रिया से की जा सकती है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनेंः

Correct Answer: (b) केवल A, B और C
Solution:

प्रश्नगत कथन "कल सूर्योदय नहीं होगा, यह तर्क वाक्य इस प्रतिज्ञान की कल सूर्योदय होगा" के लिए निम्नलिखित तर्क उपयुक्त होंगे-
(1) कि 'कल सूर्योदय नहीं होगा और 'कल सूर्योदय होगा' दोनों कथन वस्तु स्थिति हैं।
(2) 'कल सूर्योदय नहीं होगा' और 'कल सूर्योदय होगा' दोनों कथनों में कोई विरोधाभास नहीं है। (3) मन दोनों कथनों को उतनी ही सुगमता और स्पष्टता से ग्रहण करता है।

10. दिए गए गद्यांश के अनुसार ज्यामिति किससे सम्बन्धित है:

Correct Answer: (d) प्रत्ययों के सम्बन्ध
Solution:

मानवीय बुद्धि के सभी विषयों को दो प्रकार में बांटा जा सकता है
(i) प्रत्ययों के सम्बन्ध (ii) वस्तुस्थिति ।
प्रत्ययों के सम्बन्ध के अंतर्गत ज्यामिति, बीजगणित, अंकगणित संक्षेप में, प्रत्येक प्रतिज्ञान जो या तो अन्तः प्रज्ञात्मक या निरूपणात्मक रूप से निश्चित, हो आते हैं।