यूजीसी नेट/जेआरएफ परीक्षा, जून-2019 योग (YOGA)

Total Questions: 88

1. क्षणिकवाद का सिद्धान्त किस दर्शन से संबंधित है?

Correct Answer: (b)बौद्ध
Solution:

क्षणिकवाद का सिद्धांत बौद्ध दर्शन से संबंधित है। बौद्ध दर्शन तीन मूल सिद्धांत पर आधारित माना गया है -

1. अनीश्वरवाद
2. अनात्मवाद
3. क्षणिकवाद

इस ब्रह्मांड में सब कुछ क्षणिक और नश्वर है। कुछ भी स्थायी नहीं। सब कुछ परिवर्तनशील है। यह शरीर और ब्रह्मांड उसी तरह है जैसे कि घोड़े, पहिए और पालकी के संगठित रूप को रथ कहते हैं और इन्हें अलग करने से रथ का अस्तित्व नही माना जा सकता। यही क्षणिकवाद का सिद्धांत है।

उपर्युक्त तीनों सिद्धांतों के आधार पर ही बौद्ध दर्शन की रचना हुई। इन तीन सिद्धांतों पर आगे चलकर थेरवाद, वैभाषिक, सौत्रान्त्रिक, माध्यमिक, (शून्यवाद), योगाचार (विज्ञानवाद) और स्वतंत्र योगाचार का दर्शन गढ़ा गया।

2. 'भगवद्गीता' के अनुसार रजोगुण का क्या परिणाम होता है?

Correct Answer: (e) a और c
Solution:

'भगवद्गीता' के अनुसार रजोगुण के कारण लोभ और काम की उत्पत्ति होती है। श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन ! यह प्रकृति तीन गुणों से मिलकर बनती है- सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण। जब व्यक्ति में सतोगुण की वृद्धि होती हैं तो वह प्रकाशमय, निर्मल एवं ज्ञानमय हो जाता है। लेकिन हे अर्जुन !

जो व्यक्ति 'रजोगुण', जो रागस्वरुप है, में असक्त हो जाता है वह रजोगुण के कारण 'कर्मफल' के बंधन में बंध जाता है। जिसके परिणामस्वरूप लोभ और काम की उत्पत्ति होती है। तमोगुण से आलस्य व प्रमाद उत्पन्न होता है। यही प्रकृति के त्रिगुण हैं। इन्ही त्रिगुणों के कारण व्यक्ति सांसारिक बंधन में बंधता जाता है।

3. 'महाभारत' के उस पर्व का नाम बताएँ जिसमें विष्णुसहस्रनाम उल्लेखित है।

Correct Answer: (e) *
Solution:

महाकाव्य 'महाभारत' के 'अनुशासन पर्व अध्याय में भगवान विष्णु के एक हजार नामों का उल्लेख है जिसे विष्णुसहस्त्रनाम कहा जाता है। जब भीष्म पितामह बाणों की शय्या पर लेटे हुए अपनी इच्छा मृत्यु के लिए सही समय का इंतजार कर रहे थे, तब उन्होंने ये एक हजार नाम युधिष्ठिर को बताए थे।

ज्ञान पाने की इच्छा से जब युधिष्ठिर ने भीष्मपितामह से यह पूछा कि कौन ऐसा है, जो सर्व व्याप्त है और सर्व शक्तिमान है? तो पितामह ने भगवान विष्णु के ये एक हजार नाम बताए थे। विष्णुसहस्त्रनाम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह हिन्दू धर्म के दो प्रमुख सम्प्रदाय शैव और वैष्णवों के बीच जुड़ाव का काम करता है। प्रश्नगत विकल्पों में से कोई भी विकल्प सही न होने की दशा में परीक्षा संस्था ने इस प्रश्न को निरस्त (Cancelled) कर दिया है।

4. 'मुण्डकोपनिषद्' में ईश्वर के सिर की किससे तुलना की गई है?

Correct Answer: (a) अग्नि
Solution:

'मुण्डकोपनिषद् में ईश्वर के सिर की तुलना अग्नि से की गई है। मुण्डकोपनिषद् अथर्ववेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इसके रचयिता वैदिक काल के ऋषियों को माना जाता है परन्तु मुख्यतः वेदव्यास जी को कई उपनिषदों का लेखक माना जाता है। ईश्वर पूर्ण है कर्मों का अधिष्ठाता ईश्वर केवल भक्ति से प्रसन्न होता है।

वही विश्व का स्त्रष्टा, पालक और संहारक है। वह अवतारों और व्यूहों में प्रकट होता है। वेदों के अध्ययन से ईश्वर के स्वरूप का ज्ञान होता है। अतः वह अनिर्वचनीय ही है। पर उसको पूर्ण रूप से जानना भी सहज नही है। ईश्वर के गुण अनन्त हैं, अतः उसकी सत्ता सीमित नहीं है। वह अपनी इच्छा से ही विश्व का नियमन करता है।

5. बौद्ध दर्शन के अनुसार 'सम्यक्व्यायाम' का आशय है:

Correct Answer: (d) विचार शुद्धि
Solution:

बौद्ध दर्शन के अनुसार 'सम्यक व्यायाम' का आशय विचार शुद्धि से है। बौद्ध परंपरा में जिन अष्टांगिक मार्गों का विवेचन किया गया है, उनमें सम्यक् व्यायाम का अर्थ है- विचारपूर्वक किया गया पुरुषार्थ। हम कौन हैं, कहां से आए हैं, कहा जाना है और हमारे जन्म लेने का क्या अभिप्राय है। इन जिज्ञासाओं के समाधान में आचार्यों ने कहा है कि व्यक्ति का अपने जीवन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे पुरुषार्थों की प्राप्ति करना ही इसका लक्ष्य है।

और इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए किया जाने वाला कर्म ही 'सम्यक् व्यायाम' है। इसके व्याख्यान में उनका यह अभिमत प्रकट होता है कि इसे अपने जीवन में अकरणीय, अकुशलकर्म, प्रारंभ ही नहीं करने चाहिए। जैसे कि वह असत्य न बोले चोरी न करे, जुआ न खेले, व्यभिचार से दूर रहे, हिंसा न करे, और परद्रव्यहरण तथा परनिंदा जैसे अकर्मों से बचे।

6. आत्मा किसकी अवधारणा है?

Correct Answer: (a) वेदान्त दर्शन
Solution:

आत्मा वेदान्त दर्शन की अवधारणा है। वेदान्त ज्ञानयोग का एक स्रोत है जो व्यक्ति को ज्ञान प्राप्ति की दिशा में उत्प्रेरित करता है। इसका मुख्य स्रोत उपनिषद है जो वेद ग्रंथों और वैदिक साहित्य का सार समझे जाते हैं। उपनिषद् वैदिक साहित्य का अंतिम भाग है, इसलिए इसको वेदांत कहते हैं।

वेदान्त की तीन शाखाएँ जो सबसे ज्यादा जानी जाती हैं वे हैं- अद्वैत वेदान्त, विशिष्ट अद्वैत और द्वैत । आदि शंकराचार्य, रामानुज और श्री मध्वाचार्य जिनको क्रमशः इन तीनों शाखाओं का प्रवर्तक माना जाता है। वेदांत दर्शन पारमार्थिक दृष्टया एकमात्र तत्व ब्रह्म या आत्मा को मानता है। इससे भिन्न जो कुछ भी दृश्यमान है, वह सभी अतत्व है। इसे अज्ञान, माया, अवस्तु भी कहा जाता है। तत्व के ज्ञान के लिए अतत्व का ज्ञान भी अनिवार्य है।

7. 'भगवद्गीता' के अनुसार 'सर्वभूतहितेरताः ' किस योगी के लक्षण हैं?

Correct Answer: (c) भक्ति योगी
Solution:

'भगवद्गीता' के अनुसार 'सर्वभूतहितेरताः' भक्ति योगी के लक्षण हैं। अध्यात्म क्षेत्र में निष्काम बुद्धि ही 'हृदय' कहलाती है। और यह हृदय अब तैयार होता है ईश्वर के स्वरुप को समझने के लिए इसलिए 'भगवतदगीता' के सातवें से बारहवें अध्याय तक 'भक्ति योग' में ईश्वर के स्वरुप का भरपूर वर्णन है।

जब ईश्वर के स्वरूप को समझ कर अपने भीतर उस ईश्वरत्व का अनुभव करने का मार्ग खोजा जाता है तो वही 'ज्ञान योग' कहलाता हैं। जिसका वर्णन 'भगवद्गीता' में तेरहवें से अठ्ठारहवें अध्याय का विषय है। तीसरे से छठें अध्याय तक 'कर्म योग' की प्रस्तावना है। कर्म योग से निष्काम कर्म (कर्म कर फल की इच्छा नहीं कर) के बीच डालते हैं जो हमारी बुद्धि को कामनाओं से आजाद करती है।

8. 'योगवाशिष्ठ' के अनुसार निम्नलिखित में से ज्ञान की कौन सी षष्ठ अवस्था है?

Correct Answer: (d) पदार्थ भावना
Solution:

'योगवाशिष्ठ' ग्रन्थ छः प्रकरणों (458 सग) में पूर्ण है। योगवाशिष्ठ की श्लोक संख्या 29 हजार है। महाभारत के बाद यह हिन्दू धर्म का दूसरा सबसे बड़ा धर्मग्रन्थ है। योगवाशिष्ठ के अनुसार ज्ञान की छः अवस्था बताई गई है जो निम्नलिखित है - 1. वैराग्यप्रकरण (33 सर्ग) 2. मुमुक्षु व्यवहार प्रकरण (20 सर्ग) 3. उत्पत्ति प्रकरण (122 सर्ग) 4.स्थिति प्रकरण (62 सर्ग) 5. उपशम प्रकरण (93 सर्ग) 6. निर्वाण प्रकरण या पदार्थ भावना (पूर्वार्ध 128 सर्ग तथा उत्तरार्ध 216 सर्ग) प्रथम वैराग्य प्रकरण में उपनयन संस्कार के बाद राम अपने भाइयों के साथ गुरुकुल में अध्ययनार्थ गए।

अध्ययन समाप्ति के बाद तीर्थयात्रा से वापस लौटने पर राम विरक्त हुए। महाराज दशरथ की सभा में वे कहते हैं कि वैभव, राज्य, देह और आकांक्षा का क्या उपयोग है। कुछ ही दिनों में काल इन सब का नाश करने वाला है। अपनी मनोव्यथा का निवारण करने की प्रार्थना उन्होंने अपने गुरु वशिष्ठ और विश्वमित्र से की। छठे प्रकरण का पूर्वार्ध और उत्तरार्ध में विभाजन किया गया है। इसमें संसारचक्र में फँसे हुए जीवात्मा को निर्वाण अर्थात निरतिशय आनन्द की प्राप्ति का उपाय प्रतिपादित किया गया है।

9. 'भगवद्गीता' के अनुसार सर्वकर्मसिद्धि के कितने कारणों का उल्लेख है?

Correct Answer: (c) पाँच
Solution:

'भगवद्गीता' के अनुसार सर्वकर्मसिद्धि के पाँच कारणों का उल्लेख है। सभी ग्रंथों में से श्रीमद् भगवद्‌गीत को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसमें व्यक्ति के जीवन का सार है। और इसमें महाभारत काल से लेकर द्वापर में कृष्ण की सभी लीलाओं का वर्णन किया गया है। गीता की गणना प्रस्थानत्रयी में की गयी है, जिसमें उपनिषद् और ब्रह्मसूत्र भी सम्मिलित है। अतएव भारतीय परम्परा के अनुसार गीता का स्थान वही है जो उपनिषद् और धर्मसूत्रों का है। उपनिषदों को गौ और गीता को उसका दुग्ध कहा गया है।

10. "नासतो विद्यते भावो ना भावो विद्यते सतः । उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ।।" 'गीता' के अनुसार यह श्लोक किसके अमरत्व के बारे में कहता है?

Correct Answer: (c) शरीर
Solution:

'गीता' के अनुसार प्रश्नगत श्लोक में आत्मा के अमरतत्व के बारे में कहा गया है। श्लोक का भावार्थ असत् वस्तु की तो सत्ता नहीं है और सत् का अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनों का ही तत्व तत्वज्ञानी पुरुषों द्वारा देखा गया है। नासतो विघते भावः शरीर उत्पत्ति के पहले भी नही था, मरने के बाद भी नहीं रहेगा और वर्तमान में भी इसका क्षण- प्रतिक्षण अभाव हो रहा है।

तात्पर्य है कि यह शरीर भूत, भविष्य और वर्तमान - इन तीनों कालों में कभी भाव रूप से नहीं रहता। अतः यह असत है। यह शरीर तो संसार का एक छोटा-सा नमूना है, इसलिए शरीर के परिवर्तन से संसार मात्र के परिवर्तन का अनुभव होता है।