यूजीसी NTA नेट/जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर-2022 योग (YOGA)

Total Questions: 100

1. ''तां योगमिति मन्यते स्थिरामिन्द्रिय धारणाम्।" योग की यह परिभाषा किस ग्रंथ में दी गयी है?

Correct Answer: (c) कठोपनिषद्
Solution:

कठोपनिषद के अध्याय 2 के वल्ली 3 की कविता है -

''ता योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रिय धारणाम्।
अप्रमन्तस्तद भवति योग हि प्रभवप्यौ ।।"

अर्थ - जब इन्दिया मन में कैद हो जाती है तब अंविचलित अवस्था, इसके बारे में वे कहते है। "यह योग है।" तब मनुष्य बहुत सतर्क हो जाता है, क्योकि योग वस्तुओं का जन्म और उनका अन्त है।

2. न्याय दर्शन के अनुसार परार्थानुमान में पञ्चावयव वाक्यों में प्रतिज्ञा का स्थान है-

Correct Answer: (a) प्रथम
Solution:

न्याय दर्शन भारत के छः वैदिक दर्शनो में एक दर्शन है इसके प्रवर्तक ऋषि अक्षपाद गौतम है जिनका न्याय सूत्र इस दर्शन का सबसे प्राचिन एवं प्रसिद्ध ग्रन्थ है। न्याय दर्शन के अनुसार परानुमान में पंचवयव वाक्यो में प्रतिज्ञा का प्रथम स्थान है।

3. रामचरितमानस के अरण्यकाण्ड में नवथा 'भगति' के अंतर्गत तीसरी 'भगति' है-

Correct Answer: (b) गुरु के चरणकमलों की सेवा
Solution:

श्री राम चरित मानस अरण्यकाण्ड अर्थात्:- तीसरी भक्ति है अभिमानरहित होकर गुरू के चरण कमलो की सेवा और चौथी भक्ति यह है कि कपट छोड़कर मेरे गुण समूहो का गान करे। गुरू के चरण कमलों की सेवा करना तीसरी "चरण सेवा' भक्ति है

4. "कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः ।

एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥"

कर्म योग में कर्म बंधन से मुक्त होने का यह साधन किस ग्रंथ में बताया गया है?

Correct Answer: (b) ईशावास्योपनिषद्
Solution:

'कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः ।
एवं त्वयि नान्यथेतोडस्ति न कर्म लिप्यते नरे ।।"

अर्थात इस संसार में धर्म युक्त निष्काम कर्मों को करते हुए सौ वर्ष तक जीवन जीने की इच्छ करनी चाहिए। इस प्रकार जो धर्म युक्त कर्मों में लगा रहता है, वह अधर्मयुक्त कर्मों में अपने को नही लगाता" - ईशावास्योपनिषद्

5. योग वाशिष्ठ के अनुसार प्राणस्पन्द निरुद्ध होता है-

Correct Answer: (a) गुरु उपदिष्ट (युक्ति)
Solution:योग वाशिष्ठ के अनुसार प्राणस्पन्द गुरू उपदिष्ट (युक्ति) द्वारा निरूद्ध होता है।

6. 'अन्यत् श्रेयः अन्यत् उत् एव प्रेयः,

उभे नानार्थे पुरुषं सिनीतः ।'
किस उपनिषद में कहा गया है?

Correct Answer: (d) कठ
Solution:

कठोपनिषद के अध्याय एक के वल्ली दो का श्लोक है-

"अन्यत् श्रेयः अन्यत् उत् एवं प्रेम उभे नानार्थे पुरूषं सिनीतः ।
पणोः श्रेयस आददानस्य साधुर्भवति हीयतेउर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ।"

अर्थ - "एक चीज अच्छी है और दुसरी चीज सुखद है, और दोनों एक आदमी को अलग-अलग अर्थो से प्रभावित करती है। इसमे से जो उत्तम को ग्रहण करता है, उसका भला होता है वह जीवन के लक्ष्य से गिर जाता है जो सुखद को चुनता है।

7. मुण्डक उपनिषद के संबंध में सही उत्तर का चयन कीजिए।

Correct Answer: (c) प्रणवो धनुः
Solution:

श्रोक 2.2.4

'प्रणवो धनुःशारो हयात्मा ब्रह्मा तल्लक्ष्यमुच्यते।
अप्रमत्तेन वेधव्यं शखत्तन्मयो भवेत ॥4॥

अर्थ - प्रणव कैसे है, आत्मा वाण है और ब्रह्म उसका चिन्ह कहा गया है। यह उसे उस व्यक्ति द्वारा मारा जाना चाहिए जो आत्मसंग्रहित है और हिट हो जाता है, तीर की तरह, निशान के साथ एक हो जाता है, यानी ब्राह्मण।

8. जिन प्रश्नों के साथ केनोपनिषद् प्रारंभ होता है, उनके विषय हैं-

Correct Answer: (b) मन, प्राण, वाणी, चक्षु एवं कर्ण
Solution:

केना (संस्कृत केन) का शाब्दिक अर्थ है, वस्तु विषय संदर्भ के आधार पर "किसके द्वारा, कहाँ से, कैसे, क्यों, किस कारण से"। केना की यह जड़, "किसके द्वारा, या किस कारण से का अर्थ मे, केना उपनिषद का जिज्ञासु पहला छंद इस प्रकार पाया जाता है,

'केने षितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रतियुक्तः केने षितां वाचमिमां वदन्ति चक्षु श्रोत क ड देवोयुनक्ति॥

अर्थ - किसके द्वारा भेजा गया, मन उधर उड़ जाता है किसके द्वारा सताए हुए, पहली सांस उधर घूयते है जो वाणी हम बोलते है वह कौन भेजता है: ' वह देवता कौन है जो कानों और आंखों का दोहन करता है।

9. यह आत्मा बलहीन के द्वारा लभ्य नहीं है'- कहा गया है-

Correct Answer: (d) मुंडक उपनिषद्
Solution:"न अयम् आत्मा प्रवचनेन लभ्यः .....” परब्रह्म की प्राप्ति विषयक मुण्डोकोपनिषद् के वचन वैदिक ग्रन्थ 'मुंडक उपनिषद' में परब्रह्म के स्वरूप और उसे प्राप्त करने के मार्ग का वर्णन किया गया है।

10. ध्यानबिन्दूपनिषद् के अनुसार प्राणवायु को खींचकर, कुम्भक द्वारा रोकने पर (होने वाले प्राणायाम के) परिश्रम द्वारा जो स्वेदकण (पसीना) निकलता है, उसे-

Correct Answer: (b) अंगों में ही मर्दन करना चाहिए।
Solution:

प्राणवायु की खीचकर, कुम्भक द्वारा रोकने पर, परिश्रम द्वारा जो पसीना निकलता है उसे अंगों में ही मर्दन (मालिश) करना चाहिए।