NTA यू.जी.सी. नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर-2022 (हिन्दी) Shift-I

Total Questions: 100

1. भाषा के रूप में अवधी का प्रथम प्रयोग किस रचना में मिलता है?

Correct Answer: (a) खालिक बारी
Solution:

भाषा के रूप में 'अवधी' का प्रथम प्रयोग खालिक बारी में मिलता है। खालिकबारी अमीर खुसरो की रचना है। अवध क्षेत्र में व्यवहत बोली ही अवधी कहलाई।
अवधी की उत्पत्ति और उसके विकास पर चर्चा की जाय तो दो भाषा वैज्ञानिकों के मत हमारे सामने आते हैं। जहाँ जार्ज ग्रिर्यसन ने अवधी या पूर्वी हिन्दी को शौरसेनी एवं मागधी के बीच की अर्द्धमागधी से उत्पन्न माना था, वहीं बाबूराम सक्सेना इसे कोसली से उद्धृत मानते है।
मूलतः अवधी के विकास को तीन काल खण्डों में विभाजित किया जा सकता है-
1- प्रारम्भ से 1400 ई. तक
2- 1400 ई.से 1700 ई. तक
3- 1700 ई. से आज तक
प्रारम्भिक अवधी के उदाहरण पीपरहवाँ, सोहगौरा, सारनाथ, रुम्मिनदेई एवं खैरागढ़ के अभिलेख हैं।
अवधी का उदाहरण प्राकृत पैंगलम् 'राउलवेलि, उक्ति व्यक्ति प्रकरण एवं कीर्तिलता आदि ग्रंथो की भाषा में देखा जा सकता है। यहाँ तक कि हेमचन्द की अपभ्रंश भाषा में भी अवधी की ही प्रधानता है।

काव्य भाषा के रूप में अवधी को प्रतिष्ठित करने का श्रेय सूफी कवियों को दिया जाता है
'उक्ति व्यक्ति प्रकरण' हिन्दी का प्रथम गद्य ग्रन्थ है। इसकी रचना दामोदर शर्मा ने 12वीं शताब्दी के आसपास किया।यह एक व्याकरण ग्रन्थ है।
चंदायन, मुल्ला दाऊद कृत हिन्दी का प्रथम सूफी प्रेमकाव्य है। इसमें नायक लोर (लोरिक) तथा नायिका चंदा की प्रेमकथा वर्णित है। मृगावती कुतुबन की रचना है जो सन् 1501 ई. में लिखी गयी थी। इसमें चन्द्रनगर के राजा गणपतिदेव के राजकुमार और कंचनपुर के राजा रूप मुरारि की कन्या मृगावती की प्रेमकथा का वर्णन है।

2. प्रथम राजभाषा आयोग की स्थापना कब की गई?

Correct Answer: (d) 7 जून 1955
Solution:

राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने सन् 1955 ई० में बाल गंगाधर (बी. जी.) खेर की अध्यक्षता में 'राजभाषा आयोग' का गठन किया। इस आयोग में 21 सदस्य थे। 'राजभाषा आयोग' ने अपना प्रतिवेदन 1956 में दिया जो संसद के समक्ष 1957 में रखा गया। 'राजभाषा आयोग' की सिफारिशों की समीक्षा करने के लिए सन् 1957 ई. में गोविन्द बल्लभ पंत की अध्यक्षता में सयुक्त संसदीय राजभाषा समिति का गठन किया गया। श्री बी०जी० खेर की अध्यक्षता में राजभाषा आयोग का गठन निम्नलिखित विषयों पर सिफारिशें करने के लिए किया गया-
(क) संघ के सरकारी कामकाज के लिए हिन्दी भाषा का क्रमशः अधिक से अधिक प्रयोग।
(ख) संघ के सभी या कुछ सरकारी कामों के लिए अंग्रेजी भाषा के प्रयोग की मनाही
। (ग) संविधान के अनुच्छेद 348 में वर्णित सभी अथवा कुछ कार्यो के लिए किस भाषा का प्रयोग किया जाए।
(घ) संघ के किसी या किन्ही खास कार्यों के लिए प्रयोग में आने वाले अंकों का रूप ।
(ङ) एक समग्र अनुसूची तैयार करना जिसमें ये बताया जाए कि कव और किस प्रकार संघ की राजभाषा तथ संघ एवं राज्यों के बीच और एक राज्य और दूसरे राज्यों के बीच संचार की भाषा के रूप में अंग्रेजी का स्थान धीरे-धीरे हिन्दी ले।
भारत के राष्ट्रपति ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 344 (1) में प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए 7 जून 1955 को श्री बी.जी. खेर की अध्यक्षता में राजभाषा आयोग का गठन किया।

3. बघेली बोली किस अपभ्रंश से विकसित हुई है?

Correct Answer: (c) अर्धमागधी
Solution:बघेली बोली अर्द्धमागधी अपभ्रंश से विकसित हुई है। उत्तर भारत में अपभ्रंश के सात भेद रूप प्रचलित थे,
जिनसे आधुनिक भारतीय भाषाओं का जन्म हुआ। अपभ्रंश के ये सात रूप इस प्रकार हैं-
पूर्वी हिन्दी के अन्तर्गत 3 बोली आती है-
अपभ्रंश-आधुनिक भारतीय भाषाएं
1. शौरसेनी अपभ्रंश-पश्चिमी हिन्दी, राजस्थानी, गुजराती
2. पैशाची अपभ्रंश-लहँदा, पंजाबी
3. ब्राचड अपभ्रंश-सिंधी
4. खस अपभ्रंश-पहाड़ी-कुमाँऊनी, गढ़वाली
5. महाराष्ट्री अपभ्रंश-मराठी
6. अर्द्धमागधी अपभ्रंश-पूर्वी हिन्दी
7. मागधी अपभ्रंश-बिहारी, बंगाली, उड़िया, असमिया

(1) अवधी
(2) बघेली
(3) छत्तीसगढ़ी
बघेली का अन्य नाम रीवाई तथा इसकी उपबोली निबट्ठा है। बघेली, रीवा, जबलपुर, मण्डला, मिर्जापुर के कुछ क्षेत्रों में बोली जाती है। बघेली बोली उदासीन आकार बहुला बोली है।

4. 'स्पर्श-संघर्षी' व्यंजन ध्वनि कौन सी है-

Correct Answer: (d) झ
Solution:जिन व्यंजनों के उच्चारण में स्पर्श का समय अपेक्षाकृत अधिक होता है और उच्चारण के बाद वाला भाग संघर्षी हो जाता है, वे स्पर्श संघर्षी कहलाते है। च, छ, ज, झ स्पर्श संघर्षी व्यंजन है।

'स' ऊष्म व्यंजन है, क्योंकि इन्हे बोलने से साँस की ऊष्मा जिह्वा दाँत को स्पर्श करती है। इसे दन्तमूल भी कहते है। 'य' अन्तःस्थ व्यंजन है। अन्तःस्थ व्यंजन के अन्तर्गत य, र, ल, व आते है। इनका उच्चारण जीभ, तालु, दाँत और ओठों के परस्पर सटाने से होता है, किन्तु कहीं पूर्ण स्पर्श नहीं होता है। अतः ये चारों अन्तस्थ व्यंजन 'अर्द्धस्वर' कहलाते हैं। 'न' स्पर्श व्यंजन के अन्तर्गत 'त' वर्ग (त, थ, द, ध, न) में आता है।

5. हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास नामक ग्रंथ में किस कालावधि का साहित्येतिहास वर्णित है?

Correct Answer: (b) 693 से 1693 ई.
Solution:

'हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास' नामक ग्रंथ में 693 ई. से 1693 ई० के कालावधि का साहित्येतिहास वर्णित है। हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास ग्रन्थ के लेखक डॉ० रामकुमार वर्मा है। ग्रंथ में सन्धिकाल से लेकर भक्तिकाल तक की अवधि अर्थात 693ई० से 1693 ई० तक की कालावधि को लिया। डॉ० वर्मा जी ने सम्पूर्ण ग्रंथ को सात प्रकरण में विभक्त किया। इन्होने स्वयंभू को जो कि अपभ्रंश के सबसे पहले कवि हैं, हिन्दी का पहला कवि मानते हुये हिन्दी साहित्य का आरम्भ 693 ई० से स्वीकार किया।
हिन्दी-साहित्य के इतिहास लेखन का सबसे पहला प्रयास फ्रेंच विद्वान 'गार्सा द तासी' ने किया। तासी के पुस्तक का नाम 'इस्त्वार द ला लितरेत्युर ऐन्दुई-ए-ऐन्दुस्तानी' है।
डॉ० लक्ष्मीसागर वाष्णेय ने तासी के ग्रन्थ का हिन्दी अनुवाद 'हिन्दुई साहित्य का इतिहास' नाम से प्रकाशन सन् 1952 ई० में कराया।
हिन्दी साहित्येतिहास लेखन की परम्परा में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा रचित 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' का स्थान सर्वोच्च है। आचार्य शुक्ल का इतिहास मूलतः नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित 'हिन्दी शब्दसागर की भूमिका' के रूप में 'हिन्दी-साहित्य का विकास' शीर्षक से सन् 1929 ई० में प्रकाशित हुआ।

6. "देसिल बअना सब जन मिट्ठा। तें तैसन जंपओ अवहट्ठा।" किसने कहा-

Correct Answer: (c) विद्यापति
Solution:

"देसिल बअना सब जन मिट्ठा। तें तैंसन जंपओ अवहट्ठा।" पंक्ति विद्यापति की है। पंक्ति का आशय है- देशी भाषा (बोलचाल की भाषा) सब को मीठी लगती है, इससे वैसा ही अपभ्रंश (देशी भाषा मिला हुआ) जैसे मैं कहता हूँ। विद्यापति ने अपभ्रंश से भिन्न, प्रचलित बोलचाल की भाषा को 'देशी भाषा' कहा है।
बालचंद बिज्जावइ भाषा। दुहु नहिं लग्गइ दुज्जन हासा।। पंक्ति विद्यापति की है। देवसेन नामक एक जैन ग्रंथकार हुए है। उन्होने सन् 933 में 'श्रावकाचार' नाम की एक पुस्तक दोहों में बनाई थी, जिसकी भाषा अपभ्रंश का अधिक प्रचलित रूप लिए हुए है, जैसे-
जो जिण सासण भाषियउ सो मइ कहियउ सारु ।
जो पालइ सइ भाउ करि सो सरि पावइ पारु ।।
गोरखनाथ का 'नाथपंथ' बौद्धों की वज्रयान शाखा से निकला हुआ माना जाता है।।
"नौ लख पातरि आगे नाचें, पीछे सहज अखाड़ा।
ऐसे मन लौ खेलै, तब अंतरि बसै भण्डारा ।।
हेमचन्द का व्याकरण ग्रंथ शब्दानुसासन 'सिद्ध हेम' नाम से प्रसिद्ध है। अन्य पुस्तक है- कुमार पाल चरित्र, योगशास्त्र, प्राकृत व्याकरण, छन्दोनुशासन और देशी नाममाला कोष' ।

7. राधा के प्रेम संवेदन के माध्यम से जीवन को समझने का एक सफल प्रयत्न किस रचना में है?

Correct Answer: (d) कनुप्रिया
Solution:कनुप्रिया में राधा के प्रेम-संवेदन के माध्यम से जीवन को समझने का एक सफल प्रयत्न किया गया है। इसका प्रकाशन वर्ष 1959 ई० है। 'कनुप्रिया' पूर्वमान्य रूप में नहीं, एक नये अर्थ में प्रबन्धकाव्य है। इसमें कृष्ण के साथ बीते राधा के तन्मय क्षणों की विभिन्न स्थितियों को रूप देना ही कवि को अभिप्रेत है, कोई कथा कहना नहीं। यह एक ऐसा प्रबन्ध काव्य है, जो आधुनिक शिल्प और भाव बोध दोनों को आत्मसात् कर सका। 'कनुप्रिया' अपनी संवेदनात्मक गहराई और शिल्प की ताजगी के कारण एक विशिष्ट उपलब्धि है।
लोकायतन (1964) सुमित्रानंदन पंत की प्रबन्ध-कृति है, जिसमें कवि ने भारतीय जीवन की, स्वाधीनता के पहले और बाद की कथा गायी है। यह दो खण्ड़ो में विभाजित है।
आत्मजयी (1965) कुंवर नारायण की प्रबन्ध कृति है। यह 'कठोपनिषद्' के नचिकेता प्रसंग पर आधारित है।
नरेश महेता कृत संशय की एक रात (1962) में राम के मन के संशय को चिह्नित किया गया है। नरेश मेहता की अन्य रचनाएँ - वन पाँखी सुनो, बोलने दो चीड़ को, चैत्या, उत्सवा आदि हैं।

8. अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' द्वारा रचित 'ठेठ हिन्दी का ठाठ' किस विधा की रचना है?

Correct Answer: (c) उपन्यास
Solution:अयोध्या सिहं उपध्याय 'हरिऔध' द्वारा रचित 'ठेठ हिन्दी का ठाठ' उपन्यास विधा की रचना है।
इनके 'अधखिले फूल' (1907) में धार्मिक अंधविश्वसों कुपरिणाम दिखाया गया है।
का 'ठेठ हिन्दी का ठाठ' (1899) इनकी अपेक्षाकृत प्रसिद्ध रचना है।
हरिऔध जी (1865-1947) द्विवेदी-युग के प्रख्यात कवि होने के साथ-साथ उपन्यासकार, आलोचक एवं इतिहासकार भी थे। इनके काव्य ग्रंथों में 'प्रियप्रवास' (1914), 'पद्म प्रसून' (1925), 'चुभते-चौपदे(1932), 'चोखे चौपदे' (1924), 'बोलचाल, रस कलस तथा 'वैदही-वनवास' (1940) प्रसिद्ध हैं। इनमें से 'प्रियप्रवास' खड़ीबोली में लिखा गया प्रथम महाकाव्य है। 'रस कलस' की रचना ब्रजभाषा में हुई है, तथा 'प्रियप्रवास' और वैदही- वनवास की रचना खड़ी बोली में है। इनको 'कवि सम्राट' की उपाधि मिली है। 'प्रियप्रवास' पर इन्हें हिंदी का सर्वोत्तम पुरस्कार 'मंगलाप्रसाद पारितोषिक' प्रदान किया गया था। इसी प्रकार 'चुभते चौपदे' और 'चोखे चौपदे' बोलचाल की मुहावरेदार भाषा में रचित सफल काव्य-कृतियाँ हैं।

9. 'चिठिया हो तो हर कोई बांचे' निम्न में से किस साहित्यकार के पात्रों का संग्रह है?

Correct Answer: (c) रेणु
Solution:'चिठिया हो तो हर कोई बांच' रेणु के पत्रों का संग्रह है। इसका सम्पादन भारत यायावर ने किया था। इसमें 'रेणु' द्वारा कुल 65 व्यक्तियों को लिखे गए तरह-तरह के पत्र 'रेणु' जैसे संवेदनशील और प्रयोगधर्मी रचनाकार के जीवन संघर्ष के अन्तरंग और विश्वसनीय दस्तावेज है। कृष्णदत्त पालिवाल ने पत्र संवाद अज्ञेय और नंदकिशोर आचार्य के पुराने-नए लेखकों को अनगिनत पत्र लिखे हैं। 'अज्ञेय के पत्र' का सम्पादन डॉ० विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने किया। विद्यानिवासी मिश्र ललित निबन्धकार हैं। इनके ललित निबन्धों में तुम चंदन हम पानी, बसंत आ गया पर कोई उत्कंठा नहीं, छितवन की छाँह उल्लेखनीय हैं।

नागार्जुन के पत्रों (1987) का सम्पादन नरेन्द्र कोहली ने किया। पत्र-साहित्य हिन्दी-गद्य की नवीनतम विधाओं में सबसे कम समृद्ध है। पत्र-लेखन तो लिखने की कला के आविष्कार के साथ ही आरम्भ हुआ होगा; किन्तु साहित्य की एक मूल्यवान विधा मानकर प्रकाशित करने और उसके कला रूप का विश्लेषण करने की प्रवृत्ति सर्वथा नयी है।

10. रस की निष्पत्ति मूल ऐतिहासिक पात्रों से ही संभव है। यह निम्नलिखित में से किसका मानना था?

Correct Answer: (a) भट्ट लोल्लट
Solution::रस की निष्पत्ति मूल ऐतिहासिक पात्रों में ही संभव है, यह मत भट्टलोल्लट का है। इस के वर्णन में 'निष्पत्ति' शब्द का प्रथम प्रयोग भरतमुनि के 'रस सूत्र' में मिलता है-
"विभावनुभावव्यभिचारी संयोगाद्रसनिष्पत्तिः ।” भरत मुनि के परवर्ती आचार्यों में 'रस सूत्र' में आए संयोग और निष्पत्ति को लेकर विवाद रहा है। इन आचार्यों के सैद्धान्तिक व दार्शनिक आधार निम्न हैं-
आचार्यसिद्धान्तदार्शनिक मत
भट्ट लोल्लटउत्पत्ति या आरोपवादमीमांसा दर्शन
शंकुकअनुमितिवादन्याय दर्शन
भट्टनायकभुक्ति या भोगवादसांख्य दर्शन
अभिनव गुप्तअभिव्यक्तिवादशैव दर्शन

आचार्य भट्टलोल्लट को भरत के रस-सूत्र का प्रथम व्याख्याता माना जाता है।
आचार्य शंकुक के अनुसार सामाजिक 'चित्र तुरंग न्याय' से नट में रस की अवस्थिति मान कर रस का अनुमान करते हैं। भट्टलोल्लट ने उत्पत्तिवाद (आरोपवाद) में रस के मुख्य रूप से अनुकार्य (वास्तविक रामादि) में रहता है और गौण रूप में नट में बना है।