यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर 2021 (संस्कृत)

Total Questions: 100

1. अधोऽङ्कितेषु नागेशभट्टस्य ग्रन्थो नास्ति

Correct Answer: (c) माधवीयधातुवृत्ति:
Solution:

अधोऽङ्क्तेिषु नागेशभट्टस्य ग्रन्थो 'माधवीयधातुवृत्तिः' नास्ति। अर्थात् नीचे उल्लिखित 'माधवीयधातुवृत्तिः' नागेशभट्ट की रचना नहीं है जबकि अन्य तीनों (प्रदीपोद्योतः, बृहत्शब्देन्दुशेखरः, लघु-शब्देन्दुशेखरः) इनकी रचना है।

'माधवीयधातुवृत्तिः' सायणाचार्य की रचना है। सायण ने अपने भाष्यों को "माधवीय वेदार्थप्रकाश" के नाम से अभिहित किया है।

"तेन मायणपुत्रेण सायणेन मनीषिणा।
आख्यया माधवीयेयं धातुवृत्तिर्विरच्यते ॥"
नागेश भट्ट की अन्य रचनाएँ परिभाषेन्दुशेखर, वैयाकरण सिद्धान्त मञ्जूषा, लघुमञ्जूषा, परमलघुमञ्जूषा आदि हैं।

2. वेदान्तसारे चतुर्विधस्थूलशरीरेषु द्वे इमे स्तः

A. कायजम्  B. जरायुजम् C. अण्डजम् D. तोयजम्
समुचितं विकल्पं चिनुत – 

Correct Answer: (c) B एवं C
Solution:

वेदान्तसारे चतुर्विधस्थूलशरीरेषु 'जरायुजम्, अण्डजम् हे इमे स्तः । वेदान्तसार के अनुसार चार प्रकार के स्थूल शरीर होते हैं- (1) जरायुज (2) अण्डज (3) स्वेदन (4) उद्भिज

(1) जरायुज - जरायु से उत्पन्न होने वाले मनुष्य, पशु आदि जरायुज नामक स्थूल शरीर हैं।

(2) अण्डज - अण्डों से उत्पन्न होने वाले पक्षी, सर्प आदि अण्डज हैं।

(3) स्वेदज - पसीने से उत्पन्न होने वाले जू, मच्छर आदि स्वेदज नामक स्थूलशरीर हैं।

(4) उभिज - पृथ्वी को भेदकर उत्पन्न होने वाले लता, वृक्ष आदि उद्भिज हैं।

3. अधस्तनेषु कयोईयोः सम्बन्धः?

A. पतञ्जलिः महाभाष्यकार: B. कालिदासः C. गोनर्दीयः D. शबरस्वामी
समुचितं विकल्पं चिनुत - 

Correct Answer: (a) A एवं C
Solution:

अधस्तनेषु 'पतञ्जलिः महाभाष्यकारः गोनर्दीयः' एतयोः द्वयोः सम्बन्धः । महाभाष्यकार पतञ्जलि का सम्बन्ध 'गोनर्द' से है। पतञ्जलि 'व्याकरण महाभाष्य' के रचयिता हैं।

इनकी गणना भारत के अग्रगण्य विद्वानों में की जाती है। इनका निवास 'गोनर्द' नामक ग्राम है। पतञ्जलि को अन्य नाम से भी जानते हैं-गोनर्दीय, गोणिकापुत्र, नागनाथ, अहिपति, चूर्णिकार आदि।

4. मनुमते स्वयम्भूर्भगवानव्यक्तो किमिदं व्यञ्जयन् प्रादुरासीत् ?

Correct Answer: (b) जगदिदम्
Solution:

मनुमते स्वयम्भूर्भगवानव्यक्तो 'जगदिदम्' व्यञ्जयन् प्रादुरासीत्।
ततः स्वयंभूर्भगवानव्यक्तो व्यञ्जयन्निदम् । 
महाभूतादि वृत्तौजाः प्रादुरासीत्तमोनुदः ॥6॥
तब जो इन्द्रियों से प्रत्यक्ष न हों, ऐसी सृष्टि की रचना करने में समर्थ, अपनी इच्छा से शरीर धारण करने वाले और प्रकृति के प्रेरक भगवान्, आकाशादि महाभूतों को प्रकाशित करते हुए प्रकट हुए।

5. एतयोः अलंकारयोः उपमान उपमेयौ भवत:

A. रूपकम्  B. विभावना C. उत्प्रेक्षा D. विशेषोक्तिः
समुचितं विकल्पं चिनुत - 

Correct Answer: (b) A एवं C
Solution:

एतयोः अलंकारयोः 'रूपकं, उत्प्रेक्षा' उपमान उपमेयौ भवतः । रूपक एवं उत्प्रेक्षा अलङ्कार में उपमान और उपमेय दोनों होता है। रूपक 'रूपकं रूपितारोपो विषये निरपहवे।' निरपह्नव अर्थात् निषेध रहित विषय (उपमेय) में रूपित के आरोप को ही रूपक कहते हैं।

उदा. - रावणावग्रहक्लान्तमिति वागमृतेन सः। अभिवृष्य मरुत्सस्यं कृष्णमेघस्तिरोदथे ।।
उत्प्रेक्षा- 'भवेत् सम्भावनोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य परात्मना।।'

किसी प्रकृत अर्थात् प्रस्तुत वस्तु (उपमेय) को अप्रस्तुत वस्तु (उपमान)के रूप में सम्भावना करना ही उत्प्रेक्षा है।
उदा.- सैषा स्थली यत्र विचिन्वता त्वां भ्रष्टं मया नूपुरमेकमुर्त्याम् । अदृश्यते त्वच्चरणारविन्द विश्लेषदुःखादिव बद्धमौनम्।।
विभावना- 'क्रियायाः प्रतिषेधेऽपि फलव्यक्तिर्विभावना।'
विशेषोक्ति- 'सति हेतौ फलाभावे विशेषोक्तिस्तथा द्विधा।'

6. महाभारतस्य मंगलश्लोक कस्य ग्रन्थस्य निर्देशोऽस्ति?

Correct Answer: (a) जयग्रन्थस्य
Solution:

महाभारतस्य मंगलश्लोक 'जयग्रन्थस्य' निर्देशोऽस्ति । महाभारत का मंगलश्लोक 'जयग्रन्थ' में निर्देशित है। महाभारत का मूल रूप 'जय' के नाम से प्रसिद्ध था।

'जयोनामेतिहासोऽयं श्रोतव्यो विजिगीषणा।'-
महाभारत (1/62/20) महाभारत के मंगल श्लोक में भी स्पष्ट उल्लेख है-
नारायणं नमस्कृत्य नरञ्चैव नरोत्तमम्। 
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
वर्तमान महाभारत के आदिपर्व के 65वें अध्याय से जय की सामग्री का आरम्भ हुआ था। व्यास ने इसे वैशम्पायन को सुनाया था। इसमें 8800 श्लोक थे।

महाभारत का क्रम- जय भारत महाभारत । द्वितीया अवस्था में जय का विस्तार भारत के रूप में हुआ। इसमें 24000 श्लोक थे। भारत का प्रवचन वैशम्पायन ने व्यास के आदेश पर जनमेजय के समक्ष नागयज्ञ के अवसर पर किया था।

अन्तिम अवस्था में एक लाख से अधिक श्लोकों का महाभारत ग्रन्थ बना। भारत वर्ष का विश्वकोष 'महाभारत' है। भारत को महाभारत के रूप में परिणत करने का अवसर नैमिषारण्य नामक पवित्र स्थान पर होने वाला यज्ञ था।

महाभारत की रचना कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने की। यह अट्ठारह पर्वों में विभक्त है। इसे 'शत साहस्री संहिता' भी कहते हैं।

7. "यौवनारम्भे च प्रायः शास्त्रजलप्रक्षालननिर्मलापि कालुष्यमुपयाति बुद्धिः" इति केनोपदिष्टम्?

Correct Answer: (d) शुकनासेन
Solution:

"यौवनारम्भे च प्रायः शास्त्रजलप्रक्षालननिर्मलापि कालुष्यमुपयाति बुद्धिः" इति 'शुकनासेन' उपदिष्टम्। अर्थात् युवावस्था के आरम्भ में शास्त्रजल के प्रक्षालन के पश्चात् भी 'बुद्धि' कलुषता को प्राप्त करती है। यह उपदेश शुकनास ने दिया।

'शुकनासोपदेश' कादम्बरी का ही एक अंश है। कादम्बरी की रचना बाणभट्ट ने की। यह दो भागों में विभक्त है पूर्वार्द्ध, उत्तरार्द्ध । चन्द्रापीड के राज्याभिषेक के अवसर पर तारापीड का मन्त्री 'शुकनास' चन्द्रापीड को उपदेश देता है।

→ जिस प्रकार जल के कारण कसैले पदार्थ मीठा स्वाद देते हैं उसी प्रकार युवावस्था के कारण विषय में अनुरक्ति मधुर प्रतीत होती है।

→ शुकनास ने चन्द्रापीड के लिए 'तात' शब्द का प्रयोग किया।

→ शुकनास के अनुसार युवावस्था के प्रभाव से उत्पन्न अन्धकार सूर्य से भेदा नहीं जा सकता तथा मणियों एवं दीपक के प्रकाश से दूर नहीं किया जा सकता।

→ लक्ष्मी से उत्पन्न मद दारुण होता है तथा वृद्धावस्था में भी शान्त नहीं होता।
→ शुकनास कहता है कि (1) जन्म से प्राप्त ऐश्वर्य (ii) नयी युवावस्था (iii) अनुपम सौन्दर्य (iv) अलौकिक शक्ति ये चारों अनर्थ की परम्पराएँ हैं।

8. कौटिलीयमते लुब्धवर्गस्य के द्वे लक्षणे -

A. मानकामः  B. आत्मसंभावितः C. व्यसनी D. अत्याहितव्यवहारः
समुचितं विकल्पं चिनुत - 

Correct Answer: (d) C एवं D
Solution:

कोटिलीयमते लुब्धवर्गस्य 'व्यसनी, अत्याहितव्यवहारः' द्वे लक्षणे। परीक्षीणोऽत्यात्तस्वः कदर्यो व्यसन्यत्याहितव्यवहारश्चेति लब्धवर्गः । जिसका सब धन-वैभव नष्ट हो गया, जो कायर, व्यसनी और अपव्ययी हो, वह 'लुब्धवर्ग' कहलाता है।

कुद्धवर्ग- जिसकी स्त्री को जबरजस्ती छीन लिया गया हो, जिसको जल में स दिया गया हो, दूसरे के कहने मात्र से जिसको दण्ड दिया गया हो, जिसके बन्ध-बान्धव को देश निकाला कर दिया। गया हो वे इस प्रकार के सभी वर्ग 'कुद्धवर्ग' कहलाते हैं।

मानीवर्ग- अपने को महान् समझने वाला, आत्मश्लाघी, शत्रु के सम्मान को सहन न करने वाला, नीच लोगों द्वारा प्रशंसित, तीक्ष्णप्रकृति, साहसी और भोग्य पदार्थों से कभी सन्तुष्ट न होने वाला वर्ग ही 'मानीवर्ग' कहलाता है।

9. अत्र कथनद्वये (A) इत्यभिकथनम् (R) इति च कारणम्

अभिकथनम् (A) : पाणिनीय अष्टाध्याया आदौ चतुर्दशसूत्रेषु वर्णोपदेशः विद्यते
कारणम् (R) : वृत्तिसमवायार्थः अनुबन्धकरणार्थः-इष्टबुद्धर्थश्च
समुचितं विकल्पं चिनुतः 

Correct Answer: (b) (A) इति अभिकथनम् असत्यम् (R) इति कारणम् सत्यम्
Solution:

अभिकथनम् (A) : पाणिनीय अष्टाध्याया आदौ चतुर्दशसूत्रेषु वर्णोपदेशः विद्यते ।
कारणम् (R) : वृत्तिसमवायार्थः - अनुबन्धकरणार्थः - इष्टबुद्धर्थश्च समुचितं विकल्पं अस्ति।
(A) इति - अभिकथनम् तथा च (R) इति कारणम् उभयं सत्यम्

10. केन सह कस्य सम्बन्धः ?

कविसूक्ति / कथन
A. भारविःI. सर्वः कान्तमात्मीयं पश्यति
B. माघःII. गुरूपदेशश्च नाम पुरुषाणामखिलमलप्रक्षालनक्षममजलं स्नानम्
C. कालिदासःIII. सहसा विदधीत न क्रियाम्
D. बाणभट्टःIV. ग्रहीतुमार्यान् परिचर्यया मुहुर्महानुभावा हि नितान्तमर्थिनः

समुचितं विकल्पं चिनुत - 

Correct Answer: (c) A-III, B-IV, C-I, D-II
Solution:

सुमेलित तालिका है-

कविसूक्ति / कथन
A. भारविःIII. सहसा विदधीत न क्रियाम्
B. माघःIV. ग्रहीतुमार्यान् परिचर्यया मुहुर्महानुभावा हि नितान्तमर्थिनः
C. कालिदासःI. सर्वः काान्तमात्मीयं पश्यति
D. बाणभट्टःII. गुरूपदेशश्च नाम पुरुषाणामखिलमलप्रक्षालनक्षममजलं स्नानम्

अतः विकल्प (c) A-III, B-IV, C-I, D-II सही है।