NTA यू.जी.सी. नेट जेआरएफ पुनर्परीक्षा, जून-2024 संस्कृत

Total Questions: 100

1. वृत्तिषु इदं नान्तर्भवति-

Correct Answer: (c) प्रमेयः
Solution:वृत्तिषु प्रमेयः नान्तर्भवति । अर्थात् - वृत्तयः पञ्चतयः क्लिष्टाऽक्लिष्टाः ।।1.51
क्लिष्ट अक्लिष्ट पाँच प्रकार की वृत्तियाँ बताई गयी हैं। प्रमाणविपर्ययविकल्प निद्रास्मृतयः ।।1.6।।

जो कि प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति ये पाँच वृत्तियाँ पतञ्जलि भगवान ने योगदर्शन में बताई है। अतः विकल्प (c) सही है।

2. "दृष्टो यवः" इत्यस्मिन् अर्थे किं रूपं निष्पद्यते?

Correct Answer: (b) यवानी
Solution:"दुष्टो यवः" इत्यस्मिन अर्थ यवानी रूपं निष्पद्यते । अर्थात् सूत्र - इन्द्र-वरुण-भव शर्व-रूद्र मृड-हिमारण्य-यव-यवनमातुलाचार्याणामानुक्। सूत्र से आनुक् का आगम होता है।

•  'यवाद् दोष' यह वार्तिक है। दोष अर्थ द्योतित होने पर यव इस प्रतिपदिक से डीष और प्रकृति को आनुक् आगम् होता है।
• दुष्टो यवो यवानी - यव शब्द से यवाद दोष के अनुसार दूषित अर्थ में। यवनल्लियाम् यह वार्तिक है।
• यवन इस प्रतिपादिक से लिपि विशेष अर्थ होने पर ही डीष् तथा प्रकृति को आनुक् आगम होता है।
• यवनानां लिपिर्यवनानी → यवन लोगों की लिपि (लेखन पद्धति) यवनानी कहलाती है।

अतः विकल्प (b) सही है।

3. परस्परं समुचितं मेलयत

स्तम्भः १स्तम्भः २
A. काकुदवर्तिनी कन्याI. नित्ययोगे
B. उदारिणी कन्याII. अतिशायने
C. छत्रीIII. निन्दायाम्
D. क्षीरिणो वृक्षाःIV. संसर्गे

दत्तेषु विकल्पेषु समीचीनमुत्तरं चिनुत-

Correct Answer: (c) A-III, B-II, C-IV, D-II
Solution:परस्पर समुचितं मेलयत् - काकुदावर्तिनी
कन्या - निन्दायाम्
उदारिणी कन्या - अतिशायने
छत्री - संसर्गे
क्षीरिणो वृक्षाः - नित्ययोगे

अतः विकल्प (c) सही है।

4. सायणाचाः प्रतिपादितः ब्राह्मणानां क्रमः-

A. सामविधिः
B. संहितोपनिषद्ब्राह्मणम्
C. प्रौढम्
D. देवताध्यायः
E. षड्विंशः

समुचितं विकल्पं चिनुत-

Correct Answer: (a) C, E, A, D, B
Solution:सायणाचार्यः प्राति प्रादितः ब्राह्मणानां क्रमः प्रौढम्, षड्विंशः, सामविधिः, देवताध्यायः, संहितोपनिषद् ब्राह्मणम् इति ।

विशेष - ताण्ड्य ब्राह्मण को प्रौढ़ ब्राह्मण भी कहा जाता है। अध्याय 25, पाँच पञ्चिका और 178 सोमयागो का वर्णन है। और षडविंश को सायण ने अपने भाष्य में ताण्ड्यैकशेष ब्राह्मण अर्थात् ताण्ड्य का परिशिष्ट कहा है।

इसके अन्तिम अध्याय को अद्भुत ब्राह्मण भी कहते हैं। और सामविधि को सामविधान कहा जाता है, इसमें 3 प्रपाठक 25 अनुवाक काव्य का प्रयोग प्रायश्चितों का विधान है।

इसके बाद आर्षेय ब्राह्मण को प्रतिपादित किया, फिर देवताध्याय-4 खण्ड में विभक्त है और उपनिषद् ब्राह्मण 10 प्रपाठक संहितोपनिषद् 5 खण्ड में विभक्त है। और जैमिनीय ब्राह्मण में तीन ब्राह्मण प्राप्त होते हैं। अतः विकल्प (a) सही है।

5. परस्परं समुचितं मेलयत

स्तम्भः १स्तम्भः २
A. भृशायतेI. क्यष्
B. पटपटायतेII. णिच्
C. विष्णूयतिIII. क्यङ्
D. शावयतिIV. क्यच्

दत्तेषु विकल्पेषु समीचीनमुत्तरं चिनुत

Correct Answer: (b) A-III, B-I, C-IV, D-II
Solution:परस्परं समुचितं मेलयत्

(A) भृशायते = (III) क्यङ्।
(B) पटपटायते = (I) क्यष्।
(C) विष्णूयति = (II) क्यच्।
(D) शावयति = (VI) णिच्।

अर्थात् शब्दवैरकलाहभ्रकण्वमेद्येभ्यः करणे सूत्र से शब्द वैर, कलह, अभ्र, कण्व और मेध इन प्रतिपादित कर्मों से करना अर्थ में विकल्प से क्यङ्प्रत्यय होता है। और हेतु मति च सूत्र से प्रयोजक प्रेरक कर्ता |

के व्यापार (प्रेषण-प्रेरण) आदि वाच्य होने पर धातु से णिच् प्रत्यय होता है। जिससे भावयति, शावयति घाक रूप बनाते हैं। सूत्र- उपमानदाचारे सूत्र से उपमान रूप कर्म सुबन्त से आचार अर्थ में विकल्प से क्यच् प्रत्यय होता है। जैसे- विष्णूयति द्विजम्। अर्थात् ब्राह्मण को विष्णु भगवान ही मानता है।

पटपटायते - वा क्यष् सूत्र से क्यान्त (क्यष् प्रत्ययान्त) शब्द विकल्प से परस्मैपदी भी होते हैं। जैसे लोहितायति । लोहितायते लेकिन इसी में एक वार्तिक लोहिताडाज्भ्यः क्यण्वचनं भृशादिण्वितराणिति से न ही काम्यच की तरह भी।

ककार न सुनना चाहिए इस वाच्य का उच्चारण सामर्थ्य भी होना चाहिए। उसका भाष्य के प्रख्यान में पटपटायति पटपटायते ।

6. रामायणकाण्डानि केन नाम्रा विभक्तिानि?

Correct Answer: (c) सर्गेण
Solution:रामायणकाण्डानि सर्गेण नाम्ना विभक्तानि । अर्थात् रामायण काण्डों को सर्गों के नाम से विभाजित किया गया है। रामायण सात काण्डों में विभक्त है।

(1) बालकाण्ड = (77 सर्ग)
(2) अयोध्याकाण्ड = (119 सर्ग)
(3) अरण्यकाण्ड = (75 सर्ग)
(4) किष्किन्धाकाण्ड = (67 सर्ग)
(5) सुन्दरकाण्ड = (68 सर्ग)
(6) युद्धकाण्ड = (128 सर्ग)
(7) उत्तरकाण्ड = (111 सर्ग)

7. "गन्धनावक्षेपणसेवनसाहसिक्यप्रतियत्नप्रकथनोपयोगेषु कृञः " इति सूत्रे अवक्षेपणमित्यस्य कोऽर्थः ?

Correct Answer: (d) भर्त्सनम्
Solution:'गन्धनावक्षेपणसेवनसाहसिक्य प्रतियत्नकथनोपयोगेषु कृञ', इति सूत्रे अवक्षेपणं इति अस्य शब्दस्य भर्त्सनम् अर्थः । सिद्धान्त कौमुदी के अनुसार उपरोक्त सूत्र के अनुसार शब्दों के अर्थ बताए गये हैं। गन्धनं हिंसा/ उत्कुरुते सूचयति इति अर्थः ।

सूचनं हि प्राणवियोग अनुकूलत्वात् हिंसा इव । अवक्षेपणं भर्त्सनम्। श्येनो वर्तिका मुदा कुरूते। भर्सयति इति अर्थः हरिमुपकुरुते। सेवते परदारकुरूते। संवते परदारान् प्रकुरते। भर्त्सयति इति अर्थः ।

तेषु सहसा प्रवर्तते। एधांदेस्योपस्कुरूते गुणमधत्ते। यथा प्रकुरुते । प्रकथयति । शतं प्रकुरूते। धर्मार्थं विनियुक्ते एषु किम् । कटं करोति ।। अतः विकल्प (d) सही है।

8. मारीचपुराणं कीदृशमुपपुराणमस्ति?

Correct Answer: (c) वैष्णवम्
Solution:मारीचपुराणं वैष्णवम् उपपुराणमस्ति। 18 उपपुराणों के नाम-

(1) सनत्कुमार (2) नारसिंह (3) स्कान्द (4) शिवधर्म (5) आश्चर्य (6) नारदीय (7) कपिल (8) कल्कि (9) औशनस (10) ब्राह्मण्ड (11) वारूण (12) कालिका (13) माहेश्वर (14) साम्ब (15) सौर (16) पाराशर (17) मारीच (18) भार्गव

9. सधर्मवस्तुप्रतिबिम्बनमूलोऽलङ्कारः कः ?

Correct Answer: (a) दृष्टान्तः
Solution:सधर्मवस्तुप्रति बिम्बनमूलो दृष्टान्त अलङ्कारः अस्ति। अर्थात् जहाँ उपमेय और उपमान के साधारण धर्म में बिम्ब - प्रतिबिम्ब भाव दिखाया जाय, वहाँ दृष्टान्त अलङ्कार होता है।

लक्षण - 'दृष्टान्तः पुनरेतेषां सर्वेषां प्रतिबिम्बनम्

उदा. - त्वयि दृष्ट एव तस्या, निर्वाति मनो मनोभवज्वलितम्।। आलोक ही हिमांशोर्विकसति कुसुमं कुमुद्रत्याः ।

10. भगवतः स्वरूपमत्र अवलोकयितुं शक्यते-

A. स्तोभाक्षरे
B. प्रणवे
C. ऋचि
D. सानि
E. अथर्वणि

समुचितं विकल्पं चिनुत- 

Correct Answer: (b) B & D केवलम्
Solution:भगवतः स्वरूपमत्र अवलोकयितुं प्रणवे साम्नि च शक्यते । अर्थात् - भगवान का स्वरूप यहाँ प्रश्न मैं दो जगह ही दिखाई देता है -

(1) प्रवण ऊँकार में (2) साम में सामवेद को अपना स्वरूप भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में माना है। 84 विभूति दर्शन योग अध्याय में और प्रणव (ॐ) को अपना स्वरूप माना है। अतः विकल्प (b) सही है।