Solution:परस्परं समुचितं मेलयत्(A) भृशायते = (III) क्यङ्।
(B) पटपटायते = (I) क्यष्।
(C) विष्णूयति = (II) क्यच्।
(D) शावयति = (VI) णिच्।
अर्थात् शब्दवैरकलाहभ्रकण्वमेद्येभ्यः करणे सूत्र से शब्द वैर, कलह, अभ्र, कण्व और मेध इन प्रतिपादित कर्मों से करना अर्थ में विकल्प से क्यङ्प्रत्यय होता है। और हेतु मति च सूत्र से प्रयोजक प्रेरक कर्ता |
के व्यापार (प्रेषण-प्रेरण) आदि वाच्य होने पर धातु से णिच् प्रत्यय होता है। जिससे भावयति, शावयति घाक रूप बनाते हैं। सूत्र- उपमानदाचारे सूत्र से उपमान रूप कर्म सुबन्त से आचार अर्थ में विकल्प से क्यच् प्रत्यय होता है। जैसे- विष्णूयति द्विजम्। अर्थात् ब्राह्मण को विष्णु भगवान ही मानता है।
पटपटायते - वा क्यष् सूत्र से क्यान्त (क्यष् प्रत्ययान्त) शब्द विकल्प से परस्मैपदी भी होते हैं। जैसे लोहितायति । लोहितायते लेकिन इसी में एक वार्तिक लोहिताडाज्भ्यः क्यण्वचनं भृशादिण्वितराणिति से न ही काम्यच की तरह भी।
ककार न सुनना चाहिए इस वाच्य का उच्चारण सामर्थ्य भी होना चाहिए। उसका भाष्य के प्रख्यान में पटपटायति पटपटायते ।