यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर-2022 (संस्कृत)

Total Questions: 100

1. 'येन स्वः स्तभितं येन नाकः' मन्त्रांशोऽयं कस्मात् सूक्तात्______?

Correct Answer: (b) प्रजापतिसूक्तात्
Solution:

'येन स्वः स्तभितं येन नाकः' मन्त्रांशोऽयं 'प्रजापति सूक्तात्' अस्ति अर्थात् यह मन्त्रांश प्रजापति सूक्त से गृहीत है। इसके ऋषि हिरण्यगर्भ, देवता क संज्ञक प्रजापति तथा छन्द त्रिष्टुप् है। येन घोरुग्रा पृथिवी च दृष्ठता येन स्वःस्तभितं येन नाकः । यो अन्तरिक्षे रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम ।।

अर्थात् जिसके द्वारा स्वर्ग और सौर मण्डल को स्थिर किया गया था, जो आकाश में जल को व्याप्त किये है ऐसे किस देव के लिए हवि से स्तुति करें।

इन्द्रसूक्त ऋषि-मृत्समद, देवता इन्द्र, छन्द त्रिष्टुप्। विष्णु सूक्त ऋषि- दीर्घतमा, देवता-विष्णु, छन्द त्रिष्टुप्। अग्नि सूक्त ऋषि-मधुच्छन्दा, देवता अग्नि, छन्द गायत्री

2. अधोलिखितेषु किं सन्ध्यक्षरम्?

Correct Answer: (c) ओ
Solution:

उपरोक्त 'ओ' सन्ध्यक्षरम् अस्ति अर्थात् उपरोक्त में 'ओ' सन्ध्यक्षर है। अ+उ ओ होता है अ इ उ ऋ और लृ ये पाँच स्वर होते है तथा ए ऐ ओ और औ स्वर हैं।

"ततश्चत्वारि सन्ध्यक्षराण्युत्तराणि" अष्टौ समानाक्षराणि आदितः अ,आ, इ, ई, उ,ऊ, ऋ, क्रू ये आठ समानक्षर है और ए, ओ, ऐ, औ ये चार सन्ध्यक्षर है।

3. उदकं कस्मात्?

Correct Answer: (b) उनत्तीति सतः
Solution:

उदकं उनत्तीति सतः अर्थात् उदक (शब्द) गीला करने वाला होने से 'उदकं च' उणादि सूत्र से क्युन् प्रत्यय करके सिद्ध होता है।

उदकं इति जलनाम् अस्ति। तद्धि यत्र भवति यत्र गच्छति तदुनक्ति क्लेदयति । अतः उन्दी क्लीदने धातोः एवुल् प्रत्यय कृते न लोपाद उदकम् भवति।

4. ऋक्प्रतिशाख्यानुसारं 'व्यञ्जनसंनिपातः ' कः ?

Correct Answer: (c) संयोगः
Solution:

ऋप्रातिशाख्यानुसारं व्यञ्जन सन्निपातः संयोग भवति अर्थात् वर्णों का मिलना संयोग होता है। 'संयोगस्तु व्यञ्जन सन्निपातः' व्यञ्जन वर्णों का सन्निपात संयोग है।

जैसे- ऋकप्रातिशाख्य में क्+प्+र् का मेल संयोग कहलाता है। सन्धि दो वर्णों के मेल से जो विकार उत्पन्न होता है उसे सन्धि कहते है। अनुनासिक प्रत्येक वर्ण का पञ्चम् वर्ण अनुनासिक कहलाता है। लोप-अदशर्न लोपः वर्ण का अदर्शन (न दिखाई देना) लोप है।

5. कुन्तकानुसारं कविव्यापारवक्रत्वभेदाः सन्ति-

Correct Answer: (c) षट्
Solution:

कुन्तकानुसारं कविव्यापार वक्रतत्व भेदाः षट् सन्ति अर्थात् कुन्तक के अनुसार कवि व्यापार वक्रत्व के छः भेद है। 1. वर्ण विन्यास वक्रता 2. पदपूर्वार्थ वक्रता 3. पदपरार्ध वक्रता 4. वाक्य वक्रता 5. प्रकरण वक्रता 6. प्रबन्ध वक्रता।
पुनः इसके कुल 38 उपभेद हैं।
अतः विकल्प C सही है।

6. शाकटायनस्य मतम् अस्ति-

Correct Answer: (c) न निर्बद्धा उपसर्गा अर्थात्रिराहुः
Solution:

शाकटायनस्य मतं न निर्बद्धा उपसर्गा अर्थान्त्रिराहुः अस्ति अर्थात् शाकटायन का मत है" न निर्षद्धा उपसर्गा अर्थात्रिराहः।" (नाम तथा आख्यातों से) अलग करके गुम्फित किये हुए (निबद्धा नामाख्याताभ्यां निष्कृत्य बद्धाः, नाम और आख्यात् से अलग करके वाक्य में प्रयुक्त किये हुए।

उपसर्ग अर्थों को "न निराहुः निश्चयेन न आहुः” उनके साथ मिलकर द्योतन करने वाले होते है यह शाकटायन का मत है।

7. निरुक्ते मेघनामानि कियन्ति?

Correct Answer: (c) चत्वारिंशत्
Solution:

निरुक्ते मेघनामानि त्रिंशत्।
मेघनामानि उत्तराणि त्रिंशत् निघण्टु में हुए अगले तीस नाम मेघ के वाचक है। 'मिह सेचने' धातु से घञ् प्रत्यय करने पर मेघ शब्द सिद्ध होता है,

तदनुसार 'महति सिद्ध होता है, तदनुसार 'महति सिञ्चति जलम् इति मेघः' यह मेघ शब्द का निर्वचन है मेघ के जो 30 नाम निघण्टु में दिखलाये गये हैः उनमें से 'उपर, उपल' तक (17 से 19 नाम) पर्वत के नामों से साथ साधारण हैं।

(अर्थात् वे पर्वत के नाम भी हैं और मेघ के भी)।
मेघवाचक 30 नाम (1) अद्रिः (2) ग्रावा (3) गोत्तः (4) बलः (5) अश्नः (6) पुरूभोजाः (7) बलिशानः अश्मा (9) पर्वतः (10) गिरिः (11) ब्रजः (12) चरू (13) वराहः (14) शम्बरः(15) रौहिणः (16) रैवतः (17) फलिगः (18) उपरः (19) उपलः (20) चमसः (21) अहिः (22) अभ्रम् (23) बलाहकः (24) मेघः (25) दृति (26) ओदनः (27) वृषन्धिः (28) वृत्रः (29) असुरः (30) कोशः।

8. अधोलिखितेषु 'मुहूर्त्तचिन्तामणिः ग्रन्थस्य ग्रन कर्ता कः ?

Correct Answer: (c) रामदैवज्ञः
Solution:

मुहूर्तचिन्तामणि ग्रन्थस्थ कर्ता 'रामदैवज्ञः' अस्ति अर्थात् मुहूर्त चिन्तामणि ग्रन्थ के कर्ता 'रामदैवज्ञ' हैं।

9. यथा शिखा मयूराणां नागानां गणयों पथा तद्ववेदाङ्गशास्त्राणां गणितं मूर्धनि स्थितम्

इति श्लोकः केन वेदाङ्गेन सम्बद्धः ? 

Correct Answer: (c) ज्योतिषेण
Solution:यथा शिखा मयूराणां नागानां गणयो पथा तद्वद्वेदाङ्गशास्त्राणां गणितं मूर्धनि स्थितम् इति श्लोकः ज्योतिषेण वेदाङ्गेन सम्बद्धः।

अर्थात् जैसे मोरों में शिखा, और नागों में मणि का स्थान सबसे ऊपर है, वैसे ही सभी वेदाङ्ग और शास्त्रों में गणित का स्थान सर्वोपरि है। यह श्लोक षड् वेदाङ्गों (शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छन्द, ज्योतिष) के अन्तर्गत ज्योतिष में वर्णित है।

10. 'सर्वव्यापी स भगवान् तस्मात् सर्वगतः शिवः मन्त्रांशोऽयं कस्मात्?

Correct Answer: (b) श्वेताश्वतरोपनिषदः
Solution:

सर्वव्यापी सभगवान् तस्मात् सर्वगतः शिवः मन्त्रांशोऽयं श्वेताश्वतरोपनिषदः वर्णितः अस्ति अर्थात् शिव ही सर्वस्व शिव आदि देव हैं। वे महादेव हैं जो सभी देवों में सर्वोच्च हैं। शिव को ऋग्वेद में रूद्र कहा गया है, पुराणों में उन्हें महादेव के रूप में स्वीकार किया गया है।

श्वेताश्वतरोपनिषद् के अनुसार - "सृष्टि के आदिकाल में जब अन्धकार ही अन्धकार था, न दिन न रात न सत् न असत् तब केवल निर्विकार शिव रुद्र ही थे। यह मन्त्र श्वेताश्वतरोपनिषद् में वर्णित है।"