जलवायु (भारत का भूगोल)

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1. दिए गए विकल्पों में से सही कथन का चयन कीजिए। [CGL (T-I) 26 जुलाई, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (d) केरल के तटीय क्षेत्रों में दिन और रात के तापमान में बहुत कम अंतर होता है।
Solution:
  • केरल में दिन तथा रात का तापमान लगभग समान ही रहता है।
  • दिए गए विकल्पों में से सही कथन का चयन करने के लिए पूर्ण विस्तार से समझना आवश्यक है
  • लेकिन प्रश्न में कोई विशिष्ट कथन या विकल्प प्रदान नहीं किए गए हैं।
  • यह प्रकार की प्रश्न प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे UPSC, SSC, रेलवे या राज्य स्तरीय शिक्षक भर्ती परीक्षाओं में सामान्य है
  • जहां उम्मीदवारों को दो कथनों (A और B) की सत्यता और उनके तार्किक संबंध का मूल्यांकन करना होता है।
  • प्रश्न का सामान्य प्रारूप
    • ऐसे प्रश्नों में आमतौर पर दो कथन दिए जाते हैं:
    • कथन (A): एक तथ्यात्मक दावा, जैसे "हिमालय भारत की उत्तरी सीमा पर स्थित है।"
    • कथन (B): इसका कारण या व्याख्या, जैसे "यह मानसून को रोकता है।"
  • विकल्प इस प्रकार होते हैं:
    • A और B दोनों सही हैं तथा B, A की सही व्याख्या करता है।
    • A और B दोनों सही हैं किंतु B, A की सही व्याख्या नहीं करता।
    • A सही है किंतु B गलत है।
    • A गलत है किंतु B सही है।
    • A और B दोनों गलत हैं।
  • सही कथन चुनने की विधि
    • चरण 1: प्रत्येक कथन की स्वतंत्र रूप से सत्यता जांचें।
    • NCERT पुस्तकों, संविधान या वैज्ञानिक तथ्यों से तुलना करें।
    • चरण 2: यदि दोनों सही हैं, तो देखें कि क्या B, A का सही कारण या व्याख्या है।
    • उदाहरणस्वरूप, भूगोल में "केरल में दिन-रात का तापमान भिन्नता कम है" (A सही), कारण "तटीय प्रभाव" (B सही और व्याख्या करता है)।
    • चरण 3: गलत कथनों को तुरंत अस्वीकार करें।
    • जैसे, यदि A गलत हो तो विकल्प (3) या (5) पर विचार करें।
    • चरण 4: विकल्पों को क्रॉस-चेक करें और सबसे उपयुक्त चुनें।
    • जल्दबाजी न करें, दोनों पक्षों (सकारात्मक-नकारात्मक) का विश्लेषण करें।

2. भारतीय मानसून और अंतः उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (आई.टी.सी.जेड.) के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है? [CHSL (T-I) 10 अगस्त, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (b) अंतः उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र की स्थिति में परिवर्तन भारत में मानसून के प्रतिरूप को प्रभावित कर सकता है।
Solution:
  • भारत में सितंबर महीने से मानसून का प्रत्यावर्तन शुरू हो जाता है
  • जिसका कारण सूर्य के दक्षिणायन होने के कारण अंतः उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) का दक्षिण की ओर खिसकना है।
  • अंतः उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र की स्थिति में परिवर्तन भारत में मानसून के प्रतिरूप को प्रभावित कर सकता है। शेष सभी विकल्प गलत हैं।
  • ITCZ क्या है
    • ITCZ भूमध्यरेखा के लगभग दोनों गोलार्धों को मिलाने वाले उष्णकटिबंधीय क्षेत्र को कहते हैं
    • जहाँ गर्मी के कारण ऊर्ध्वाधर उठान और मजबूत कंप्रेशन बनते हैं, जिससे व्यापक वर्षा होती है.​
    • यह मौसम के अनुसार उत्तर की तरफ या दक्षिण की तरफ खिसक सकता है
    • जिससे मानसून के समय-काल और क्षेत्रीय वर्षा में बदलाव आते हैं.​
  • ITCZ का वार्षिक परिवर्तन और भारत पर प्रभाव
    • गर्मियों में ITCZ गर्मी के कारण उत्तर-आधार की ओर शिफ्ट होता है
    • जिससे भारत के दक्षिण-पश्चिम मानसून द्वार (अंडमान-चीनी द्वीपों से लेकर अरब महासागर तक) सक्रिय होता है
    • वह मॉनसून गर्त बनाकर उत्तरी भारत तक वर्षा लाता है.​
    • ITCZ के उत्तर में स्थित होने से उत्तर भारत और पश्चिमी हिमालय क्षेत्र में अत्यधिक वर्षा और बारिश की प्रवृत्ति बढ़ती है
    • जबकि दक्षिणी तथा पूर्वी भारत में मानसून के वितरण पर भी प्रभाव पड़ता है.​
    • ITCZ की स्थिति में बदलाव से मानसून गर्त (monsoon trough) का स्थान निर्धारित होता है
    • जिससे निम्न दबाव क्षेत्र बनते हैं और मानसून वर्षा कृषि-जलवायु पर सीधा असर डालती है.​​
  • ITCZ–भारत के विभिन्न मानसून चरणों के साथ संबंध
    • दक्षिण-पश्चिम मानसून: ITCZ का उत्तर-की ओर खिसकना इस समय के दौरान उत्तरी भारत में ऊष्मा-आधारित निम्नदाब विकसित कर बारिश के लिए प्रेरक घटक बनता है.​
    • उत्तर-पूर्वी मानसून: ITCZ की स्थिति इस अवधि में भी भूमिका निभाती है
    • क्योंकि यह क्षेत्रीय नमी और पूर्वी भारत में वर्षा के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है.​​
    • मानसून की अस्थिरता: ITCZ के असामान्य स्थानांतरण या गतिशीलता किसी वर्ष में भारत में बहु-दिवसीय या बहु-राज्यीय बाढ़/सूखा जैसे विपरीत परिणाम दे सकती है.​
  • सार मंजूर निष्कर्ष
    • ITCZ की स्थिति मानसून गर्त के स्थान और सक्रियता को निर्णायक रूप से प्रभावित करती है
    • इसलिए ITCZ का उत्तर की ओर खिसकना सामान्यतः भारत में मानसून वर्षा के अधिक सक्रिय होने के संकेत देता है
    • जबकि दक्षिण दिशा में खिसकना अन्य क्षेत्रों में कमी या अनियमित वर्षा ला सकता है.​
    • ITCZ के स्थानांतरण के बारे में अध्ययन और विश्लेषण भारतीय मानसून के प्रभावी पूर्वानुमान और कृषि-नीति निर्णयों के लिए महत्वपूर्ण हैं.​

3. निम्नलिखित में से कौन-सा भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाला एक कारक नहीं है? [CHSL (T-I) 4 अगस्त, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) सहारा रेगिस्तान
Solution:
  • समुद्र से दूरी, समुद्री धाराएं, समुद्र की स्थिति, भूमि का ढलान तथा मिट्टी की प्रकृति जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक हैं।
  • हिंद महासागर, पश्चिमी घाट तथा हिमालय पर्वत भारत की जलवायु को प्रभावित करते हैं, जबकि सहारा रेगिस्तान इस श्रेणी में नहीं आता है।
  • संक्षेप में: भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं
  • इनमें से एक विकल्प ऐसा हो सकता है जो सच में भारतीय जलवायु को प्रेरित नहीं करता।
  • नीचे विस्तृत विश्लेषण के साथ सही विकल्प की पहचान दी जा रही है।
  • भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक
    • अक्षांश (latitude): भू-आकृति और जलवायु जिनमें उष्णकटिबंधीय से समशीतोष्ण क्षेत्र तक विविधता है
    • यह तापमान और मौसमी पैटर्न तय करता है।
    • उच्च अक्षांश पर ठंडा मौसम और पठारों पर हिमालयी प्रभाव स्पष्ट रहते हैं।
    • ऊँचाई/उच्‍चत्ताय (altitude/elevation): ऊँचे क्षेत्र ठंडे रहते हैं और बारismos (नमी) के वितरण को प्रभावित करते हैं
    • हिमालय और पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र इसका मुख्य उदाहरण हैं।
    • समुद्रों का प्रभाव (पारिवारिक समुद्री जल स्रोत) और पैसिफिक/अटलांटिक नहीं बल्कि बंगाल की खाड़ी और अरब सागर जैसे हिंद महासागर के आर्द्रता स्रोत: मानसून की नेपाल-भारत दिशा, पूर्वी और पश्चिमी विक्षेपणों के कारण आर्द्रता का आगमन होता है।
    • स्थलाकृति (terrain): हिमालय, थार और भारतीय उपमहाद्वीप की पहाड़ियाँ
    • घाटियाँ और ऊँचे पठार वर्षा, तापमान और वायुदाब के पैटर्न में बहु-राज्यीय विविधता लाते हैं।
    • मौसम तंत्र: मानसून, ITCZ (अंतर-उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र), वायुदाब वितरण और ऊर्जीय प्रवाह, जिनसे वार्षिक वर्षा और तापमान के पैटर्न बने रहते हैं।
    • महाद्वीपीय और समुद्री जलवायु का संयुक्त प्रभाव: बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से आर्द्रता, ऊष्मा और वर्षा का वितरण सुनिश्चित करते हैं।
  • संभावित विकल्पों में सही/गलत पहचान कैसे करें
    • यदि विकल्पों में “पश्चिमी महासागर” या “ग्लोबल पेन” जैसे कारक शामिल हों जो भारत की जलवायु पर प्रत्यक्ष नहीं हैं
    • ऐसा कोई तत्त्व जो भारतीय जलवायु के प्रमुख चालक नहीं माने जाते, तो वह विकल्प सही माना जाएगा।
    • आम तौर पर भारत की जलवायु के साथ प्रत्यक्ष रूप से जुड़े प्रमुख कारक होते हैं
    • अक्षांश, ऊँचाई/रेगिस्तान संरचना, मानसून-उत्पादन के तथ्य, बंगाल की खाड़ी/अरब सागर से प्राप्त आर्द्रता, ITCZ की स्थिति, और हिमालयी प्रभाव।
  • कैसे निर्णय लें
    • यदि प्रश्न का विकल्प स्पष्ट रूप से “महासागर के बाहरी क्षेत्र” या “ग्लोबल जलवायु के ऐसे तत्व” बताता है
    • जो भारत के स्थानीय जलवायु प्रवाह में प्रत्यक्ष भूमिका नहीं निभाते, तो उसे चुनना सही होगा।
    • स्तर पर अक्सर प्रश्न प्रमाणित कराते समय मानसून, हिमालयी प्रभाव, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के आर्द्रता-आवागमन जैसे कारकों को प्राथमिक माना जाता है
    • इसलिए किसी ऐसे विकल्प को गलत माना जाएगा जो इन प्रमुख कारकों की सूची के बाहर है।

4. दक्षिण-पश्चिम मानसून की ऋतु के दौरान भारत में दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनों की दिशा क्या होती है? [CHSL (T-I) 8 अगस्त, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (a) दक्षिण-पश्चिमी
Solution:
  • दक्षिण-पश्चिम मानसून ऋतु के दौरान भारत में दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक हवाओं की दिशा दक्षिण-पश्चिमी होती है।
  • भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून का मौसम आमतौर पर जून से सितंबर तक रहता है।
  • इस वर्षा-समय में ये पवनें उष्णकटिबंधीय समुद्री मौसम से आकर हिंद महासागर क्षेत्रों को पार करती हैं
  • भारत के अधिकांश भागों में वर्षा लाती हैं। नीचे विस्तृत विवरण दिया गया है।
  • परिचय: व्यापारिक पवन क्या हैं
    • व्यापारिक पवन वे स्थायी एवं मौसमी हवाएँ हैं जो उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों से भूमध्यरेखा की ओर बहती हैं
    • भूमध्यरेखा के करीब से क्रिया करते हुए पृथ्वी की कोरिओलिस प्रभाव के कारण दिशा में बदलाव देखती हैं.​
    • उत्तरी गोलार्ध में सामान्यत: दक्षिण-पूर्व से उत्तर-पश्चिम दिशा में बहती हैं ताकि भूमध्यरेखा से दूर स्थित क्षेत्रों तक पहुँचें.​
  • दक्षिण-पश्चिम मानसून बनाम व्यापारिक पवनें
    • दक्षिण-पश्चिम मानसून किसी विशेष मौसमी घटना है जिसमें दक्षिण-पश्चिमी हवाओं का मजबूत आना हिंद महासागर क्षेत्र से भारत entering करता है
    • जिससे बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के ऊपर बादल बनते हैं और भारी वर्षा होती है.​
    • व्यापारिक पवनें अलग दोहरे पथों में प्रसारित होती हैं: दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनें भूमध्यरेखा को पार करती हैं
    • बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के क्षेत्र में पहुंचती हैं
    • जबकि दक्षिण-पूर्वी पवनें अक्सर पश्चिम-उत्तरी दिशा में विक्षेपित होकर भारत के पश्चिमी तट के पास से प्रभाव डालती हैं.​
  • दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनों की दिशा और प्रभाव
    • गर्म मौसम के दौरान, भूमध्य रेखा से आकर दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनें अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के रास्ते भारत के ऊपर प्रवेश करती हैं
    • कोरिओलिस प्रभाव के कारण पश्चिम-उत्तर-पश्चिम की ओर विक्षेपित होती हैं
    • इस प्रवाह की वजह से भारत की पश्चिमी और दक्षिणी क्षेत्रों में भारी वर्षा होती है.​
    • मानसून के समय इन पवनों का प्रभाव समुद्री नमी लाने, बादलों के निर्माण और दक्षिण-पश्चिम मानसून को सक्रिय रखने में अहम भूमिका निभाता है.​
  • उत्तर-दक्षिण पवनों के संदर्भ में संक्षिप्त तुलना
    • दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनें: भूमध्यरेखा के पास से उठती हैं
    • बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के क्षेत्र में प्रवेश करते हैं
    • भारत के ऊपर पश्चिम-उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर विक्षेपित होती हैं
    • मानसून के दौरान सक्रिय रूप से नमी लाती हैं.​
    • दक्षिण-पश्चिम मानसून: June–September के दौरान आता है
    • दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनों के साथ मिलकर उष्णकटिबंधीय जल से आर्द्र हवा लेकर भारत में भारी वर्षा कराता है.​
    • उत्तरी-पूर्वी व्यापारिक पवनें: शीतकाल में उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की दिशा में बहती हैं
    • ठंडी, शुष्क मौसम लाती हैं; यह उत्तर-पूर्वी मानसून के बारे में है
    • दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान पवनों के सामान्य प्रवाह का हिस्सा.​
  • महत्वपूर्ण बिंदु
    • दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान पवनों की दिशा का प्रमुख ट्रेंड दक्षिण-पूर्वी से दक्षिण-पश्चिमी पवनों तक होता है
    • यानी दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनें भूमध्यरेखा से आकर पश्चिम की ओर विक्षेपित हो जाती हैं ताकि भारत के पश्चिमी तटों पर प्रभाव डालें.​
    • मानसून के मौसम में यह पवन-धारा भारत में भारी वर्षा का मुख्य कारण बनती है, खासकर पश्चिमी और दक्षिणी हिस्सों में.​
  • नोट्स और संदर्भ
    • दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनों की दिशा और मानसून के क्रियाकलापों पर संक्षेप संदर्भ: Testbook जैसी स्रोतों में स्पष्ट रूप से बताया गया है
    • दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान दक्षिण-पूर्वी पवनें पश्चिम-उत्तर-पश्चिम की ओर विक्षेपित होती हैं
    • यह मानसून के कारण भारत में वर्षा लाती हैं.​
    • अतिरिक्त पाठ्य-स्तर विवरण के लिए Drishti IAS/OnlyIAS जैसे स्रोतों में मानसून-निर्भर पवनों के प्रवाह का विश्लेषण मिलता है
    • जिसमें दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनें प्रमुख भूमिका निभाती हैं.​
    • यदि चाहें, इन बिंदुओं को एक समीकृत चार्ट/टेबल के रूप में भी पेश किया जा सकता है
    • ताकि तुलना साफ़ दिख सके। साथ ही, किसी विशेष राज्य/पश्चिमी तट या बंगाल की खाड़ी के मानसून-केंद्रित प्रभाव के बारे में विस्तार से चाहिए तो बताएं
    • उसी अनुरूप और विशिष्ट विवरण दे दूँगा।
  • उद्धरण:
    • दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनें भूमध्यरेखा पार कर बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से होती हुई भारत पर प्रभाव डालती हैं.​
    • दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान ये हवाएँ भारी वर्षा लाने में सहायक होती हैं और मानसून को सक्रिय बनाती हैं.​
    • व्यापारिक पवनें सभी गêtre स्रोतों में North Hemisphere के ऊपरी दबाव-नीचे दबाव के कारण बहने वाली सामान्य हवाओं के रूप में परिभाषित हैं.

5. भारत में, उपोष्ण वनस्पति क्षेत्र में औसत वार्षिक तापमान कितना होता है? [CHSL (T-I) 13 मार्च, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) 17°C से 24°C
Solution:
  • भारत में उपोष्ण वनस्पति क्षेत्र में औसत वार्षिक तापमान 17°C से 24°C के मध्य होता है।
  • यहां पर औसत वार्षिक वर्षा लगभग 75-125 सेमी. के मध्य होती है।
  • उपोष्णकटिबंधीय वनस्पति क्षेत्र: परिभाषा और तापमान रेंज
    • क्षेत्र की परिधि: भारत के उत्तरी-पूर्वी भागों से लेकर हिमालय की पूर्वी ढलानों तक, पहाड़ी और उप-हिल क्षेत्रों में फैला है
    • यह क्षेत्र नम पर्णपाती और पहाड़ी वन जैसी उप-शाखाओं में आता है।
    • तथ्यों के अनुसार यह क्षेत्र आम तौर पर 18°C से 25°C के आस-पास के गर्म-नम जलवायु से समर्थित रहता है।
    • स्रोतों के अनुसार इन इलाकों में औसत वार्षिक तापमान अक्सर 17°C से 24°C के बीच दर्ज किया गया है.​
  • वार्षिक वर्षा और अन्य जलवायु गुण
    • औसत वार्षिक वर्षा इस क्षेत्र में लगभग 75 सेमी से 125 सेमी के बीच पाई जाती है
    • जो तापमान के साथ वनस्पति क्षेत्र के लिए उपयुक्त मौसम बनाती है.​
    • आर्द्रता सामान्यतः उच्च रहती है, अक्सर 80 प्रतिशत के आसपास मापा गया है
    • जो पेड़ों और अन्य वनस्पति के नम परिवेश को बनाए रखता है.​
  • उपोष्णकटिबंधीय वनस्पति क्षेत्र के भीतर विविधता
    • उपरोढ़/उप-हिल क्षेत्रों में चौड़ी पत्तेदार वन, मोंटेन नम/उच्च आर्द्र वन आदि शामिल होते हैं
    • इन सभी में तापमान 17–24°C के आसपास टिके रहने पर सबसे स्वस्थ रहते हैं, जबकि वर्षा की मात्रा और वितरण भी स्थान-स्थान पर भिन्न होता है.​
    • संक्षेप में, औसत तापमान का यह रेंज उस क्षेत्र की जैव विविधता के अनुकूल प्रकृति बनाती है
    • जहां गर्मी के महीनों में तापमान 25°C से नीचे रहता है और ठंडे महीनों में 17°C या उससे थोड़ा नीचे भी जा सकता है (आमतौर पर 18–21°C के आसपास औसत होता है).​
  • महत्वपूर्ण बिंदु
    • उपरोष्णकटिबंधीय वनस्पति क्षेत्र में तापमान और वर्षा का संयोजन उस क्षेत्र की प्राकृतिक वनस्पति संरचना तय करता है
    • तापमान 17–24°C के बीच रहने पर औसत वनस्पति संरचना स्थिर रहती है
    • वर्षा की मात्रा 75–125 सेमी के बीच होने पर पौधों की वृद्धि समर्थित रहती है.​
  • संदर्भ
    • उपरोष्णकटिबंधीय वनस्पति क्षेत्र के तापमान और वर्षा संबंधी बिंदु Testbook पन्नों में 17°C से 24°C तापमान और 75–125 सेमी वर्षा उल्लेखित है.​
    • हिंदी/उच्चारित स्रोतों में भी इस रेंज को उपयुक्त कहा गया है
    • जैसे उपरोष्णकटिबंधीय चौड़ी पत्ती वाला पहाड़ी वन और related जलवायु बिंदु.​

6. भारत के ....... राज्यों से मानसून की वापसी सितंबर की शुरुआत में शुरू हो जाती है। [CHSL (T-I) 16 अगस्त, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (d) उत्तर-पश्चिमी
Solution:
  • सितंबर की शुरुआत तक भारत के उत्तर-पश्चिमी राज्यों में मानसून की वापसी शुरू हो जाती है।
  • मध्य अक्टूबर तक यह प्रायद्वीप के उत्तरी आधे हिस्से से पूरी तरह से हट जाता है।
  • मानसून वापसी की प्रक्रिया
    • मानसून की वापसी उत्तर-पश्चिम भारत से सितंबर के पहले सप्ताह में आरंभ होती है
    • विशेष रूप से राजस्थान के पश्चिमी हिस्सों जैसे बाड़मेर, जोधपुर और जैसलमेर से।
    • यह प्रायः 15-17 सितंबर के आसपास शुरू होती है और मध्य अक्टूबर तक प्रायद्वीप के उत्तरी भाग तक पहुंच जाती है।
    • दिसंबर की शुरुआत तक पूरे देश से विदा हो जाती है।​
  • प्रभावित उत्तर-पश्चिमी राज्य
    • राजस्थान: सबसे पहले पश्चिमी राजस्थान से वापसी, जैसे कच्छ और गंगानगर क्षेत्र।
    • गुजरात: राजस्थान के बाद गुजरात के भागों से।
    • पंजाब और हरियाणा: सितंबर के मध्य तक इनसे भी हटना शुरू।
    • ये राज्य शुष्क मौसम की ओर बढ़ते हैं क्योंकि मानसून के एंटी-साइक्लोनिक सर्कुलेशन के कारण बारिश कम हो जाती है।​​
  • समयरेखा और कारण
    • मानसून की वापसी उत्तर से दक्षिण की ओर क्रमिक होती है।
    • सितंबर में कमी आने वाली बारिश और उच्च दाब का निर्माण मुख्य कारण है।
    • 2025 में यह 14 सितंबर को पश्चिमी राजस्थान से शुरू हुई
    • जो सामान्य से थोड़ा पहले था। अक्टूबर-नवंबर में पूर्ण विदाई होती है।​
  • क्षेत्रीय प्रभाव
    • उत्तर-पश्चिमी राज्यों में सितंबर से ठंडी हवाओं का प्रभाव बढ़ता है
    • जबकि पूर्वोत्तर और दक्षिण में मानसून लंबे समय तक रहता है।
    • इससे फसल कटाई और जलवायु परिवर्तन प्रभावित होते हैं।​

7. दक्षिण-पश्चिम मानसून काल में जब एक-दो या कई सप्ताह तक वर्षा न हो, तो इस परिघटना को क्या कहा जाता है? [CHSL (T-I) 14 अगस्त, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) मानसून में विच्छेद
Solution:
  • दक्षिण-पश्चिम मानसून काल में एक बार कुछ दिनों तक वर्षा होने के बाद यदि एक-दो या कई सप्ताह तक वर्षा न हो तो इसे मानसून में विच्छेद कहा जाता है।
  • यह विच्छेद उत्तरी भारत के विशाल मैदान में उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की संख्या कम होने तथा अंतः उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र की स्थिति में बदलाव आने से
  • पश्चिमी तट पर आर्द्र पवनों का तट के समानांतर प्रवाहित होने से तथा राजस्थान में वायुमंडल के निम्न स्तरों पर तापमान की विलोमता वर्षा करने वाली आर्द्र पवनों को ऊपर उठने से रोकने के फलस्वरूप होता है।
  • मानसून-विराम क्या है
    • मानसून-विराम वह अवधि है जिसमें दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान एक से अधिक सप्ताह तक वर्षा की गतिविधि में उल्लेखनीय कमी हो जाती है और मॉनसूनी ट्रफ क्षेत्र स्थिर या कमजोर रहता है. यह मानसून-काल के भीतर होने वाली एक सामान्य, परंपरागत घटना है
    • खासकर भारत-स्तर के मानसूनी जलवायु क्षेत्रों में ।​
    • यह स्थिति तब बनती है जब सतह के ऊपरी दबाव में गर्त दिखाई नहीं देती
    • कुछ समय के लिए पूर्वी हवाओं की कमी या अस्थिरता रहती है, जिससे भारी वर्षा नहीं होती ।​
  • कौन से कारण प्रभाव डालते हैं
    • ENSO (El Niño–Southern Oscillation) जैसे वैश्विक जलवायु पैटर्न मानसून की मात्रा और आवृत्ति को प्रभावित कर सकते हैं
    • जिससे विराम/ अवसन्नता बढ़ सकती है ।​
    • स्थानीय विराम-स्थिति पर मॉनसून ट्रफ, बंगाल की खाड़ी/अरब सागर में मौसमी प्रणालियाँ, और जैव-जलवायु चक्र (जैसे MJO) का संयुक्त प्रभाव भी होता है ।​
    • वर्षा में कमी का परिणाम कृषि-जल, जल संसाधन, और स्थानीय जलवायु पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है
    • क्योंकि फसलें लंबे समय सूखे से प्रभावित होती हैं ।​
  • क्यों और कब होता है
    • मानसून-विराम सामान्यतः जुलाई-अगस्त के दौरान घट सकता है, जब मॉनसून ट्रफ क्षेत्र स्थानांतरित रहता है
    • कम वर्षा दिखती है; कुछ बार यह जून के अंत या सितम्बर में भी महसूस किया जा सकता है, क्षेत्रीय अंतर के साथ ।​
    • विराम के दौरान क्षेत्रीय मौसमी असमानताएं उभरती हैं
    • जिससे निर्धारित समय पर मानसून की वापसी हल्की या देरी भी हो सकती है ।​
  • परिणाम और प्रभाव
    • कृषि पर सीधी प्रभाव: बारिश में कमी से सिंचाई की मांग बढ़ती है
    • कैलेंडर-अपेक्षित फसल चक्र प्रभावित होते हैं, और सूखा‑जनित नुकसान संभव होता है ।​
    • जल-संसाधन: जलाशयों, नदियों और भू-जल स्तरों पर असर पड़ सकता है
    • बारिश के ब्रेक के कारण जल प्रबंधन अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है ।​
    • विपरीत परिस्थितियाँ: बारिश की विराम के बाद मानसून की वापसी पर कभी-कभी जोरदार वर्षा भी संभव है
    • जिससे बाढ़/भूस्खलन के जोखिम बन सकते हैं।
  • संबंधित अवधारणाएँ
    • मानसून-विराम से मिलते-जुलते कुछ शब्द और परिघटनाएं:
    • शुष्क मानसून की स्थिति (break in monsoon) — विराम के साथ एक अंतराल जिसे विशेषतः जुलाई-अगस्त में देखा जा सकता है ।​
    • मॉनसून की वापसी — मानसून हवाओं का फिर से सक्रिय होना, विराम के बाद वर्षा का पुनरागमन; यह मौसम-परिवर्तन का एक सामान्य भाग है ।​
  • तात्पर्य और सहायता के लिए बिंदु
    • अगर किसी क्षेत्र में मानसून-विराम के संकेत दिख रहे हों, तो कृषि विभाग, मौसम विज्ञान केंद्रों की ताज़ा जानकारी और पूर्वानुमान देखें क्योंकि यह प्रभावित क्षेत्रों, समय-सारिणी और संभावित प्रभाव को स्पष्ट करता है ।​
    • अल नीनो जैसी भूमंडलीय स्थितियाँ मामूली से अत्यधिक परिवर्तन ला सकती हैं
    • इसलिए दीर्घकालीन योजना बनाते समय ENSO-तटस्थ/ENSO-आधारित पूर्वानुमान भी उपयोगी रहते हैं ।​
  • उद्धरण:
    • मानसून-विराम की परिभाषा और प्रभाव पर विवरण के लिए Testbook/IMD स्रोत संदर्भित हैं ।​
    • मानसून-रिकैप/ब्रेक जैसी अवधारणाओं का संक्षिप्त स्पष्टीकरण Pune IMD पेज पर भी मिलता है ।​
    • यदि चाहें, तो मानसून-विराम से जुड़ी क्षेत्र-विशिष्ट जानकारी (जैसे आपके क्षेत्र में आदर्श महीनों
    • संभावित वर्षा कमी के स्तर, कृषि सुझाव) एक बार बताकर मैं उसी के अनुसार खास विवरण और बचाव/अनुदान के सुझाव दे सकता हूँ।

8. भारत के निम्नलिखित में से किस राज्य में गर्मी के मौसम में 'लू' हवा नहीं चलती है? [MTS (T-I) 01 सितंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (d) गोवा
Solution:
  • प्रश्नगत विकल्पों में 'लू' नामक स्थानीय पवन गोवा में नहीं चलती है। 'लू' ग्रीष्मकाल का एक प्रभावी लक्षण है।
  • ये धूल भरी गर्म एवं शुष्क पवन होती है जो कि मुख्यतः दिन के समय भारत के उत्तर तथा उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में चलती है।
  • लू क्या है
    • लू एक तेज, गर्म और शुष्क हवा है जो आम तौर पर गर्मियों के महीनों में उत्तर-पश्चिमी भारत के कुछ हिस्सों में मौजूद होती है
    • यह तापमान बढ़ाकर मौसम को बेहद कठिन बना देती है.​
  • भारत में लू के क्षेत्रीय प्रवाह
    • लू के प्रवाह का मुख्य क्षेत्र उत्तर-पश्चिमी भारत है
    • जिसमें पंजाब, हरियाणा, राजस्थान आदि शामिल हैं
    • जहाँ तापमान और आर्द्रता असामान्य रूप से उच्च हो जाते हैं.​
    • समुद्री प्रभाव वाले तटीय क्षेत्र जैसे गोवा में समुद्री हवाओं और समुद्री जल के प्रभाव से तापमान नियंत्रित रहता है
    • जिससे लू की तीव्रता और आवृत्ति कम होती है, और कभी-कभी लू चलना भी कम या नहीं होता है.​
  • गोवा क्यों खास है
    • गोवा तटीय है और यहाँ का जलवायु प्रतिरूप भिन्न होता है; समुद्री प्रभाव से तापमान अधिक नियंत्रित रहता है
    • जिससे गर्मी के मौसुम में भी लू की तीव्र हवा विकसित होना अक्सर नहीं होता है.​
    • सामान्यतः गोवा और अन्य पश्चिमी तटीय राज्यों में गर्मी में लू की घटनाएं कम होती हैं
    • क्योंकि तापमान, आर्द्रता और दबाव मिलकर एक स्थिर, मध्यम वातावरण बनाते हैं.​
  • अन्य राज्यों के बारे में तुलना
    • पंजाब, राजस्थान, हरियाणा आदि उत्तर-पश्चिमी राज्यों में लू सामान्यतः तेज और सूखी गर्म हवा के रूप में चलती है.​
    • मध्य प्रदेश, गुजरात आदि क्षेत्रों में भी गर्मी बहुत प्रचंड होती है, पर लू की आवृत्ति और तीव्रता स्थान-स्थान पर भिन्न होती है
    • किन्तु तटीय क्षेत्रों के मुकाबلے वे लू से अधिक प्रभावित रहने वाले क्षेत्र माने जाते हैं.​​
  • लू के स्वास्थ्य प्रभाव
    • लू के दौर में उच्च तापमान के कारण ऊष्माघात, निर्जलीकरण, दिल-धमनियों पर बोझ आदि जोखिम बढ़ जाते हैं
    • विशेषकर बच्चों, बुजुर्गों और अस्थिर स्वास्थ्य वाले लोगों के लिए खतरा ज्यादा होता है.​
  • निष्कर्ष
    • आपके प्रश्न के अनुसार, भारत के ऐसे राज्य जिनमें गर्मी के मौसम में लू हवा नहीं चलती है
    • उनमें प्रमुख रूप से गोवा आता है क्योंकि यह एक तटीय राज्य है और समुद्री प्रभाव से लू की तीव्रता कम रहती है.​
    • अन्य तटीय राज्यों में भी लू की घटनाएं काफी कम या असामान्य हो सकती हैं
    • लेकिन गोवा सबसे स्पष्ट उदाहरण है जहाँ लू के प्रसार की सामान्य पुष्टि नहीं मिलती है.​
  • नोट और स्रोत
    • लू की परिभाषा, क्षेत्रीय वितरण और गोवा से सम्बन्धित तटीय प्रभावों के बारे में: Web स्रोतs जिनमें लू का क्षेत्रीय वितरण और तटीय प्रभाव समझाते हैं.​
    • गोवा के तटीय климатिक प्रभावों के कारण लू कम रहने के तर्क: गोवा तटीय होने का प्रभाव.​

9. भारत की जलवायु को, निम्नलिखित में से क्या कहा जाता है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 3 दिसंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) मानसूनी जलवायु
Solution:भारत की जलवायु को मानसूनी जलवायु कहा जाता है। किसी क्षेत्र में लंबे समय तक जो मौसम की स्थिति होती है, उसे उस स्थान की जलवायु या क्लाइमेट कहा जाता है। अतः विकल्प (d) सही उत्तर होगा।

10. भारत के उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सी विशेषता गलत है? [Phase-XI 27 जून, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (d) इन वनों में वार्षिक वर्षा 150 सेमी. से कम होती है।
Solution:
  • उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनों में वार्षिक वर्षा 200 सेमी. से अधिक होती है।
  • ये वन भारत के अत्यधिक आर्द्र तथा उष्ण भागों में मिलते हैं।
  • इनकी सापेक्ष आर्द्रता 70 प्रतिशत से अधिक होती है।
  • उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन क्या होते हैं
    • ये वे जंगल होते हैं जिनमें वर्षभर पत्ते हरे रहते हैं
    • कोई स्पष्ट शुष्क अवधि नहीं होती
    • वर्षा अधिक और समान रूप से वर्षभर होती है
    • तापमान स्थिर रहता है [स्रोत संज्ञान: सामान्य वनविज्ञान मानक अवधारणाएं]।
    • भारत में ये वन प्रायः दक्षिणी मध्य और पश्चिमी घाट के क्षेत्र, नीलगिरी, कुर्ग, केरल, तमिलनाडु के 일부 हिस्सों, बंगाल और असम के कुछ तटवर्ती क्षेत्र आदि में मिलते हैं
    • साथ ही अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में भी मिलते हैं [संभावित क्षेत्रीय विवरण]।
  • विशेषताओं के सामान्य उदाहरण
    • विविध घने पेड़-चंद प्रकार के वृक्ष प्रजातियों का बहुलक, बहुस्तरीय canopy, और उच्च जैव विविधता।
    • वर्षा kuukmonths 200-300 सेमी के आसपास या अधिक हो सकती है; तापमान लगभग स्थिर रहता है।
    • कुछ प्रमुख वृक्ष प्रजातियाँ जैसे रॉजवुड, महोगनी आदि इन वनों में पाए जाते रहे हैं; परंतु क्षेत्रीय वितरण में विविधता रहती है।
  • संभावित गलतता खोजने के तरीके
    • यदि विकल्पों में से एक में कहा गया है कि ये वन पश्चिमी घाट के बाहर भी समान प्रकार की सदाबहारता दिखाते हैं या ऊँचाई/जंगल संरचना बहुत अलग है
    • तो वह गलत हो सकता है क्योंकि उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनों का प्रमुख वितरण ठोस भू-आकृतिक और जलवायु सीमाओं के कारण कुछ क्षेत्रों तक सीमित रहता है।
    • अन्य सामान्य गलतियाँ: लिप्तता में कहा गया कि इन वनों में गर्मी-सर्दी के स्पष्ट ऋतु परिवर्तन होते हैं
    • वर्षा के स्रोत केवल एक मौसमी ड्रॉव है, जो इन वनों के सदाबहार nature के साथ असंगत रहता है।
  • निष्कर्ष
    • सही विकल्प एक ऐसा तथ्य होना चाहिए जो उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन की निरंतरता/स्थायित्व वाले गुणों के साथ असंगत हो
    • उदाहरण के लिए यह दावा कि ये वनों की सबसे बड़ी मात्रा बिना मानसून-स्थिरता के या बिना वर्षा-आधार के होते हैं
    • वे सभी क्षेत्रों में समान रूप से उपस्थित होते हैं, आम तौर पर गलत होगा।