पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी (भारत का भूगोल) (भाग-I)

Total Questions: 30

1. निम्नलिखित में से कौन-से पेड़ भारत के पर्णपाती वनों में पाए जाते हैं? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 2 दिसंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (e) सागौन और शीशम
Solution:
  • सागौन भारत के उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वनों की सबसे महत्वपूर्ण प्रजाति है।
  • इस जंगल की अन्य महत्वपूर्ण प्रजातियां बांस, साल, शीशम, चंदन, कुसुम आदि हैं।
  • जबकि महोगनी तथा आबनूस उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन के अंतर्गत आते हैं।
  • आर्द्र पर्णपाती वन
    • ये वन 100-200 सेमी वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों जैसे उत्तर-पूर्वी राज्य, हिमालय की तलहटी, पश्चिमी घाट के पूर्वी ढलान और ओडिशा में पाए जाते हैं।
    • मुख्य पेड़ों में सागौन (Tectona grandis), साल (Shorea robusta), शीशम (Dalbergia sissoo), महुआ (Madhuca longifolia), आँवला (Phyllanthus emblica), सेमल (Bombax ceiba), कुसुम (Schleichera oleosa) और चंदन (Santalum album) शामिल हैं।
    • इनमें बांस (Bamboo) भी प्रचुर मात्रा में उगता है, जो वन की संरचना को मजबूत बनाता है।​
  • शुष्क पर्णपाती वन
    • ये 70-100 सेमी वर्षा वाले शुष्क क्षेत्रों जैसे उत्तर भारत के शिवालिक, प्रायद्वीप का उत्तर-पूर्वी भाग और मध्य भारत में मिलते हैं।
    • प्रमुख प्रजातियाँ बबूल (Acacia nilotica), खैर (Acacia catechu), नीम (Azadirachta indica), पलास (Butea monosperma), बेर (Ziziphus mauritiana), खजूर (Phoenix sylvestris) और काँटा (Prosopis spicigera) हैं।
    • इनके नीचे घास के मैदान विकसित होते हैं, जो पशुचारण के लिए उपयोगी हैं।​
  • अन्य महत्वपूर्ण पेड़
    • पर्णपाती वनों में कटहल (Artocarpus heterophyllus), आम (Mangifera indica), अर्जुन (Terminalia arjuna), हरड़ (Terminalia chebula), बरगद (Ficus benghalensis) और मवेशी (Bauhinia variegata) भी आम हैं।
    • सागौन और साल को आर्थिक रूप से सबसे मूल्यवान माना जाता है।
    • ये वन जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण हैं और लकड़ी, औषधि तथा ईंधन प्रदान करते हैं।​

2. निम्नलिखित में से किस प्रकार के बायोम का 'उष्णकटिबंधीय सवाना' नामक उप-प्रकार होता है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 3 दिसंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) घासस्थल
Solution:
  • घासस्थल प्रकार के बायोम का 'उष्णकटिबंधीय सवाना' नामक उप-प्रकार होता है।
  • ये घास के मैदान उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों तथा मरुस्थलीय बायोम के मध्य लहरदार बिखरे घास के मैदानों के रूप में पाए जाते हैं।
  • तुलनात्मक बिंदु
    • उप-प्रकार का अभिप्राय: उष्णकटिबंधीय सवाना एक प्रकार का घास-मैदान बायोम है
    • जिसमें घास प्रमुख होता है और पेड़-झाड़ियाँ बिखरे हुए रहते हैं।​
    • जलवायु-संरचना: दो मौसम—गीला और शुष्क—इनका प्रमुख चरित्र है
    • जिसकी वजह से वनस्पति संरचना और जीव-जगत विशिष्ट रूप से अनुकूलित रहती है।​
    • वैश्विक प्रसार: अफ्रीका-आस्ट्रेलिया-दक्षिण अमेरिका-भारत जैसे उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाया जाता है।​
    • जैव विविधता और भूमिका: घास-मैदान जैव विविधता का समृद्ध है
    • चराय-उन्मुख पारिस्थितिकी के लिए महत्त्वपूर्ण है, और कार्बन सिंक के तौर पर भी भूमिका निभाता है।​
  • याद रखने योग्य मुख्य बातें
    • “उष्णकटिबंधीय सवाना” अक्सर एक उप-प्रकार के रूप में वर्णित होता है जो घास के मैदानों पर केंद्रित होता है
    • इसमें sporadic (बिखरे हुए) पेड़-झाड़ियाँ मिलती हैं।​
    • यह बायोम उष्णकटिबंधीय जलवायु क्षेत्र में होती है, जहाँ तापमान स्थिर रहता है
    • वर्षा का विहाजन्य पैटर्न घास के अविकास और जीवों के अतिचलन को प्रभावित करता है।​
    • यदि चाहें, इसे किसी एक विशिष्ट क्षेत्र (जैसे अफ्रीका के सवाना, भारत के मरुस्थलीय-घास के मैदान) के संदर्भ में भी विस्तार से देखा जा सकता है
    • स्थानीय पेड़-झाड़ियाँ, जलवायु डेटा, और प्रमुख जीवों के उदाहरण सूचीबद्ध किए जा सकते हैं।

3. 1990 के दशक की शुरुआत में किस प्रक्रिया की खोज की गई थी, जो वर्तमान में अपशिष्ट जल से अमोनिया को हटाने के लिए उपयोग की जाती है और महासागरों से स्थिर नाइट्रोजन को नष्ट करने में महत्वपूर्ण योगदान देती है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 30 नवंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) एनामॉक्स
Solution:
  • 1990 के दशक की शुरुआत में एनामॉक्स (Anaerobic ammonium oxidation) प्रक्रिया की खोज की गई
  • जो वर्तमान में अपशिष्ट जल से अमोनिया को हटाने के लिए उपयोग की जाती है
  • महासागरों से स्थिर नाइट्रोजन को नष्ट करने में महत्वपूर्ण योगदान देती है।
  • SHARON–ANAMMOX संयोजन का महत्त्व:
    • SHARON चरण उच्च तापमान पर गतिशील रहता है और nitrite-producing bacteria की वृद्धि को प्रोत्साहित करता है
    • इसके साथ anaerobic वातावरण में ANAMMOX बैक्टीरिया nitrite और ammonium को सीधे N2 गैस में रूपांतरित करते हैं
    • जिससे बड़े पैमाने पर एलोšana (कम ऊर्जा-खपत, कम मात्रा में स्लरी) में नाइट्रोजन हटाने की क्षमता मिलती है ।​
    • यह संयोजन पारंपरिक मेथनोजन (nitrification-denitrification) की अपेक्षा ऊर्जा-खपत में अधिक कुशल माना गया है
    • क्योंकि यह ऑक्सीजन की आवश्यकता कम कर देता है और ऑक्सीजन-सम्बंधित खर्च घटाता है ।​
  • अद्यतन और तुलनात्मक दृष्टिकोण:
    • 1990 के दशक के अंत और 2000 के दशक की शुरुआत में ammonia stripping, air stripping, electro-dialysis आदि जैसे physico-chemical या अन्य जैविक-आधारित विकल्प भी विकसित हुए
    • जैसे प्रक्रियाओं ने विशेष तौर पर कम-ऊर्जा-उत्पादन और कम सामग्री-उत्पादन के कारण स्थायित्व और बड़े-स्तर के अनुप्रयोगों में प्रेरणा दी ।​
    • वैज्ञानिक साहित्य इस बात पर भी सहमत है कि ANAMMOX-आधारित प्रणालियाँ municipal और industrial wastewater दोनों के nitrogen-removal दरों में सुधार के लिए उपयुक्त हैं
    • महासागरीय nitrogen cycling के हिस्से के रूप में N2 गैस रिलीज करती हैं ।​
  • महासागरों पर प्रभाव:
    • नाइट्रोजन-सम्पन्न जल के समुद्री प्रणालियों में prosthetic pathways के कारण प्राकृतिक जिन्न-चक्रण (nitrification–denitrification) के साथ-साथ ANAMMOX जैसे जैविक मार्ग भी समुद्री नाइट्रोजन प्रवाह को नियंत्रित करते हैं
    • जिससे स्थिर नाइट्रोजन के नुकसान/फ्लडिंग में कमी और समुद्री अम्लता-सम्वेदनशीलता के साथ इंफ्लुएंस संतुलित रहते हैं ।​
  • प्रौद्योगिकी अवलोकन (लंबे विवरण के लिए मुख्य बिंदु):
    • SHARON चरण ammonium को nitrite में रूपांतरित करता है; यह चरण सामान्यतः उच्च तापमान और विशेष pH-परिसर में लाभदायक रहता है ।​
    • ANAMMOX चरण nitrite और ammonium को मिलाकर N2 गैस बनाता है
    • जिससे जल-निकासी प्रणालियों में nitrogen-removal उच्च-गुणवत्ता और कम ऊर्जा-खपत के साथ संभव होता है ।​
    • इन प्रणालियों के एकीकरण से संयुक्त-प्रदर्शन में wastewater से ammonia-N removal को कम-ऊर्जा-उत्पादन की दिशा में बढ़ावा मिला है
    • जबकि रसायनिक/फिज़िकल विकल्पों पर निर्भरता घटती है ।​
  • अन्य प्रगति और संदर्भ:
    • ammonia stripping व अन्य फिजिक-रसायनिक निवारण पद्धतियाँ भी 1990s के बाद से विकसित हुईं
    • किन्तु SHARON/ANAMMOX की भूमिका स्थिर-नाइट्रोजन के महासागरीय चक्र में विशेष महत्त्व रखती है ।​
    • हाल के समीक्षा लेखों में nitrogen removal technologies के विस्तृत अवलोकन मिलते हैं
    • जिसमें ammonia stripping, CWAO, तथा अन्य जैविक/केमिकल प्रक्रियाओं का तुलनात्मक मूल्यांकन किया गया है
    • ANAMMOX की भूमिका सूर्य-चक्र (marine nitrogen cycle) में अहम रहती है ।​
  • निष्कर्ष:
    • 1990 के दशक की शुरुआत में SHARON-ANAMMOX जैसे जैविक-आधारित प्रक्रियाओं का विकास हुआ
    • ताकि wastewater से ammonium-nitrogen कम किया जा सके और महासागरों के स्थिर नाइट्रोजन चक्र में योगदान दिया जा सके।
    • यह संयोजन ऊर्जा-कुशल और स्थायी नाइट्रोजन-उन्मूलन के लिए प्रमुख मानक बन गया है, विशेषकर बड़े-स्तर के अनुप्रयोगों में ।​

4. अगस्त्यमाला बायोस्फीयर रिजर्व किन दो राज्यों में स्थित है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 23 नवंबर, 03 दिसंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) केरल और तमिलनाडु
Solution:
  • अगस्त्यमाला बायोस्फीयर रिजर्व कर्नाटक, तमिलनाडु एवं केरल राज्यों में स्थित है।
  • प्रश्न में दो राज्यों में स्थित पूछा गया है जो त्रुटिपूर्ण है
  • परंतु प्रश्नगत विकल्पों में इसका निकटतम उत्तर विकल्प (b) होगा।
  • विस्तार में:
    • Augustyamalai (अगस्त्यमाला) पश्चिमी घाट के दक्षिणी भाग में स्थित है
    • इसका क्षेत्र प्रमुख रूप से केरल और तमिलनाडु में फैला हुआ है।
    • यह बायोस्फीयर रिजर्व नेटवर्क के अंतर्गत आता है, जिसे 2001 में स्थापित किया गया था
    • 2016 में यूनेस्को के जिवमंडल नेटवर्क (MAB/BIOSPHERE) में शामिल किया गया।
    • केरल के उत्तरी और दक्षिणी जिलों के साथ तमिलनाडु के कन्याकुमारी क्षेत्र तक यह फैला हुआ मानक प्रस्तुत करता है [उद्धरण उपलब्ध हैं, जैसे GKToday/Testbook/DrishtiIAS आदि]।
  • वास्तविक भौगोलिक विवरण:
    • केरल भाग में कई वन्य क्षेत्र शामिल हैं, जिनमें नेय्यर और पेप्पारा जैसे वन्यजीव अभयारण्य और आसपास के क्षेत्र आते हैं
    • तमिलनाडु के कन्याकुमारी, तिरुवन्नथपुरम जिलों के हिस्से भी रिजर्व के भाग हैं।
    • यह पारिस्थितिक विविधता के कारण एक आकर्षक जैव-विविधता केंद्र है
    • [web-उद्धरण उपलब्ध: GKToday/Testbook/DrishtiIAS आदि]।

5. निम्नलिखित में से कौन-सा राज्य उष्णकटिबंधीय कंटीले वनों से संबंधित है? [Phase-XI 30 जून, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) मध्य प्रदेश
Solution:
  • उष्णकटिबंधीय कंटीले वन एवं झाड़ियां उन क्षेत्रों में पाई जाती हैं
  • जहां लगभग 70 सेमी. से कम वर्षा होती है। इनमें विभिन्न प्रकार के कंटीले वन, घास और झाड़ियां पाई जाती हैं।
  • इसमें दक्षिणी-पश्चिमी पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के अर्द्धशुष्क क्षेत्र शामिल हैं
  • उष्णकटिबंधीय काँटेदार वन क्या हैं
    • विशेष प्रकार के उष्णकटिबंधीय वन जिनमें वर्षा कम होती है (शुष्क या अर्ध-शुष्क क्षेत्र) और जंगल का कैनोपी स्तर खुला रहता है
    • ताकि प्रकाश नीचे तक पहुँच सके। प्रमुख जातियाँ बबूल (Acacia/Prosopis spp.) और अन्य कठोर-झाड़ियाँ हैं।​
    • इन वनों का वितरण मुख्यतः दक्षिणी-पश्चिमी भारत और रेगिस्तानी-सीमाओं के पास होता है
    • भारत के पूर्वोत्तर हिस्सों में उष्णकटिबंधीय वर्षावन अधिक उल्लेखनीय हैं।​
  • कहाँ कहाँ उष्णकटिबंधीय काँटेदार वन मिलते हैं
    • राजस्थान: उष्णकटिबंधीय काँटेदार वन का एक प्रमुख क्षेत्र जैसलमेर जैसे जिलों में पाया जाता है
    • जो शुष्क पर्णपाती और काँटेदार जंगलों के साथ मिलते-जुलते प्रजातीय संसार को प्रस्तुत करता है।
    • इसलिए जैसलमेर में these प्रकार के वन पाये जाते हैं।​
    • पूर्वोत्तर और उत्तर-पूर्वी हिमरेखा के आस-पास: असम, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश आदि राज्यों में उष्णकटिबंधीय वर्षावन सामान्यतः प्रमुख हैं;
    • काँटेदार वन इन क्षेत्रों में कम-से-कम हिस्सों में मौजूद हो सकते हैं
    • पूर्णतया काँटेदार-वन के बजाय समृद्ध वर्षावन अधिक प्रचलित हैं।​
    • दक्षिणी-पश्चिमी भाग: पर्माफ्रेश, सुदूर दक्षिणी भागों में भी कुछ काँटेदार वन या मिश्रित वन पाए जा सकते हैं
    • वहाँ की प्रमुख पहचान उष्णकटिबंधीय शुष्क/काँटेदार शैलियाँ हैं।​
  • कहाँ अधिक स्पष्ट रूप से उष्णकटिबंधीय वर्षावन रहते हैं
    • पूर्वोत्तर भारत का क्षेत्र (असम, अरुणाचल प्रदेश आदि): यहाँ उष्णकटिबंधीय वर्षावन व्यापक रूप से फैले हुए हैं
    • इतनी भारी वर्षा के कारण यहाँ कैनोपी-समृद्ध जंगल मिलते हैं।
    • शुष्क काँटेदार वन स्थानीय क्षेत्रों में विशेष रूप से नहीं बल्कि वर्षा-प्रधान जंगल यहाँ प्रमुख हैं।​
    • अन्य उष्णकटिबंधीय वन क्षेत्रों में बबूल-युक्त काँटेदार वन भी मिलते हैं, विशेषकर अरावली-पूर्वीय पठार के क्षेत्रों में।​
  • महत्वपूर्ण निष्कर्ष
    • उष्णकटिबंधीय काँटेदार वन मुख्यतः शुष्क या अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में पाये जाते हैं
    • जिनमें बबूल-जातियाँ प्रमुख होती हैं और कैनोपी खुली रहती है। राजस्थान के कुछ जिलों में यह प्रकार पाया जाता है
    • जबकि अधिक विस्तृत और समृद्ध उष्णकटिबंधीय वर्षावन पूर्वोत्तर भारत में स्थित हैं।​
    • यदि प्रश्न यह है कि “इनमें से कौन-सा राज्य उष्णकटिबंधीय काँटेदार वन से जुड़ा है
    • तो सबसे स्पष्ट उत्तर जैसलमेर (राजस्थान) है क्योंकि वहाँ उष्णकटिबंधीय काँटेदार वन का उल्लेख स्पष्ट रूप से दर्ज है
    • असम/पूर्वोत्तर क्षेत्र उष्णकटिबंधीय वर्षावन के लिए प्रसिद्ध हैं, जहां काँटेदार वन भी मिलते हैं पर प्रमुखता वर्षावन की होती है।​

6. भारत का कौन-सा क्षेत्र अनोखे शोला वनों के लिए जाना जाता है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 22, 23 नवंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (b) पश्चिमी घाट
Solution:
  • भारत का पश्चिमी घाट क्षेत्र शोला वनों के लिए जाना जाता है।
  • नीलगिरि, अन्नामलाई तथा पालनी पहाड़ियों में समशीतोष्ण वनों को शोला वन कहते हैं।
  • शोला वन क्या हैं
    • परिभाषा: शोला वन दक्षिण भारत के ऊँचे पर्वतीय भागों में मौजूद शीतोष्ण-उष्णकटिबंधीय पर्वतीय वन की एक विशिष्ट श्रेणी हैं
    • जिनमें घास के मैदान और छोटे सदाबहार वनों के मुलायम मोज़ेक के साथ घाटियाँ बनी होती हैं।
    • इन जंगलों का वातावरण ऊँचाई के कारण ठंडा और नम रहता है। [स्थानीय ज्ञान/भूगोल संदर्भ]
    • ऊँचाई सीमा: आम तौर पर समुद्र तल से लगभग 1,500 से 2,500 मीटर की ऊँचाई पर पाए जाते हैं
    • जहाँ तापमान ठंडा रहता है और वर्षा चरम नहीं होती। यह ऊँचाई-आधारित संकुल शोला वन की विशिष्टता है। [स्थानीय भूगोल]
  • कहाँ कहाँ पाए जाते हैं
    • दक्षिणी पश्चिमी घाट: मुख्य बंधन-क्षेत्र कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के ऊँचे भागों में स्थित हैं
    • नीलगिरि, अन्नामलाई और पलानी की पहाड़ियों में शोला वनों की विशिष्ट उपस्थिति दर्ज है।
    • ये क्षेत्र शोला वन के क्लस्टर-एन्क्लेव के रूप में प्रसिद्ध हैं। [स्थानीय वन-विज्ञान स्रोत/शिक्षण सामग्री]
    • अन्य शहरी-मैदानी ऊँचाइयों पर शोला वन की वास्तविकता नरम-गुणात्मक रूप से कम है
    • अधिकतर_showला-वनों का प्रभाव पश्चिमी घाट के उच्च क्षेत्रों में केंद्रित रहता है। [शिक्षण/आदि]
  • प्रणालीगत महत्व
    • जैव विविधता: शोला वनों में सीमित गाढ़े कैनोपी-घनेपन के विरुद्ध घास-मैदानों का मिश्रण इतना विशिष्ट बनाता है
    • कई स्थानीय प्रजातियाँ यहाँ अनुकूलित हैं। यह विविधता क्षेत्रीय पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण है। [स्थानीय अध्ययन/शिक्षण]
    • जल संरक्षण: ये वन जल के अनुशासन को बनाए रखते हैं, नदियों के पानी की सतत् धारा और भूमिगत जल स्त्रोतों के संरक्षण में सहायक होते हैं
    • खासकर पेयजल और कृषि-जल चक्र के लिए। [ watershed/पारिस्थितिकी संदर्भ]
    • कार्बन संकेंद्रण: शोलाओं का स्थितिगत संरचना जलवायु-निवारण में योगदान देती है
    • क्योंकि उच्च ऊँचाई के वन क्षेत्रों में कार्बन पृथक्करण की प्रक्रियाओं में भाग लेते हैं। [ऊर्जा/जलवायु संदर्भ]
  • संभावित भ्रम और तुलना
    • शोला बन बनाम उष्णकटिबंधीय वर्षावन: शोला वन पर्वतीय-उष्णकटिबंधीय प्रकार हैं
    • जबकि दक्षिण भारत का उष्णकटिबंधीय वर्षावन अधिक घनत्व वाला और वर्षा-प्रधान मिजाज दिखाते हैं
    • शोला विशेषतः ऊँचाई और मौसमी जलवायु के अनुकूल होता है। [भूगोल/वृहत अध्ययन]
    • अन्य राज्यों में अवसर: पश्चिमी घाट के बाहर शोला वनों का वितरण बहुत कम होता है
    • यदि दिखे तो वे छोटी चिन्हें या मिश्रित पर्वतीय वन का भाग होते हैं। [स्थानीय वन-विज्ञान स्रोत]
  • क्यों यह क्षेत्र विशेष क्यों माना जाता है
    • यूनेस्को विश्व धरोहर-धारणा: पश्चिमी घाट और इसके शोला-घास-घटित बनों की जैव विविधता एवं जल-रक्षक भूमिका इन्हें क्षेत्रीय महत्त्व देता है।
    • [विश्व धरोहर/संस्थागत विवरण]
    • स्थानीय समुदाय: शोला वनों से स्थानीय समुदायों को जल संरक्षण, चराई-स्थिति और औषधीय पौधों जैसे संसाधनों की आपूर्ति मिलती है
    • जो ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था से जुड़ी हैं। [स्थानीय जीवन-निर्भरता]

7. टिकाऊ और कठोर लकड़ी प्रदान करने वाले सुंदरी वृक्ष भारत में कहां पाए जाते हैं? [CGL (T-I) 18 जुलाई, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (b) मैंग्रोव वन
Solution:
  • सुंदरी पेड़ अथवा वृक्ष भारतीय उपमहाद्वीप में मैंग्रोव वृक्ष की प्रमुख प्रजाति है।
  • ये भारत में पश्चिम बंगाल के पास स्थित सुंदरबन डेल्टा में बहुतायत में पाए जाते हैं।
  • स्थान विवरण
    • सुंदरी वृक्ष पद्मा, मेघना और ब्रह्मपुत्र नदियों के डेल्टा क्षेत्र में स्थित सुंदरबन मैंग्रोव वनों में पाए जाते हैं
    • जो पश्चिम बंगाल राज्य में फैले हुए हैं और बांग्लादेश की सीमा तक विस्तृत हैं। सुंदरबन दुनिया का सबसे बड़ा निरंतर मैंग्रोव वन है
    • यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त है।
    • ये वृक्ष खारे पानी और जलभराव वाले वातावरण के लिए अनुकूलित होते हैं।​
  • लकड़ी की विशेषताएँ
    • सुंदरी वृक्ष की लकड़ी उच्च गुणवत्ता वाली, मजबूत, टिकाऊ और दीमक प्रतिरोधी होती है
    • जिसका उपयोग निर्माण कार्य, नाव निर्माण तथा फर्नीचर बनाने में किया जाता है।
    • इसकी पानी प्रतिरोधी प्रकृति इसे व्यावसायिक रूप से मूल्यवान बनाती है।
    • हालांकि, जलवायु परिवर्तन, समुद्र स्तर वृद्धि और अत्यधिक कटाई से इनकी संख्या घट रही है
    • जिसके कारण IUCN रेड लिस्ट में इन्हें कमजोर श्रेणी में रखा गया है।​
  • पारिस्थितिक महत्व
    • ये वृक्ष घनी जड़ प्रणाली के माध्यम से तटीय कटाव रोकते हैं, मिट्टी को स्थिर रखते हैं तथा लवणता को नियंत्रित करते हैं।
    • सुंदरबन में सुंदरी वृक्षों के कारण ही इस क्षेत्र का नाम पड़ा है।
    • अन्य मैंग्रोव क्षेत्रों जैसे अंडमान-निकोबार, गोदावरी-कृष्णा डेल्टा में भी सीमित संख्या में पाए जाते हैं।​
  • संरक्षण प्रयास
    • सुंदरी वृक्षों की रक्षा के लिए भारत सरकार और NGOs द्वारा पुनर्वनीकरण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।
    • इनके आवास संरक्षण से जैव विविधता और तटीय सुरक्षा सुनिश्चित होती है।​

8. मेघालय के पठार, सह्याद्री और निकोबार समूह के मध्य और दक्षिणी द्वीपों में किस प्रकार की वनस्पति पाई जाती है? [CGL (T-I) 20 जुलाई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) नम उष्णकटिबंधीय अर्द्ध सदाबहार वनस्पति
Solution:
  • मेघालय के पठार, सह्याद्रि और अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह के मध्य और दक्षिणी द्वीप उष्णकटिबंधीय जलवायु और अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में स्थित है।
  • इस प्रकार वनस्पति के ये क्षेत्र नम उष्णकटिबंधीय अर्द्ध सदाबहार वनस्पति के अंतर्गत आते हैं।
  • प्रमुख विशेषताएं
    • ये वन उच्च वर्षा (1500-4000 मिमी से अधिक) वाले क्षेत्रों में विकसित होते हैं, जहां पेड़ों की ऊंचाई 30-50 मीटर तक पहुंचती है
    • घनी लियानाएं, एपिफाइट्स तथा कवक प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
    • मेघालय पठार पर खासी, जयंतिया और गारो पहाड़ियों में ये वन 1200 मीटर तक फैले हैं
    • जबकि सह्याद्री के पठारी भागों में केरल और कर्नाटक के पश्चिमी ढलानों पर समान वनस्पति है।
    • निकोबार द्वीपों के मध्य और दक्षिणी हिस्सों में उष्णकटिबंधीय आर्द्र वन मैंग्रोव से मिश्रित रूप में पाए जाते हैं, जो समुद्री प्रभाव से समृद्ध हैं।​
  • प्रमुख प्रजातियां
    • वृक्ष: कास्टानोप्सिस इंडिका, डायसोक्सिलम, एलियोकार्पस फ्लोरिबंडस, डिलेनिया इंडिका, शोरेा रोबस्टा, टेक्टोना ग्रैंडिस, टर्मिनालिया मायリオकार्पा।
    • उपवृक्ष और झाड़ियां: सिम्प्लोकोस पैनिकुलाटा, सैपिंडस रराक, रोडोडेंड्रॉन आर्बोरियम, माइरिका एसकुलेंटा।
    • अन्य: ऑर्किड की 300+ प्रजातियां, कीटभक्षी पौधे जैसे नेपेंथेस खासियाना, ड्रोसेरा प्रजातियां, बांस और लियानाएं।
    • निकोबार में अतिरिक्त रूप से महोगनी, सागवान और उष्णकटिबंधीय फलदार वृक्ष जैसे एपेल (महोगनी) प्रमुख हैं।​
  • क्षेत्रीय भिन्नताएं
    • मेघालय पठार पर उपोष्णकटिबंधीय पाइन वन (पाइनस केसिया) ऊंचाई वाले क्षेत्रों (900-1500 मीटर) में सीमित हैं
    • जबकि निचले भागों में आर्द्र सदाबहार वन। सह्याद्री में वर्षा छाया वाले पूर्वी ढलानों पर आर्द्र पर्णपाती वन मिश्रित हैं।
    • निकोबार के दक्षिणी द्वीपों (जैसे ग्रेट निकोबार) में उष्णकटिबंधीय वर्षावन अधिक शुद्ध रूप में हैं
    • जहां एंडेमिक प्रजातियां जैसे प्टेरोस्पर्मम एसिरिफोलियम पाई जाती हैं।
    • ये सभी क्षेत्र जैव-विविधता हॉटस्पॉट हैं, जहां 70% से अधिक क्षेत्र वनाच्छादित है।​
  • पारिस्थितिक महत्व
    • ये वन जल संरक्षण, मिट्टी कटाव रोकथाम और वन्यजीव आवास प्रदान करते हैं
    • जिसमें हॉर्नबिल, बाघ और हाथी शामिल हैं। हालांकि, अवैध कटाई, खनन और जलवायु परिवर्तन से खतरा है
    • जिसके कारण कई प्रजातियां IUCN रेड लिस्ट में हैं।
    • संरक्षण के लिए राष्ट्रीय उद्यान जैसे सुंदरबन-निकोबार और मेघालय के बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट संरक्षित हैं।​

9. साल, बबूल और बांस, जो शुष्क उष्णकटिबंधीय वन के प्रकार हैं, में वार्षिक वर्षा की मात्रा कितनी है? [CHSL (T-I) 07 अगस्त, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (b) 51 से 151 सेमी. के बीच
Solution:
  • साल, बबूल और बांस शुष्क उष्णकटिबंधीय वन के अंतर्गत आते हैं।
  • इस क्षेत्र में वार्षिक वर्षा की मात्रा 51 से 151 सेमी. के बीच होती है।
  • यह वन क्षेत्र आर्द्र तथा शुष्क जलवायु के बीच संक्रमण पेटी के बीच स्थित है।
  • अतः इसकी आर्द्र तथा शुष्क सीमाओं पर वार्षिक वर्षा की मात्रा तथा अवधि में पर्याप्त विषमता पाई जाती है।
  • उष्णकटिबंधीय वनांची स्थिति
    • शुष्क उष्णकटिबंधीय वन वेग-वेग जलवायु क्षेत्रों में पाए जाते हैं
    • जहां वर्षा-मौसम स्पष्ट और сух रहता है, यानी बरसात का काल छोटा या हल्का होता है.​
    • साल, बबूल और बांस इन वनों में सामान्य पेड़-प्रजातियाँ हैं
    • जिनकी जलवायु-आवश्यकताएँ समान रूप से गर्म तापमान और सीमित वर्षा के अनुरूप होती हैं.​
  • वार्षिक वर्षा का दायरा
    • विशिष्ट शिक्षण-स्रोतों के अनुसार इन वनों की वार्षिक वर्षा 51 सेमी से 151 सेमी के बीच मानी जाती है
    • यह मात्रा उष्णकटिबंधीय हरित-वनों (जहाँ वर्षा अधिक होती है) से कम और शुष्क क्षेत्रों से अधिक हो सकती है.​
    • तुलना के तौर पर, उष्णकटिबंधीय वर्षा-वन आमतौर पर 200 सेमी से अधिक वर्षा प्राप्त करते हैं
    • जबकि शुष्क उष्णकटिबंधीय वन में वर्षा अधिक बार 100–200 सेमी के भीतर रहती है
    • परन्तु वर्षा-मान केवल एक पंक्ति नहीं है; स्थान-विशेष के अनुसार यह भिन्न हो सकता है.​
  • अन्य वृहत संदर्भ
    • उष्णकटिबंधीय वन सामान्य रुप से गर्म तापमान और उच्च वर्षा के कारण विविध जीवन-समुदाय के लिए आवास प्रदान करते हैं
    • इन तकनीकी विवरणों से स्पष्ट है कि 100–200 सेमी वर्षा इन क्षेत्रों के लिए मानक नहीं हैं
    • लेकिन शुष्क उष्णकटिबंधीय प्रकार में कम-बारिश वाला भाग लक्षित होता है.​
    • कुछ स्रोत 200 सेमी से अधिक वार्षिक वर्षा को उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन की पहचान मानते हैं
    • जबकि अन्य लेख यह संकेत करते हैं कि भारी वर्षा वाले क्षेत्र भी इन वनों में शामिल हो जाते हैं—इस कारण यह आंकड़ा स्रोत-निर्भर है.​

10. भारतवर्ष में, कौन-से वन बहुतायत में पाए जाते हैं? [MTS (T-I) 02 मई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (d) उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन
Solution:
  • भारतवर्ष में उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन बहुतायत में पाए जाते हैं।
  • इन्हें मानसूनी वन भी कहा जाता है। ये वन 70-200 सेमी. वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
  • प्रमुख वन प्रकार
    • भारत की विविध जलवायु के कारण छह मुख्य प्रकार के वन प्रचुरता में पाए जाते हैं
    • जिनमें उष्णकटिबंधीय सदाबहार, उष्णकटिबंधीय नम पर्णपाती, उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती, पर्वतीय उप-उष्णकटिबंधीय, शंकुधारी और मैंग्रोव शामिल हैं।
    • उष्णकटिबंधीय नम पर्णपाती वन सबसे व्यापक हैं, जो 100-200 सेमी वर्षा वाले क्षेत्रों में उगते हैं।
    • शुष्क पर्णपाती वन भी बहुतायत में हैं, खासकर कम वर्षा वाले इलाकों में।​
  • वितरण और क्षेत्र
    • उष्णकटिबंधीय नम पर्णपाती वन छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड, पूर्वी मध्य प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश में प्रमुख हैं।
    • ये साल, सागवान, महुआ, जामुन, पलास जैसे वृक्षों से भरे होते हैं।
    • उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में फैले हैं, जहां बबूल, खजूर, नीम, शीशम प्रमुख हैं।​
  • विशेषताएँ
    • ये वन मानसून पर निर्भर होते हैं, जहां गर्मियों में पत्ते झड़ जाते हैं लेकिन वर्षा में फिर से हरे हो जाते हैं।
    • सदाबहार वन पश्चिमी घाट, पूर्वी हिमालय और अंडमान-निकोबार में पाए जाते हैं
    • महोगनी, रोजवुड, बांस जैसे कठोर लकड़ी के वृक्षों से युक्त।
    • शंकुधारी वन हिमालयी क्षेत्रों जैसे उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश में चीड़, देवदार, ओक से भरपूर हैं।​
  • आर्थिक महत्व
    • ये वन लकड़ी, ईंधन, औषधियाँ, फल और जैव विविधता प्रदान करते हैं
    • साथ ही मिट्टी संरक्षण और जल चक्र में सहायक हैं।
    • मैंग्रोव वन तटीय क्षेत्रों जैसे सुंदरबन में पाए जाते हैं, जो तूफान से सुरक्षा देते हैं।
    • कुल मिलाकर, भारत का वन क्षेत्र 21-24% है, जिसमें ये प्रकार जैव विविधता का आधार हैं।​