पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी (भारत का भूगोल) (भाग-II)

Total Questions: 30

11. पारिस्थितिक तंत्र की उत्पादकता निम्नलिखित में से किसको मिलाकर बनती है? [CGL (T-I) 02 दिसंबर, 2022 (II-पाली)]

Correct Answer: (c) शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता और सकल प्राथमिक उत्पादकता
Solution:
  • पारिस्थितिकी तंत्र की उत्पादकता शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता और सकल प्राथमिक उत्पादकता को मिलाकर बनती है।
  • यह प्रकाश संश्लेषण के दौरान पादपों द्वारा एक निश्चित समयावधि में प्रति इकाई क्षेत्र द्वारा उत्पन्न किए गए जैव मात्रा या कार्बनिक सामग्री की मात्रा है।
  • पारिस्थितिक तंत्र क्या है
    • पारिस्थितिक तंत्र एक संरचित नेटवर्क है जिसमें जैविक समुदाय (पादप, पशु, सूक्ष्मजीव) और अजैविक पर्यावरण (मिट्टी, जल, वायु, जलवायु, पोषक तत्व) एक-दूसरे के साथ पारस्परिक क्रिया करते हैं।
    • यह ऊर्जा प्रवाह और पदार्थों के चक्र के माध्यम से संचालित होता है।
  • उत्पादक कौन हैं
    • अधिकांश पारिस्थितिकी प्रणालियों में सबसे पहली और महत्वपूर्ण बाध्य इकाई उत्पादक या निर्माता होते हैं। ये वे जीव हैं
    • जो प्रकाश संश्लेषण या अन्य गैर-आजीवी ऊर्जा-स्रोतों से ऊर्जा प्राप्त कर कार्बोहाइड्रेट जैसे अकार्बनिक से जटिल अकार्बनिक पदार्थ बनाते हैं।
    • पृथ्वी के अधिकांश प्राकृतिक जलवायु-आधारित पारिस्थितिकी तंत्रों में हरे पौधे (ग्रीन प्लांट्स) को प्राथमिक उत्पादक माना जाता है
    • क्योंकि वे सूर्य-ऊर्जा को रसायन ऊर्जा में बदलते हुए अपने भीतर संग्रहित कार्बोहाइड्रेट बनाते हैं।
    • यह ऊर्जा क्रमशः खाद्य श्रंखला/जाल के बाकी भागों तक पहुँचती है। [उत्पादक की परिभाषा और कार्य]​
  • कार्बनिक पदार्थ बनना कैसे होता है
    • प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया के जरिए पौधे सूर्य-ऊर्जा से कार्बोहाइड्रेट बनाते हैं
    • जो द्रव्य के रूप में ऊतकों में संग्रहित रहता है और अन्य जीवित घटकों के पोषण का आधार बनता है।
    • यह प्रक्रिया पारिस्थितिक तंत्र के भीतर ऊर्जा चक्र का प्रारम्भिक चरण है। [उत्पादक की भूमिका]​
  • अन्य घटक जिन्हें भी समझना जरूरी है
    • अजैविक घटक: जल, मिट्टी, कार्बन डाई ऑक्साइड, ऊर्जा-न्यूट्रल तत्व जैसे नाइट्रोजन, फास्फोरस, तापमान, प्रकाश आदि
    • ये सब उत्पादकता के स्रोत/प्रेरक होते हैं और पौधों के लिए पोषक तत्वों की उपलब्धता निर्धारित करते हैं। [पारिस्थितिकी तंत्र घटक]​​
    • जैविक घटक: उत्पादक (पादप), उपभोक्ता (कीट, स्तनधारी, आदि), अपघटक (बैक्टीरिया/फungi) जैसे जीव
    • इन सभी के बीच खाद्य जाल/श्रृंखला बनती है और ऊर्जा/पदार्थों का प्रवाह नियंत्रित होता है। [पारिस्थितिक तंत्र घटक]​​
  • उत्पादन दर (प्राथमिक उत्पादकता)
    • प्राथमिक उत्पादकता वह मात्रा है जो एक क्षेत्र में उत्पादक पौधे एक क्षेत्रीय समय-खंड (जैसे एक वर्ष) में बनाते हैं
    • यह सीधे-सीधे पर्यावरणीय कारकों (प्रकाश, तापमान, जलवायु) और पोषक तत्व उपलब्धता पर निर्भर करती है।
    • उच्च प्रकाश, तापमान और पोषक तत्वों की उपलब्धता से आम तौर पर उच्च प्राथमिक उत्पादकता मिलती है। [उत्पादन दर का अर्थ]​
    • विविध पारिस्थितिकी तंत्रों में प्राथमिक उत्पादकता उच्च-जलवायु-आधा(Bundle) वाले शाकाहारी या समृद्ध जलवायु वाले क्षेत्र में अधिक हो सकती है
    • जैसे उष्णकटिबंधीय वन और तटीय प्रणालियाँ। [उत्पादन दर के प्रभाव]​
  • प्रमुख बिंदु—क्यों यह महत्त्वपूर्ण है
    • ऊर्जा प्रवाह का प्रारम्भिक स्रोत: सभी ऊर्ध्वगामी (ऊपर की तरफ़ जाने वाली) खाद्य श्रृंखलाएँ/जाल उत्पादकों से शुरू होती हैं
    • इसलिए उत्पादकों की मात्रा और उनकी उत्पादकता से पूरे पारिस्थितिक तंत्र की ऊर्जा-जरूरतें पर्याप्त रहती हैं। [उत्पাদক की भूमिका]​
    • पदार्थ-चक्र में भूमिका: उत्पादकता से कार्बोहाइड्रेट/ऑर्गैनिक पदार्थ बनते हैं
    • जिन्हें उपभोक्ता और अपघटक उपयोग करते हैं
    • अतः उत्पादकता पारिस्थितिक चक्र के स्थिरता के लिए आवश्यक है। [पदार्थ-चक्र]​
  • उदाहरण
    • सर्वोच्च प्राथमिक उत्पादकता वाला परिदृश्य: पौध-समृद्ध जंगल/घासभूमि, जहाँ प्रचुर प्रकाश और पोषक तत्व मिलते हैं
    • वहां उत्पादकता अधिक रहती है। [उत्पादन दर उदाहरण]​
    • कम उत्पादकता वाला परिदृश्य: अत्यधिक सूखा, अत्यंत तापमान, या पोषण की कमी वाले क्षेत्र जहाँ ऊर्जा-संश्लेषण कम होता है। [उत्पादन दर प्रभाव]​
  • संक्षेप में
    • पारिस्थितिक तंत्र की उत्पादकता वास्तव में प्राथमिक उत्पादकों द्वारा तय होती है, जो प्रकाश संश्लेषण कर ऊर्जा-युक्त कार्बोहाइड्रेट बनाते हैं
    • फिर यही ऊर्जा श्रृंखला के अन्य सदस्य तक पहुँचती है।
    • अजैविक कारक और जैविक घटक दोनों इसका निर्णायक नियंत्रण करते हैं
    • उत्पादन दर पूरे तंत्र की ऊर्जा-उत्पादन क्षमता के लिए आधार बनाती है। [उत्पादक की भूमिका]

12. निम्नलिखित में से कौन-सा एक अत्यधिक स्थिर आणविक संरचना वाला कृत्रिम फ्लोरीनिकृत यौगिक है, जिसे अब तक की सबसे शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस के रूप में जाना जाता है? [CGL (T-I) 20 जुलाई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) सल्फर हेक्साफ्लोराइड
Solution:
  • सल्फर हेक्साफ्लोराइड एक स्थिर आणविक संरचना वाला कृत्रिम फ्लोरीनिकृत यौगिक है।
  • यह अब तक ज्ञात सबसे शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसों में से एक है।
  • इस गैस का विकिरण प्रभाव उच्च है तथा इसकी ग्लोबल वार्मिंग क्षमता (GWP) कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में 22800 गुना अधिक है।
  • अत्यधिक स्थिर संरचना
    • SF6 का गैस-फेज के अंदर संरचना ऑक्टेट-सममिति में six fluorine atom से चारित (दोनों éch) त्रि-डायगोनल-ऑर्बिटेटिंग पात्रता के साथ घेरा बनाती है।
    • यह समरूप अणु (अष्ट-आकृति) निम्न-उच्च ऊर्जा अवरोधों के कारण बहुत स्थिर माना जाता है, और इसे वातावरण में तोड़ना कठिन है.​
  • अत्यंत उच्च GWP और स्थायित्व
    • SF6 ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल (GWP) के लिहाज़ से अत्यंत उच्च मूल्य वाला गैस है
    • यह विश्व स्तर पर सबसे लंबे समय तक वायुमंडल में रहने वाले ग्रीनहाउस गैसों में से एक है।
    • इसकी दीर्घकालिक मौजूदगी और उच्च अवशोषण क्षमता इसे वैश्विक तापमान पर विशेष रूप से प्रभावी बनाती है.​
  • कृत्रिम फ्लोरीनेटेड गैसों में भाग
    • फ्लोरीनेटेड गैसों में SF6, HFCs, PFCs आदि शामिल हैं; SF6 इनमें सबसे प्रसिद्ध और मजबूत गैसों में से एक मानी जाती है
    • औद्योगिक प्रक्रियाओं (जैसे गैस-इलेक्ट्रिकल इन्सुलेशन और अत्यधिक-उच्च-वोल्टेज उपकरण) से उत्सर्जित होती है.​
  • अन्य तुलनात्मक पक्ष
    • HFCs, PFCs आदि भी शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें हैं और they भी fluorinated गैसों में आते हैं
    • SF6 की स्थिरता और वार्षिक उत्सर्जन-समझौता इसे “सबसे शक्तिशाली” में प्रमुख बनाते हैं.​
    • मीथेन, जल-वाष्प आदि अन्य प्रमुख ग्रीनहाउस गैसें हैं, पर SF6 से ऊँचा GWP नहीं रखते; SF6 लंबे समय तक रहता है
    • समय-गुणक के अनुसार प्रभावी रहता है.​
  • सामान्य संदर्भ
    • फ्लोरीनेटेड गैसें एक समूह के रूप में जानी जाती हैं जिनमें HFC, PFC, SF6 आदि शामिल हैं
    • इनमें SF6 को अक्सर “सबसे स्थिर” और “सबसे शक्तिशाली” गैसों में से एक माना जाता है.​
  • ध्यान देने योग्य बिंदु
    • कुछ स्रोत प्रश्न-समाधान में अन्य फ्लोरीनेटेड गैसों के साथ तुलना करते समय उनका अलग-सा स्थान बताते हैं
    • सुरक्षा-निर्देशों के अनुरूप SF6 को शक्तिशाली और स्थिर गैस के तौर पर सबसे ऊपर माना जाता है.

13. पारिस्थितिकी के संदर्भ में, दिया गया समीकरण किसी क्षेत्र के आकार और उसमें उपस्थित प्रजातियों की संख्या के बीच के संबंध को दर्शाता है। तदनुसार, समाश्रयण गुणांक को किस अक्षर से निरूपित किया जाता है? [CHSL (T-I) 11 अगस्त, 2023 (II-पाली)]

log S = log C + Z log A

Correct Answer: (b) Z
Solution:
  • पारिस्थितिकी के संदर्भ में, दिया गया समीकरण किसी क्षेत्र के आकार और उसमें उपस्थित प्रजातियों की संख्या के बीच के संबंध को दर्शाता है।
  • इस समीकरण में समाश्रयण गुणांक को Z अक्षर से निरूपित किया जाता है।
  • मूल समीकरण और परिभाषा
  • सबसे सामान्य रूप S = C A^Z है, जिसे लॉग-रूप में लिखा जाता है:
    • लॉग S = लॉग C + Z लॉग A
    • जहां:
    • S: क्षेत्र के भीतर प्रजातियों की संख्या (species richness
    • A: क्षेत्रफल (area)
    • C: इंटरसेप्ट, जिसे कभी-कभी Y-अंतःखंड भी कहा जाता है
    • Z: समाश्रयण गुणांक (slope of the regression in log-log space), जो क्षेत्र के आकार बढ़ने पर प्रजातियों की संख्या बढ़ने की दर को निर्धारित करता है
  • समाश्रयण गुणांक Z के अर्थ
  • सामान्य अर्थ:
    • छोटे क्षेत्रों पर प्रजातियाँ तेजी से जुड़ती हैं, बड़े क्षेत्रों पर वृद्धि धीमी होती है।
    • Z का मान सामान्यतः 0.1–0.2 के बीच होता है जब समूह विविधता का आकार बहुत बड़ा नहीं होता (उदा., एक विशिष्ट समुदाय के भीतर) ।​
    • विविधता के बड़े महाद्वीपीय स्तर पर Z का मान अधिक उच्च हो सकता है, अर्थात वृद्धि की दर अधिक तीव्र हो सकती है
    • क्योंकि एक विशाल महाद्वीप में विविधता अधिक होती है ।​
  • प्रतियोगितात्मक/व्यवहारिक सार
    • Z एक क्षेत्र-समृद्धि विश्लेषण की धुरी है; यह बताता है
    • यदि क्षेत्रफल दोगुना किया जाए तो प्रजातियाँ कितनी अधिक होंगी, और यह वृद्धि उनके वर्ग/कटिंग समूह पर निर्भर करती है ।​
    • लॉग-स्केल पर यह रेखा स्पष्ट रूप से एकStraight Line है, जिससे Z और log A के बीच सीधी रेखीय संबंध उभरता है ।​
  • अन्य सम्बंधी बिंदु
    • H-url के हवाले से यह भी दिखता है कि प्रजाति-क्षेत्र संबंध अक्सर rectangular hyperbola के रूप में शुरू होता है
    • लॉग-रूप में एक सरल रेखा बनती है जिसमें Z का मान स्पेसिफिक समूह/घटक के अनुसार स्थिर रहता है
    • (जब तक कि अधिकांश क्षेत्र एक महाद्वीप जैसे बड़े आकार तक नहीं पहुंच जाते) ।​
    • द्वीप-आवास (island biogeography) और हिस्सों में विभाजन जैसे आंतरिक प्रभाव भी Z के मूल्य और व्यवहार को प्रभावित करते हैं
    • क्योंकि सूक्ष्म-क्षेत्रों में वृद्धि की दर और स्थिति अलग दिखती है ।​
  • एक स्पष्ट उत्तर
  • यदि चाहें, इस विषय पर मैं:
    • विविध क्षेत्रों/जीवक्रमों के उदाहरणों के साथ Z के मानों की диапазन दिखा सकता हूँ
    • एक छोटे गणितीय उदाहरण के साथ S = C A^Z का अभ्यास कर सकता हूँ
    • NEET/पारिस्थितिकी के अन्य तुलनात्मक प्रश्नों के स्पष्ट विकल्प-समाधान दे सकता हूँ
    • कृपया बताएं कि आप किन उदाहरणों के साथ अधिक गहराई चाहते हैं.

14. पारिस्थितिक तंत्र के रखरखाव में जातीय समृद्धि के महत्व का सुझाव देने के लिए पॉल एहरलिक द्वारा कौन-सी परिकल्पना प्रस्तावित की गई थी? [CHSL (T-I) 8 अगस्त, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) रिवेट पोपर परिकल्पना
Solution:
  • रिवेट पोपर परिकल्पना पॉल एहरलिक द्वारा प्रस्तावित की गई थी।
  • यह परिकल्पना पारिस्थितिकी तंत्र के रखरखाव में प्रजातियों की समृद्धि के महत्व का सुझाव देती है।
  • परिकल्पना का मूल सिद्धांत
    •  एक-दो रिवेट्स निकालने (प्रजाति विलुप्ति) से विमान तुरंत नहीं गिरता, लेकिन कई रिवेट्स हटाने पर संपूर्ण संरचना ढह जाती है।
    • एहरलिक ने जोर दिया कि जातीय समृद्धि (species richness) पारिस्थितिक स्थिरता के लिए आवश्यक है
    • क्योंकि हर प्रजाति पारिस्थितिकी में अद्वितीय भूमिका निभाती है ।​​
  • एहरलिक का योगदान और संदर्भ
    • स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के पारिस्थितिकीविद् पॉल एहरलिक ने 1980-90 के दशक में यह परिकल्पना लोकप्रिय बनाई
    • जो NCERT जैव विविधता अध्याय में भी उल्लिखित है।
    • उन्होंने तर्क दिया कि मानव गतिविधियों से प्रजाति विलुप्ति पारिस्थितिक सेवाओं (जैसे परागण, मिट्टी संरक्षण, जल शुद्धिकरण) को प्रभावित करती है।
    • उदाहरणस्वरूप, कीटों या पक्षियों की कमी से फसल उत्पादकता घटती है, जो समग्र तंत्र को अस्थिर बनाती है ।​
  • पारिस्थितिक महत्व
    • स्थिरता में वृद्धि: उच्च जातीय समृद्धि वाले तंत्र प्राकृतिक आपदाओं, रोगों या आक्रामक प्रजातियों का बेहतर प्रतिरोध करते हैं।
    • उत्पादकता: विविधता से संसाधन उपयोग कुशल होता है
    • जैसा डेविड टिलमैन के प्रयोगों में सिद्ध हुआ।
    • पुनरुद्धार क्षमता: रिवेट्स हटने पर तंत्र की लचीलापन कम होता है
    • लेकिन पूर्ण समृद्धि इसे पुनर्स्थापित रखती है ।​
    • यह परिकल्पना संरक्षण नीतियों का आधार बनी, जैसे जैव विविधता हॉट-स्पॉट्स की पहचान।
  • व्यावहारिक उदाहरण
    • उष्णकटिबंधीय वर्षावनों में उच्च समृद्धि से मिट्टी क्षरण रुकता है।
    • यदि शेर (शीर्ष शिकारी) विलुप्त हो, तो हिरणों की अधिकता वनस्पति नष्ट कर तंत्र असंतुलित हो जाता है।
    • एहरलिक की यह परिकल्पना दर्शाती है
    • प्रजाति हानि अपरिवर्तनीय क्षति पहुंचा सकती है

15. निम्नलिखित में से कौन-सा स्थलीय पारितंत्र (terrestrial ecosystem) का एक उदाहरण है? [MTS (T-I) 20 जून, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) घास के मैदान
Solution:
  • घास के मैदान स्थलीय पारितंत्र का एक उदाहरण है। घास की प्रकृति के आधार पर घास के मैदानों को दो भागों में बांटा जाता है
  • (क) उष्ण कटिबंधीय घास के मैदान
  • (ख) शीतोष्ण कटिबंधीय घास के मैदान।
  • सवाना घास का मैदान उष्णकटिबंधीय घास के मैदान का उदाहरण है
  • जबकि प्रेयरी, पम्पास, वेल्ड, डाउन्स तथा स्टेपी शीतोष्ण कटिबंधीय घास के मैदान के उदाहरण हैं।
  • घरेलू परिभाषा और प्रकार
    • स्थलीय पारितंत्र (terrestrial ecosystem) वे जैविक– अजैविक घटक के बीच आपसी क्रिया-प्रक्रिया वाले प्रणालियाँ हैं
    • जो भूमि के भीतर विकसित होती हैं।
    • इनमें पौधों, जीव-जंतुओं, सूक्ष्मजीवों, मिट्टी, जल-अवशोषण और आस-पास के प्राकृतिक तत्वों का सम्मिलित सम्मिलन होता है।
    • एक साथ मिलकर ये प्रणाली ऊर्जा प्रवाह और पदार्थों के चक्र को संचालित करती है। [उच्चस्तरीय परिचय]
  • मुख्य स्थलीय पारितंत्र के उदाहरण
    • घास भूमि पारितंत्र (Grassland ecosystem)
    • प्रमुख फीचर: घासों की व्यापक प्रजातियाँ, छोटे से जंगली जीव-जंतु से लेकर बड़े मिलो के जीव तक, और मिट्टी की उर्वरता।
    • ऊर्जा प्रवाह: दिन-प्रतिदिन प्रकाश-संश्लेषण से परजीवीजीवों और शाकाहारियों को ऊर्जा उपलब्ध कराई जाती है
    • अंतिम स्तर तक ऊर्जा श्रृंखला बनती है।
    • जल-विनियोजन: वर्षा-आधारित जल-चक्र, घास के जड़ें मिट्टी को पकड़े रहते हैं जिससे जल धारण क्षमता बढ़ती है
    • मैदानी जलवायु में उपज स्थिर रहती है।
    • उपयोग और मानवीय प्रभाव: चराई, भूमि-विकास, और कृषि-उन्नतियाँ घास भूमि पारितंत्र को प्रभावित करती हैं
    • संरक्षण के लिए चराई चक्र को संतुलित रखा जाना चाहिए। [उच्चस्तरीय विवरण]
  • अन्य प्रमुख स्थलीय पारितंत्र के प्रकार
    • वन पारितंत्र (Forest ecosystem)
    • मरुस्थलीय पारितंत्र (Desert ecosystem)
    • पहाड़ी/पर्वतीय पारितंत्र (Hilly/mountain ecosystem)
    • तटीय और शुष्क-जलवायु उप-प्रकार (Desertification से प्रभावित क्षेत्रों सहित)
  • इनके भीतर संरचना और कार्य
    • संरचनात्मक घटक: जलीय/जैविक और अजैविक घटक एक साथ मिलकर स्थलीय पारितंत्र की संरचना बनाते हैं
    • जैसे कि जीव-जंतुओं की विविधता, पौधों की बनावट, मिट्टी की गुणवत्ता, जल-संरक्षण आदि। [सार]
    • कार्यात्मक घटक: भोजन-श्रृंखला, पदार्थ-चक्र (कार्बन, नाइट्रोजन आदि), ऊर्जा प्रवाह और पारिस्थितिकी सेवाओं (जैसे जल गुणवत्ता, बायोडायवर्सिटी, पोषण चक्र) इस प्रकार गतिशील रहते हैं। [सार]
  • क्यों यह अध्ययन महत्वपूर्ण है
    • पृथ्वी के विविध पारिस्थितिकी तंत्रों की समझ से प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, जल-स्तर नियंत्रण, बायोडायवर्सिटी संरक्षण
    • कृषि-नीति और भूमि-उपयोग योजना को बेहतर बनाया जा सकता है। [उच्चस्तरीय योगदान]
  • संक्षिप्त तुलना (टेबल के बजाय पाठ्य रूप में)
    • स्थलीय बनाम जलपारितंत्र: स्थलीय पारितंत्र भूमि-आधारित होते हैं
    • जैसे वन, घास भूमि, मरुस्थल; जलपारितंत्र जल-आधारित होते हैं जैसे स्पष्ट जल-तट, समुद्री पारितंत्र आदि।
    • ऊर्जा स्रोत: दोनों में प्रकाश-उत्पादन (पौधों के द्वारा) प्राथमिक ऊर्जा स्रोत है
    • परंतु संरचना-घटक और जलवायुविक चर उनमें भिन्न हो सकते हैं।
    • मानव प्रभाव: दोनों में कृषि, औद्योगीकरण, प्रदुषण आदि प्रभाव डालते हैं
    • स्थलीय पारितंत्र में भूमि-उपयोग परिवर्तन प्रमुख कारक होते हैं।
  • नोट
    • यदि चाहें तो स्थलीय पारितंत्र के विभिन्न प्रकारों के बारे में अधिक विशिष्ट उदाहरण
    • उनके विशिष्ट जीव-जंतुओं की सूची और उनके संचालनों की प्रक्रियाएं भी विस्तार से समझा सकता हूँ।
    •  इस विषय पर पढ़ने के लिए हिंदी शिक्षा-संसाधनों के भरोसेमंद स्रोतों के लिंक भी साझा किए जा सकते हैं।

16. पारिस्थितिक तंत्र के कार्य करने और बने रहने के लिए बुनियादी आवश्यकता क्या है? [Phase-XI 27 जून, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) सौर ऊर्जा का निवेश
Solution:
  • पारिस्थितिकी तंत्र के कार्य करने और बने रहने के लिए बुनियादी आवश्यकता सौर ऊर्जा का निवेश है।
  • सौर ऊर्जा उत्पादकों द्वारा प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के माध्यम से खाद्य उत्पादन को सक्षम बनाती है
  • खाद्य श्रृंखला के माध्यम से पारिस्थितिकी तंत्र में ऊर्जा प्रवाह को बनाए रखती है।
  • पारिस्थितिक तंत्र क्या है
    •  यह ऊर्जा के लिए सूर्य पर निर्भर रहता है औरdha ऊर्जा के इनपुट के बिना अस्तित्व संभव नहीं होता।
    • [उद्धरण: विविध स्रोत, सामान्य शिक्षण अवधारणाएँ]
  • ऊर्जा का प्रवाह
    • सूर्य से ऊर्जा पादपों द्वारा अवशोषित होकर रासायनिक ऊर्जा में बदली जाती है
    • (फोटोसिंथेसिस) और फिर प्रभावित श्रृंखलाओं द्वारा الحيوजन तक पहुंचती है।
    • इससे खाद्य जाल बनता है जिसमें उत्पादक (पादप) से प्रारम्भ कर उपभोक्ता (कीट, छोटे जानवर, बड़े जानवर) और अंततः अपघटक तक ऊर्जा का प्रवाह होता है।​​
    • इस ऊर्जा प्रवाह के साथ साथ पदार्थों का भी चक्रण होता है
    • जैसे जल, कार्बन, नाइट्रोजन आदि पोषक तत्वों का अपरदन, अपघटन और खनिजीय रूपांतरण के माध्यम से पुनः पौधों तक पहुँचता है।​
  • पोषक तत्वों का चक्र (पोषक तत्त्वों का आवर्तन)
    • अजैव घटक (जैसे मिट्टी, जल, वायुमंडलीय गैसें, तापमान, pH) पोषक तत्वों की उपलब्धता निर्धारित करते हैं
    • जैव घटकों (पादप, जानवर) के लिए आधार बनते हैं।
    • यह चक्र निरंतर चलता रहता है ताकि उच्च生命 क्रम बना रहे।​
    • अपघटन की क्रिया मृत अवशेषों को खनिजों में बदल देती है
    • जिन्हें फिर पौधे सोख लेते हैं और खाद्य जाल पुनः सक्रिय हो जाता है।​
  • बुनियादी आवश्यकताें: संक्षेप में
    • ऊर्जा का प्रवाह: सूर्य से ऊर्जा का निरंतर प्रवेश और जैविक प्रणालियों में उसका ग्रहण/उपयोग।​
    • पोषक तत्वों का आवर्तन: जल, मिट्टी, गैसों आदि के पौष्टक तत्वों का निरंतर परिपार्जन ताकि पौधे और अन्य जीव जीवन रख सकें।​
    • अजैव और जैव घटकों के बीच आपसी क्रिया: खाद्य जाल और पर्यावरणीय स्थितियों के अनुसार पारस्परिक निर्भरता।​
  • कार्य और उपयोगिता
    • ऊर्जा उपयोग: उत्पादक द्वारा ऊर्जा संचय और उसके बाद उपभोक्ता के माध्यम से ऊर्जा प्रवाह।​
    • पदार्थ चक्रण: पोषक तत्वों का परिसंचरण, वातावरण से मिट्टी तक और वापस।​
    • स्वास्थ्य और सुरक्षा: स्वच्छ हवा, जल और उपजाऊ मिट्टी जैसी सेवा सुविधाएं जो सभी जीवों के अस्तित्व हेतु अनिवार्य हैं।​
  • महत्वपूर्ण घटक
    • अजैव घटक: मिट्टी, पानी, हवा, प्रकाश, तापमान, pH, खनिज आदि।​
    • जैव घटक: पेड़-पौधे, जानवर, सूक्ष्मजीव आदि जो ऊर्जा के स्रोत और खाद्य जाल के सदस्य होते हैं।​
    • अपघटक/निशाचय: मृत पदार्थों को खनिज में बदलकर चक्र में वापस डालते हैं, ताकि पौधे फिर से अवशोषित कर सकें।​

17. क्योटो प्रोटोकॉल (Kyoto Protocol) की पहल प्रतिबद्धता अवधि का लक्ष्य कितनी ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को 1990 के स्तरों से 5.2% तक कम करना है? [CHSL (T-I) 4 अगस्त, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (d) 6
Solution:
  • क्योटो प्रोटोकॉल एक अंतरराष्ट्रीय संधि है, जिसका उद्देश्य ग्लोबल वार्मिंग में योगदान देने वाली गैसों के उत्सर्जन को कम करना है।
  • इस प्रोटोकॉल में 6 ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को वर्ष 1990 के स्तर से 5.2 प्रतिशत तक कम करने का आह्वान किया गया।
  • पूर्ण विवरण
    • क्या था लक्ष्य: क्योटो प्रोटोकॉल के तहत 37 औद्योगिक रूप से विकसित देश और यूरोपियन यूनियन क्षेत्र ने 1990 के स्तर से छह प्रमुख गैसों (CO2, CH4, N2O, HFCs, PFCs, SF6) के उत्सर्जन को औसतन 5.2% कम करने का लक्ष्य निर्धारित किया था. यह लक्ष्य पहली प्रतिबद्धता अवधि के लिए था.​
    • पहली प्रतिबद्धता अवधि: यह 2008 से शुरू होकर 2012 तक चली
    • इस अवधि के दौरान अनुबंध-1 देशों को अपने जीएचजी उत्सर्जनों में निर्धारित कमी हासिल करनी थी, खासकर 1990 के स्तर से नीचे.​
    • गैसों के प्रकार और दायरा: 6 गैसों पर लागू यह कटौती CO2, CH4, N2O, HFCs, PFCs, और SF6 तक सीमित थी।
    • यह व्यापक रूप से जलवायु परिवर्तन के संयुक्त प्रयासों को मजबूत करने के लिए किया गया था.​
    • प्रमुख प्रेरक तथ्य: प्रोटोकॉल का उद्देश्य विकसित देशों के लिए एक verbindlicher लक्ष्य बनाकर वैश्विक उत्सर्जन में कमी लाकर जलवायु परिवर्तन से निपटना था
    • यह प्रोटोकॉल 1997 में क्योटो, जापान में हस्ताक्षरित हुआ और 2005 में लागू हुआ.​
  • स्टेप-बाय-स्टेप संदर्भ
    • 1990 के स्तर की तुलना में 5.2% कमी का मानक सीधे छह गैसों पर लागू किया गया
    • जिससे देशों से उनके औसत उत्सर्जन को नीचे लाने की अपेक्षा थी
    • यह लक्ष्य पहली प्रतिबद्धता अवधि के लिए था; बाद में Doha संशोधनों सहित अवधि बढ़ाने के विचार भी सामने आए.​
    • यह जानकारी अक्सर हिंदी और अंग्रेजी स्रोतों में समान रूप से मिलती है
    • पाठ्यांक/गैर-शिक्षा संदर्भों में इसे 5.2% कमी के रूप में प्रस्तुत किया गया है
    • उदाहरण के संकेत: कई शैक्षणिक और शंका-समाधान साइटों पर यही संख्या दी जाती है.​

18. एक स्थलीय पारितंत्र में हरे पौधे अपनी पत्तियों पर पड़ने वाले सूर्यप्रकाश की ऊर्जा के लगभग ....... प्रतिशत को सोख लेते हैं और इसे खाद्य ऊर्जा में बदल देते हैं। [CHSL (T-I) 17 मार्च, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (d) 1
Solution:
  • हरे पौधे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के लिए अपनी पत्तियों पर पड़ने वाली सूर्य की रोशनी की ऊर्जा का लगभग 1% ग्रहण करते हैं।
  • यह ऊर्जा भोजन के रूप में रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है।
  • प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया
    • पौधों की पत्तियों में क्लोरोफिल सूर्यप्रकाश को अवशोषित करता है
    • लेकिन कुल सूर्य ऊर्जा का केवल 1-2% ही उपयोगी रासायनिक ऊर्जा (ग्लूकोज) में परिवर्तित होता है।
    • बाकी ऊर्जा परावर्तित, गर्मी के रूप में निकल जाती है या प्रकाश संश्लेषण के दौरान खो जाती है।
    • यह दक्षता स्थलीय पारिस्थितिक तंत्रों जैसे जंगलों या घास के मैदानों में औसतन 0.5-2% तक रहती है।
  • ऊर्जा हानि के कारण
    • प्रतिबिंब और पारगमन: पत्तियों की सतह 20-30% प्रकाश को वापस प्रतिबिंबित या पार कर देती है।
    • गर्मी क्षय: अवशोषित प्रकाश का 50% से अधिक गर्मी बनकर वातावरण में चला जाता है।
    • फोटोरेस्पिरेशन: ऑक्सीजन की उपस्थिति में 20-30% ऊर्जा बर्बाद होती है, खासकर गर्म मौसम में।
  • पारिस्थितिक प्रभाव
    • यह कम दक्षता (लगभग 1%) वैश्विक जैव-भू-रासायनिक चक्र को प्रभावित करती है
    • जहां पौधे ही प्राथमिक उत्पादक हैं। उष्णकटिबंधीय वर्षावनों में यह 2% तक पहुंच सकती है
    • जबकि रेगिस्तानी पौधों में 0.1% से कम। मानव कृषि में उन्नत फसलें (जैसे गन्ना) 3-4% तक प्राप्त कर सकती हैं।

19. किस पारिस्थितिक-विज्ञानी ने बाहरी भूखंडों पर एक दीर्घकालिक प्रयोग में दिखाया कि उत्पादकता, स्थिरता, पारिस्थितिक तंत्र के आक्रमण के प्रतिरोध और उनकी मिट्टी की उर्वरता के लिए जैव विविधता का केंद्रीय महत्व है? [CHSL (T-I) 07 अगस्त, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) डेविड टिलमैन
Solution:
  • डेविड टिलमैन के प्रयोग से पता चलता है कि जैव विविधता उत्पादकता, स्थिरता, पारिस्थितिक तंत्र पर आक्रमण के प्रतिरोध और उनकी मिट्टी की उर्वरता के लिए केंद्रीय महत्व रखती है।
  • BEF अनुसंधान का सार
    • BEF (Ecology-ecosystem functioning) का मानक निष्कर्ष है
    • जैव विविधता बढ़ने पर उत्पादकता बढ़ सकती है
    • खासकर प्रयोगात्मक प्लॉटिंग में जहां समान पर्यावरणीय शर्तों के तहत विविध प्रजातियों वाले मिश्रण अधिक लगातार अधिक उत्पादक दिखाते हैं
    • [memory/]. यह निष्कर्ष कई बाहरी भूखंडों (outlying/remote) में भी समर्थित पाया गया है
    • जहाँ विविधता से खाद्य उत्पादन में स्थायित्व भी बढ़ सकता है.​
    • स्थिरता (resilience) और रिकवरी (recovery) में जैव विविधता का योगदान मापने योग्य दिखा है
    • विविध समुदाय अक्सर आक्रमण/चक्रवात/डिजास्टर जैसे दबावों के दौरान तेजी से पुनर्स्थापित हो जाते हैं
    • जिससे दीर्घकालिक प्रणालियाँ अधिक टिकाऊ रहती हैं.​
  • मिट्टी की उर्वरता और आर्थी-उत्पादन
    • बहुलता से मिट्टी के संरचना-लाभ और पोषक तत्व परिसंचरण में वृद्धि होती है, जिससे मिट्टी की जल-धारण क्षमता और उर्वरता उच्च रहती है
    • कुछ बहु-प्रजातीय कृषि-उद्योगों में यह स्पष्ट रूप से देखा गया है
    • जैव विविधता मिट्टी-उर्वरता और पोषक तत्व चक्रण को सुदृढ़ करती है.​
    • जैव विविधता से रूट सिस्टम में विविधता और सूक्ष्मजीवी समुदायों की विविधता बढ़ती है
    • जो पोषक तत्व उपलब्धता और मिट्टी के साथ पारिस्थितिकी-आक्रमण-रोधी गुणों में सहायक होते हैं.​
  • पारिस्थितिक-आक्रमण और केंद्रीय प्रोएक्टिव तत्व
    • बाहरी आक्रमणकारी प्रजातियाँ (invaders) के संचालन से होने वाले दबाव BEF में वस्तुगत परिवर्तन ला सकते हैं
    • उच्च जैव विविधता वाले समुदायों में आक्रमण के प्रतिरोध में कमी और संरचना-परिवर्तन का दबाव अक्सर कम पाया गया है
    • जिससे पारिस्थितिक तंत्र सेवाओं का संरक्षण होता है.​
    • IPBES जैसे संकलन बताते हैं कि जैव-विविधता पर दबावों के कारण बहुधा आक्रमणों से निपटने के लिए समेकित गवर्नेंस और क्वारंटीन/सर्विलांस को मजबूत करने की जरूरत होती है
    • यह संकेत BEF-रिफ्लेक्ट करता है कि विविधतामय प्रणालियाँ आक्रमण के प्रति अधिक लचीलापन दिखाती हैं.​
  • निष्कर्ष और अनुसंधान-विकल्प
    • बाहरी भूखंडों में BEF के साथ कार्यशील अध्ययन यह बताते हैं
    • विविधता से उत्पादकता और स्थिरता के साथ-साथ मिट्टी की उर्वरता पर लाभ संभव है
    • किन्तु प्रभाव क्षेत्र, प्रजाति-डायवर्सिटी, और पर्यावरणीय हालत के अनुसार परिणाम भिन्न हो सकते हैं.​
    • नीति-स्तर पर जमीन-सम्बन्धी बहाली (ecosystem restoration) और बायोसिक्योरिटी नियंत्रण, soil-health initiatives, और फूल-परागण सेवाओं के संरक्षण के महत्व को बढ़ावा देता है ताकि BEF-स्तर के लाभ दीर्घकालिक रहे.​

20. वन्य जीवन (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2022 वन्य जीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों में अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन (Convention on International Trade in Endangered Species of Wild Fauna and Flora - CITES) को लागू करने का प्रयास करता है। CITES के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है? [MTS (T-I) 01 सितंबर, 2023 (III-पाली)]

1. CITES सरकारों के बीच एक समझौता है जो यह सुनिश्चित करता है कि जंगली जानवरों और पौधों के नमूनों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार से प्रजातियों के अस्तित्व को खतरा न हो।

2. CITES के तहत, पौधों और जानवरों के नमूनों को उनके विलुप्त होने के खतरे के आधार पर पांच श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है।

3. कन्वेंशन के तहत देशों को परमिट के माध्यम से सभी सूचीबद्ध नमूनों के व्यापार को विनियमित करना आवश्यक है।

4. यह जीवित जीवों के नमूनों के स्वायत्तीकरण को विनियमित करने का भी प्रयास करता है।

Correct Answer: (d) 1,3 और 4
Solution:
  • साइट्स (CITES - The Convention on International Trade in Endangered Species of Wild Fauna and Flora) के संबंध में दिया गया कथन (1), (3) तथा (4) सत्य हैं, जबकि कथन (2) त्रुटिपूर्ण है।
  • उद्धार और तात्पर्य
    • CITES का पूरा नाम Convention on International Trade in Endangered Species of Wild Fauna and Flora है
    • इसे 1973-1975 के दशक में विकसित किया गया ताकि अवैध या अस्वीकार्य व्यापार से लुप्तप्राय प्रजातियाँ बचाई जा सकें.​
    • इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है
    • अंतरराष्ट्रीय व्यापार से वन्यजीवों और वनस्पतियों के प्रजातियों के अस्तित्व पर जोखिम न हो और अगर किसी प्रजाति को संरक्षण की ज़रूरत हो
    • तो उसका व्यापार नियंत्रण/प्रतिबंधित किया जाए.​
    • CITES 183 से अधिक पक्षकार देशों के साथ एक बहुपक्षीय व्यवस्था है
    • यह प्रजातियों को तीन प्रकार के रंग-सूचियों (Appendices) में वर्गीकृत कर इनके आयात-निर्यात को लाइसेंसिंग के जरिये नियंत्रित करता है.​
  • भारत का दायित्व और कानूनन क्रियान्वयन
    • भारत CITES का हस्ताक्षरकर्ता है और इसलिए इसे अपनी घरेलू वन्यजीव संरक्षित अधिनियमों के अंदर CITES के अनुरूप संशोधनों और प्रक्रियाओं को अपनाना पड़ता है ताकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नियम अनुपालन में रहें.​
    • 2022 में भारत ने वन्य जीव (संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2022 पारित किया ताकि CITES के दायित्वों को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके
    • यह विधेयक घरेलू कानूनों में आवश्यक प्रावधान जोड़कर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के अनुरूप अनुपालन सुनिश्चित करता है.​
    • CITES के अंतर्गत प्रजातियों के आयात, निर्यात, पुनः निर्यात और प्रवेश के लिए लाइसेंसिंग एवं प्रमाणपत्र आवश्यक होते हैं
    • अधिकांश मामलों में व्यापार तभी संभव है जब दोनों देशों द्वारा परमिट दिए जाएँ, और अवैध व्यापार पर रोक के लिए दंड और जब्ती के उपाय भी शामिल होते हैं.​
  • CITES के प्रमुख कार्य और प्रभाव
    • CITES लगभग 35,000 से अधिक प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार को विनियमित करता है
    • इनमें से कुछ प्रजातियों के लिए पूर्ण निषेध लागू होता है जबकि अन्य के लिए मात्रा/प्रयोग के हिसाब से नियंत्रण रहता है.​
    • कोप (Conference of the Parties) निर्णयों के माध्यम से सूचीकरण और व्यापार-नीतियों में परिवर्तन किए जाते हैं
    • ताकि समयानुसार संरक्षण-स्तर सुधारा जा सके; सदस्य देश इन निर्णयों को अपने कानूनों में अनुकूलित करते हैं.​
    • CITES के प्रभाव के उदाहरणों में अफ्रीकी हाथी, पैंगोलिन, मगरमच्छ आदि जैसे समुद्री/भूमि प्रजातियों के संरक्षण के लिए मजबूत निगरानी और स्थानीय कानूनों के साथ संयुक्त प्रयासों के परिणामस्वरूप अवैध व्यापार में कमी दिखना शामिल है.​
  • भारत के कानून-परिदृश्य में हालिया प्रवृत्ति
    • वन्यजीव संरक्षण संशोधन विधेयक 2022 और अन्य संशोधनों के साथ CITES के अनुरूप घरेलू नियंत्रण मजबूत हुआ है
    • इससे आयात-निर्यात के लिए आवश्यक प्रक्रियाओं की स्पष्टता और दंड-प्रणालियाँ बेहतरhosi हैं.​
    • CITES के अनुसार देशों को अपने प्रजातियों-स्तर के अनुसार व्यापार के लिए अनुमति-पत्र (permits) देना अनिवार्य है
    • भारत इन मानकों को अपने स्थानीय कानूनों—जैसे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, और अन्य लागू प्रावधानों—के जरिए लागू करता है.​
  • क्यों यह महत्वपूर्ण है
    • अंतरराष्ट्रीय व्यापार में संदिग्ध/अनपेक्षित प्रजातियों के विनिमय से वैश्विक बायोडायवर्सिटी पर खतरा उत्पन्न हो सकता है
    • CITES के माध्यम से ऐसे जोखिम को कम किया जाता है
    • वैश्विक सहयोग के साथ संरक्षण-लक्ष्यों को सपोर्ट किया जाता है.​
    • भारत जैसे महाद्वीपीय देशों में CITES के अनुरूप कानून बनना और उसे क्रियान्वित करना स्थानीय संरक्षण के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं की पूर्ति भी सुनिश्चित करता है.​