अविद्या सभी क्लेशों की जननी है। शरीर और आत्मा भिन्न-भिन्न है किन्तु अस्मिता के कारण व्यक्ति को इनके एक होने की अनुभूति होतीहै। सुखद अनुभवों से काम और भावनात्मक आसक्ति उत्पन्न होती है। अप्रसन्नता के परिणामस्वरूप घृणा और महत्त्वहीनता का भाव उत्पन्न होता है।
जीवन के प्रति आसक्ति अथवा मृत्यु भय सभी मनुष्यों में निहित है और विवेकीजन भी इससे अछूते नहीं हैं। ये पाँच क्लेश बौद्धिक, भावनात्मक और सहज इन तीन स्तरों वाले होते हैं। अविद्या और अस्मिता बुद्धि के क्षत्र से संबंधित हैं। राग और द्वेष भावनाओं और अनुभूतियों से संबंधित हैं। अभिनिवेश क्लेश की प्रवृत्ति सहज होती है। इन पाँच क्लेशों के मूल कारण व्यवहारपरक प्रकार्य एवं चिंतन हैं।
सभ्यता के आरम्भ से ही विचार और कर्म की प्रक्रियाएँ विद्यमान रही हैं और मनुष्य यथार्थ ज्ञान की खोज करता रहा है। साधना के संदर्भ में बुद्धि की विभेदक शक्ति अंततः विशुद्ध प्रज्ञा में परिणत होती है जो शाश्वत रहती है। सच्चा साधक योग के माध्यम से आरंभ में ही क्लेशों को नष्ट करने में सक्षम होता है।
बुद्धि की विभेदक शक्ति अंततः इनमें से किसमें परिणत होती है?