रोग एवं उपचार (जीव विज्ञान)Total Questions: 3321. किस खनिज/विटामिन की कमी से गर्दन की ग्रंथियां सूजी हुई दिखाई देती हैं? [CHSL (T-I) 16 मार्च, 2023 (II-पाली)](a) विटामिन सी(b) आयोडीन(c) कैल्शियम(d) विटामिन डीCorrect Answer: (b) आयोडीनSolution:आयोडीन युक्त हॉर्मोन थायरॉक्सिन एक अमीनो अम्ल हैजिसे थायरॉइड ग्रंथि से स्रावित करने के लिए प्रेरित करने वाला हॉर्मोन थाइरोट्रोपिन (TSH) है।TSH (Thyroid Stimulating Hormone) पीयूष ग्रंथि से स्रावित होता है।शरीर में आयोडीन की कमी से घेघा रोग हो जाता है, जिसके कारण गर्दन की ग्रंथियां सूजी हुई दिखाई देती हैं।कारणगर्दन की ग्रंथियों की सूजन के प्रमुख कारण संक्रमण (वायरल जैसे सर्दी-जुकाम, बैक्टीरियल जैसे स्ट्रेप थ्रोट या टीबी) हैंविटामिन डी या जिंक की कमी से प्रतिरक्षा कमजोर होकर अप्रत्यक्ष रूप से संक्रमण का खतरा बढ़ा सकती हैजिससे लिम्फ नोड्स सूज सकते हैं। आयोडीन की कमी गॉयटर (थायरॉइड ग्रंथि की सूजन) का कारण बनती हैजो गर्दन के सामने सूजन पैदा करती है, लेकिन यह लिम्फ नोड्स नहीं।लक्षणसूजन के साथ दर्द, बुखार, गले में खराश, थकान या वजन घटना जैसे लक्षण हो सकते हैं।विटामिन सी की कमी में अतिरिक्त लक्षण जैसे मसूड़ों का ढीला होनाजोड़ों में दर्द और त्वचा पर नीले धब्बे दिखते हैं।यदि सूजन दर्दरहित और लगातार हो, तो कैंसर या पुरानी बीमारी की जांच जरूरी है।निदान व उपचारनिदान के लिए डॉक्टर शारीरिक जांच, अल्ट्रासाउंड, रक्त परीक्षण (CBC, ESR) या बायोप्सी करते हैं।कमी के मामले में विटामिन सी युक्त आहार (नींबू, संतरा, आंवला) या सप्लीमेंट दिए जाते हैंस्कर्वी 1-2 सप्ताह में सुधार दिखाता है। संक्रमण पर एंटीबायोटिक्स या एंटीवायरल दवाएं प्रभावी हैं।रोकथामसंतुलित आहार लें जिसमें विटामिन सी (फल-सब्जियां), जिंक (मांस, दालें) और आयोडीन (नमक) शामिल हों।नियमित हाथ धोना, टीकाकरण और समय पर चिकित्सा सहायता संक्रमण रोकती है।कुपोषण वाले क्षेत्रों में पोषण शिक्षा महत्वपूर्ण है।22. विटामिन बी 3 की कमी के कारण होने वाला वह पोषण संबंधी विकार कौन-सा है, जिससे त्वचा, जठर-आंत्रीय मार्ग और तंत्रिका तंत्र से नैदानिक अभिव्यक्तियां होती हैं? [CHSL (T-I) 02 अगस्त, 2023 (II-पाली)](a) बेरी बेरी(b) रक्ताल्पता(c) पेलाग्रा(d) स्कर्वीCorrect Answer: (c) पेलाग्राSolution:विटामिन बी 3 (नियासिन या निकोटिनिक अम्ल) की कमी के कारण पेलाग्रा (चर्मदाह) नामक रोग होता है।जिससे त्वचा, जठर-आंत्रीय मार्ग और तंत्रिका तंत्र में नैदानिक अभिव्यक्तियां होती हैं।इस रोग के निदान हेतु यीस्ट, मांस, मछली, अंडा, दूध, फलियां आदि का सेवन करना चाहिए।लक्षणपेलाग्रा के प्रमुख लक्षणों को "तीन डी" (3 Ds) के रूप में जाना जाता हैडर्मेटाइटिस (त्वचा की सूजन), डायरिया (दस्त) और डिमेंशिया (मानसिक विकृतिजो अनुपचारित रहने पर चौथा डी—मृत्यु—कारण बन सकता है।त्वचा में सूर्य के संपर्क वाले क्षेत्रों पर लाल, पपड़ीदार चकत्ते, जलन और कालापन पड़ जाता हैजबकि जठरांत्र मार्ग में भूख न लगना, कब्ज, दस्त, उल्टी और पेट दर्द होता है।तंत्रिका तंत्र प्रभावित होने से चिड़चिड़ापन, अवसाद, भ्रम, सिरदर्द, थकान, याददाश्त कमजोर होना और गंभीर मामलों में मतिभ्रम या बेहोशी जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं।कारणयह विकार मुख्यतः भोजन में विटामिन बी3 की कमी से होता हैजो शराबियों, कुपोषित व्यक्तियों या मकई-प्रधान आहार वाले क्षेत्रों (जैसे पुराने समय में अमेरिका या भारत के कुछ हिस्सों) में आम हैक्योंकि मकई में नियासिन अल्प-उपलब्ध रूप में होता है।इसके अलावा, विटामिन बी6, बी12 या ट्रिप्टोफैन की कमी भी नियासिन संश्लेषण को बाधित कर पेलाग्रा का कारण बन सकती हैसाथ ही क्रोहन रोग या किडनी विकार जैसे अवशोषण संबंधी रोग इसे बढ़ावा देते हैं।निदाननिदान मुख्य रूप से नैदानिक लक्षणों (त्वचा, पाचन और न्यूरोलॉजिकल अभिव्यक्तियों) पर आधारित होता हैजिसमें रक्त या मूत्र में नियासिन मेटाबोलाइट्स (जैसे N-मिथाइलनिकोटिनामाइड) की जांच शामिल है।त्वचा बायोप्सी या ट्रिप्टोफैन लोड टेस्ट से पुष्टि की जाती हैजबकि अन्य विटामिन की कमी वाले रोगों (जैसे बेरी-बेरी या स्कर्वी) से भेदभाव आवश्यक होता है।उपचारउपचार सरल है—उच्च खुराक वाले नियासिन सप्लीमेंट्स (50-500 mg प्रतिदिन) से लक्षण कुछ दिनों में सुधरने लगते हैंसाथ ही संतुलित आहार (मांस, मछली, दालें, हरी सब्जियां) और अन्य बी-कॉम्प्लेक्स विटामिन्स दिए जाते हैं।गंभीर मामलों में अस्पताल में भर्ती कर IV थेरेपी की आवश्यकता पड़ सकती हैअनुपचारित रहने पर यह जानलेवा सिद्ध हो सकता है।रोकथामपेलाग्रा की रोकथाम आहार सुधार से संभव हैनियासिन युक्त खाद्य पदार्थ जैसे चिकन, टूना, मूंगफली, दूध उत्पाद और अनाजों का सेवन करें।विकासशील देशों में आटा मजबूतीकरण (फोर्टिफिकेशन) ने इसकी घटनाओं को कम किया हैजोखिम समूहों (शराबी, बुजुर्ग) के लिए सप्लीमेंट्स उपयोगी सिद्ध हुए हैं।23. निम्नलिखित में से 'रोग अवधि' का कौन-सा युग्म सही है? [CHSL (T-I) 14 मार्च, 2023 (I-पाली)]Ⅰ. तीव्र (Acute) - लंबी अवधिII. दीर्घकालिक (Chronic) - कम समय(a) I और II दोनों(b) न तो I और न ही II(c) केवल II(d) केवल ICorrect Answer: (b) न तो I और न ही IISolution:तीव्र रोगों की विशेषता रोगों की अचानक शुरुआत और अपेक्षाकृत छोटी अवधि होती हैजैसे सामान्य सर्दी, बुखार, ब्रोंकाइटिस आदि। दीर्घकालिक रोग लंबी अवधि तक होते हैंजो आमतौर पर महीनों या वर्षों तक हो सकते हैं; जैसे मधुमेह, उच्च रक्त चाप आदि।सही युग्मसही युग्म है: तीव्र (Acute) - छोटी अवधि; दीर्घकालिक (Chronic) - लंबी अवधि।यह युग्म इसलिए सही है क्योंकि तीव्र रोग अचानक शुरू होते हैंकम समय (कुछ दिनों से हफ्तों तक) में ठीक हो जाते हैंजबकि दीर्घकालिक रोग लंबे समय (महीनों से वर्षों या जीवनभर) तक रहते हैं।उदाहरणस्वरूप, सामान्य जुकाम या फ्लू तीव्र रोग हैं, जबकि मधुमेह या उच्च रक्तचाप दीर्घकालिक रोग हैं।तीव्र रोग (Acute Diseases)ये रोग छोटी अवधि के होते हैं और शरीर पर तीव्र प्रभाव डालते हैं।लक्षण तेजी से प्रकट होते हैं और सामान्यतः कुछ ही दिनों या हफ्तों में समाप्त हो जाते हैं।उपचार से जल्दी ठीक हो जाते हैं, लेकिन अनुपचारित रहने पर जटिलताएँ उत्पन्न कर सकते हैं।उदाहरण: चोट, संक्रमण जैसे टॉन्सिलाइटिस, या गैस्ट्रोएंटेराइटिस।दीर्घकालिक रोग (Chronic Diseases)ये रोग लंबी अवधि के होते हैं और प्रायः स्थायी प्रबंधन की आवश्यकता रखते हैं।लक्षण धीरे-धीरे विकसित होते हैं और वर्षों तक बने रह सकते हैं।जीवनशैली परिवर्तन, दवाएँ या सतत निगरानी से नियंत्रित किए जाते हैं।उदाहरण: हृदय रोग, कैंसर, अस्थमा, या क्षय रोग (टीबी)।अन्य समान शब्दों से अंतर'रोग अवधि' को ऊष्मायन अवधि (Incubation Period) से भ्रमित न करेंजो संक्रमण से लक्षण प्रकट होने तक का समय है।प्रसुप्ति अवधि (Latency Period) संक्रमण फैलाने की क्षमता विकसित होने तक की अवधि दर्शाती है।वास्तविक प्रश्न प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे SSC) में आता हैजहाँ विकल्प 1 ही सही माना जाता है।24. मानव शरीर में निम्नलिखित में से कौन-सा अंग निमोनिया रोग से सबसे अधिक प्रभावित होता है? [MTS (T-I) 08 मई, 2023 (II-पाली)](a) फेफड़े(b) वृक्क(c) हृदय(d) मूत्राशयCorrect Answer: (a) फेफड़ेSolution:निमोनिया मनुष्य के एक या दोनों फेफड़ों में संक्रमण है। फेफड़ों की वायुकोशिकाएं द्रव या मवाद से भर जाती हैंजिससे ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है और सांस लेना मुश्किल हो जाता है।निमोनिया बैक्टीरिया, वायरस, कवक या अन्य रोगाणुओं के कारण होता है।निमोनिया का कारणनिमोनिया बैक्टीरिया, वायरस, कवक या अन्य सूक्ष्मजीवों से होता हैजो फेफड़ों में प्रवेश कर सूजन पैदा करते हैं। स्ट्रेप्टोकोकस निमोनिया जैसे बैक्टीरिया सबसे सामान्य कारण हैंजबकि वायरस अन्य अंगों को भी प्रभावित कर सकते हैं।फेफड़ों की कोशिकाएं प्रोटीन छोड़ती हैं जो संक्रमण से लड़ती हैं, लेकिन इससे एल्वियोली में तरल भराव होता है।प्रभावित अंग: फेफड़ेफेफड़े निमोनिया से प्राथमिक रूप से प्रभावित होते हैं, जहां न्यूट्रोफिल कोशिकाएं बैक्टीरिया पर हमला करती हैंतरल से भर जाते हैं। इससे सांस लेना कठिन हो जाता हैबुखार, ठंड लगना और थकान जैसे लक्षण दिखते हैं। गंभीर मामलों में फेफड़े सख्त हो जाते हैंजिससे ऑक्सीजन की कमी होती है।अन्य प्रभावहालांकि फेफड़े मुख्य अंग हैं, गंभीर निमोनिया श्वसन विफलता, सेप्सिस या हृदय पर दबाव डाल सकता है।वायरल निमोनिया अन्य अंगों को भी प्रभावित कर सकता हैलेकिन यकृत, गुर्दा या हृदय सीधे प्रभावित नहीं होते। एक्स-रे में फेफड़ों में समेकन दिखता है।लक्षण और जटिलताएंलक्षणों में खांसी, सांस फूलना, सीने में दर्द और ऑक्सीजन स्तर में कमी शामिल है।गंभीर स्थिति में एआरडीएस (तीव्र श्वसन संकट सिंड्रोम) हो सकता हैजहां यांत्रिक वेंटिलेशन की जरूरत पड़ती है।25. निम्नलिखित में से कौन-सा कुपोषण का एक गंभीर रूप है जो आमतौर पर शिशुओं और बच्चों को प्रभावित करता है, जो अक्सर 5 साल की उम्र में दूध छुड़ाने की उम्र के आसपास होता है? [C.P.O.S.I. (T-I) 10 नवंबर, 2022 (II-पाली)](a) क्वाशियोरकर(b) बैक्टीरियल मेनिंजाइटिस(c) निमोनिया(d) डायरियाCorrect Answer: (a) क्वाशियोरकरSolution:क्वाशियोरकर कुपोषण का एक गंभीर रूप है, जो प्रोटीन की कमी से होता है।यह रोग आमतौर पर शिशुओं और बच्चों को प्रभावित करता हैजो अक्सर 5 साल की उम्र में दूध छुड़ाने की उम्र के आस-पास होता है।क्वाशियोरकर की समस्या आमतौर पर अकालग्रस्त और गरीब/पिछड़े इलाकों में अधिक देखी जाती है।कारणक्वाशियोरकोर तब होता है जब बच्चे को पर्याप्त कैलोरी तो मिलती हैजैसे चावल, आलू या दलिया से), लेकिन प्रोटीन की मात्रा बहुत कम होती है।दूध छुड़ाने के बाद अगर आहार में दूध, अंडा, मांस या दाल जैसी प्रोटीन स्रोत न दिए जाएं, तो यह समस्या उभरती है।गरीबी, खाद्य असुरक्षा और संक्रमण वाले विकासशील क्षेत्रों में यह अधिक आम है।लक्षणपेट में सूजन (एडिमा) के कारण 'पोटबेली' दिखना, चेहरा चंदू जैसा (मून फेस)।त्वचा रूखी, झुर्रीदार और छिलने वाली; बाल पतले, हल्के रंग के।सुस्ती, भूख न लगना, इम्यूनिटी कमजोर होने से बार-बार संक्रमण।प्रभावयह कुपोषण का घातक रूप है जो 5 वर्ष से कम बच्चों में मृत्यु का बड़ा कारण बनता हैक्योंकि इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है।बिना इलाज के डायरिया, निमोनिया या अन्य बीमारियां घातक साबित होती हैं।लंबे समय तक रहने पर मानसिक विकास रुक जाता है।इलाज और रोकथामतत्काल प्रोटीन-युक्त फॉर्मूला मिल्क (F-75, F-100) और एंटीबायोटिक्स से उपचार।रोकथाम के लिए संतुलित आहार, विशेष रूप से weaning के समय प्रोटीन बढ़ाना; टीकाकरण और स्वच्छता जरूरी।पोषण शिक्षा से इसे रोका जा सकता है।26. कौन-सा रोग आहार में प्रोटीन की कमी से होता है? [MTS (T-I) 16 जून, 2023 (I-पाली)](a) पीलिया(b) स्कर्वी(c) सूखा रोग(d) क्वाशियोरकरCorrect Answer: (d) क्वाशियोरकरSolution:क्वाशियोरकर (Kwashiorkor) नामक रोग आहार में लगातार प्रोटीन की कमी के कारण होता है।इस रोग के कारण शरीर कमजोर हो जाता हैरुधिर के प्लाज्मा में प्रोटीन की कमी से पैर तथा पेट फूल जाता है, त्वचा सूखी और पपड़ीदार हो जाती है।क्वाशियोर्कर क्या है? जब बच्चे के भोजन में पर्याप्त कैलोरी तो किसी तरह मिल जाती हैंलेकिन प्रोटीन बहुत कम होता है। यह अक्सर 1–5 वर्ष की आयु के उन बच्चों में दिखता हैजिन्हें अनाज‑प्रधान, पर दाल, दूध, अंडा, दालें आदि कम मिली हों।यह प्रोटीन‑ऊर्जा कुपोषण का गंभीर रूप माना जाता है।समय पर इलाज न मिलने पर यह जानलेवा भी हो सकता है।क्वाशियोर्कर के प्रमुख लक्षणप्रोटीन की कमी शरीर के लगभग हर ऊतक पर असर डालती है, इसलिए लक्षण पूरे शरीर में दिखते हैं।पेट, चेहरे और पैरों में सूजन (एडिमा), जिससे बच्चा फूला‑फूला दिखता है।बालों का पतला, भूरा या लाल जैसा पड़ जाना, आसानी से टूट जाना।त्वचा का सूखी, पपड़ीदार हो जाना, उस पर सफेद या काले धब्बे दिखना।बच्चा सुस्त, चिड़चिड़ा, रोने वाला और कम सक्रिय दिखाई देना।वजन न बढ़ना या तेजी से घटना, मांसपेशियाँ घुलना (दुबला शरीर लेकिन फूला पेट)।बार‑बार संक्रमण, घाव देर से भरना, रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होना।प्रोटीन की कमी से शरीर पर प्रभावप्रोटीन शरीर की मांसपेशियों, एन्जाइम, हार्मोन, एंटीबॉडी और हीमोग्लोबिन जैसी कई ज़रूरी चीज़ों का मुख्य घटक है।जब भोजन में प्रोटीन कम होता है तो कई स्तरों पर नुकसान होता है।खून में प्रोटीन (एल्बुमिन) घटने से द्रव ऊतकों में एकत्र हो जाता है, जिससे सूजन (एडिमा) होती है।मांसपेशियाँ कमजोर और पतली हो जाती हैं, जिससे ताकत और सहनशक्ति कम होती है।हीमोग्लोबिन के निर्माण पर असर से एनीमिया, थकान, चक्कर, सुस्ती जैसे लक्षण हो सकते हैं।बच्चों में विकास धीमा हो जाता है—कद, वजन, दिमागी विकास सभी पीछे रह सकते हैं।अन्य समस्याएँ: प्रोटीन‑ऊर्जा कुपोषण व एनीमियालंबे समय तक प्रोटीन और कुल कैलोरी दोनों की कमी रहे तो प्रोटीन‑ऊर्जा कुपोषण (PEM) के दो रूप—क्वाशियोर्कर और मैरास्मस—दिखते हैं।क्वाशियोर्कर: पेट‑पैर सूजे, बाल और त्वचा में परिवर्तन, सुस्ती व चिड़चिड़ापन।मैरास्मस: बहुत अधिक दुबलापन, चर्म‑स्थि (skin and bone) जैसा शरीर, पर सूजन कम या नहीं।इसके अलावा, प्रोटीन की कमी से एनीमिया का जोखिम बढ़ता है, क्योंकि हीमोग्लोबिन एक प्रोटीन हैलाल रक्त कणिकाएँ पर्याप्त नहीं बन पातीं।बचाव और उपचार (सामान्य जानकारी)क्वाशियोर्कर और प्रोटीन की कमी से होने वाली अन्य समस्याओं से बचाव का मूल उपाय संतुलित और प्रोटीन‑युक्त आहार है।आहार में दालें, राजमा, चना, सोया, दूध‑दही, पनीर, अंडा, मछली, मांस आदि जैसे प्रोटीन‑समृद्ध पदार्थ शामिल करना।बच्चों को समय पर स्तनपान और फिर उचित पूरक आहार देना, जिसमें पर्याप्त प्रोटीन हों।अगर बच्चे या वयस्क में ऊपर बताए गए लक्षण दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर या नज़दीकी स्वास्थ्य‑केंद्र पर जाँच और उपचार कराना ज़रूरी है।27. विटामिन बी 1 की कमी से कौन-सा पोषण संबंधी विकार होता है जिससे परिधीय तंत्रिकाओं (peripheral nerves) और क्षय (wasting) की समस्याएं उत्पन्न होती हैं? [MTS (T-I) 14 सितंबर, 2023 (III-पाली), MTS (T-I) 01 सितंबर, 2023 (II-पाली)](a) पर्निसियस एनीमिया(b) सूखा रोग(c) बेरीबेरी(d) शुष्काक्षिपाकCorrect Answer: (c) बेरीबेरीSolution:बेरी-बेरी रोग विटामिन बी 1 की कमी से होता है। इसके कारण व्यक्ति अत्यंत कमजोरी महसूस करता हैमस्तिष्क, हृदय आदि की क्रिया शिथिल पड़ जाती है। तंत्रिका तंत्र कमजोर पड़ जाती हैजिससे परिधीय तंत्रिकाओं (Peripheral nerves) और क्षय (Wasting) की समस्याएं उत्पन्न होती हैं।विटामिन बी 1 का रासायनिक नाम थायमीन (Thiamine) है। अनाज, फलियां, सोयाबीन आदि इसके प्रमुख स्रोत हैं।बेरी-बेरी के प्रकारजबकि वेट बेरी-बेरी हृदय और रक्त वाहिकाओं को प्रभावित करता है।विटामिन बी1 ऊर्जा चयापचय में कोफेक्टर के रूप में कार्य करता हैजिसकी कमी से तंत्रिका कोशिकाओं में ऊर्जा संकट और ऑक्सीडेटिव तनाव पैदा होता है।लक्षणों का विस्तारड्राई बेरी-बेरी में परिधीय न्यूरोपैथी प्रमुख समस्या है, जो पैरों से शुरू होकर धीरे-धीरे ऊपरी अंगों तक फैलती है।मरीजों को चलने में कठिनाई, मांसपेशियों का पतला होना (wasting), गंभीर दर्द, पैरों में जलन और रिफ्लेक्स में कमी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।गंभीर अवस्था में यह वर्स निक्टन्स एन्सेफैलोपैथी (Wernicke-Korsakoff syndrome) का रूप ले सकता हैजिसमें भ्रम और स्मृति हानि जुड़ जाती है।कारण और जोखिम कारकयह विकार अक्सर पॉलिश किए हुए चावल या थायमिन-कम आहार से जुड़ा होता हैखासकर विकासशील क्षेत्रों में।शराब की लत, मधुमेह, किडनी डायलिसिस या अत्यधिक डायटिंग भी कमी को बढ़ावा देते हैंक्योंकि थायमिन जल-घुलनशील विटामिन है और शरीर में संग्रहित नहीं रहता।कमी के शुरुआती चरणों में भूख न लगना, वजन घटना और थकान जैसे सामान्य लक्षण उभरते हैं।निदान व उपचारनिदान रक्त या मूत्र में थायमिन स्तर जांच से होता है, साथ ही लक्षणों के आधार पर।उपचार थायमिन सप्लीमेंट (मौखिक या इंजेक्शन) से तुरंत शुरू होता हैजो न्यूरोपैथी को उलट सकता है यदि शुरुआती चरण में पकड़ा जाए।रोकथाम के लिए संतुलित आहार (साबुत अनाज, दालें, मांस, नट्स) आवश्यक हैउच्च जोखिम वाले समूहों में सप्लीमेंटरी खुराक दी जाती है।28. कौन-सी स्थिति हड्डियों में दर्द, हड्डियों के अच्छे से विकसित न होने और नरम, कमजोर हड्डियों का कारण बनती है जिससे हड्डियों में विकृति आ सकती है? [MTS (T-I) 11 सितंबर, 2023 (II-पाली)](a) सूखा रोग(b) प्लीहाभाव(c) मस्तिष्क पक्षाघात(d) काली खांसीCorrect Answer: (a) सूखा रोगSolution:सूखा रोग (Rickets): यह बच्चों में होने वाली एक ऐसी स्थिति हैजो विटामिन डी, कैल्शियम या फास्फोरस की गंभीर कमी के कारण होती है।इससे हड्डियां नरम और कमजोर हो जाती हैं, जिससे उनमें दर्द, विकास में बाधा और विकृति (जैसे धनुषाकार पैर) आ सकती है।वयस्कों में इसी तरह की स्थिति को ऑस्टियोमलेशिया कहा जाता है।कारणरिकेट्स विटामिन डी की कमी से होता हैजो सूर्य की रोशनी, आहार या अवशोषण संबंधी समस्याओं (जैसे किडनी रोग) के कारण हो सकती है।कैल्शियम या फॉस्फोरस की कमी हड्डी खनिजीकरण को रोकती हैजिससे हड्डियां नरम रह जाती हैं। आनुवंशिक कारक या कुछ दवाएं भी योगदान दे सकती हैं।लक्षणहड्डियों और मांसपेशियों में दर्द, विशेषकर पैरों, रीढ़ और श्रोणि में।विकास में देरी, छोटा कद, और कंकाल विकृतियां जैसे कलाई/टखनों का मोटा होना या छाती का विकृत होना।चलने में कठिनाई, मांसपेशियों की कमजोरी, और दांत निकलने में देरी।निदानडॉक्टर रक्त परीक्षण से विटामिन डी, कैल्शियम स्तर जांचते हैंएक्स-रे से नरम हड्डियां और विकृतियां दिखती हैं। हड्डी बायोप्सी दुर्लभ मामलों में की जाती है।उपचारविटामिन डी सप्लीमेंट्स, कैल्शियम-युक्त आहार और सूर्य स्नान से सुधार होता हैगंभीर मामलों में फॉस्फेट थेरेपी। ब्रेस या सर्जरी विकृतियों के लिए।ज्यादातर मामलों में 3-6 महीनों में ठीक हो जाता है।रोकथामबच्चों को स्तनपान के साथ विटामिन डी दें, संतुलित आहार (दूध, अंडे) रखें, और रोज 10-15 मिनट धूप लें।नियमित जांच से कमी पकड़ें।29. शहरीकरण के कारण, मानव जीवनशैली में गंभीर बदलाव आया है; ऐसी स्थिति में मोटापा एक प्रमुख स्वास्थ्य समस्या है। निम्नलिखित में से कौन-सा मोटापे का कारण है? [MTS (T-I) 11 सितंबर, 2023 (I-पाली)](a) पानी की अत्यधिक खपत(b) उच्च कैलोरी वाले खाद्य पदार्थों का अत्यधिक सेवन(c) प्रोटीन की कमी(d) नियमित आहार में विटामिन की कमीCorrect Answer: (b) उच्च कैलोरी वाले खाद्य पदार्थों का अत्यधिक सेवनSolution:उच्च कैलोरी वाले खाद्य पदार्थों का अत्यधिक सेवनजब कोई व्यक्ति आवश्यकता से अधिक कैलोरी का सेवन करता हैपर्याप्त शारीरिक गतिविधि नहीं करता हैतो अतिरिक्त कैलोरी वसा के रूप में जमा हो जाती है, जिससे मोटापा होता है।शहरीकरण का प्रभावशहरीकरण ने लोगों की दिनचर्या को sedentary (गतिहीन) बना दिया हैजहां डेस्क जॉब्स, ट्रैफिक और सीमित खेलकूद के स्थान शारीरिक श्रम को कम करते हैं।इससे कैलोरी इनटेक बढ़ता है लेकिन व्यय घट जाता है।फास्ट फूड चेन, प्रोसेस्ड फूड और शुगरयुक्त ड्रिंक्स की आसान उपलब्धता ने खान-पान की आदतों को बिगाड़ दिया है।मुख्य कारण: उच्च कैलोरी सेवनउच्च कैलोरी वाले खाद्य पदार्थ जैसे बर्गर, पिज्जा, चिप्स और कोल्ड ड्रिंक्स में चीनी, ट्रांस फैट और रिफाइंड कार्ब्स अधिक होते हैंजो तुरंत वजन बढ़ाते हैं। शहरी जीवन में व्यस्तता के कारण लोग घर का ताजा भोजन छोड़कर ये विकल्प चुनते हैं।BMI 30 से ऊपर होने पर मोटापा माना जाता हैजो डायबिटीज, हृदय रोग और हाई BP जैसी बीमारियों को न्योता देता है।अन्य योगदानकारी कारकशारीरिक गतिविधि की कमी: शहरों में वॉकिंग स्पेस कम, वाहनों पर निर्भरता बढ़ी।तनाव और नींद की कमी: कोर्टिसोल हार्मोन वसा संचय बढ़ाता है।आनुवंशिक और सामाजिक कारक: निम्न आय वर्ग में जंक फूड सस्ता पड़ता है।रोकथाम के उपायसंतुलित आहार, रोज 30 मिनट व्यायाम और जागरूकता से मोटापा नियंत्रित किया जा सकता है।सरकारें स्वस्थ शहर नीतियों से हरे क्षेत्र बढ़ा सकती हैं।30. घेंघा रोग में किस ग्रंथि के आकार में वृद्धि हो जाने के कारण गले के अगले भाग में सूजन आ जाती है? [MTS (T-I) 01 सितंबर, 2023 (III-पाली)](a) अधिवृक्क ग्रंथि(b) पीयूष ग्रंथि(c) थायरॉइड ग्रंथि(d) पिनियल ग्रंथिCorrect Answer: (c) थायरॉइड ग्रंथिSolution:आयोडीनयुक्त हॉर्मोन थायरॉक्सिन एक अमीनो अम्ल हैजिसे थायरॉइड ग्रंथि से स्रावित करने के लिए प्रेरित करने वाला हॉर्मोन थायरोट्रोपिन या TSH है।शरीर में आयोडीन की कमी से घेघा रोग हो जाता है, जिसके कारण थायरॉइड ग्रंथि के अगले भाग में सूजन आ जाती है।थायरॉइड ग्रंथि की स्थितिथायरॉइड ग्रंथि गर्दन के आगे एडम्स एप्पल के ठीक नीचे तितली के आकार की होती है।यह ग्रंथि थायरॉक्सिन (T4) और ट्राईआयोडोथायरोनिन (T3) जैसे हार्मोन बनाती हैजो चयापचय, ऊर्जा उत्पादन और विकास को नियंत्रित करते हैं।जब यह ग्रंथि आयोडीन की कमी या अन्य कारणों से बढ़ जाती है, तो गले में गांठ या सूजन पैदा हो जाती है।घेंघा रोग के कारणआयोडीन की कमी: सबसे सामान्य कारण, खासकर उन क्षेत्रों में जहां पानी या मिट्टी में आयोडीन कम होता है।इससे थायरॉइड हार्मोन बनाने में बाधा आती है, और ग्रंथि बढ़ने लगती है।हार्मोनल असंतुलन: हाइपरथायरॉइडिज्म (अधिक हार्मोन) या हाइपोथायरॉइडिज्म (कम हार्मोन) से ग्रंथि प्रभावित होती है।अन्य कारक: ऑटोइम्यून रोग जैसे हाशिमोटो थायरॉइडाइटिस, थायरॉइड नोड्यूल्स, या दवाओं का प्रभाव।लक्षण और प्रभावघेंघा रोग के मुख्य लक्षण गले के सामने सूजन है, जो दर्दरहित होती हैलेकिन बड़े आकार में निगलने या सांस लेने में कठिनाई पैदा कर सकती है।अन्य लक्षणों में थकान, वजन परिवर्तन, खांसी, आवाज का भारी होना, और चिड़चिड़ापन शामिल हैं।यदि गांठ कैंसरयुक्त हो, तो अतिरिक्त जांच जरूरी होती है।निदान और उपचारनिदान में अल्ट्रासाउंड, ब्लड टेस्ट (TSH, T3, T4), या बायोप्सी शामिल है।उपचार आयोडीन युक्त नमक, दवाएं (जैसे लेवोथायरोक्सिन), या सर्जरी (थायरॉइडेक्टॉमी) पर निर्भर करता है।शुरुआती चरण में जीवनशैली बदलाव से नियंत्रण संभव है।Submit Quiz« Previous1234Next »