विविध (भारतीय राजव्यवस्था) भाग-II

Total Questions: 39

1. फरवरी, 2022 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 में किस अपवाद को चुनौती देने वाली जनहित याचिकाओं (PILs) की एक श्रृंखला पर निर्णय सुरक्षित रखा ? [CGL (T-I) 20 जुलाई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) वैवाहिक बलात्कार
Solution:
  • फरवरी, 2022 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 (अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 63) में वैवाहिक बलात्कार के मामलों को चुनौती देने वाली जनहित याचिकाओं (PILs) की एक श्रृंखला पर निर्णय सुरक्षित रखा।
  • जनहित याचिकाओं में जिस अपवाद को चुनौती दी जा रही है वह अपवाद खंड है
  • जिसमें कहा गया है कि किसी व्यक्ति द्वारा अपनी ही पत्नी, यदि वह 15 वर्ष से कम की नहीं हैतो
  • उसके साथ किया गया यौन संबंध या कृत्य बलात्कार नहीं है।
  • पृष्ठभूमि
    •  इस पृष्ठभूमि के कारण दिल्ली उच्च न्यायालय ने इन याचिकाओं के मामले की merits सुनने से पहले निष्कर्ष और तर्क तैयार किए।
    • पूर्णतः संदर्भ में, इस प्रकार के PILs विवाह के भीतर यौन हिंसा के अधिकार, लैंगिक समानता, और संवैधानिक सुरक्षा जैसे प्रश्नों को छूते हैं
    • जो सामाजिक-न्यायिक विमर्श के केंद्र में आते हैं।
  • निर्णय का सार
    • अभियोग के संबन्ध मेंpil याचिकाओं ने धारा 375 के अपवाद (2) को असंवैधानिक/अलग प्रश्न माना है
    • अदालत ने इन PILs पर अब तक का निर्णय सुरक्षित रखा, अर्थात merits पर आगे सुनवाई/निर्णय को टाल दिया गया।
    • यह कार्रवाई अदालत के लिए आवश्यक था
    • पहले यह स्पष्ट हो सके कि याचिकाओं की maintainability (याचिका के पुख्ता होने) और प्रश्न-सामग्री पर कौन-सी विधिक सुरक्षा/उचित परीक्षण लागू होंगे।
  • महत्वपूर्ण बिंदु (विस्तार)
    • अपवाद (2) से जुड़ी चुनौती का केंद्र विवाह के भीतर यौन संबंधों के लिए criminal liability की सीमा का प्रश्न है
    • विरोधी तर्क विवाह के भीतर होने वाले अपराधों के लिए अलग मानक या संरक्षण सुनिश्चित करने की सरकार/विधायिका की मंशा पर प्रश्न उठाते हैं।
    • चुनौती के दायरे में समानता का अधिकार, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों (संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21) के उल्लंघन का सवाल भी जुड़ा रहता है।
    • निर्णय सुरक्षित रखने का मतलब है कि अदालत तब तक इस मुद्दे पर ठोस कानूनी तर्क/औचित्य की पुष्टि नहीं कर रहा था
    • जब तक कि अन्य तकनीकी/तर्कनिष्ठ मुद्दे स्पष्ट न हो जाएँ, जैसे maintainability, standing, या locus standi आदि।
  • संभावित परिणाम/निकट भविष्य की दिशा (सरल अंदाजा)
    • यदि अदालत इस अपवाद को असंवैधानिक मानती है, तो घरेलू/वैवाहिक हिंसा से जुड़े मामले में rape के परिप्रेक्ष्य में नए मानक बन सकते हैं
    • इससे marital rape का दायरा criminal prosecutions के अंतर्गत आ सकता है।
    • इसके उलट, यदि अपवाद बना रहता है, तब भी यह विषय संसद/Women safety के wider policy considerations पर प्रभाव डाल सकता है।
    • ध्यान दें: यह उत्तर सामान्य शास्त्रीय स्थिति बताता है
    • फरवरी 2022 की विशेष सुनवाई/फैसले कीनिरपेक्ष विवरणों के लिए विशिष्ट फैसलों/आदेशों की आधिकारिक टेक्स्ट देखने की सलाह दी जाती है।
    • नवीनतम आधिकारिक स्रोतों के आधार पर पूरी कानूनी टेक्स्ट, न्यायालय की टिप्पणियाँ और उसके बाद के अपडेट संकलित करके दे सकता सकती हूँ।
    • स्रोत के साथ उद्धरण (कृपया ध्यान दें: नीचे दिए गए उद्धरण केवल उदाहरण के लिए हैं
    • यदि आप चाहें तो मैं सटीक कानूनी टेक्स्ट/आदेश लिंक भी खोजकर दे सकता/सकती हूँ):
    • दिल्ली उच्च न्यायालय की धारा 375 के अपवाद (2) को लेकर PILs पर निर्णय सुरक्षित रखने का संदर्भ ।​
    • IPC §375 और marital rape विषय पर विश्लेषण/तथ्यताएँ ।​

2. न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा ने निम्नलिखित में से किस ऐतिहासिक निर्णय में असहमति व्यक्त की थी? [CGL (T-I) 19 जुलाई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (c) सबरीमाला में महिलाओं का प्रवेश
Solution:
  • न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा ने सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर असहमति व्यक्त की थी।
  • सबरीमाला के मामले में उच्चतम न्यायालय ने केरल में सबरीमाला स्थित अयप्पा मंदिर में सभी आयु की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दे दी
  • मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाना लैंगिक भेदभाव है
  • एवं यह प्रथा हिंदू महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन है।
  • परंतु न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा ने इस निर्णय के इतर सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर असहमति व्यक्त की।
  • मामले का विवरण
    • सबरीमाला मंदिर (केरल) में 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने 28 सितंबर 2018 को 4:1 के बहुमत से फैसला सुनाया।
    • बहुमत ने प्रतिबंध को असंवैधानिक ठहराया, जबकि न्यायमूर्ति मल्होत्रा ने असहमति दर्ज की।​
  • असहमति के मुख्य तर्क
    • न्यायमूर्ति मल्होत्रा ने तर्क दिया कि भगवान अय्यप्पा को 'नित्य ब्रह्मचारी' के रूप में पूजा जाता है
    • इसलिए मंदिर की प्रथा धार्मिक आवश्यकता से जुड़ी है
    • संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) के तहत संरक्षित है।
    • उन्होंने कहा कि न्यायालय को धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जब तक वे स्पष्ट रूप से असंवैधानिक न हों।​
  • निर्णय का प्रभाव
    • यह फैसला लैंगिक समानता (अनुच्छेद 14, 15) बनाम धार्मिक स्वतंत्रता के बीच बहस को तेज करने वाला था
    • जिसके बाद समीक्षा याचिकाएं दायर हुईं और मामला बड़ी पीठ को भेजा गया।
    • असहमति ने धार्मिक मामलों में न्यायिक संयम की वकालत की।​
  • अन्य प्रमुख फैसले
    • नवतेज सिंह जोहर मामला (2018): धारा 377 को अपराधमुक्त करने में सहमति
    • जहां उन्होंने कहा कि "इतिहास को इस समुदाय से माफी मांगनी चाहिए।"​

3. फरवरी, 2021 में निम्नलिखित में से किस मामले में न्यायालय ने कहा कि दो वयस्कों द्वारा विवाह करने का निर्णय लेने के बाद परिवार की सहमति की आवश्यकता नहीं है? [CGL (T-I) 21 जुलाई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) लक्ष्मीबाई चंदरागी बनाम कर्नाटक राज्य
Solution:
  • लक्ष्मीबाई चंदरागी बनाम कर्नाटक राज्य के मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत दो वयस्कों द्वारा अपना जीवन साथी चुनने का अधिकार है।
  • किसी व्यक्ति का निर्णय जाति, सामाजिक परंपराओं या पारिवारिक अनुमोदन से प्रभावित नहीं होना चाहिए।
  • केस का पृष्ठभूमि और निर्णय का सार
    • जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने इस दृष्टिकोण को स्पष्ट किया कि दो वयस्क अपनी मर्जी से विवाह का चयन करते हैं
    • तो परिवार, जातीय समूह, या समुदाय की पूर्व स्वीकृति/अनुमति चाहिए नहीं होती।
    • अदालत ने इसे व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के रूप में मान्यता दी और कहा कि ऐसे अधिकार का उल्लंघन संवैधानिक उल्लंघन है ।​
  • संविधानिक अधिकार और तर्क
    • संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत स्वतंत्रता के अभिव्यक्ति, आचार-विचार, और जीवन के अधिकार की सुरक्षा और अनुच्छेद 21 के अंतर्गत व्यक्तिगत स्वतंत्रता/जीवन के अधिकार की सुरक्षा का आधार इस प्रकार के निर्णयों में प्रभावी है।
    • अदालत ने माना कि यदि दो वयस्क स्वयं विवाह चुनते हैं
    • तो यह उनकी अभिव्यक्ति व जीवनशैली का भाग है
    • इसे उनके समकक्ष अधिकारों के रूप में संरक्षित किया जाना चाहिए ।​
  • अदालत के शब्द और दृष्टिकोण
    • निर्णय में कहा गया कि “दो वयस्क अपनी इच्छा से विवाह करते हैं
    • वे अपने रिश्ते को पूर्ण करते हैं, महसूस करते हैं कि यह उनका लक्ष्य है
    • उन्हें ऐसा करने का पूरा अधिकार है”।
    • ऐसे मामलों में परिवार/कबीाला/समुदाय की सहमति को प्राथमिकता देना संविधान के अनुरोध के विरुद्ध है ।​
  • व्यापक प्रभाव और व्यावहारिक पालन
    • यह निर्णय समाज के परंपरागत दबावों के साथ-साथ परिवार के दबावों के विरुद्ध एक मजबूत कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है
    • दो वयस्क बिना किसी बाहरी रोक-टोक के साथ रहने और विवाह करने का विकल्प चुन सकें।
    • पुलिस/प्रशासनिक संस्थाओं के लिए भी यह निर्देश देता है
    • वे बिना उचित आधार के दखल न दें और यदि आवश्यक हो तो 婚 खबर/एफआईआर की स्थिति में कानून के अनुरूप कार्रवाई करें ।​
  • तुलना संदर्भ
    • इसी प्रकार के सिद्धांत हाल के वर्षों में दिल्ली हाई कोर्ट के मामलों में भी दोहराए गए हैं
    • जहाँ अदालत ने दो वयस्कों के विवाह-स्वतंत्रता के अधिकार को संरक्षित किया है और family interference को निषेध किया है
    • स्पष्ट करता है कि यह अधिकार व्यापक रूप से भारतीय संवैधानिक ढांचे के भीतर समर्थित है ।​
  • संबंधित स्रोतों के प्रमुख बिंदु
    • जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने 2021-2022 के दशक की शुरुआत में बताया कि दो वयस्कों के स्वेच्छा से विवाह में परिवार/कबीला/समुदाय की सहमति आवश्यक नहीं है
    • यह उनके मौलिक अधिकारों के अंतर्गत आता है ।​
    • सार्वजनिक/आंदोलनात्मक कवरेज और अन्यibliक फैसलों में भी अदालतों ने समान विचारधारा की सुरक्षा पर बल दिया है
    • ताकि व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर किसी भी अनुचित अवरोध से बचा जा सके ।​
  • संभावित प्रश्न और स्पष्टीकरण
    • अगर किसी के परिवार या समुदाय द्वारा दबाव के कारण विवाह की योजना प्रभावित हो, तो कोर्ट क्या करेगी?
    • अदालत ऐसे दबाव-युक्त मामलों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा और सुरक्षा-केस के आधार पर आवश्यक कदम उठाती है
    • जैसे कि सुरक्षा प्रशासन के निर्देश, शिकायत की जांच, और कानूनी उपाय, ताकि दंपति की सुरक्षा व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित हो सके ।​

4. निम्नलिखित में से कौन-सा विकल्प भारतीय संविधान में 'रिपब्लिक (गणतंत्र)' शब्द का अर्थ बताता है? [CGL (T-I) 14 जुलाई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (c) निर्वाचित प्रमुख
Solution:
  • 'निर्वाचित प्रमुख' भारतीय संविधान में 'गणतंत्र' शब्द का अर्थ बताता है।
  • रिपब्लिक (गणतंत्र) शब्द लैटिन के रेस पब्लिका से आया है, जिसका अर्थ है 'सार्वजनिक मामला।
  • यह राज्य प्रणाली का एक रूप है, जहां कार्यकारी शक्तियां नागरिकों द्वारा चुनी जाती हैं।
  • रिपब्लिक अथवा गणतंत्र वह शासन प्रकार है जिसमें राज्य का प्रमुख नहीं एक संपूर्ण राजसी सत्ता होता है
  • बल्कि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के माध्यम से सत्ता का संचालन होता है।
  • यह परिप्रेक्ष्य प्रस्तावना और संविधान के ढांचे में प्रमुख स्थान रखता है ।​
  • भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है, जिसका मतलब है
  • नागरिकों के द्वारा चुने गए प्रतिनिधि और एक निर्वाचित राष्ट्रपति (मुख्य राज्य प्रमुख) के माध्यम से शासन होता है
  • एक जीवनभर के लिए स्थापित राजा/रानी द्वारा शासन ।​
  • प्रस्तावना के संकेत
    • संविधान की प्रस्तावना यह बताती है कि भारत का राज्य न तो 皇家 सत्ता है
    • अनैतिक या निजी सत्ता का संपन्न स्रोत—यह प्रजा के प्रति सार्वजनिक सत्ता का सिद्धांत है
    • गणतंत्र के ढांचे में राष्ट्रपति निर्वाचित होकर राज्य का प्रमुख बनते हैं ।​
    • प्रस्तावना में उल्लेखित "गणराज्य/गणतंत्र" के अर्थ से समझ में आता है
    • राष्ट्र का नेतृत्व नागरिकता के आधार पर चुने गए प्रतिनिधियों के हाथों में है
    • राष्ट्रपतिः राष्ट्रपति चेहरा लोकतांत्रिक/प्रतिनिधि प्रणाली के अंतर्गत एक चयनित प्रमुख होते हैं ।​
  • प्रमुख स्पष्टीकरण (संविधानीय संदर्भ)
    • भारत के संविधान के अनुसार, भारत एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य है।
    • गणतंत्र शब्द इस संरचना को दर्शाता है जिसमें प्रमुख सत्ता की नियुक्ति जनता द्वारा चयनित प्रतिनिधियों के द्वारा हो और राष्ट्रपति अप्रत्यक्ष चुनाव द्वारा चुने जाते हैं, न कि hereditary रूप से ।​
    • गणतंत्र के तौर पर राष्ट्रपति का चुनाव एक electoral college द्वारा किया जाता है
    • जिसमें संसद के दोनों सदनों और सभी राज्यों की विधानसभाओं के सदस्य सम्मिलित होते हैं
    • यानी सत्ता का legitimation नागरिक-निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से होता है ।​
  • संविधानिक तुलना (सरल सार)
    • Republican गणराज्य = सार्वभौम सत्ता जनता के प्रतिनिधियों के हाथ में; राज्य प्रमुख elected या indirect elected होना चाहिए।
    • Monarchal राजतंत्र = सत्ता का स्रोत राजसी ज hereditary अधिकारों से चलता है।
    • भारत में असर: सत्ता की धारा नागरिकों/प्रतिनिधियों के चयन से चलती है
    • शासक के रूप में कोई hereditary monarch नहीं, बल्कि राष्ट्रपति चुने गए प्रतिनिधियों से बने ढांचे के भीतर रहते हैं ।​
    • रिपब्लिक/गणतंत्र का अर्थ: ऐसी राज्य-संरचना जिसमें शासन सार्वजनिक मामलों के लिए है
    • सत्ता जनता के प्रतिनिधियों के द्वारा चुने गए संस्थागत प्रमुख (जैसे राष्ट्रपति, संसद) के हाथों में रहती है, न कि किसी राजसी परिवार के हाथों में ।​

5. निम्नलिखित में से किसने भारतीय संविधान को 'अर्ध संघीय' कहा? [CHSL (T-I) 03 जून, 2022 (II-पाली)]

Correct Answer: (c) के.सी. व्हीयर
Solution:
  • के.सी. व्हीयर ने भारतीय संविधान को 'अर्ध संघीय' कहा है। अर्ध संघीय शब्द दर्शाता है
  • भारतीय संविधान में संधीय और एकात्मक दोनों लक्षण विद्यमान हैं।
  • अर्ध-संघीयता का मूल अर्थ
    • के.सी. व्हेयर ने संघीय शासन को परिभाषित करते हुए कहा कि इसमें केंद्र और इकाइयों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन, लिखित संविधान, स्वतंत्र न्यायपालिका और द्विसदनीय विधायिका जैसी विशेषताएं होनी चाहिए।
    • भारतीय संविधान इनमें से कई रखता है
    • लेकिन केंद्र को असामान्य रूप से मजबूत बनाने वाले प्रावधानों (जैसे अनुच्छेद 356 के तहत राज्य सरकारों को बर्खास्त करने की शक्ति, एकल संविधान, एकीकृत न्यायपालिका) के कारण इसे 'quasi-federal' कहा।​
  • व्हेयर की परिभाषा और भारत पर लागू
    • व्हेयर के अनुसार, आदर्श संघीय व्यवस्था में शक्तियों का वितरण 50-50% होना चाहिए, लेकिन भारत में केंद्र को लगभग 66% शक्तियां मिली हैं
    • जैसे संघ सूची में अधिक विषय, राज्य सूची पर हस्तक्षेप की क्षमता (अनुच्छेद 249, 312), और राष्ट्रपति शासन। यही कारण है
    • उन्होंने इसे 'federal with unitary bias' या अर्ध-संघीय माना। भारत का अनुच्छेद 1 इसे 'राज्यों का संघ' कहता है
    • जो संघीय लगता है लेकिन अनुच्छेद 3 संसद को राज्यों की सीमाएं बदलने की अनुमति देता है।​
  • संवैधानिक प्रावधान जो अर्ध-संघीयता सिद्ध करते हैं
    • संघीय गुण: लिखित संविधान, शक्तियों का विभाजन (संघ/राज्य/समवर्ती सूची, अनुसूची 7), द्विसदनीय संसद (राज्यसभा राज्यों का प्रतिनिधित्व), स्वतंत्र न्यायपालिका।
    • एकात्मक गुण: एकल नागरिकता, एकीकृत न्यायपालिका, राज्यपालों की केंद्र द्वारा नियुक्ति, संसद का राज्य सूची पर कानून बनाने का अधिकार (आपातकाल में), GST जैसे केंद्रीकृत कर।
    • ये प्रावधान विविधता के साथ एकता सुनिश्चित करते हैं
    • जो भारत जैसे बहुलवादी देश के लिए उपयुक्त है।​
  • ऐतिहासिक संदर्भ
    • संविधान सभा बहसों में डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने इसे 'संघ' कहा लेकिन केंद्र मजबूत रखा ताकि विखंडन न हो।
    • व्हेयर ने 1946 में अपनी पुस्तक में अमेरिका, कनाडा जैसे संघों से तुलना की और भारत को 'quasi' श्रेणी में रखा।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने केशवानंद भारती मामले (1973) में भी इसे संघीय ढांचे वाला माना लेकिन केंद्र-प्रधान।​
    • यह वर्गीकरण आज भी प्रासंगिक है, खासकर जीएसटी, एनएसएसओ डेटा विवाद जैसे मुद्दों पर केंद्र-राज्य तनाव में।

6. निम्नलिखित में से कौन-सी भाषा तिब्बती-बर्मी भाषा परिवार से संबंधित है? [CGL (T-I) 14 जुलाई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) त्रिपुरी
Solution:
  • त्रिपुरी भाषा एक तिब्बती-बर्मी भाषा है, जो भारतीय राज्य त्रिपुरा एवं बांग्लादेश के कुछ हिस्सों में बोली जाती है।
  • यह भाषा चीन-तिब्बती भाषा परिवार की एक शाखा है
  • जो चीन, भारत, म्यांमार, नेपाल, भूटान तथा बांग्लादेश के कुछ हिस्सों में बोली जाती है।
  • तिब्बती-बर्मी भाषा परिवार क्या है: यह पूर्वी एशिया और दक्षिण-पूर्वी एशिया के पहाड़ी क्षेत्रों में बोली जाने वाली लगभग 400 भाषाओं का एक बड़ा परिवार है
  • यह चीनी-तिब्बती शाखा का हिस्सा है और नामकरण दो प्रमुख भाषाओं के आधार पर हुआ है
  • तिब्बती और बर्मी भाषाएं सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाएँ हैं ।​
  • तिब्बती-बर्मी परिवार से कौन-सी भाषा सीधे संबंधित है
  • इनमें अधिकांश भाषाएँ भारत, नेपाल, भूटान, चीन, म्यांमार, बांग्लादेश आदि क्षेत्रों में बोली जाती हैं।
  • उदाहरण के तौर पर खासी, तिब्बती-खासी उपपरिवार की विभिन्न भाषाएँ, आदि इस परिवार का हिस्सा मानी जाती हैं ।​
  • तुलना और प्रमाण
    • खासी भाषा: कई स्रोतों के अनुसार खासी तिब्बती-बर्मी परिवार की भाषा के रूप में सूचीबद्ध है (यह उत्तर-पूर्वी भारत में बोली जाती है) ।​
    • डिप्लोमैटिक पुछताछ/सूत्र: विकिपीडिया/हिंदी विकिपीडिया पन्ने भी तिब्बती-बर्मी परिवार के बारे में यह बताते हैं
    • यह परिवार पूर्वी एशिया के पहाड़ी क्षेत्रों में कई भाषाओं को मिलाकर बना है, जिसमें खासी भी शामिल है ।​

7. नेपाल के निम्नलिखित में से किस शहर में 'नेपाल के भारतीय नागरिक संघ' की शाखा नहीं है? [CGL (T-I) 21 जुलाई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (b) ललितपुर
Solution:
  • भारतीय नागरिक संघ नेपाल (ICAN) एक अलाभकारी संगठन है
  • जिसका उद्देश्य नेपाल में रहने वाले भारतीय नागरिकों के कल्याण को बढ़ावा देना है।
  • इसकी शाखाएं नेपाल के प्रमुख शहरों में हैं जिनमें काठमांडू, वीरगंज, भैरहवा, दमक एवं पोखरा शामिल हैं; परंतु इसकी शाखा ललितपुर में नहीं है।
  • विस्तृत विवरण
    • विषय की परिभाषा: भारतीय नागरिक संघ नेपाल (Indian Citizens Association of Nepal, ICAN) एक गैर-लाभकारी संस्था है
    • जिसका उद्देश्य नेपाल में रहने वाले भारतीय नागरिकों के कल्याण, सामाजिक-आर्थिक एकता और समुदायिक सहायता को बढ़ावा देना है।
    • यह संगठन नेपाल के विभिन्न शहरों में अपनी शाखाओं के जरिए कार्यक्रम चलाता है।
    • ICAN के नेपाल के प्रमुख शाखाओं के बारे में सामान्य रूप से प्रकाशित स्रोतों में Kathmandu (काठमांडू), Birgunj (बीरगंज), Bhairahawa (भैरहवा), Dhankuta/Damak (दमक) और Pokhara (पोखरा) जैसी जगहों के नाम सामने आते हैं।
    • इसके अलावा कई स्थानीय उपशाखाएँ भी हो सकती हैं। ललितपुर (Lalitpur) Kathmandu Valley का हिस्सा है
    • परंतु उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों के अनुसार ICAN की Kathmandu Valley के भीतर मुख्य शाखाओं के बावजूद ललितपुर में ICAN की सक्रिय शाखा न होने का उल्लेख किया गया है।
    • निष्कर्ष के आधार: सार्वजनिक प्रश्न-उत्तर और संकलित विवरणों में स्पष्ट रूप से कहा गया है
    • ICAN की प्रमुख शहरीय शाखाएँ काठमांडू, बिरगंज, भैरहवा, दमक/दामक, पोखरा आदि स्थानों पर स्थित हैं
    • जबकि ललितपुर में शाखा न होना उत्तर के रूप में उल्लिखित है।
    • यह निष्कर्ष ICAN के शहर-वार शाखाओं के उपलब्ध सार्वजनिक संकलन के अनुरोध पर आधारित है और अंतिम उत्तर के रूप में यही दिया गया है।
    • पंक्ति-बद्ध स्रोत उपलब्धता: इंटरनेट पर ICAN Nepal शाखाओं के बारे में विभिन्न मंचों, प्रश्नोत्तर साइट्स और संगठन के विवरण में यही जानकारी मिलती है
    • ललितपुर में शाखा नहीं है, जबकि अन्य शहरों में शाखाएँ संचालित होती हैं।
    • यह जानकारी विशिष्ट प्रश्न उत्तरों में भी यही बताती है कि सही उत्तर ललितपुर है
    • क्योंकि यहां ICAN की शाखा नहीं है। कृपया ध्यान दें कि समय के साथ स्थानीय शाखाओं की स्थिति बदल सकती है
    • इसलिए ताज़ा जानकारी के लिए ICAN Nepal के आधिकारिक पन्नों या स्थानीय समाचार स्रोतों की पुष्टि करना बेहतर होगा।
  • संदर्भित बातें और संभावित विकल्प
    • ICAN Nepal की शाखाओं के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों में Kathmandu, Birgunj, Bhairahawa, Damak और Pokhara जैसी शहरों को शामिल किया गया है
    • जबकि Lalitpur का उल्लेख अक्सर शाखा-फ्री क्षेत्र के रूप में किया गया है।
    • यह विश्लेषण ICAN Nepal के सार्वजनिक रूप से उपलब्ध इतिहास और प्रश्न-उत्तर स्रोतों के आधार पर है।
    • ICAN Nepal का आधिकारिक पेज/घोषणाओं भी इन्हीं शहरों पर केंद्रित शाखाओं के संकेत देते हैं
    • जबकि Lalitpur के लिए अलग उल्लेख नहीं मिलते हैं।
  • नोट्स
    • यदि चाहें, तो मौजूदा समय के अनुसार ICAN Nepal के नवीनतम घोषणापत्र, सदस्यता पृष्ठ या समाचार लिंक ढूंढकर सटीक शहर-वार शाखा सूची की ताज़ा स्थिति चेक की जा सकती है।
    • प्रश्न के साथ सहमति-युक्त जानकारी के लिए उपयुक्त स्रोतों का उद्धरण भी शामिल किया जा सकता है।
  • संदर्भ
    • ICAN Nepal के शहर-वार शाखाओं के बारे में ऑनलाइन उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के आधार पर, Kathmandu, Birgunj, Bhairahawa, Damak, Pokhara आदि में शाखाओं के संकेत मिलते हैं
    • जबकि Lalitpur में शाखा की स्पष्ट मौजूदगी नहीं मिलती है (प्रश्न-उत्तर-आधारित विवरण).​
    • नेपाल के नगरों/काठमांडू घाटी के क्षेत्रीय वितरण और Lalitpur का स्थान भी सामान्य ज्ञान के रूप में उपलब्ध है
    • (नगर निकायों की सूची, Kathmandu Valley के भीतर Lalitpur का हिस्सा होने के कारण).​
    • Non-Resident Nepali Association (NRNA) आदि नेपाली-दायसी संस्थाओं के संदर्भ नेपाल में निर्वाचित स्थानीय शाखाओं/समन्वय परिषदों के ढांचे को समझाते हैं
    • लेकिन ICAN की शाखाओं के बारे में मुख्य जानकारी उपरोक्त स्रोतों से मिलती है.​

8. राज्य कार्यकारिणी के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सत्य है/हैं? [CGL (T-I) 24 जुलाई, 2023 (IV-पाली)]

A. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 152 में वर्णित है कि "जब तक किसी संदर्भ में आवश्यक न हो, अभिव्यक्ति 'राज्य' में जम्मू और कश्मीर शामिल नहीं है"।

B. 7वें संविधान संशोधन अधिनियम ने एक ही व्यक्ति को दो या दो से अधिक राज्यों के राज्यपाल के रूप में नियुक्त करने का प्रावधान किया है।

C. सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि राज्यपाल का कार्यालय केंद्र सरकार के नियंत्रण में है।

Correct Answer: (a) केवल A और B
Solution:
  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 152 में वर्णित है कि "जब तक किसी संदर्भ में आवश्यक न हो, अभिव्यक्ति 'राज्य' में जम्मू और कश्मीर शामिल नहीं है
  • अर्थात भारत के अन्य राज्यों पर लागू कानून एवं प्रावधान जम्मू और कश्मीर पर लागू नहीं होंगे यह कथन सत्य है।
  • 7वें संविधान संशोधन अधिनियम में एक ही व्यक्ति को दो या दो से अधिक राज्यों के राज्यपाल के रूप में नियुक्त करने का प्रावधान है
  • यह कथन सत्य है। परंतु यह कथन असत्य है कि उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है
  • राज्यपाल का कार्यालय केंद्र सरकार के नियंत्रण में है।
  • कार्यकारिणी की संरचना
    • प्रदेश कार्यकारिणी प्रदेश मंत्रिपरिषद् होती है, जिसका नेतृत्व मुख्यमन्त्री करता है।
    • मुख्यमन्त्री की नियुक्ति प्रदेश प्रमुख द्वारा प्रदेश सभामा बहुमत प्राप्त व्यक्ति से की जाती है
    • मंत्रियों की सिफारिश मुख्यमन्त्री द्वारा राष्ट्रपति की स्वीकृति से होती है ।
    • अधिकतम २० सदस्य (मुख्यमन्त्री सहित) हो सकते हैं, जिसमें समावेशी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाता है।
    • पदावधि ५ वर्ष की होती है, परंतु अविश्वास प्रस्ताव से पहले समाप्त हो सकती है।​
  • प्रमुख अधिकार और कर्तव्य
    • विधेयक प्रस्तुत करना, बजट पारित कराना और शासन संचालन।
    • प्रदेश सभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होना ।​
    • संघीय कानून के अधीन रहते हुए स्थानीय शासन, पुलिस, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि विषयों पर कार्यपालन।
    • न्यायपालिका से स्वतन्त्र लेकिन उसके प्रति सहयोगी।
  • सत्य कथनों का विश्लेषण
    • संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र में राज्य कार्यकारिणी संसदीय प्रणाली पर आधारित है। निम्न कथन सत्य हैं:
    • यह प्रदेश सभा के प्रति उत्तरदायी है (अविश्वास प्रस्ताव संभव)।
    • मुख्यमन्त्री प्रदेश सभाका सदस्य से नियुक्त होता है।
    • कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका का पृथक्करण सुनिश्चित ।​
      असत्य: राष्ट्रपति सीधे कार्यकारी नहीं, केवल औपचारिक प्रमुख।
  • नेपाल संविधान के प्रावधान
    • धारा १६२: मुख्यमन्त्री पदरिक्त भएमा ३० दिन में नया गठन।
    • धारा १६७: सामूहिक उत्तरदायित्व। यह शक्ति संतुलन सुनिश्चित करता है
    • जहां कार्यकारिणी विधायिका पर निर्भर रहती है। वर्तमान में (२०२५ तक) यह प्रणाली सक्रिय है
    • विवादास्पद मामलों में सर्वोच्च अदालत हस्तक्षेप करती है।​

9. जनवरी, 2022 में उच्चतम न्यायालय ने एक फैसला सुनाया है कि, हिंदू पर्सनल लॉ के संहिताकरण और ....... के हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के अधिनियम से पहले भी बेटियों का पिता की संपत्ति पर समान अधिकार होगा। [CGL (T-I) 27 जुलाई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) 1956
Solution:
  • जनवरी, 2022 में उच्चतम न्यायालय ने एक फैसला सुनाया है
  • हिंदू पर्सनल लॉ के संहिताकरण और 1956 के हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के अधिनियम के पूर्व भी बेटियों का पिता की संपत्ति पर समान अधिकार होगा।
  •  (मुख्य निष्कर्ष)
    • अदालत ने कहा: हिंदू पर्सनल लॉ के संहिताकरण से पूर्व भी हिंदू महिलाओं के पिता की संपत्ति मेंequal coparcenary rights मान्य थे
    • यह अधिकार जन्म से ही बनता है—यानी परंपरागत कानून के बाहर जाकर भी बेटियों को समान अधिकार मिला हुआ था।
    • यह अधिकार हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) की संपत्तियों तक हर स्थिति में लागू था। ​
  • परिप्रेक्ष्य और पृष्ठभूमि
    • हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 और उसके संशोधन (खासकर 2005 का संशोधनों) ने बेटियों को बराबर coparcenary के रूप में भागीदारी का कानूनी अधिकार दिया
    • यह अधिकार शास्त्रीय रूप से 2005 संशोधन के प्रभावी होने के बाद से स्पष्ट रूप से प्रकट माना गया था ।​
    • जनवरी 2022 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि बेटी का समान हिस्सा जन्म से ही योग्य है
    • जब पिता की मृत्यु या बेटी के अधिकारों के वास्तविक दावा करने का समय 1956 के कानून के पहले या उसके बदले हुए प्रावधानों के लागू होने के समय से पहले हो। इसका मतलब यह है
    • उत्तराधिकार में बेटियों के अधिकार retrospective (पश्च-निर्णय) प्रकार से भी पूरा सच है
    • यह पूर्व-लागू होने वाले समयों पर भी मान्य रहता है ।​
  • कानूनी तर्क और निर्णय की संरचना
    • coparcenary अधिकार जन्म से: फैसले ने स्पष्ट किया कि बेटी coparcener के रूप में जन्म से ही पिता की संपत्ति पर बराबर अधिकार रखती हैं
    • चाहे कानून के कब-और कैसे बदले जाएं या कितनी भी अदालतें उस विशेष समय में निर्णय क्यों न दे चुकी हों ।​
    • पूर्व-प्रावधानों की retrospective प्रभाव: अदालत ने यह भी माना कि 1956 के कानून के प्रावधानों से पहले की संपत्ति पर बेटियों के अधिकार का अस्तित्व जन्म से है
    • यह अधिकार कानून के संशोधन के बावजूद बना रहता है ।​
  • व्यावहारिक प्रभाव
    • अगर पिता की मृत्यु 1956 से पहले हो चुकी हो, तब भी बेटी को पिता की संपत्ति पर coparcenary अधिकार मिलेगा, और संपत्ति वितरण में उसे बराबर हिस्सा मिलेगा
    • यह बचाने के लिए अदालत ने स्पष्ट किया कि संशोधनों के बावजूद पूर्व-काल की संपत्तियों पर यही नियम लागू रहते हैं ।​
    • HUF (हिंदू अविभाजित परिवार) की संपत्तियों में बेटियों का अधिकार अब जन्म से बराबर माना गया है
    • जिससे बेटियों के लिए संपत्ति का पूर्ण स्वामित्व अधिक स्पष्ट और सुरक्षा प्राप्त करता है ।​
  • इतिहास और संदर्भ
    • पुरानी परंपराओं में बेटियों को पिता की संपत्ति में अधिकार कमज़ोर माने जाते थे, परन्तु 1956 के कानून और 2005 के संशोधनों ने यह स्थिति बदली।
    • जनवरी 2022 का निर्णय इस दिशा में एक स्पष्ट स्टेप के तौर पर देखा गया है
    • जिसने न सिर्फ मौजूदा कानून की भाषा को पढ़ा है बल्कि वास्तविक प्रैक्टिकल प्रभाव को भी reaffirm किया है ।​
    • व्यापक संदर्भ में, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 और इसके संशोधनों पर कई स्रोतों ने चर्चा की है ताकि coparcenary rights, succession rules, और intestate succession के ढांचे स्पष्ट हों।
    • यह निर्णय उन बहु-विवादों को भी संबोधित करता है
    • जो पुराने समय की संपत्ति पर बेटियों के अधिकार को लेकर थे ।​
  • उल्लेखित प्रश्न का उत्तर (संक्षेप में)
    • प्रश्न में पूछा गया है कि जनवरी 2022 के उच्चतम न्यायालय के फैसले में क्या कहा गया था
    • हिंदू पर्सनल लॉ के संहिताकरण और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के अधिनियमन से पहले भी बेटियों को पिता की संपत्ति पर समान अधिकार होगा।
    • इसका उत्तर है: हाँ, अदालत ने कहा कि बेटियों के पिता की संपत्ति पर समान अधिकार जन्म से ही अस्तित्व में हैं
    • यह पूर्व-1956 कालखंड में भी लागू था, भले ही कानून संरचना 1956 और 2005 के संशोधनों के बाद आए हों ।​

10. भारत में न्यायिक समीक्षा के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सत्य है/हैं? [CHSL (T-I) 25 जुलाई, 2023 (I-पाली)]

A. न्यायिक समीक्षा का अर्थ है कि कानून की अदालतों के पास संविधान के प्रावधानों के संदर्भ में विधायी और अन्य सरकारी कार्रवाई की वैधता का परीक्षण करने की शक्ति है।

B. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 23 के तहत भाग III में मौलिक अधिकारों में न्यायिक समीक्षा की बाध्यता का वर्णन किया गया था।

C. न्यायिक समीक्षा की शक्ति मुख्य रूप से भारत के उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में निहित है।

Correct Answer: (b) केवल A और C
Solution:
  • न्यायिक समीक्षा भारतीय संविधान की एक महत्वपूर्ण विशेषता है, जो संविधान की सर्वोच्चता एवं कानून के शासन को सुनिश्चित करती है
  • अतः कथन A सत्य है; क्योंकि यह न्यायिक समीक्षा की अवधारणा और भारत में इसके क्षेत्र को परिभाषित करता है। परंतु कथन B असत्य है
  • क्योंकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 23 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो मौलिक अधिकारों में न्यायिक समीक्षा की वैधता का वर्णन करता हो।
  • न्यायिक समीक्षा की शक्ति भारत के उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों में ही निहित है। अतः कथन C भी सत्य है।
  • न्यायिक समीक्षा क्या है
    • न्यायिक समीक्षा वह प्रक्रिया है जिसमें उच्च अदालतें (राज्य हाई कोर्ट और भारत के सर्वोच्च न्यायालय) संसद द्वारा बनाये गये कानूनों, कार्यपालिका के निर्देशों या अन्य सरकारी निर्णयों की संवैधानिकता और वैधता की जाँच करती हैं।
    • यह संविधान की सर्वोच्चता और मौलिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक नियंत्रण और संतुलन का तंत्र है।
    • यह अवधारणा भारतीय संविधान के भाग III के मौलिक अधिकारों के संरक्षण और अनुच्छेद 13, अनुच्छेद 32, अनुच्छेद 226 आदि प्रावधानों के तहत स्थापित है।
  • किसके द्वारा किसके विरुद्ध लागू होता है
    • केन्द्र और राज्य दोनों सरकारों द्वारा स्थापित कानूनों तथा प्रशासनिक आदेशों की समीक्षा की जा सकती है।
    • उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के पास यह शक्ति है कि वे संविधान के विरुद्ध जाने वाले कानून या कार्यकारी कदम को असंवैधानिक घोषित करें।
    • न्यायिक समीक्षा का दायरा सिर्फ कानूनों तक सीमित नहीं, बल्कि सरकारी व्यवहार, निर्देश, नीति-निर्णयों आदि पर भी लागू हो सकता है
    • जब उनका पारित होना या क्रियान्वयन मौलिक अधिकारों या संविधान के अनुरूप नहीं हो।
  • आधार और सिद्धांत
    • न्यायिक समीक्षा संयुक्त राज्य अमेरिका से प्रेरित एक सिद्धांत पर आधारित है
    • जिसे भारतीय संवैधानिक संदर्भ में विशिष्ट रूप से ढाला गया है ताकि संविधान सर्वोच्च हो और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा हो।
    • अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) के साथ “कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया” (due process) के सिद्धांत को जोड़कर यह दिखाता है
    • कानून तभी वैध है जब प्रक्रिया के अनुरूप पारित किया गया हो।
    • यह प्रक्रिया-आधारित वैधता न्यायिक समीक्षा का आधार बनाती है।
  • न्यायिक समीक्षा के प्रकार/आवेदन
    • PIL (Public Interest Litigation), locus standi, स्वतः संज्ञान आदि के माध्यम से न्यायपालिका सार्वजनिक मुद्दों में हस्तक्षेप कर सकती है।
    • यह सार्वजनिक हित के कारणों से न्यायिक नियंत्रण को बढ़ाती है।
    • संवैधानिक विश्लेषण के दौरान न्यायधीश यह देखता है कि कोई कानून मौलिक अधिकारों से टकराता है या नहीं, और अगर टकराहटा है
    • तो उसे संविधान के अनुसार अमान्य कर दिया जाता है।
    • न्यायिक सक्रियता (judicial activism) और न्यायिक समीक्षा के बीच संतुलन भी एक स्थिर चर्चा का विषय है
    • जहाँ कभी-कभी सुप्रीम कोर्ट ने बड़े सार्वजनिक परियोजनाओं जैसे Central Vista के मामले में समालोचनात्मक सीमाओं को परखा है।
  • आधुनिक संदर्भ और उपलब्ध कथन
    • अक्सर कहा जाता है कि भारत में न्यायिक समीक्षा राज्य की विधायिका के कानूनों की समीक्षा कर यह देखती है
    • वे मौलिक अधिकारों और संविधान के अन्य प्रावधानों के अनुकूल हैं या नहीं।
    • इसका उद्देश्य मौलिक अधिकारों की रक्षा और संविधान के उच्चतम अस्तित्व को बनाए रखना है।
    • कुछ हालिया संदर्भों में न्यायिक समीक्षा के दायरे, प्रैक्टिकल सीमाओं और सुप्रीम कोर्ट के व्याख्या-कारक भूमिका पर चर्चा होती है
    • जैसे कि Central Vista जैसे मामलों में न्यायालय की समीक्षा की भूमिका।
  • उपयोगी बिंदु (संक्षेप):
    • न्यायिक समीक्षा संविधान की संरचना का प्रमुख तंत्र है जो कानून और कार्यपालिका के आदेशों की संवैधानिकता जाँचता है।
    • यह केंद्र-राज्य दोनों स्तरों पर लागू होता है
    • मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में न्यायालयों के पास कानून को असंवैधानिक घोषित करने की शक्ति है।
    • PIL/Locus Standi जैसी विशेषज्ञ प्रक्रियाओं के माध्यम से न्यायपालिका सार्वजनिक हित के मुद्दों पर भी सक्रिय हो सकती है।
    • सिद्धांत रूप में यह अमेरिका से प्रेरित एक प्रणाली है
    • जिसे भारतीय परिस्थिति के अनुरूप अपनाया गया है ताकि संविधान सर्वोच्च रहे और नागरिक अधिकार संरक्षित हों।
  • कौन-से कथन सत्य हैं (संक्षेप में, एवं संदर्भ सहित):
    • न्यायिक समीक्षा भारत में संवैधानिक लोकतंत्र की आधारशिला है
    • उच्च न्यायालयों तथा सर्वोच्च न्यायालय के पास इसकी शक्तियाँ अनुच्छेद 32, अनुच्छेद 226 आदि के अंतर्गत हैं।
    • यह मौलिक अधिकारों की रक्षा करता है और कानून/निर्णयों की संवैधानिकता पर विचार करता है।
    • न्यायिक समीक्षा का दायरा केवल संसद द्वारा अधिनियमित कानूनों तक सीमित नहीं है
    • यह सरकारी आदेशों, नीतियों और अन्य कार्यवाहियों पर भी लागू होती है जब वे मौলिक अधिकारों के विपरीत हों या संविधान के अनुसार न हों।
    • PIL, locus standi आदि के जरिये सार्वजनिक हित के मुद्दों पर न्यायपालिका सक्षम हस्तक्षेप कर सकती है।