सर्वोच्च न्यायालय

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1. भारत के संविधान की व्याख्या करने की शक्ति किसके पास है? [MTS (T-I) 08 मई, 2023 (II-पाली), CGL (T-I) 31 अगस्त, 2016 (I-पाली)]

Correct Answer: (d) सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय दोनों
Solution:
  • भारत के संविधान की व्याख्या करने की शक्ति सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय दोनों के पास है।
  • संविधान के संरक्षक के रूप में, सर्वोच्च न्यायालय के पास अंतिम व्याख्या (Final Interpretation) करने का अधिकार है
  • जबकि उच्च न्यायालय भी संविधान के प्रावधानों की व्याख्या कर सकते हैं
  • खासकर रिट क्षेत्राधिकार (Writ Jurisdiction) का प्रयोग करते समय।
  • हालांकि, यह संविधान द्वारा लगाई गई सीमाओं के भीतर कार्य करता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय के कार्य और उत्तरदायित्व संविधान द्वारा परिभाषित हैं।
  • संविधान के भाग VI में अनुच्छेद 214 से 231 उच्च न्यायालयों से संबंधित है।
  • भारत का संविधान प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय का प्रावधान करता है।
  • 7वां संशोधन अधिनियम 2 या अधिक राज्यों के लिए एक सामान्य उच्च न्यायालय स्थापित करने के लिए अधिकृत है।
    other Information
  • सर्वोच्च न्यायालय के पास विशिष्ट क्षेत्राधिकार या शक्तियों का दायरा है।
  • मूल: संघ और राज्यों के बीच और राज्यों के बीच विवादों का निपटारा करता है।
  • अपीलीय: दीवानी, आपराधिक और संवैधानिक मामलों में निचली अदालतों से अपील की सुनवाई करता है, सलाहकार सार्वजनिक महत्व और कानून के मामलों पर राष्ट्रपति को परामर्श देता है।
  • रिटः व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, निषेध, उत्प्रेषण और अधिकार पृच्छा की रिट जारी कर सकता है।
  • विशेष शक्तियां: भारत के क्षेत्र में किसी भी न्यायालय द्वारा पारित किसी भी फैसले या मामले की अपील के लिए विशेष अनुमति दे सकती है।
  • इस विषय को तीन मुख्य बिंदुओं में समझना उपयोगी रहेगा:
  • अधिकारों की व्याख्या: मौलिक अधिकारों की विशिष्ट्ताओं और उनके व्याख्या को लेकर अदालत का निर्णय निर्णायक होता है
  • क्योंकि इन अधिकारों के संरक्षण और संसद के संशोधन अधिकारों के बीच संतुलन तय होता है।​
  • संवैधानिक संरचना: संविधान की संरचना, सत्ता का विभाजन (फेडरल ढांचा, संघीय/राज्यों के अधिकार) आदि मामलों में भी सर्वोच्च न्यायालय ही अंतिम व्याख्याता है और संरचनात्मक दृष्टिकोण से निर्णय देता है।​
  • लेखन-धारणा बनाम व्यापक अर्थ: प्रारम्भिक पाठ-आधारित (Textual) व्याख्या के बाद संरचनावादी और अन्य दृष्टिकोण विकसित हुए हैं; अदालतों की भूमिका इन दृष्टिकोणों के अनुसार निर्णयों के वैध आधार बनती है।​
  • संक्षेप में, भारत के संविधान की व्याख्या करने की अंतिम शक्ति सुप्रीम कोर्ट के पास है, जो संविधान के शब्दों के शाब्दिक अर्थ के साथ-साथ उसकी संरचना और मौलिक सिद्धांतों के अनुरूप अर्थत्व निर्धारित करता है।​
  • यदि चाहें तो इस विषय पर विशिष्ट अध्यायों (जैसे प्रस्तावना की भूमिका, पाठवादी बनाम संरचनावादी दृष्टिकोण, संदर्भ-निर्णय) के उदाहरण अदालतों के निर्णयों के साथ विस्तृत इतिहास और प्रमुख फैसलों के साथ भी प्रस्तुत कर सकता हूँ।

2. निम्नलिखित में से किस अधिनियम के तहत सर्वोच्च न्यायालय अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता शुरू कर सकता है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 22, 23 नवंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996
Solution:
  • सर्वोच्च न्यायालय मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 (Arbitration and Conciliation Act, 1996) के तहत अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता शुरू कर सकता है।
  • यह अधिनियम मध्यस्थता की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है और अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता से संबंधित मामलों के लिए कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।
  • यह अधिनियम अंतर्राष्ट्रीय मानकों को दर्शाते हुए, अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता पर UNCITRAL मॉडल कानून पर आधारित है।
  •  यह घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय दोनों प्रकार की मध्यस्थता के लिए एक व्यापक ढांचा प्रदान करता है
  • यह सुनिश्चित करता है कि विवादों का कुशलतापूर्वक समाधान किया जाए।
  •  भारत का सर्वोच्च न्यायालय इस अधिनियम के तहत मध्यस्थता शुरू कर सकता है और इसे लागू कर सकता है
  • यह सुनिश्चित करता है कि मध्यस्थता समझौतों का पालन किया जाए और मध्यस्थ पुरस्कारों को लागू किया जाए।
  •  इस अधिनियम में कई बार संशोधन किया गया है, हाल ही में 2019 में, इसकी दक्षता और पारदर्शिता को बढ़ाने के लिए।
    Other Information
  •  UNCITRAL मॉडल कानून:
    •  अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता पर UNCITRAL मॉडल कानून को 1985 में संयुक्त राष्ट्र आयोग अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कानून (UNCITRAL) द्वारा अपनाया गया था।
    •  इसका उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक विवादों के समाधान में एकरूपता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए देशों को अपने मध्यस्थता कानूनों में सुधार और आधुनिकीकरण करने में सहायता करना है।
    •  मॉडल कानून एक ऐसा ढांचा प्रदान करता है जिसे राष्ट्र अपना सकते हैं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि उनके मध्यस्थता कानून अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हैं।
  • मध्यस्थता समझौताः
    •  मध्यस्थता समझौता पक्षों के बीच एक लिखित समझौता है जिसमें अदालत जाने के बजाय अपने विवादों को मध्यस्थता के लिए प्रस्तुत करने का प्रावधान होता है।
    • इस तरह के समझौते आमतौर पर वाणिज्यिक अनुबंधों में शामिल होते हैं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि भविष्य के किसी भी विवाद का समाधान मध्यस्थता के माध्यम से किया जाए।
  •  मध्यस्थ पुरस्कार:
    •  मध्यस्थ पुरस्कार मध्यस्थता कार्यवाही में एक मध्यस्थ या मध्यस्थ न्यायाधिकरण द्वारा लिया गया निर्णय है।
    •  यह इसमें शामिल पक्षों के लिए बाध्यकारी है और इसे उसी तरह लागू किया जा सकता है जैसे अदालत का निर्णय।
  •  अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थताः
    •  अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक लेनदेन से उत्पन्न होने वाले विवादों को सुलझाने की एक विधि है।
    •  इसमें विभिन्न देशों के पक्ष शामिल होते हैं और यह अंतर्राष्ट्रीय संधियों और सम्मेलनों, जैसे न्यूयॉर्क कन्वेंशन द्वारा शासित होता है।

3. कॉलेजियम प्रणाली के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन गलत है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 20 नवंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) यह प्रणाली वर्ष 2007 में शुरू हुई थी।
Solution:
  • यह प्रणाली वर्ष 2007 में शुरू हुई थी गलत है। कॉलेजियम प्रणाली की उत्पत्ति द्वितीय न्यायाधीश मामले (Second Judges Case), 1993 में हुई थी
  • जिसे बाद में तृतीय न्यायाधीश मामले (Third Judges Case), 1998 में मजबूत किया गया।
  • यह गलत है: कॉलेजियम प्रणाली 2007 में शुरू नहीं हुई थी।
  • यह तीन ऐतिहासिक मामलों में न्यायिक निर्णयों के माध्यम से विकसित हुई जिन्हें तीन न्यायाधीश मामले के रूप में जाना जाता है:
  • प्रथम न्यायाधीश मामला (1981): न्यायिक नियुक्तियों में कार्यपालिका को प्रधानता प्राप्त थी।
  • द्वितीय न्यायाधीश मामला (1993): न्यायपालिका ने न्यायिक नियुक्तियों के लिए कॉलेजियम प्रणाली बनाकर अपनी प्रधानता स्थापित की थी।
  • तृतीय न्यायाधीश मामला (1998): कॉलेजियम का विस्तार करके इसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और सर्वोच्च न्यायालय के चार सबसे वरिष्ठ न्यायाधीशों को शामिल किया गया था।
  • इस प्रकार, कॉलेजियम प्रणाली 1993 में क्रियाशील हुई, 2007 में नहीं।
    Other Information
  • कॉलेजियम प्रणाली:
    • यह न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण की प्रणाली है जो सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के माध्यम से विकसित हुई है
    • न कि संसद के किसी अधिनियम या संविधान के किसी प्रावधान द्वारा।
    • सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम का नेतृत्व भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) करते हैं और इसमें न्यायालय के चार अन्य वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
    • उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीशों की नियुक्ति केवल कॉलेजियम प्रणाली के माध्यम से की जाती है
    • कॉलेजियम द्वारा नाम तय किए जाने के बाद ही सरकार की भूमिका होती है।

4. उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को किस आधार पर पद से हटाया जा सकता है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 1 दिसंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) सिद्ध कदाचार और असमर्थता
Solution:
  • उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को सिद्ध कदाचार एवं असमर्थता के आधार पर हटाया जा सकता है।
  • न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 में कुल 7 धाराएं हैं, जिसमें उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के पद से हटाए जाने (संसद में ऐसे समावेदन के रखे जाने तथा न्यायाधीश के कदाचार या असमर्थता की जांच और उसे सिद्ध करने) की प्रक्रिया और ब्यौरों का वर्णन है।
  • सर्वोच्च न्यायालय (और उच्च न्यायालय) के न्यायाधीश को भी राष्ट्रपति द्वारा अपने पद से हटाए गए दुर्व्यवहार या अक्षमता के आधार पर हटाया जा सकता है।
  • इस तरह के दुर्व्यवहार या अक्षमता की जांच और सबूत के लिए शक्ति संसद में निहित है।
  • प्रत्येक घर में, न्यायाधीश को हटाने के लिए एक प्रस्ताव पारित करना होगा जो उपस्थित और मतदान के 2/3 सदस्यों द्वारा समर्थित है और घर की कुल सदस्यता का बहुमत है।
  • न्यायाधीश जांच अधिनियम, 1968 महाभियोग की प्रक्रिया द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने से संबंधित प्रक्रिया को नियंत्रित करता है।
  • अभी तक उच्चतम न्यायालय के किसी भी न्यायाधीश पर महाभियोग नहीं लगाया गया है।
  • न्यायमूर्ति वी रामास्वामी (1991-1993) और न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा (2017-2018) के महाभियोग के प्रस्ताव संसद में हार गए।
    Other Information
  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124 में सर्वोच्च न्यायालय का उल्लेख है।
    सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 214-231 में उच्च न्यायालयों के प्रावधानों का उल्लेख किया गया है।
  • सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन और भत्ते क्रमशः भारत के राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 125 और अनुच्छेद 221 के अनुसार निर्धारित किए जाते हैं।
  • विस्तार से भाग
    • महाभियोग कैसे काम करता है: संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव (resolution) पास करना पड़ता है, फिर राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदन और अंत में यह प्रक्रिया न्यायिक अधिकारी के खिलाफ निर्णय के रूप में निष्पादन तक पहुँचती है। यह प्रक्रिया संविधान की कठोरतम नियंत्रण-तंत्र है और सामान्यतः उच्चस्तरीय भ्रष्टाचार, अक्षम्डता या अन्य बड़े दुर्व्यवहार के मामलों में लागू होती है।
    • वैकल्पिक/समतुल्य उपाय: अनुच्छेद 124(4) और उच्च न्यायालयों पर अनुच्छेद 218 के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के जज के लिए लागू प्रावधान वही होते हैं जो उच्च न्यायालय के जज पर लागू होते हैं—यानि अक्षमता या दुर्व्यवहार के आधार पर removal के उपायों की व्यवस्था समान हो सकती है।
    • भूमिका और संरचना: न्यायिक निकायों के हटाने की यह प्रक्रिया संवैधानिक संरक्षा के रूप में स्थापित है ताकि न्यायिक स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा बनी रहे, पर साथ ही अवैध या आक्रामक आचरण पर भी जवाबदेही संभव रहे।
  • चुनाव-संदेश और निर्गम
    • महाभियोग की आवश्यकता क्यों है: न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखना अत्यंत маңызды है, परंतु आवश्यक सिद्धांत के अनुसार अत्यंत गंभीर आचरण पर ही सदस्य पद से हटाए जा सकते हैं ताकि गलत आचरण के विरुद्ध कठोर संदेश दिया जा सके।
    • संसदीय और कार्य-व्यवस्था: इस विषय में बहस और कानूनी परस्पर-विरोध संभव है; सही दायरे के लिए संविधान की धाराओं, कोर्ट के फैसलों और लोक प्रशासनिक संसाधनों का संदर्भ लेना आवश्यक होता है।
  • यदि चाहें तो:
    • मैं आपके लिए संविधान के अनुच्छेद (जैसे अनुच्छेद 124(4), अनुच्छेद 217(1), अनुच्छेद 218 आदि) के उपयुक्त अंशों का संक्षिप्त विश्लेषण बना सकता हूँ।
    • साथ ही अधिक स्पष्ट उदाहरणों के साथ एक संक्षिप्त तुलना-तालिका (जज हटाने के अलग तरीके) भी प्रस्तुत कर सकता हूँ।
  • स्रोतों के संकेत
    • ऊपर दिए गए तथ्य संविधान की संरचना पर आधारित सामान्य जानकारी पर बने हैं; अधिक सटीक उद्धरण/धाराओं के लिए आप चाहें तो मैं विश्वसनीय कानूनी संसाधनों से विशिष्ट अनुच्छेद-प्रावधान और हाल के न्यायिक निर्णयों के साथ उद्धरणीन जानकारी दे सकता हूँ।

5. यदि उच्च न्यायालय अपील करने पर किसी आरोपी व्यक्ति को बरी करने के आदेश को उलट देता है और उसे मौत की सजा देता है, तो दिए गए श्रेणी के मामले के लिए सर्वोच्च न्यायालय के किस प्रकार के अधिकार क्षेत्र को लागू किया जा सकता है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 1 दिसंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) आपराधिक मामलों के संबंध में अपीलीय क्षेत्राधिकार (अनुच्छेद 134)
Solution:
  • यदि उच्च न्यायालय अपील करने पर बरी किए गए आरोपी को मौत की सज़ा देता है, तो यह मामला आपराधिक मामलों के संबंध में अपीलीय क्षेत्राधिकार (अनुच्छेद 134) के अंतर्गत आता है।
  • अनुच्छेद 134 सर्वोच्च न्यायालय को ऐसे मामलों में अपील सुनने की शक्ति प्रदान करता है जहाँ उच्च न्यायालय ने किसी व्यक्ति को बरी करने के फैसले को पलटकर मौत की सज़ा दी हो।
  • संवैधानिक आधार
    • सर्वोच्च न्यायालय के पास तीन प्रकार के अधिकार क्षेत्र हैं: मौलिक क्षेत्राधिकार (Article 131), आपराधिक अपील क्षेत्राधिकार (Article 134) और विशेष मामलों के लिए चयनित हस्तक्षेप (Article 136) [उच्चतम न्यायालय की संरचना और powers पर सामान्य विवरण]।
    • इन अधिकार क्षेत्रों के जरिए ही सर्वोच्च न्यायालय अपील स्वीकार या अस्वीकार कर सकता है.​
    • हिंदी स्रोतों के अनुसार, आपराधिक मामलों में अपील तब संभव है जब उच्च न्यायालय ने आरोपी को मृत्युदंड, आजीवन कारावास या कम से कम कुछ निश्चित अवधि की कैद सुनाई हो, या जब उच्च न्यायालय ने किसी मामले को अपने पास ले कर अंतःस्थापित किया हो और आरोपी को  सजा दी हो, या अदालत ने मामला उपयुक्त माना हो—यही फॉर्मैट 134 का प्रमुख ढांचा है.​
  • आपराधिक अपील क्षेत्राधिकार (Article 134) के प्रमुख घटक
    • उच्च न्यायालय ने किसी आरोपी को मौत की सजा दी हो या जीवंत Carriage के समान कड़ी सजा दी हो (जैसे आजीवन कारावास) और बाद में वही निर्णय के विरुद्ध सक्षम पक्ष सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर सकता है.​
    • इसके अतिरिक्त, यदि उच्च न्यायालय ने किसी मामले को नीचे से ऊपर स्थानांतरित कर स्वयं विचारण किया हो और आरोपी को मृत्यु/जीवन कारावास/10 वर्ष से कम की सजा सुनाई हो, तब भी अपील स्वीकार हो सकती है; संविधान के अनुसार ऐसी परिस्थितियाँ अपील के लिए आवश्यक मानदंडों में शामिल हैं ।​
    • विशिष्ट स्थितियों में अनुच्छेद 136 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय के चुनिंदा हस्तक्षेप के अधिकार का प्रयोग भी संभव है, पर यह सामान्य अपील के बजाय एक असाधारण राहत है और उसके लिए विशिष्ट मानदंड आवश्यक होते हैं.​
  • मामलों की व्यवहारिक व्याख्या
    • यदि उच्च न्यायालय ने किसी अभियुक्त को बरी कर दिया हो और फिर उसी मामले में दोबारा अपील के बाद उच्च न्यायालय ने उसे मौत की सजा सुना दी हो, तब भी सर्वोच्च न्यायालय के पास अपील का अधिकार है, बशर्ते अन्य मानदंड जैसे कि मामला अपील-योग्य हो (जैसे राज्य बनाम विषय-गत कानूनी प्रश्न का महत्व) पूरे हों ।​
    • तब उच्च न्यायालय के निर्णय पर आधारित मूल तथ्य/कानून के प्रश्नों के कारण सर्वोच्च न्यायालय समीक्षा कर सकता है और अंतिम निर्णय दे सकता है।​
  • व्यवहारिक सुझाव
    • इस प्रकार के मामलों में मुवक्किल के वकील को उच्च न्यायालय के निर्णय की प्रतियां, मृत्युदंड/आजीवन कारावास/कम सजा के तर्क, और अगर उपलब्ध हो तो संविधान से अनुच्छेद 134 के अनुसार अपील-योग्यता का स्पष्ट उल्लेख रखना चाहिए।
    • साथ ही, अगर मामला अनुच्छेद 136 के दायरे में आ सकता है, तो किन्हीं विशिष्ट परिस्थितियों में उच्चतम न्यायालय के चयनित हस्तक्षेप के लिए आवेदन/याचिका प्रस्तुत की जा सकती है।

6. ....... उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली अस्तित्व में आई। [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 3 दिसंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (b) सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष तीन अलग-अलग मामलों के परिणामस्वरूप
Solution:

उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष तीन अलग-अलग मामलों के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आई।

  • इन मामलों (1982, 1993, और 1998) ने न्यायिक नियुक्तियों में कार्यपालिका (Executive) के स्थान पर न्यायपालिका की भूमिका को स्थापित किया। परिणामस्वरूप अस्तित्व में आई, जिन्हें तीन न्यायाधीश मामले के रूप में जाना जाता है:
  • दूसरा न्यायाधीश मामला (1993)
  • स्थापित किया गया कि "'परामर्श " का अर्थ ''सहमति" है और यह कि भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की राय संस्थागत थी, व्यक्तिगत नहीं
  • तीसरा न्यायाधीश मामला (1998)
  • सर्वोच्च न्यायालय ने कॉलेजियम के कामकाज के लिए नौ दिशानिर्देश निर्धारित किए, कार्यपालिका पर न्यायपालिका की प्रधानता को पुष्ट किया
  • कॉलेजियम प्रणाली न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण के लिए एक तंत्र है जिसका नेतृत्व CJI और चार अन्य वरिष्ठ न्यायाधीश करते हैं।
  • न्यायिक व्यवस्था में लोकतंत्र सुनिश्चित करने के लिए प्रणाली को अपनाया गया था।
  • हालांकि, इसकी कई कारणों से आलोचना की गई है, जिनमें शामिल हैं: पारदर्शिता की कमी, पात्रता और चयन के लिए स्थापित मानदंडों की कमी, हाशिए के समुदायों के प्रतिनिधित्व की कमी, भाई-भतीजावाद और पक्षपात की संभावना, और जांच और संतुलन के सिद्धांत का उल्लंघन

7. ....... भारत के संविधान का अंतिम व्याख्याकार/व्याख्याता है। [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 14 नवंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) उच्चतम न्यायालय
Solution:

उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) भारत के संविधान का अंतिम व्याख्याकार/व्याख्याता (Final Interpreter) है। यह संविधान की सर्वोच्चता को बनाए रखता है और केंद्र तथा राज्यों के बीच शक्तियों के विभाजन सहित सभी संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या करता है।

  • सर्वोच्च न्यायालय भारत में न्यायिक व्यवस्था का सर्वोच्च अपीलीय न्यायालय और शीर्ष निकाय है।
  •  न्यायिक समीक्षा
    •  सर्वोच्च न्यायालय विधायिका द्वारा पारित कानूनों और कार्यपालिका के आदेशों की समीक्षा यह सुनिश्चित करने के लिए कर सकता है कि वे संविधान का पालन करते हैं।
  • सर्वोच्च न्यायालय की व्याख्याएँ और निर्णय देश के अन्य सभी न्यायालयों के लिए बाध्यकारी हैं।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने संवैधानिक व्याख्या के लिए कई तरीकों और दृष्टिकोणों को विकसित किया है, जिसमें पाठवाद, मौलिकतावाद, उद्देश्यवाद और न्यायिक सक्रियता शामिल हैं।

Other Information

  • कार्यपालिका सरकार की वह शाखा है जो विधायिका द्वारा अपनाए गए कानूनों और नीतियों के कार्यान्वयन के लिए जिम्मेदार है।
    •  कार्यपालिका अक्सर नीति निर्माण में शामिल होती है।
  •  विधायिका केवल एक कानून बनाने वाली संस्था नहीं है।
    •  कानून बनाना विधायिका के कार्यों में से एक है।
    •  यह सभी लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रक्रियाओं का केंद्र है।
    •  यह कार्रवाई से भरा हुआ है; वॉक आउट, विरोध प्रदर्शन, प्रदर्शन, सर्वसम्मति, चिंता और सहयोग।
    •  ये सभी बहुत महत्वपूर्ण उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं। वास्तव में, एक प्रतिनिधि, कुशल और प्रभावी विधायिका के बिना एक वास्तविक लोकतंत्र अकल्पनीय है।
    •  विधायिका लोगों को प्रतिनिधियों को जवाबदेह बनाने में भी मदद करती है।

8. निम्नलिखित में से कौन-सा सर्वोच्च न्यायालय के अपीलीय क्षेत्राधिकार के अंतर्गत नहीं आता है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 15 नवंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) केंद्र और राज्य के बीच टकराव
Solution:

केंद्र और राज्य के बीच टकराव (Disputes between Centre and State) सर्वोच्च न्यायालय के अपीलीय क्षेत्राधिकार (Appellate Jurisdiction) के अंतर्गत नहीं आता है।

  • यह इसके मूल क्षेत्राधिकार (Original Jurisdiction - अनुच्छेद 131) के अंतर्गत आता है। ऐसे मामलों में, सर्वोच्च न्यायालय सीधे विवादों का निपटारा करता है, अपील के माध्यम से नहीं।
  • इस अनुच्छेद के तहत, सर्वोच्च न्यायालय भारत के भीतर सरकारों के बीच कानूनी विवादों या संघर्षों के मामले में मध्यस्थ के रूप में कार्य करता है। इसलिए, यह सही विकल्प है।
  • उच्च न्यायालयों में आपराधिक मामलों से अपील सर्वोच्च न्यायालय के अपीलीय क्षेत्राधिकार के अंतर्गत आती है, न कि इसके मूल क्षेत्राधिकार के। इसलिए यह कथन गलत है।
  • मौलिक अधिकारों का प्रवर्तन सर्वोच्च न्यायालय के रिट क्षेत्राधिकार (अनुच्छेद 32) के अंतर्गत आता है, न कि इसके मूल क्षेत्राधिकार के। इसलिए यह कथन गलत है।
  • संसद सदस्यों के खिलाफ चुनाव याचिकाओं का निर्णय उच्च न्यायालयों द्वारा किया जाता है और यह सर्वोच्च न्यायालय के मूल क्षेत्राधिकार के अंतर्गत नहीं आती हैं। इसलिए यह कथन गलत है।

Other Information

  • सर्वोच्च न्यायालय का मूल क्षेत्राधिकार:
    • सर्वोच्च न्यायालय का मूल क्षेत्राधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत परिभाषित किया गया है।
    •  यह मुख्य रूप से भारत सरकार और एक या अधिक राज्यों के बीच, या दो या अधिक राज्यों के बीच विवादों से संबंधित है।
    •  उदाहरणों में जल बंटवारे, क्षेत्रीय सीमाओं और संवैधानिक मामलों पर विवाद शामिल हैं।
    •  यह क्षेत्राधिकार एक एकल, तटस्थ न्यायिक निकाय के माध्यम से अंतर-सरकारी संघर्षों के समाधान को सुनिश्चित करता है।
  • अपीलीय क्षेत्राधिकार:
    •  अपने अपीलीय क्षेत्राधिकार के तहत सर्वोच्च न्यायालय उच्च न्यायालयों सहित निचली अदालतों के फैसलों के खिलाफ अपील सुनता है।
    •  इसमें आपराधिक मामलों, दीवानी विवादों और संवैधानिक मामलों में अपील शामिल हैं।
    •  अपीलीय क्षेत्राधिकार संविधान के अनुच्छेद 132 से 134 द्वारा शासित है।
  •  रिट क्षेत्राधिकार (अनुच्छेद 32):
    •  सर्वोच्च न्यायालय के पास मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट जारी करने का अधिकार है।
    •  इस क्षेत्राधिकार को अक्सर "मौलिक अधिकारों का संरक्षक कहा जाता है और यह भारत में न्यायपालिका के कामकाज के लिए मौलिक है।
    •  रिट में बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, निषेध, अधिकार पृच्छा और उत्प्रेषण शामिल हैं।
  •  चुनाव याचिकाएं:
    •  चुनाव याचिकाएं लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत उच्च न्यायालयों में दायर की जाती हैं।
    •  सर्वोच्च न्यायालय का चुनाव मामलों में मूल क्षेत्राधिकार नहीं है; यह केवल उच्च न्यायालय के फैसलों से उत्पन्न होने वाली अपीलें सुन सकता है।
  • महत्वपूर्ण बिंदु
    •  मूल क्षेत्राधिकार के उदाहरण:
    •  राज्य जल विवाद: राज्यों के बीच जल बंटवारे पर विवाद, जैसे कि कावेरी जल विवाद।
    •  सीमा विवादः महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों के बीच क्षेत्रीय सीमाओं पर संघर्ष।
    •  सीमाएं:
    •  मूल क्षेत्राधिकार निजी व्यक्तियों या संस्थाओं पर लागू नहीं होता है।
    •  यह अनुच्छेद 131 के तहत परिभाषित अंतर-सरकारी विवादों तक सीमित है।

9. भारत का सर्वोच्च न्यायालय ....... को अस्तित्व में आया। [CGL (T-I) 24 जुलाई, 2023 (I-पाली), MTS (T-I) 20 अक्टूबर, 2021 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) 26 जनवरी, 1950
Solution:
  • भारत का सर्वोच्च न्यायालय 26 जनवरी, 1950 को अस्तित्व में आया। इसने भारत के संविधान के लागू होने के साथ ही फेडरल कोर्ट ऑफ इंडिया का स्थान लिया और 28 जनवरी, 1950 को इसका औपचारिक उद्घाटन हुआ।
  •  इसने भारत के संघीय न्यायालय का स्थान लिया और भारत के संविधान के तहत स्थापित किया गया।
  • सर्वोच्च न्यायालय देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था है और इसके निर्णय भारत की अन्य सभी अदालतों पर बाध्यकारी होते हैं।
  •  भारत के पहले मुख्य न्यायाधीश हीरालाल जे. कानिया थे, जिन्होंने 1950 से 1951 तक सेवा की।
    Other Information
  • भारत के मुख्य न्यायाधीश और 33 अन्य न्यायाधीश सर्वोच्च न्यायालय बनाते हैं, जिसके पास मूल, अपीलीय और सलाहकार क्षेत्राधिकार के रूप में व्यापक अधिकार हैं। संविधान के अनुच्छेद 142 के अनुसार, न्यायालय के पास कोई भी आदेश जारी करने का अंतर्निहित अधिकार है
  • जिसे पूर्ण न्याय के लिए आवश्यक माना जाता है, और राष्ट्रपति इसे लागू करने के लिए बाध्य है।
  • प्रथम विश्व युद्ध के बाद आर्थिक परेशानियों का जवाब देने के लिए 1 अप्रैल 1935 को भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थापना की गई थी।
  • 15 अगस्त 1947 वह तारीख है जब भारत को ब्रिटिश शासन से आजादी मिली थी।
  • 2 अक्टूबर 1952 वह तारीख है जब भारत में पहला डाक टिकट जारी किया गया था।
  • भूमिका और सत्ता: सर्वोच्च न्यायालय देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था है और संविधान के अनुसार इसके निर्णय सभी अदालतों के लिए बाध्यकारी होते हैं
  • यह संवैधानिक न्याय तथा सामान्य न्याय दोनों की अंतिम अपील-केन्द्र है। [संदर्भ: संविधान और SC के सामान्य सिद्धांत]
  • स्थान और संरचना: सामान्यतः इसकी मुख्यालय नई दिल्ली में तिलक मार्ग पर है; यह अदालत तीन स्तरों की न्यायिक प्रणाली का शीर्ष है
  • जिसमें उच्च न्यायालय और अधीनस्थ न्यायालय भी शामिल हैं। [सार्वजनिक जानकारी]
  • इतिहास के संदर्भ: भारत में पहले से पूर्वी क्षेत्रीय न्यायालय-सम्हालों के अंतर्गत 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में कलकत्ता, मद्रास और बंबई में उच्च न्यायालय स्थापित थे
  • 1950 में संविधान के लागू होने के साथ वर्तमान सर्वोच्च न्यायालय का अस्तित्व आया और उसी वर्ष उद्घाटन भी हुआ। [ईतिहासिक संदर्भ]

10. 28 जून, 2021 को उच्चतम न्यायालय ने किस मामले में माना कि विकलांग व्यक्तियों को भारत के संविधान, 1950 के अनुच्छेद 16 (4) के तहत पदोन्नति में आरक्षण का अधिकार है? [CGL (T-I) 17 जुलाई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (d) केरल राज्य बनाम लीसम्मा जोसेफ
Solution:
  • 28 जून, 2021 को उच्चतम न्यायालय ने केरल राज्य बनाम लीसम्मा जोसेफ (State of Kerala v. Lessamma Joseph) मामले में यह निर्णय दिया कि विकलांग व्यक्तियों को अनुच्छेद 16(4) के तहत पदोन्नति में आरक्षण का अधिकार है।
  • न्यायालय ने आदेश दिया कि विकलांग व्यक्ति (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 के तहत आरक्षित पदों पर पदोन्नति में आरक्षण लागू होना चाहिए।
  •  इसके अलावा, यह माना गया कि संविधान का अनुच्छेद 16(4), राज्य को नागरिकों के किसी भी पिछड़े वर्ग के पक्ष में पदोन्नति के मामलों में आरक्षण के प्रावधान करने का अधिकार देता है
  • इसके दायरे में विकलांग व्यक्तियों को भी शामिल किया गया है, भले ही उनकी प्रकृति कुछ भी हो। प्रतिष्ठान, चाहे वे सार्वजनिक क्षेत्र के हों या निजी क्षेत्र के।
  • "इंद्र साहनी बनाम भारत संघ का मामला लोकप्रिय रूप से "मंडल आयोग मामला" के रूप में जाना जाता है।
  • यह भारत के सर्वोच्च न्यायालय का एक ऐतिहासिक निर्णय है जो सार्वजनिक रोजगार में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षण के कार्यान्वयन से संबंधित है।
  • मंडल आयोग, जिसे आधिकारिक तौर पर द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग के रूप में जाना जाता है, ने सरकारी नौकरियों में ओबीसी के लिए 27% आरक्षण की सिफारिश की थी। इस मामले में इन आरक्षणों के कार्यान्वयन को संवैधानिक चुनौती दी गई थी।
    Other Information
  •  विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 (RPDA) :
  •  यह प्रमुख कानून है जो भारत में विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करता है।
  •  यह विकलांग व्यक्ति अधिनियम, 1995 को प्रतिस्थापित और मजबूत करता है।
  • विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन का अनुपालन करता है, जिसका भारत एक हस्ताक्षरकर्ता है।
  • अधिनियम मान्यता प्राप्त विकलांगताओं की सूची को 7 से 21 तक विस्तारित करता है
  • केंद्र और राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करने के लिए उपाय करने का आदेश देता है कि विकलांग व्यक्ति सभी मानवाधिकारों और मौलिक स्वतंत्रता का पूरी तरह से आनंद लें।
  •  धारा 33 में कहा गया है कि उपयुक्त सरकारें प्रत्येक सरकारी प्रतिष्ठान में बेंचमार्क विकलांगता वाले व्यक्तियों से भरे जाने वाले पदों के प्रत्येक समूह में कैडर की ताकत में कुल रिक्तियों की संख्या के चार प्रतिशत से कम नहीं नियुक्त करेंगी
  • जिनमें से एक खंड (a), (b) और (c) के तहत बेंचमार्क विकलांग व्यक्तियों के लिए प्रत्येक प्रतिशत आरक्षित किया जाएगा और खंड (d) और (e) के तहत बेंचमार्क विकलांग व्यक्तियों के लिए एक प्रतिशत आरक्षित किया जाएगा, अर्थात् :-
  • अंधापन और निम्न दृष्टि:
  • बहरा और सुनने में कठिन;
  • सेरेब्रल पाल्सी ठीक हुए कुष्ठ रोग, बौनापन, एसिड अटैक पीड़ित और मस्कुलर डिस्ट्रॉफी सहित लोकोमोटर विकलांगता:
  • ओटिज़्म, बौद्धिक विकलांगता, विशिष्ट सीखने की विकलांगता और मानसिक बीमारी;
  • खंड (a) से (d) के तहत बहरा-अंधत्व सहित व्यक्तियों में से कई विकलांगताएं।
  • भारत के संविधान का अनुच्छेद 16 आम तौर पर सार्वजनिक रोजगार के मामलों में अवसर की समानता प्रदान करता है।
  • हालाँकि, खंड 16(4) राज्य को नागरिकों के किसी भी पिछड़े वर्ग के पक्ष में नियुक्तियों या पर्दों में आरक्षण के प्रावधान करने का अधिकार देता है यदि उसे लगता है कि राज्य के तहत सेवाओं में उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।
  •  28 जून 2021 को पारित ''केरल राज्य बनाम लीसम्मा जोसेफ" मामले में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि विकलांग व्यक्तियों को संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत पदोन्नति में आरक्षण का अधिकार है।
  • यह सार्वजनिक रोजगार में विकलांग व्यक्तियों के लिए समान अवसरों के सिद्धांत को मजबूत करने वाला एक महत्वपूर्ण निर्णय था।