सांस्कृतिक गतिविधियां (परम्परागत सामान्य ज्ञान) भाग-IV

Total Questions: 50

21. ....... पंजाब राज्य के संगीत का वोकल रूप है। [CGL (T-I) 13 अप्रैल, 2022 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) टप्पा
Solution:
  • टप्पा पंजाब राज्य के संगीत का वोकल रूप है।
  • उत्पत्ति और इतिहास
    • टप्पा की शुरुआत 17वीं शताब्दी के पहले भाग में पंजाब-सिंध क्षेत्र के ऊंट चलाने वाले लोक गीतों से मानी जाती है
    • जिसे मूल रूप से कब्बाली गायकों ने विकसित किया। पंजाबी भाषा में इसके बोल होते हैं
    • यह पुरुष गायकों द्वारा गाया जाता था, जबकि महिलाएं इसे शादी के गीत के रूप में गाती थीं।
    • औरंगजेब के काल (1668-1707) में यह खयाल की फिक्राबंदी का साहित्यिक रूप बन गया, जिसमें हल्के रागों को पंजाबी लोक शैली के साथ मिलाया गया।
  • प्रदर्शन शैली
    • टप्पा चार प्रमुख शैलियों में गाया जाता है: खद्दादर (सीधा और मजबूत), फंदादर (झटकेदार), गुथावदार (गूढ़ और बंधा हुआ), तथा लैदर (लहरदार और कोमल)।
    • यह खयाल या ध्रुपद से अलग तैयारी मांगता था, इसलिए अलग घरणे थे, लेकिन अब गायक सभी रूपों को सीखते हैं।
    • आमतौर पर खमाज, भैरवी और सिंधु जैसे रागों में गाया जाता है, जो इसे शहरी श्रोताओं के लिए मनोरंजक बनाते हैं।​
  • महत्व और विशेषताएं
    • पंजाब में टप्पा सबसे कठिन शास्त्रीय रूपों में से एक है, जो पश्तो लोक साहित्य का प्राचीनतम रूप है।
    • यह लोक संगीत से शास्त्रीय संगीत की ओर संक्रमण का प्रतीक है और उत्तर भारत में 18वीं शताब्दी से लोकप्रिय हुआ।
    • पटियाला घराने जैसे शास्त्रीय घरानों ने इसे समृद्ध किया
    • हालांकि पंजाबी संगीत मुख्यतः भांगड़ा, सूफी और लोक शैलियों से जाना जाता है। आज यह आधुनिक गीतों में भी प्रभाव डालता है।

22. मल्लिका साराभाई को कला प्रदर्शन में उनके योगदान के लिए पद्म भूषण (2010) से सम्मानित किया गया था। वह किस नृत्य शैली के लिए जानी जाती थीं। [MTS (T-I) 20 जून, 2023 (II-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 14 नवंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) कुचिपुड़ी और भरतनाट्यम
Solution:
  • मल्लिका साराभाई एक भारतीय कुचिपुड़ी और भरतनाट्यम नृत्यांगना हैं।
  • कला क्षेत्र में प्रदर्शन में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्म भूषण (2010) से सम्मानित किया गया था।
  • नृत्य शैलियों का विवरण
    • मल्लिका साराभाई मुख्यतः कुचिपुड़ी के लिए विख्यात हैं, जो आंध्र प्रदेश का एक प्रमुख शास्त्रीय नृत्य रूप है।
    • यह शैली अपने गतिशील आंदोलनों, अभिव्यंजक हस्त मुद्राओं (मुद्राओं) और नाटकीय कथा-प्रसंगों के लिए प्रसिद्ध है
    • जो अक्सर हिंदू पौराणिक कथाओं जैसे रामायण या महाभारत के दृश्यों को जीवंत करती है।
    • कुचिपुड़ी में नर्तक तेज फुटवर्क, घुमावदार मुद्राएं और तेलुगु संगीत की संगत पर नृत्य करते हैं, जो इसे भरतनाट्यम से अधिक नाटकीय बनाता है।
    • वह भरतनाट्यम में भी निपुण हैं, जो तमिलनाडु की प्राचीनतम शास्त्रीय नृत्य शैली है।
    • भरतनाट्यम में जटिल फुटवर्क (नट्टुवंगम), सुंदर हस्त मुद्राएं, नेत्र अभिनय (नट्टाराध्यम) और भावपूर्ण अभिनय का समावेश होता है
    • जो भक्ति रस से ओतप्रोत होता है। मल्लिका ने दोनों शैलियों को मिलाकर आधुनिक सामाजिक मुद्दों जैसे पर्यावरण, महिला सशक्तिकरण और राजनीतिक व्यंग्य पर प्रदर्शन तैयार किए
    • जो पारंपरिक नृत्य को समकालीन बनाते हैं।
  • पद्म भूषण और कला योगदान
    • उन्हें 2010 में प्रदर्शन कला में योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार उनके दशकों लंबे करियर को मान्यता देता है
    • जिसमें अहमदाबाद के दर्पण अकादमी (जिसकी वह निर्देशक हैं) के माध्यम से नृत्य शिक्षा और सामाजिक जागरूकता का प्रसार शामिल है।
    • उन्होंने पीटर ब्रुक के महाभारत में द्रौपदी की भूमिका निभाई और फ्रांसीसी 'पामे डी'ओर' जैसे अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त किए।
  • पारिवारिक पृष्ठभूमि और विरासत
    • मल्लिका विक्रम साराभाई (भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक) और मृणालिनी साराभाई (प्रसिद्ध भरतनाट्यम नर्तकी) की पुत्री हैं।
    • दर्पण अकादमी की स्थापना उनकी मां ने की थी, जहां मल्लिका ने नृत्य को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया।
    • उन्होंने यूनेस्को के साथ विश्व सांस्कृतिक विरासत पर काम किया और विश्व आर्थिक मंच में भाग लिया।
    • उनके प्रदर्शन जैसे "शक्ति: द पावर ऑफ वुमन" महिला अधिकारों पर केंद्रित हैं।
  • अन्य उपलब्धियां
    • सामाजिक कार्य: नृत्य के जरिए भ्रष्टाचार, पर्यावरण संरक्षण और लिंग असमानता जैसे मुद्दों पर व्यंग्यात्मक प्रस्तुतियां।
    • फिल्म और थिएटर: कई नाटकों और फिल्मों में अभिनय, जिसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना।
    • शिक्षा और नेतृत्व: केरल कलामंडलम की कुलाधिपति रहीं, जहां उन्होंने प्रदर्शन कला को नई दिशा दी।

23. केरल राज्य में प्रचलित प्राचीन मार्शल आर्ट को दर्शाने वाले अलंकारी रंगीन श्रृंगार और अनोखे मुखौटों के कारण किस भारतीय शास्त्रीय नृत्य को अलग पहचान मिली ? [MTS (T-I) 19 जून, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) कथकली
Solution:
  • केरल राज्य में प्रचलित प्राचीन मार्शल आर्ट को दर्शाने वाले अलंकारी रंगीन श्रृंगार और अनोखे मुखौटों के कारण 'कथकली' शास्त्रीय नृत्य को अलग पहचान मिली।
  • कथकली शास्त्रीय नृत्य संगीत और अभिनय का मिश्रण है और इसमें अधिकतर भारतीय महाकाव्यों से ली गई कथाओं का नाटकीकरण किया जाता है।
  • उत्पत्ति और इतिहास
    • कथकली की जड़ें 17वीं शताब्दी के केरल में हैं, जहाँ इसे काला (नाटक) और अणि (खेल) से विकसित किया गया।
    • यह कलरिपयट्टू नामक केरल के प्राचीन मार्शल आर्ट से प्रेरित है
    • जिसमें शक्तिशाली मुद्राएँ, नेत्र अभिनय और शारीरिक लचीलापन दिखता है।
    • नर्तक वर्षों की कठोर ट्रेनिंग से इन मार्शल तत्वों को आत्मसात करते हैं, जो प्रदर्शन में युद्ध दृश्यों को नाटकीय बनाते हैं।​
  • विशेष श्रृंगार और वेशभूषा
    • कथकली की सबसे बड़ी खासियत इसका भव्य रंगीन श्रृंगार है, जो पात्रों की प्रकृति को तुरंत पहचान दिलाता है।
    • चेहरे पर चावल का पेस्ट, लाल चंदन और प्राकृतिक रंगों से बने अलंकार लगाए जाते हैं
    • जबकि आँखें काले काजल से घेरकर नाटकीय बनाई जाती हैं।
    • वेषभूषा में विशाल कीर्तिम (सिर का आभूषण), कंचुका (भारी जैकेट) और मोटी कमर-पट्टी शामिल होती है
    • जो नर्तक को देवता या राक्षस जैसा रूप देती है।
  • मुखौटे के प्रकार
    • कथकली में पाँच मुख्य वेषम (मुखौटे/श्रृंगार प्रकार) होते हैं, प्रत्येक का अपना रंग और चरित्र:
    • पच्चा (हरा): शालीन नायक जैसे राम या अर्जुन के लिए, चेहरा हरा रंगा होता है।​
    • कत्ती (चाकू): खलनायकों जैसे कंस या रावण के लिए, आँखों के किनारे लाल चाकू जैसी आकृति।​
    • ताड़ी (दाढ़ी): सफेद (हनुमान), लाल (दुष्ट राक्षस) या काली (शिकारी) दाढ़ी वाले अतिमानवीय पात्र।​
    • करि (काला): काले रंग का चेहरा, जंगल या राक्षसी चरित्रों के लिए।
    • मिनुक्कु: चमकीला, महिलाओं या देवताओं के लिए कोमल श्रृंगार।​
    • ये अनोखे मुखौटे और श्रृंगार मार्शल आर्ट की शक्ति को चित्रित करते हैं, जैसे युद्ध मुद्राएँ और नेत्र-भ्रुकुति से भाव व्यक्त करना।​
  • प्रदर्शन शैली
    • प्रदर्शन रात भर चलता है, मृदंगम, चेंडा जैसे वाद्यों और मधुर गायन पर।
    • नर्तक बोलते नहीं, केवल मुद्राओं (हस्त मुद्राएँ), नेत्र अभिनय (नट्टुककिथल) और पैरों की थाप से कहानी कहते हैं।
    • मार्शल प्रभाव पैरों के उछाल, घुमाव और तलवार-ढाल जैसे हावभावों से झलकता है, जो कलरिपयट्टू से लिया गया है।
  • सांस्कृतिक महत्व
    • कथकली केरल की सांस्कृतिक पहचान है, जो UNESCO द्वारा अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर घोषित है।
    • यह नृत्य, संगीत, नाटक और मार्शल आर्ट का संगम है, जो दर्शकों को आध्यात्मिक अनुभव देता है।
    • आज भी कोठुवाली कलरिय जैसे गुरुकुलों में प्रशिक्षण होता है, जहाँ बाल नर्तक सुबह 4 बजे उठकर अभ्यास करते हैं।

24. निम्नलिखित में से किस भारतीय नृत्य शैली का संबंध ओडिशा से है? [MTS (T-I) 19 जून, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (b) छउ
Solution:
  • 'छउ' भारतीय नृत्य शैली का संबंध ओडिशा, पश्चिम बंगाल तथा झारखंड से है। ओडिशा राज्य में मनाए जाने वाले छउ नृत्य को 'मयूरभंज छउ' कहते हैं।
  • ओडिसी की उत्पत्ति
    • ओडिसी नृत्य की जड़ें ओडिशा के प्राचीन मंदिरों, विशेष रूप से पुरी के जगन्नाथ मंदिर में हैं
    • जहां इसे महारी (मंदिर नर्तकियां) द्वारा भगवान जगन्नाथ को समर्पित किया जाता था।
    • इसकी शुरुआत 200 ईसा पूर्व तक मानी जाती है, और कोणार्क सूर्य मंदिर तथा लिंगराज मंदिर की मूर्तियां इसकी मुद्राओं को दर्शाती हैं।
    • 20वीं शताब्दी में गुरु केलुचरण महापात्र और संजुक्ता पाणिग्रही जैसे कलाकारों ने इसे पुनर्जीवित कर वैश्विक पहचान दिलाई।​​
  • प्रमुख विशेषताएं
    • ओडिसी की पहचान त्रिभंगी मुद्रा (शरीर के तीन भागों—गर्दन, धड़ और कमर—में वक्र) से है
    • जो मूर्तिकला जैसी कोमलता प्रदान करती है। इसमें नृत्य (शुद्ध नृत्य), नृत्य (अभिनय) और आभिनय (भाव अभिव्यक्ति) का संतुलन है
    • जो जयदेव के गीता गोविंद से प्रेरित राधा-कृष्ण भक्ति पर आधारित होता है।
    • वाद्य यंत्र जैसे मृदंग, मंजीरा, बांसुरी और सहनाई इसके लयबद्ध प्रदर्शन को समृद्ध बनाते हैं।​​
  • वेशभूषा और आभूषण
    • महिला नर्तकियां चमकीली रेशमी साड़ियां (लाल, नारंगी, बैंगनी रंगों में) पहनती हैं
    • जिनमें चंदन की सीमा और चांदी के आभूषण जैसे मांग टीका, बड़ी मंदिर-शिखर जैसी सिर सज्जा (ताहिया), कंठहार और कमरबंद प्रमुख हैं।
    • पुरुष नर्तक धोती या पायजामा पहनते हैं, नंगे धड़ के साथ चांदी के आभूषणों से सजते हैं।
    • मेकअप में आंखों को काजल से उभारकर भाव स्पष्ट किए जाते हैं।​
  • प्रदर्शन शैली
    • प्रदर्शन मंगल ध्रुव, बटुहारी, पल्लवी जैसे भागों में विभाजित होता है, जिसमें पैरों की ताल (थारी)**, नेत्र धुनि (आंखों की लय) और हस्त मुद्राएं शामिल हैं।
    • यह लहरदार गतियों, तेज घुमावों और स्थिर आसनों (जैसे चौका और अभंग) से भरपूर है।
    • समूह प्रदर्शन भी लोकप्रिय हैं, जैसे भुवनेश्वर में गिनीज रिकॉर्ड वाले मेगा इवेंट।​
  • अन्य ओडिशा नृत्य
    • ओडिशा के लोक नृत्य जैसे छऊ (युद्ध-प्रेरित, मयूरभंज शैली), गोटिपुआ (बालक लड़कियों के वेश में), डालखाई (महिलाओं का त्योहार नृत्य) और घूमरा (आदिवासी) भी प्रसिद्ध हैं
    • लेकिन ये शास्त्रीय नहीं। ओडिसी ही एकमात्र शास्त्रीय शैली है जो ओडिशा से जुड़ी है।
  • सांस्कृतिक महत्व
    • ओडिसी ओडिशा की वैष्णव भक्ति, मंदिर परंपरा और स्थापत्य कला का जीवंत प्रतीक है
    • जो आज अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ओडिशा की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है।
    • यह नृत्य न केवल मनोरंजन, बल्कि आध्यात्मिक अभिव्यक्ति का माध्यम है।​​

25. एक संक्रामक बीमारी से उबरने के बाद, खास तौर पर चेचक से उबरने पर, स्थानीय देवता को धन्यवाद देने के लिए आमतौर पर ब्रिता (Brita) नृत्य किया जाता है। यह ....... राज्य के सबसे प्रसिद्ध नृत्यों में से एक है। [MTS (T-I) 16 जून, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (c) पश्चिम बंगाल
Solution:
  • ब्रिता (Brita) नृत्य पश्चिम बंगाल का एक पारंपरिक नृत्य है, जो संक्रामक रोग, आमतौर पर चेचक से उबरने के बाद स्थानीय देवता को धन्यवाद देने के लिए किया जाता है।
  • यह नृत्य पारंपरिक बंगाली संगीत के साथ होता है।
  • उत्पत्ति और महत्व
    •  बीमारी से ठीक होने या संतान प्राप्ति की कामना पूरी होने पर देवता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है।
    • यह न केवल चेचक या चिकनपॉक्स जैसी संक्रामक बीमारियों से रिकवरी का प्रतीक है
    • बल्कि शुद्धि और नवीकरण का भी।
    • नृत्य के माध्यम से महिलाएं अपनी भक्ति और आभार प्रकट करती हैं, जो बंगाली संस्कृति की गहरी धार्मिक परंपराओं को दर्शाता है।
  • प्रदर्शन की विधि
    • इस नृत्य में महिलाएं जल से भरे घड़ों के चारों ओर एक घेरे में खड़ी होकर नृत्य करती हैं। वे एक-दूसरे पर पानी छिड़कती हैं, जो शुद्धिकरण का प्रतीक है।​
    • पारंपरिक बंगाली संगीत और लोक धुनों के साथ यह नृत्य किया जाता है
    • जिसमें घुमावदार चालें, हथियारों की लयबद्ध गतियां और सामूहिक उत्साह प्रमुख होते हैं। नृत्य शुरू करने से पहले और कामना पूरी होने के बाद दोनों समय मंदिर में ही होता है।
  • सांस्कृतिक संदर्भ
    • पश्चिम बंगाल के लोक नृत्यों में ब्रिता सबसे प्रसिद्ध है, जो ग्रामीण महिलाओं की आस्था और सामुदायिक एकता को मजबूत करता है।
    • यह आज भी गांवों में जीवंत है, हालांकि आधुनिकता के कारण इसका प्रसार सीमित हो रहा है।
    • यह नृत्य अन्य बंगाली लोक कलाओं जैसे गंभिरा या अलकाप से भिन्न है, क्योंकि यह विशुद्ध रूप से धार्मिक कृतज्ञता पर केंद्रित है।
    • स्थानीय देवताओं जैसे मां काली या ग्राम देवता को समर्पित यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है।​
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
    • चेचक जैसी महामारियों के प्रकोप काल में यह नृत्य विशेष महत्व रखता था
    • जब चिकित्सा सुविधाओं की कमी होती थी। रिकवरी को चमत्कार मानकर देवता को धन्यवाद देना प्रथा का हिस्सा था।
    • आजादी के बाद भी यह ग्रामीण बंगाल में लोकप्रिय रहा, और इसे सांस्कृतिक उत्सवों में संरक्षित किया जाता है। यह बंगाल की लोक कला को जीवित रखने का माध्यम है।

26. कथकली नृत्य शैली की उत्पत्ति निम्नलिखित में से किस राज्य में हुई है? [MTS (T-I) 15 जून, 2023 (III-पाली), MTS (T-I) 10 मई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) केरल
Solution:
  • कथकली नृत्य, संगीत और अभिनय का मिश्रण है, जिसकी उत्पत्ति केरल राज्य में हुई थी।
  • उत्पत्ति और इतिहास
    • कथकली का विकास 17वीं शताब्दी में हुआ, जब कोट्टारक्करा तंपुरान (एक राजा) ने रामनाट्टम नामक नाट्य रूप का आविष्कार किया
    • जो बाद में कथकली के रूप में परिपक्व हुआ।
    • यह कूटियाट्टम, कृष्णनाट्टम और कलरिप्पयट्टु जैसी पारंपरिक कलाओं से प्रभावित है। केरल कलामंडलम जैसे संस्थान इसके प्रशिक्षण के प्रमुख केंद्र रहे हैं।
  • विशेषताएँ
    • कथकली 'कथा' (कहानी) और 'कली' (खेल या प्रदर्शन) से बना शब्द है
    • जिसमें नर्तक संवाद नहीं बोलते बल्कि हस्तमुद्राओं, नेत्र अभिनय, मुख्य भावों और नृत्य से रामायण-महाभारत की कथाएँ चित्रित करते हैं।
    • इसमें 24 मुख्य मुद्राएँ और नौ रसों का प्रयोग होता है, साथ ही चेन्दा और मडलम जैसे वाद्ययंत्रों का संगीत।
    • कलाकार रंगीन वेशभूषा, चुट्टी (चेहरे पर सफेद रेखाएँ) और विशाल मुकुट धारण करते हैं।​
  • वेशभूषा और श्रृंगार
    • नर्तकों का मेकअप चरित्र-आधारित होता है—हरे रंग से शांत देवता, लाल से उग्र राक्षस, सफेद से महिलाएँ।
    • वस्त्रों में घाघरा जैसी घंटी स्कर्ट, आभूषण और फूलों से सजे मुकुट प्रमुख हैं। श्रृंगार में 8-10 घंटे लगते हैं, और प्रशिक्षण 10-15 वर्ष का होता है।
    • यह चित्र कथकली कलाकार FACT जयदेव वर्मा को हनुमान के रूप में दर्शाता है, जिसमें पारंपरिक सफेद-लाल मेकअप और मुकुट दिखाई दे रहे हैं।

27. कुचिपुड़ी नृत्य किस प्रकार के संगीत के साथ किया जाता है? [MTS (T-I) 14 जून, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (d) कर्नाटक
Solution:
  • कुचिपुड़ी शास्त्रीय नृत्य के साथ कर्नाटक संगीत का प्रयोग किया जाता है। कुचिपुड़ी नृत्य भारत के आंध्र प्रदेश का एक शास्त्रीय नृत्य है।
  • कुचिपुड़ी नृत्य का संगीत
    • यह संगीत रागों (मार्गी और देशी दोनों) और सात प्रमुख तालों (जैसे आदि ताल, रूपक ताल) पर आधारित होता है
    • जो नृत्य की लयबद्धता, भक्ति भाव और अभिनय को समर्थन देता है।
    • गायन मुख्यतः तेलुगु भाषा में होता है, जिसमें भागवत पुराण या कृष्ण लीला जैसी कथाओं पर आधारित पद्य रचनाएँ शामिल होती हैं।
  • कर्नाटक संगीत की संरचना

    • कर्नाटक संगीत में राग (मेलakarta राग प्रणाली के 72 मूल राग) स्वरों की सुक्ष्म विविधताओं पर केंद्रित होते हैं
    • जबकि ताल नृत्य के जटिल फुटवर्क जैसे तिरदा या तारंगम को निर्देशित करते हैं।
    • एकल नृत्य प्रस्तुतियों में जातिस्वरम, वर्णम, तिल्लाना जैसी रचनाएँ प्रमुख होती हैं
    • जहाँ संगीत नृत्यम् (अभिनयपूर्ण नृत्य) और नृत् (शुद्ध नृत्य) दोनों को जोड़ता है।
    • नृत्य-नाटक शैली में, संगीत पूर्ण नाटकीय संवाद प्रदान करता है, जिसमें नर्तक स्वयं कभी-कभी गाते या बोलते हैं।
  • संगत वाद्ययंत्र

    • कुचिपुड़ी के संगीत में मृदंगम (दोहरी ड्रम, ताल के लिए मुख्य), वीणा या वायलिन (मुख्य स्वर वाद्य), बांसुरी (सूक्ष्म भाव व्यक्त करने हेतु), और तालम (झांझ या कर्टल्स) का उपयोग होता है।
    • गायक के अलावा एक पूरा संगीत दल होता है, जो नृत्य की चपल गति और वर्तुलाकार भंगिमाओं को लयबद्ध बनाता है।
    • यह संयोजन भरतनाट्यम से मिलता-जुलता है, लेकिन कुचिपुड़ी में अधिक लयात्मक ऊर्जा और कृष्ण-भक्ति का प्रभाव दिखता है।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विकास
    • कुचिपुड़ी की उत्पत्ति 17वीं शताब्दी में आंध्र प्रदेश के कुचिपुड़ी गाँव से हुई, जहाँ सिद्धेंद्र योगी ने भामा कलापम जैसी रचनाएँ रचीं।
    • परंपरागत रूप से पुरुष ब्राह्मण नर्तक इसे प्रस्तुत करते थे, लेकिन 20वीं शताब्दी में महिलाओं ने इसे एकल शैली के रूप में लोकप्रिय बनाया।
    • कर्नाटक संगीत का चयन दक्षिण भारतीय परंपरा से प्रेरित है, जो सामवेद की जड़ों से जुड़ा है और नृत्य को आध्यात्मिक गहराई प्रदान करता है।
    • यह चित्र मलाबिका सेन द्वारा कुचिपुड़ी प्रदर्शन को दर्शाता है, जहाँ हस्त मुद्राएँ और पारंपरिक वेशभूषा कर्नाटक संगीत की लय के साथ तालमेल दिखाती हैं।
  • विशेषताएँ और आधुनिक उपयोग

    • आज कुचिपुड़ी में कर्नाटक संगीत के साथ तारंगम (थाली पर जलते दीये संतुलित करते हुए नृत्य) जैसी अनूठी प्रस्तुतियाँ होती हैं।
    • यह संगीत नृत्य को गतिशील बनाता है—उड़ान जैसे पद-संचारण और भावपूर्ण अभिनय के लिए।
    • कुल मिलाकर, कर्नाटक संगीत कुचिपुड़ी को भारत के आठ शास्त्रीय नृत्यों में अद्वितीय बनाता है, जो भक्ति, लय और नाट्य का संगम है।

28. गुरु वेंपति चिन्ना सत्यम का संबंध निम्नलिखित में से किस नृत्य शैली से है? [MTS (T-I) 14 जून, 2023 (III-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 21 नवंबर, 2023 (III-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 21 नवंबर, 2023 (II-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 29 नवंबर, 2023 (III-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 29 नवंबर, 2023 (I-पाली), CHSL (T-I) 02 जून, 2022 (II-पाली)]

Correct Answer: (b) कुचिपुड़ी
Solution:
  • गुरु वेंपति चिन्ना सत्यम एक नर्तक और कुचिपुड़ी नृत्य शैली के गुरु थे।
  • उन्होंने वर्ष 1963 में मद्रास में कुचिपुड़ी कला अकादमी शुरू की। उन्हें पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया था।
  • प्रारंभिक जीवन और प्रशिक्षण
    • वेंपति चिन्ना सत्यम का जन्म 15 अक्टूबर 1929 को आंध्र प्रदेश के कुचिपुड़ी गाँव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था
    • जो इस नृत्य शैली का उद्गम स्थल है। छह वर्ष की आयु से उन्होंने अपने पिता से नृत्य सीखना शुरू किया
    • बाद में वेदांतम लक्ष्मी नारायण शास्त्री, तदपेल्ली पेरैय्या शास्त्री तथा अपने बड़े भाई वेंपति पेद्दा सत्यम से दो दशकों तक कठोर प्रशिक्षण लिया।
    • इस प्रशिक्षण ने उन्हें कुचिपुड़ी को नाट्य शास्त्र के मानकों के अनुरूप परिष्कृत करने में सक्षम बनाया, जिसमें पैरों की विशिष्ट गतियाँ 'चरी' का समावेश प्रमुख था।
  • कुचिपुड़ी में योगदान
    • 1963 में उन्होंने मद्रास (अब चेन्नई) में 'कुचिपुड़ी कला अकादमी' (बाद में कुचिपुड़ी डांस सेंटर) की स्थापना की
    • जो इस नृत्य को बढ़ावा देने और सिखाने का प्रमुख केंद्र बनी। सत्यम ने कुचिपुड़ी को ग्रामीण लोक शैली से शास्त्रीय रूप प्रदान किया
    • जिसमें जटिल फुटवर्क, अभिनयपूर्ण हस्तमुद्राएँ, गायन और नाटकीय कथानक शामिल हैं
    • ये विशेषताएँ इसे भरतनाट्यम, कथक या मणिपुरी जैसी अन्य शैलियों से अलग करती हैं।
    • 1985 में उन्होंने विशाखापट्टनम में 'कुचिपुड़ी कलाक्षेत्र' भी स्थापित किया तथा हजारों शिष्यों को प्रशिक्षित कर इस कला को वैश्विक मंच पर पहुँचाया।
  • पुरस्कार और विरासत
    • उन्हें 1998 में पद्म भूषण, संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप (1967), तमिलनाडु का कलैमामणि तथा मध्य प्रदेश का कालिदास पुरस्कार जैसे सम्मान मिले।
    • 29 जुलाई 2012 को चेन्नई में उनका निधन हो गया, किंतु उनकी अकादमी भक्ति-प्रधान विषयों, गतिशील एकल प्रदर्शनों और कुचिपुड़ी की मौलिकता को जीवित रख रही है।
    • कथक (उत्तर भारतीय, मुगल प्रभावित), मणिपुरी (मणिपुर की कोमल वैष्णव शैली) या भरतनाट्यम (तमिलनाडु की भावपूर्ण शैली) से भिन्न, सत्यम का कार्य कुचिपुड़ी को आंध्र की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में स्थापित करता है।

29. नाहिद सिद्दीकी को अक्टूबर, 2017 में मिलापफेस्ट के लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड (Milapfest's Lifetime Achievement Award) से सम्मानित किया गया। वह किस नृत्य शैली के लिए जानी जाती हैं? [MTS (T-I) 14 जून, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) कथक
Solution:
  • नाहिद सिद्दीकी एक प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना हैं। वह दो महान गुरुओं महाराज कथक (पाकिस्तान) और बिरजू महाराज (भारत) की शिष्या रही हैं।
  • नाहिद सिद्दीकी को कथक नृत्य शैली में उनके योगदान के लिए अक्टूबर, 2017 में मिलापफेस्ट के लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
  • कथक में उनकी विशेषज्ञता
    • उनकी शैली में सूफियाना कथानक और परंपरागत तकनीकों का मिश्रण है, जो कथक को वैश्विक रूप देता है।​
    • भारत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कथक के प्रचार-प्रसार में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।​
  • कथक नृत्य का परिचय
    • कथक उत्तर भारत का शास्त्रीय नृत्य रूप है, जो आठ प्रमुख शास्त्रीय नृत्यों में से एक है।​
    • यह जटिल पैरकर्म (तात्कार), घुमावदार चालें (चक्कर), अभिनयपूर्ण हस्त मुद्राएँ (अभिनय) और घुंघरू की ध्वनि पर आधारित होता है।​
    • मुगल प्रभाव से हिंदू-फ़ारसी तत्वों का समावेश इसमें हुआ, जो इसे कथावाचक परंपरा से जोड़ता है।​
  • प्रमुख घराने और शैली
    • कथक के तीन मुख्य घराने हैं: लखनऊ, जयपुर और बनारस। प्रत्येक की अपनी तकनीकें और रचनाएँ हैं।​
    • नाहिद सिद्दीकी ने इन परंपराओं को नवीन कोरियोग्राफी से समृद्ध किया, जिसमें समकालीन तत्व जोड़े।​​
    • उनकी प्रस्तुतियाँ प्रमुख उत्सवों, टेलीविजन और विश्व स्तर पर सराही गई हैं।​
  • उपलब्धियाँ और सम्मान
    • नाहिद सिद्दीकी ने लंदन में भारतीय विद्या भवन में कथक कक्षाएँ शुरू कीं और सरे विश्वविद्यालय में इसे पाठ्यक्रम में शामिल कराया।​
    • पाकिस्तान का सर्वोच्च कला सम्मान 'प्राइड ऑफ परफॉर्मेंस' सहित कई पुरस्कार प्राप्त हैं।​
    • वह लाहौर में नाहिद सिद्दीकी फाउंडेशन चलाती हैं, जो नृत्य, नाटक, संगीत और योग सिखाती है।​
  • वेशभूषा और प्रदर्शन
    • महिला नर्तकियाँ अनारकली सूट, लहंगा या दुपट्टा पहनती हैं, जबकि पुरुष कुर्ता-पायजामा।​
    • घुंघरू और आभूषण प्रदर्शन को दृश्य-श्रव्य रूप देते हैं।​
    • उनके कार्यों ने कथक को ब्रिटेन, पाकिस्तान और विश्व में लोकप्रिय बनाया।​​

30. निम्नलिखित में से कौन कथक से संबंधित है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 20 नवंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (c) नाहिद सिद्दीकी
Solution:
  • नाहिद सिद्दीकी एक प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना हैं। वह दो महान गुरुओं महाराज कथक (पाकिस्तान) और बिरजू महाराज (भारत) की शिष्या रही हैं।
  • नाहिद सिद्दीकी को कथक नृत्य शैली में उनके योगदान के लिए अक्टूबर, 2017 में मिलापफेस्ट के लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
  • कथक का परिचय
    • कथक का नाम संस्कृत शब्द "कथा" से लिया गया है, जिसका अर्थ है कहानी सुनाना।
    • प्राचीन कथाकार (कहानीकार) भक्तिपूर्ण कथाओं, रामायण-महाभारत की घटनाओं और कृष्ण लीला को नृत्य, संगीत व अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत करते थे।
    • यह नृत्य उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली आदि क्षेत्रों से जुड़ा है और भक्ति आंदोलन (लगभग 400 ई.पू.) से विकसित हुआ।
  • उत्पत्ति और इतिहास
    • कथक की जड़ें वैदिक काल के कथाकारों में हैं, जो मंदिरों व धार्मिक अनुष्ठानों में कहानियां सुनाते थे।
    • मुगल काल में यह दरबारी नृत्य बना, जहां फारसी प्रभाव से चक्करदार चालें, तबला-पखावज का प्रयोग और घुंघरू बंधे पैरों की तालबद्ध थापें जुड़ीं।
    • जयपुर घराने को इसका श्रेय दिया जाता है, जहां पंडित बिन्दादीन, हरिप्रसाद जैसे महाराजों ने इसे शास्त्रीय रूप दिया।
    • अन्य घराने जैसे लखनऊ, बनारस और जयपुर ने अपनी-अपनी शैलियां विकसित कीं।
  • विशेषताएं
    • नृत्य शैली: नृत्य (नृत्य), भाव (अभिनय) और ताल (तालका) का संतुलन।
    • तेज घुमाव (चक्कर), पैरों की जटिल थापें (तत्कार), मुद्राएं (हस्त मुद्राएं) प्रमुख हैं।
    • वाद्य यंत्र: तबला, पखावज, सरंगी, वायलिन, बांसुरी; मुख्यतः हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत।
    • वेशभूषा: पुरुष-कुर्ता-पाजामा, चूड़ीदार, अंगरखा; महिला-घाघरा, चोली, ओढ़नी, भारी आभूषण और कमर पर 150+ घुंघरू।
    • घराने: जयपुर (तकनीकी प्रधान), लखनऊ (भाव प्रधान), बनारस (मिश्रित)।
  • प्रसिद्ध कलाकार
    • नाहिद सिद्दीकी कथक से सीधे जुड़ी हैं—वे महाराज कथक (पाकिस्तान) और बिरजू महाराज (भारत) की शिष्या रही हैं
    • प्रसिद्ध कथक नर्तकी हैं। अन्य प्रमुख: बिरजू महाराज, शोवना नारायण, मालविका, यामिनी कृष्णमूर्ति, चित्रा विश्वेश्वरन। आधुनिक समय में कथक वैश्विक मंचों पर लोकप्रिय है।​
  • विकास और महत्व
    • 19वीं सदी में ब्रिटिश काल में पतन के बाद स्वतंत्र भारत में पुनरुद्धार हुआ। आज यह सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है
    • यूनेस्को द्वारा संरक्षित। कथक लचीलापन, गति और भावुकता के कारण अद्वितीय है, जो कहानी को जीवंत बनाता है।​