सांस्कृतिक गतिविधियां (परम्परागत सामान्य ज्ञान) भाग-IV

Total Questions: 50

41. गुरु निरंजन राउत और गुरु रामहरि दास को ....... नृत्य और संगीत के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए गुरु केलुचरण महापात्र पुरस्कार, 2022 प्रदान किया गया था। [MTS (T-I) 14 सितंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (c) ओडिसी
Solution:
  • गुरु केलुचरण महापात्र पुरस्कार, 2022 क्रमशः गुरु निरंजन राउत और गुरु रामहरि दास को ओडिसी नृत्य और संगीत के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए प्रदान किया गया था।
  • पुरस्कार का विवरण
    • यह पुरस्कार ओडिसी नृत्य के दिग्गज गुरु केलुचरण महापात्र की स्मृति में श्रीजन (गुरु केलुचरण महापात्र ओडिसी नृत्यबास) द्वारा प्रदान किया जाता है
    • जो भुवनेश्वर स्थित एक प्रमुख संस्थान है। पुरस्कार में 1 लाख रुपये नकद, प्रशस्ति पत्र, स्मृति चिन्ह और शॉल शामिल होता है।
  • पुरस्कार वितरण समारोह
    • पुरस्कार का वितरण 28वें ओएमसी गुरु केलुचरण महापात्र पुरस्कार महोत्सव के दौरान 5 से 9 सितंबर 2022 को भुवनेश्वर के रवींद्र मंडप में हुआ।
    • महोत्सव का यह संस्करण कथक के दिग्गज पंडित बिरजू महाराज को समर्पित था, और इसमें युवा प्रतिभा सम्मान भी दिए गए
    • जैसे गीतांजलि आचार्य (ओडिसी नृत्य) और मातृप्रसाद दास (ओडिसी संगीत) को।
    • यह आयोजन कोविड-19 महामारी के दो वर्षों के बाद पूर्ण रूप से भौतिक रूप में आयोजित किया गया।
  • पुरस्कृत व्यक्तियों का योगदान
    • गुरु निरंजन राउत ओडिसी नृत्य के क्षेत्र में अपनी समर्पित साधना और शिक्षण के लिए जाने जाते हैं
    • जिन्होंने इस शास्त्रीय नृत्य रूप की समृद्ध परंपरा को जीवित रखा। गुरु रामहरि दास ओडिसी संगीत के विशेषज्ञ हैं
    • जिनका योगदान नृत्य प्रस्तुतियों को संगीतमय गहराई प्रदान करने में महत्वपूर्ण रहा है।
    • दोनों गुरुओं ने ओडिसी की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने में अग्रणी भूमिका निभाई।
  • ओडिसी नृत्य का संक्षिप्त परिचय
    • ओडिसी भारत के आठ प्रमुख शास्त्रीय नृत्य रूपों में से एक है, जो ओडिशा की मंदिरीय मूर्तियों से प्रेरित है।
    • इसमें तरल मुद्राएं, मूर्तिकला-प्रेरित आसन, जटिल पैरकर्म और हिंदू पौराणिक कथाओं पर आधारित अभिनय प्रमुख हैं।
    • गुरु केलुचरण महापात्र ने इसे आधुनिक मंच के लिए परिष्कृत कर वैश्विक पहचान दिलाई।
  • पुरस्कार की पृष्ठभूमि
    • श्रीजन संस्था 1995 में स्थापित हुई, जिसका उद्देश्य गुरु केलुचरण महापात्र की विरासत को संरक्षित रखना है।
    • यह वार्षिक पुरस्कार नृत्य, संगीत, रंगमंच और सिनेमा के क्षेत्रों में उत्कृष्ट कलाकारों को दिया जाता है
    • जो कलाओं की परंपराओं को मजबूत करते हैं।
    • गुरु केलुचरण स्वयं पद्म श्री (1974), पद्म भूषण (1988) और पद्म विभूषण (2000) जैसे सम्मानों से नवाजे गए थे।​

42. मलयालम कवि वल्लथोल नारायण मेनन (Vallathol Narayana Menon) और नृत्यांगना और गुरु कल्याणीकुट्टी अम्मा (Kalyanikutti Amma) के प्रयासों ने ....... नृत्य शैली को फिर से चलन में लाया और एक नया जीवनदान दिया। [MTS (T-I) 14 सितंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (c) मोहिनीअट्टम
Solution:
  • मलयालम कवि वल्लथोल नारायण मेनन (Vallathol Narayana Menon) और नृत्यांगना और गुरु कल्याणीकुट्टी अम्मा (Kalyanikutti Amma) के प्रयासों ने 'मोहिनीअट्टम' नृत्य शैली को फिर से चलन में लाया और एक नया जीवनदान दिया।
  • पृष्ठभूमि
    • मोहिनीअट्टम केरल का एक कोमल, आकर्षक नृत्य है, जो मोहिनी (विष्णु का अवतार) की कथाओं पर आधारित है।
    • ब्रिटिश काल में नृत्यसभाओं पर प्रतिबंध और सामाजिक परिवर्तनों से यह शैली लगभग विलुप्त हो चुकी थी।
    • वल्लथोल नारायण मेनन (1878-1957), मलयालम के महाकवि, ने केरल की कलाओं के संरक्षण के लिए केरल कलामंडलम की स्थापना 1930 में की
    • जहां कथकली के साथ-साथ मोहिनीअट्टम को भी बढ़ावा दिया।
  • वल्लथोल का योगदान
    • वल्लथोल ने कलामंडलम के माध्यम से पारंपरिक कलाओं को पुनर्जागरण दिया।
    • उन्होंने मोहिनीअट्टम को औपचारिक प्रशिक्षण का केंद्र बनाया, छात्रों को प्रोत्साहित किया और इसे शास्त्रीय मान्यता दिलाने में भूमिका निभाई।
    • उनका दृष्टिकोण राष्ट्रीयता और सांस्कृतिक पुनरुत्थान से प्रेरित था।
  • कल्याणीकुट्टी अम्मा का योगदान
    • कलामंडलम कल्याणीकुट्टी अम्मा (1915-1999), थिरुनावाया की निवासी, को 'मोहिनीअट्टम की माता' कहा जाता है।
    • उन्होंने कलामंडलम में वल्लथोल के मार्गदर्शन में नृत्य सीखा, इसे व्यवस्थित किया
    • सात आइटम वाली प्रस्तुति प्रारूप बनाया, नव रसों का उपयोग जोड़ा, और 80 श्लोकों वाली तकनीक ग्रंथ रची।
    • उन्होंने पूरे भारत में कार्यशालाएं चलाईं, छात्राएं तैयार कीं, और 'कल्याणीकुट्टी अम्मा शैली' विकसित की।
  • पुनरुद्धार प्रक्रिया
    • 1930-40 के दशक में कलामंडलम में इनके संयुक्त प्रयासों से मोहिनीअट्टम को नया स्वरूप मिला
    • कोमल मुद्राएं, लयबद्ध पैरों की थिरकन, नेपथ्य संगीत (मलयालम-साहित्यिक), और रंगीन वेशभूषा पर जोर।
    • चिन्नम्मा अम्मा जैसी अन्य कलाकारों के साथ मिलकर उन्होंने दो भिन्न शैलियां सृजित कीं। 1950 तक यह शैली राष्ट्रीय मंचों पर पहुंची।
  • दीर्घकालिक प्रभाव
    • आज मोहिनीअट्टम आठ मान्यता प्राप्त शास्त्रीय नृत्यों में शामिल है।
    • इन प्रयासों ने केरल की सांस्कृतिक पहचान मजबूत की, और अम्मा के शिष्य जैसे कनक रंजिनी ने इसे वैश्विक बनाया।
    • वल्लथोल की कलामंडलम विरासत आज भी जारी है।

43. रोहिणी भाटे, पंडित मुन्नालाल शुक्ला, कुमुदिनी लाखिया और उमा शर्मा निम्नलिखित में से किस शास्त्रीय नृत्य शैली के प्रसिद्ध व्याख्याता हैं? [MTS (T-I) 13 सितंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (d) कथक
Solution:
  • रोहिणी भाटे, पंडित मुन्नालाल शुक्ला, कुमुदिनी लाखिया और उमा शर्मा भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैली 'कथक' के प्रसिद्ध व्याख्याता हैं।
  • कथक नृत्य का परिचय
    • कथक भारत के आठ प्रमुख शास्त्रीय नृत्यों में से एक है, जो मुख्य रूप से उत्तर भारत से उत्पन्न हुआ।
    • इसकी जड़ें कथावाचकों (कथकारों) की परंपरा में हैं, जो भक्ति काल में राम-कृष्ण की कथाएं गाते-नाचते थे।
    • मुगल काल में यह दरबारी नृत्य बना, जहां हिंदू और इस्लामी प्रभावों से लयबद्ध चालें, घुमाव और तबला संगति विकसित हुई।
  • इन कलाकारों का योगदान
    • रोहिणी भाटे पुणे घराने की प्रमुख नृत्यांगना थीं, जिन्होंने कथक को महाराष्ट्र में लोकप्रिय बनाया।
    • पंडित मुन्नालाल शुक्ला लखनऊ घराने के गुरु थे, जिनकी शिष्यों ने नृत्य की शुद्धता को संरक्षित किया।
    • कुमुदिनी लाखिया ने 1960 के दशक में कथक को समूह नृत्य और समकालीन विषयों की ओर ले जाकर क्रांति लाई; उन्होंने अहमदाबाद में कदम्ब केंद्र स्थापित किया।
    • उमा शर्मा दिल्ली घराने की समर्थ व्याख्याता हैं, जो भावपूर्ण अभिनय और जटिल तालों के लिए जानी जाती हैं।
  • कथक की विशेषताएं
    • नृत्य तत्व: जटिल पदकृतियां (पैरों की थाप), चक्कर (घुमाव), हस्तमुद्राएं और नेत्र अभिनय।​
    • संगीत: हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत, तबला और पखावज के साथ; गत, तोड़ा और परान जैसे भाग।​
    • घराने: लखनऊ (भाव प्रधान), जयपुर (लयकारी प्रधान) और बनारस।​
    • वस्त्राभूषण: घुंघरू, चूड़ियां, अनघरा या चुरidar; पुरुष कुर्ता-पायजामा।​
  • इनका ऐतिहासिक महत्व
    • ये कलाकार स्वतंत्र भारत में कथक को पुनर्जीवित करने वाले स्तंभ हैं।
    • कुमुदिनी लाखिया (1930-2025) को पद्म विभूषण मिला, जिन्होंने पारंपरिक जड़ों को बनाए रखते आधुनिक कोरियोग्राफी जोड़ी।
    • रोहिणी भाटे और उमा शर्मा ने महिला नृत्यांगनाओं को प्रोत्साहित किया, जबकि शुक्ला ने गुरु परंपरा को मजबूत किया।
    • इन्होंने कथक को वैश्विक मंच पर पहुंचाया, जहां यह अब भरतनाट्यम या ओडिसी के साथ खड़ा है।

44. ....... नृत्य की मूल शब्दावली में युद्ध तकनीकों का नाट्य स्वरूप, पक्षियों और जानवरों की शैलीगत चालें और गांव की गृहिणियों के कामकाज पर आधारित गतिविधियां शामिल हैं और ज्यादातर पूर्वी भारत में पुरुष नर्तकों द्वारा प्रस्तुत की जाती हैं। [MTS (T-I) 13 सितंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) छउ
Solution:
  • 'छउ' नृत्य की मूल शब्दावली में युद्ध तकनीकों का नाट्य स्वरूप, पक्षियों और जानवरों की शैलीगत चालें और गांव की गृहिणियों के कामकाज पर आधारित गतिविधियां शामिल हैं
  • ज्यादातर पूर्वी भारत में पुरुष नर्तकों द्वारा प्रस्तुत की जाती हैं।
  • उत्पत्ति और क्षेत्र
    • इसके तीन प्रमुख रूप हैं: पुरुलिया छऊ (पश्चिम बंगाल), सरायकेला छऊ (झारखंड) और मयूरभंज छऊ (ओडिशा)।
    • यह शब्द "छाय" से आया है, जिसका अर्थ छाया या मुखौटे से है, और 16वीं शताब्दी में योद्धा समुदायों द्वारा विकसित हुआ।
  • विशेषताएँ और शब्दावली
    • इसकी मूल शब्दावली में नकली युद्ध तकनीकें (जैसे तलवारबाजी और कुश्ती), पक्षियों (मोर, हंस) व जानवरों (बाघ, हाथी) की शैलीगत चालें, तथा गांव की गृहिणियों के दैनिक काम जैसे पानी भरना, चक्की पीसना या झाड़ू लगाना शामिल हैं।
    • ये तत्व इसे शक्तिशाली और जीवंत बनाते हैं, जो मार्शल आर्ट से प्रेरित है।
    • प्रदर्शन रात में होता है, जिसमें विस्तृत मुखौटे, भारी वेशभूषा और शरीर चित्रकला का उपयोग होता है।
  • प्रदर्शन शैली
    • यह मुख्य रूप से पुरुष नर्तकों द्वारा किया जाता है, जो उन्नत शारीरिक प्रशिक्षण से गुजरते हैं।
    • मुखौटे पहनकर भाव-भंगिमाओं के बजाय शारीरिक गतियों से कहानी कही जाती है, जो इसे नाट्य और लोक नृत्य का मिश्रण बनाता है।
    • संगीत में ढोल, नगाड़ा, शंख और बांसुरी प्रमुख हैं, जो उत्साहपूर्ण लय प्रदान करते हैं।
  • विषय और महत्व
    • विषय रामायण, महाभारत, स्थानीय लोककथाओं और प्रकृति से लिए जाते हैं, जैसे शिव-तांडव या पौराणिक योद्धाओं के युद्ध।
    • यह सामुदायिक उत्सवों, जैसे चैत्र परब या गजान, का हिस्सा है और सामाजिक एकता को बढ़ावा देता है।
    • यूनेस्को ने 2010 में इसे मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर घोषित किया।
  • आधुनिक स्थिति
    • आज छऊ को संरक्षण के लिए संस्थान जैसे मयूरभंज छऊ नृत्य प्रतिष्ठान सक्रिय हैं।
    • यह वैश्विक मंचों पर लोकप्रिय हो रहा है, लेकिन शहरीकरण से पारंपरिक प्रशिक्षण चुनौतीपूर्ण है।
    • सरकारें और एनजीओ इसे प्रोत्साहित कर रही हैं ताकि नई पीढ़ी इसे अपनाए।

45. देबा प्रसाद दास, पंकज चरण दास और गंगाधर प्रधान का संबंध निम्नलिखित में से किस नृत्य शैली से हैं? [MTS (T-I) 13 सितंबर, 2023 (II-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 29 नवंबर, 2023 (II-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 01 दिसंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) ओडिसी
Solution:
  • देबा प्रसाद दास, पंकज चरण दास और गंगाधर प्रधान आदि ओडिसी नृत्य शैली के कलाकार है।
  • इनका योगदान
    • इन कलाकारों ने 1940 के दशक के बाद ओडिसी को मंदिरों की अनुष्ठानिक जड़ों से पुनर्जीवित किया।
    • देबा प्रसाद दास को आधुनिक ओडिसी का संस्थापक गुरु कहा जाता है
    • जिन्होंने मजबूत और अनोखी शैली विकसित की, जबकि पंकज चरण दास भक्ति रस से भरपूर समूह कोरियोग्राफी में निपुण थे।
    • गंगाधर प्रधान ने इसे वैश्विक स्तर पर फैलाया और उड़ीसा नृत्य अकादमी की स्थापना की, जहाँ उन्होंने भावी पीढ़ियों को प्रशिक्षित किया।​​
    • उन्हें पद्मश्री जैसे सम्मान मिले, और उनकी शैली महारी परंपरा पर आधारित थी।
  • ओडिसी नृत्य का परिचय
    • ओडिसी ओडिशा राज्य से उत्पन्न शास्त्रीय नृत्य है, जो तरल मुद्राओं, त्रिभंग (तीन-झुकाव वाली मुद्रा) और चौका (वर्ग मुद्रा) के लिए जाना जाता है।
    • यह हिंदू पौराणिक कथाओं, विशेषकर जगन्नाथ, कृष्ण और राधा की कहानियों पर आधारित है, जिसमें जटिल अभिनय (अभिव्यक्ति) और ओडिसी संगीत का मिश्रण होता है।​
    • मंदिर नर्तकियों (महारियों) द्वारा शुरू किया गया, यह नाट्य शास्त्र से प्रेरित है और घुंघरू से लयबद्ध पैरों की गति पर जोर देता है।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
    • स्वतंत्रता के बाद इन गुरुओं ने ओडिसी को मंच पर लाकर लोकप्रिय बनाया, जो पहले पुरी के जगन्नाथ मंदिर तक सीमित था।
    • यह कथक, भरतनाट्यम या मणिपुरी जैसे अन्य नृत्यों से अलग है, क्योंकि इसमें ओडिशा की लोक और शास्त्रीय परंपराओं का अनूठा संआन होता है।​
    • आज ओडिसी यूनेस्को स्तर पर सराही जाती है और अंतरराष्ट्रीय उत्सवों में प्रदर्शित होती है।​

46. भानु जी का संबंध निम्नलिखित में से किस कथक घराने से है? [MTS (T-I) 13 सितंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) जयपुर
Solution:
  • भानु जी का संबंध जयपुर घराने से है। यह कथक का प्राचीनतम घराना है।
  • जयपुर घराने का इतिहास
    • जयपुर घराना कथक का एक प्रमुख घराना है, जिसकी शुरुआत भानु जी ने की। माना जाता है
    • भानु जी को किसी संत से शिव तांडव नृत्य की शिक्षा प्राप्त हुई, जिसे उन्होंने कथक में समाहित किया।
    • इस घराने का विकास राजस्थान के जयपुर क्षेत्र से जुड़ा है, जहां हिंदू राजाओं के दरबारों में नृत्य परंपरा फली-फूली।
    • भानु जी के पुत्र मालु जी ने इसे आगे बढ़ाया, जिन्होंने अपने पुत्रों लालू जी और कान्हू जी को प्रशिक्षित किया।​
    • कान्हू जी ने वृंदावन में नटवरी नृत्य सीखा, जबकि उनके पुत्र गीधा जी ने तांडव और शेजा जी ने लास्य अंग में निपुणता हासिल की।​
  • विशेषताएं और शैली
    • जयपुर घराना जटिल पैरों के काम, तेज चक्कर (स्पिन) और लयबद्ध तालों के लिए प्रसिद्ध है।
    • इसमें कवित्त, प्रिमलू, पक्षी परन, जाती परन जैसे बोलों का अनोखा प्रयोग होता है
    • यह घराना पूरे शरीर के उपयोग से नृत्य में भावनाओं और कहानी को व्यक्त करता है
    • साथ ही घुंघरू की झनकार के साथ तत्कार पर जोर देता है। पखावज की जटिल तालें यहां आसानी से प्रस्तुत की जाती हैं।​​
    • भाव प्रदर्शन में भजन-पदों का सहारा लिया जाता है, जो इसे लखनऊ घराने (अभिनय प्रधान) से अलग करता है।​
  • प्रमुख कलाकार
    • जयपुर घराने के उल्लेखनीय नर्तक पं. दुर्गा लाल और पं. गौरी शंकर हैं। आधुनिक समय में भी यह घराना कथक को समृद्ध करता रहा।​
    • भानु जी की विरासत ने कथक को शास्त्रीय रूप प्रदान करने में योगदान दिया।

47. निर्मला पणिकर (Nirmala Panikar) को ....... नृत्य शैली में उनके योगदान के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2019 (फरवरी, 2023 में दिया गया) से सम्मानित किया गया। [MTS (T-I) 13 सितंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) मोहिनीअट्टम
Solution:
  • निर्मला पणिकर एक प्रसिद्ध मोहिनीअट्टम नृत्यांगना हैं।
  • केरल के शास्त्रीय नृत्य मोहिनीअट्टम में उनके योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2019 के संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
  • यह पुरस्कार उन्हें फरवरी, 2023 में दिया गया।
  • निर्मला पणिकर का परिचय
    •  उन्होंने दशकों से इस कला रूप को संरक्षित करने, प्रचारित करने और लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
    • केरल के शास्त्रीय नृत्य मोहिनीअट्टम में उनकी विशेषज्ञता ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।
  • पुरस्कार का विवरण
    • संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भारत की संगीत, नृत्य और नाटक के लिए राष्ट्रीय अकादमी द्वारा प्रदर्शन कलाओं के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए दिया जाता है।
    • निर्मला पणिकर को 2019 के लिए यह पुरस्कार मोहिनीअट्टम में उनके योगदान के लिए मिला
    • हालांकि महामारी के कारण इसे फरवरी 2023 में प्रदान किया गया।
    • यह पुरस्कार 2019, 2020 और 2021 के लिए चयनित 128 कलाकारों में से एक था
    • इसे केरल में ही प्रदान किया गया, जो एक ऐतिहासिक क्षण था क्योंकि सामान्यतः यह दिल्ली में होता है।
  • मोहिनीअट्टम नृत्य शैली
    • मोहिनीअट्टम केरल का एक प्रमुख शास्त्रीय नृत्य रूप है, जो मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा किया जाता है।
    • इसमें कोमल, लहरदार आंदोलन, स्त्री शैली और भक्ति-प्रधान विषय प्रमुख हैं
    • जो अक्सर भगवान विष्णु या मोहिनी अवतार से जुड़े होते हैं।
    • निर्मला पणिकर ने इस नृत्य को आधुनिक संदर्भों में जीवंत रखा, नई कोरियोग्राफी और शिक्षण के माध्यम से।
  • उनके योगदान की झलक
    • पणिकर ने मोहिनीअट्टम को वैश्विक मंचों पर ले जाकर इसका प्रसार किया।
    • वे एक समर्पित शोधकर्ता भी हैं, जिन्होंने नृत्य के पारंपरिक तत्वों को संरक्षित किया।
    • कई दशकों के करियर में उन्होंने अनगिनत शिष्यों को प्रशिक्षित किया और प्रदर्शन आयोजित किए।

48. कर्नाटक की रानी मचैया (Rani Machaiah) को कर्नाटक और कर्नाटक के बाहर ....... को लोकप्रिय बनाने में उनके योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। [MTS (T-I) 12 सितंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) उम्मत्त-आट
Solution:
  • कर्नाटक की रानी मचैया (Rani Machaiah) को कर्नाटक और कर्नाटक के बाहर 'उम्मत्त आट' (Ummathat) को लोकप्रिय बनाने में उनके योगदान के लिए वर्ष 2023 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।
  • पद्मश्री पुरस्कार का विवरण
    • रानी मचैया को वर्ष 2023 में भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री से नवाजा गया।
    • यह पुरस्कार गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर घोषित हुआ और मार्च 2023 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा प्रदान किया गया।
    • सम्मान कला श्रेणी (पारंपरिक लोक नृत्य) में उनके असाधारण योगदान के लिए दिया गया
    • जिसमें उन्होंने कोडावा संस्कृति को नृत्य के माध्यम से संरक्षित और प्रचारित किया।​
  • उम्मतथात नृत्य क्या है?
    • उम्मतथात कर्नाटक के कोडागु (कोर्ग) जिले के कोडवा समुदाय का पारंपरिक लोक नृत्य है।
    • यह मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा किया जाने वाला ऊर्जावान नृत्य है
    • जिसमें लयबद्ध चालें, रंग-बिरंगे वेशभूषा और प्रकृति, त्योहारों तथा सामुदायिक जीवन पर आधारित थीम्स होती हैं।
    • रानी मचैया ने इसे पुनर्जीवित करने, सिखाने और भारत व विदेशों में प्रस्तुतियों के माध्यम से राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध किया।
  • उनके योगदान की पूरी जानकारी
    • रानी मचैया ने अपना जीवन कोडावा सांस्कृतिक विरासत को समर्पित कर दिया। वे कर्नाटक कोडवा साहित्य अकादमी की पूर्व अध्यक्ष रह चुकी हैं
    • कावेरी कलावृंद संगha नामक संगठन की संस्थापक व अध्यक्ष हैं, जो नृत्य प्रशिक्षण प्रदान करता है।
    • हजारों बच्चों को प्रशिक्षित कर उन्होंने युवा पीढ़ी को परंपराओं से जोड़ा, जबकि विभिन्न सांस्कृतिक उत्सवों, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रदर्शन कर उम्मतथात को लोकप्रिय बनाया।
    • इससे पहले उन्हें राज्योत्रव पुरस्कार जैसे अन्य सम्मान भी मिले थे।​
  • पुरस्कार प्राप्ति पर उनकी प्रतिक्रिया
    • रानी मचैया ने कहा, "मैंने इसके लिए आवेदन तक नहीं किया था। कई लोगों ने बधाई दी तब पता चला।
    • यह उन हजारों बच्चों की मेहनत का फल है जिन्होंने मेरी मदद की।" उनकी खुशी शब्दों से परे थी
    • जो उनकी विनम्रता दर्शाती है। 2023 में उन्हें कोर्ग पर्सन ऑफ द ईयर भी चुना गया।
  • सांस्कृतिक महत्व
    • पद्मश्री ने न केवल रानी मचैया के व्यक्तिगत प्रयासों को मान्यता दी, बल्कि लोक कलाओं के संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया।
    • पद्म पुरस्कार 1954 से दिए जाते हैं—पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्मश्री—जो विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्टता को सम्मानित करते हैं।
    • उनका कार्य अन्य क्षेत्रीय कलाकारों के लिए प्रेरणा स्रोत है, जो लुप्तप्राय परंपराओं को जीवित रख रहे हैं।

49. अलार्मेल वल्ली (Alarmel Valli) एक ......... नृत्यांगना हैं [MTS (T-I) 11 सितंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (c) भरतनाट्यम
Solution:
  • अलार्मेल वल्ली एक प्रमुख भारतीय शास्त्रीय नृत्यांगना और कोरियोग्राफर हैं
  • भारतीय शास्त्रीय नृत्य रूप, भरतनाट्यम की पंडानल्लुर शैली की अग्रणी प्रतिपादक हैं।
  • नृत्य शैली
    • उनकी शैली को "शास्त्रीय परंतु समकालीन, सटीक और काव्यात्मक" कहा जाता है
    • जो परंपरा को व्यक्तिगत अभिव्यक्ति से जोड़ती है। वे आंदोलनों में काव्य और संगीत की गहराई लाती हैं
    • खासकर संगम काव्य (100 ई.पू.-250 ई.) पर आधारित रचनाओं के माध्यम से।
    • उनकी प्रस्तुतियाँ दर्शकों को शास्त्रीय जानकार से सामान्य व्यक्ति तक आकर्षित करती हैं।
  • पुरस्कार सम्मान
    • पद्म भूषण (2004, भारत सरकार)।
    • पद्म श्री (सबसे कम उम्र प्राप्तकर्ताओं में से एक)।
    • कैलैमामणी (तमिलनाडु सरकार)।
    • शेवालिए ऑफ आर्ट्स एंड लेटर्स (फ्रांस सरकार, 2004)।
    • संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार।
    • नाट्य कला आचार्य (म्यूजिक अकादमी, चेन्नई)।
    • ग्रांद मेडेल दे ला विले दे पेरिस।
    • वे भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से नवाजी गईं।​
  • प्रदर्शन स्थल
    • उनके प्रदर्शन विश्वप्रसिद्ध मंचों पर हुए, जैसे बोल्शॉय थिएटर (रूस), थिएटर डे ला विले (फ्रांस), एडिनबर्ग फेस्टिवल, रॉयल अल्बर्ट हॉल (लंदन), कैनेडी सेंटर (अमेरिका), वेनिस बिएनाले, जापान का मिन-ऑन फेस्टिवल।
    • भारत में प्रमुख त्योहारों सहित वैश्विक सांस्कृतिक राजधानियों में उनकी उपस्थिति रही।​
  • संस्थान कार्य
    • 1984 (या 1986) में उन्होंने चेन्नई में दीपासिखा डांस फाउंडेशन की स्थापना की
    • जहाँ वे कार्यशालाएँ, लेक्चर-डेमॉन्स्ट्रेशन और मास्टरक्लास आयोजित करती हैं।
    • स्पिक मैके, वियना के इंटरनेशनल समरटैंजवोकेन, अमेरिकी विश्वविद्यालयों आदि में उन्होंने शिक्षण दिया।
  • फिल्में विरासत
    • प्रवाही (2004, फिल्म्स डिवीजन, भारत)।
    • बीबीसी ऑम्निबस श्रृंखला पर फिल्म।
    • लास्या काव्या (2012, संकल्प मेश्रम द्वारा, राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता)।
    • उनकी रचनाएँ भरतनाट्यम को गतिशील भाषा के रूप में लोकप्रिय बनाती हैं, जो परंपरा और आधुनिकता का संगम है।​

50. लंबाडी (Lambadi) नृत्य ....... जनजाति का लोक नृत्य है और इसकी उत्पत्ति आंध्र प्रदेश में हुई थी। [MTS (T-I) 11 सितंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (b) बंजारा
Solution:
  • 'लंबाडी' तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के बंजारा जनजाति द्वारा किया जाने वाला एक लोक नृत्य है।
  • यह मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा अच्छी फसल के लिए अपने देवता को श्रद्धांजलि देने के लिए किया जाता है।
  • उत्पत्ति और इतिहास
    •  ये लोग प्राचीन काल में वस्तुओं का व्यापार करने विभिन्न स्थानों पर घूमते थे
    • लेकिन समय के साथ वे एक स्थान पर बस गए और कृषि अपनाई।
    • इस नृत्य का उद्देश्य अच्छी फसल के लिए देवताओं को प्रसन्न करना था
    • यह राजस्थान तथा दक्षिण भारतीय संस्कृतियों का मिश्रण दर्शाता है।
    • आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में कई लोक नृत्यों की तरह, यह भी स्थानीय समुदायों की सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है।​
  • प्रदर्शन शैली
    • यह नृत्य मुख्यतः महिलाओं द्वारा किया जाता है, हालांकि पुरुष वाद्ययंत्रों के साथ सहयोग करते हैं।
    • नृत्य में सहज हाथों की गतियां होती हैं, जो रोपाई, बुआई और कटाई जैसी कृषि क्रियाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं।
    • गीत लंबाड़ी भाषा में गाए जाते हैं, जो उत्सवपूर्ण और लोकप्रिय हैं। प्रदर्शन धीमी लय से शुरू होकर तीव्र हो जाता है, जिसमें समूह में घूमना और मुद्राएं शामिल होती हैं।​​
  • पोशाक और आभूषण
    • महिलाएं चटकीले रंगों वाली लंबी घाघरा, ब्लाउज और ओढ़नी पहनती हैं, जो कांच की कामकाजी सजावट से सुसज्जित होती हैं।
    • भारी आभूषण जैसे चूड़ियां, गोदने और कान की बालियां राजस्थानी शैली से मिलती-जुलती हैं।
    • पुरुष सरल वेशभूषा में तबला या ढोलक बजाते हैं। यह पोशाक नृत्य की जीवंतता को बढ़ाती है।​
  • अवसर और महत्व
    • लंबाडी नृत्य विवाह, होली, दशहरा, दीपावली जैसे त्योहारों पर किया जाता है
    • जहां कलाकार घर-घर जाकर प्रसाद प्राप्त करते हैं। अब यह उत्सवों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में मनोरंजन का रूप ले चुका है।
    • हाल ही में राष्ट्रीय आदिवासी महोत्सव जैसे आयोजनों में भी इसका प्रदर्शन हुआ है।
    • यह नृत्य बंजारा संस्कृति की निरंतरता और लोक कला के संरक्षण को दर्शाता है।​