सांस्कृतिक गतिविधियां (परम्परागत सामान्य ज्ञान) भाग-I

Total Questions: 50

11. लाई हारोबा भारत के निम्नलिखित शास्त्रीय नृत्यों में से किसका प्रारंभिक रूप है? [CGL (T-I) 26 जुलाई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) मणिपुरी
Solution:
  • 'लाई हारोबा' मणिपुर का एक पारंपरिक त्योहार है, जिसे नृत्य और संगीत प्रदर्शन के माध्यम से मनाया जाता है। लाई हारोबा भारत के 'मणिपुरी' शास्त्रीय नृत्य का सबसे प्रारंभिक रूप है।
  • लाई हारोबा का परिचय
    • लाई हारोबा, जिसे लाई हराओबा भी कहा जाता है, मणिपुर के प्रमुख पारंपरिक उत्सवों में से एक है।
    • इसका शाब्दिक अर्थ "देवताओं का आमोद-प्रमोद" है और यह पूर्व-वैष्णव काल से चला आ रहा है।
    • यह श्रुति साहित्य, संगीत, नृत्य और अनुष्ठानों का संगम है, जो सनमाही (मैतेई) धर्म के देवता उमंग लाई को प्रसन्न करने के लिए समर्पित होता है।
    • मायबा (पुरुष पुजारी) और मायबी (महिला पुजारिन) इसकी मुख्य कलाकार होते हैं
    • जो सृष्टि रचना की कथा को नृत्य-गीत के माध्यम से पुनः अभिनीत करते हैं।
    • त्योहार में पुरुष और महिलाएं देवताओं के सम्मान में नृत्य करते हैं, जो मणिपुरी शास्त्रीय नृत्य का सबसे प्राचीन रूप दर्शाता है।​
  • मणिपुरी नृत्य से संबंध
    • लाई हारोबा को मणिपुरी शास्त्रीय नृत्य का प्रारंभिक रूप माना जाता है
    • जो भारत के आठ मान्यता प्राप्त शास्त्रीय नृत्यों में शामिल है।
    • मणिपुरी नृत्य की कोमल गतियां, नाजुक हस्त मुद्राएं और तरल पैरों का काम इसी त्योहार से विकसित हुए।
    • यह पूर्वोत्तर भारत के मणिपुर राज्य से उत्पन्न हुआ, जहां भौगोलिक अलगाव ने इसे बाहरी प्रभावों से बचाए रखा।
    • लाई हारोबा के अनुष्ठानिक नृत्य ने मणिपुरी को जन्म दिया
    • जो अब हिंदू महाकाव्यों और पौराणिक कथाओं पर आधारित कोमल, गीतात्मक शैली के लिए जाना जाता है।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
    • यह त्योहार पूर्व-वैष्णव काल (वैष्णव धर्म के प्रसार से पहले) से जुड़ा है
    • मणिपुर की आदिवासी-सांस्कृतिक परंपराओं को प्रतिबिंबित करता है।
    • उमंग थाई जैसे स्थानीय देवताओं की पूजा इसमें होती है, साथ ही पूर्वजों की आत्माओं को नमन किया जाता है।​
    • मणिपुर सरकार इसे यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल कराने का प्रयास कर रही है।
    • यह मई मास में मनाया जाता है और आज भी जीवंत रूप में प्रस्तुत होता है।​

12. 'लाई हरोबा' भारत के निम्नलिखित में से किस शास्त्रीय नृत्य की शैली है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 2 दिसंबर, 2023 (II-पाली), Phase-XI 28 जून, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (b) मणिपुरी
Solution:
  • 'लाई हारोबा' मणिपुर का एक पारंपरिक त्योहार है, जिसे नृत्य और संगीत प्रदर्शन के माध्यम से मनाया जाता है। लाई हारोबा भारत के 'मणिपुरी' शास्त्रीय नृत्य का सबसे प्रारंभिक रूप है।
  • उत्पत्ति और इतिहास
    • लाई हरोबा, जिसे लाई हराओबा भी कहा जाता है, मणिपुर के मेइतेई समुदाय का प्रमुख पारंपरिक त्योहार है।
    • इसका शाब्दिक अर्थ "देवताओं का आमोद-प्रमोद" है और यह पूर्व-वैष्णव काल से चला आ रहा है।
    • यह उत्सव उमंग लाई (पाक्हांगबा और लेइमापोकपा जैसे देवताओं) को प्रसन्न करने के लिए आयोजित होता है
    • जिसमें पुजारी (मायबा) और पुजारिनें (मायबी) सृष्टि की रचना का पुनःअभिनय करते हैं।
    • यह नृत्य मणिपुरी शास्त्रीय नृत्य का सबसे पुराना रूप माना जाता है, जो बाद में रासलीला और अन्य शैलियों में विकसित हुआ।
    • मणिपुरी नृत्य की जड़ें इसी उत्सव में हैं, जहां समूह नृत्य, जटिल मुद्राएं और भाव-भंगिमाएं प्रमुख हैं।
  • नृत्य की विशेषताएं
    • शैली: कोमल, गीतात्मक और तरल गतिविधियां; हाथों की जटिल मुद्राएं (हस्त मुद्राएं), पैरों की थिरकन और चेहरे के सूक्ष्म भाव।
    • संगीत: पारंपरिक मणिपुरी पेंगा (ढोलक जैसा), मृदंग, खर्ताल और पुंग (ढोल) के साथ गायन। गीत श्रुति साहित्य पर आधारित होते हैं।
    • परिधान: पुरुषों के लिए धोती-कुर्ता जैसा, महिलाओं के लिए फूलों से सजा पोटलो (लहंगा जैसा) और शीश झुमके। जीवंत रंग और प्रकृति से प्रेरित।
    • प्रदर्शन: समूह में, युवा से वृद्ध तक भाग लेते हैं। इसमें थोइबी-खंबा की लोककथा पर नाट्य प्रदर्शन भी शामिल।
    • यह नृत्य मार्शल आर्ट और पारंपरिक रंगमंच के तत्वों को भी समेटे हुए है, जो मणिपुर की सांस्कृतिक समृद्धि दर्शाता है।​
  • मणिपुरी नृत्य से संबंध
    • मणिपुरी भारत के आठ शास्त्रीय नृत्यों में से एक है, जिसकी उत्पत्ति 18वीं शताब्दी में राजा भग्य चंद्र कीर्ति सिंह के समय रासलीला से जुड़ी।
    • लेकिन लाई हरोबा इसका प्राचीन आधार है, जो वैष्णव भक्ति से पहले का है। आज यह शास्त्रीय मंचों पर भी प्रस्तुत होता है
    • लेकिन मूल उत्सव में अनुष्ठानिक रूप प्रमुख रहता है।
    • अन्य शास्त्रीय नृत्यों जैसे कथकली (केरल), कथक (उत्तर भारत) या ओडिसी (ओडिशा) से अलग, यह पूर्वोत्तर की कोमलता और आध्यात्मिकता पर जोर देता है।
  • सांस्कृतिक महत्व
    • लाई हरोबा मणिपुर के सनमाही धर्म और लोक जीवन का प्रतीक है।
    • यह वसंत ऋतु (अप्रैल-मई) में इम्फल घाटी के खूथोक लाकपुड़ा या अन्य स्थानों पर मनाया जाता है।
    • शाम को देवता की पालकी घुमाई जाती है। यह न केवल नृत्य का आधार है
    • बल्कि सामुदायिक एकता और आध्यात्मिक जागरण का माध्यम भी।
    • आधुनिक समय में यह पर्यटन और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए भी महत्वपूर्ण है।

13. बिम्बावती देवी किस भारतीय नृत्य शैली की प्रतिपादक हैं? [CGL (T-I) 02 दिसंबर, 2022 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) मणिपुरी
Solution:
  • प्रश्नानुसार, बिम्बावती देवी भारतीय शास्त्रीय नृत्य मणिपुरी की प्रतिपादक हैं।
  • पारिवारिक पृष्ठभूमि
    • बिम्बावती देवी प्रसिद्ध मणिपुरी नृत्य गुरुओं बिपिन सिंह और कलावती देवी की पुत्री हैं।
    • बचपन से ही उन्होंने मणिपुरी नृत्य, पुंग (मणिपुरी ढोल) वादन और थांग-टा (मणिपुरी मार्शल आर्ट) में प्रशिक्षण प्राप्त किया।
    • यह पारिवारिक विरासत ने उन्हें शास्त्रीय मणिपुरी परंपरा का गहन ज्ञान प्रदान किया।
  • मणिपुरी नृत्य की विशेषताएं
    • मणिपुरी नृत्य मणिपुर राज्य से उत्पन्न भारत का एक प्रमुख शास्त्रीय नृत्य रूप है, जो वैष्णव भक्ति और रासलीला पर आधारित है।
    • इसमें लास्य (नरम, सुंदर चालें) और तांडव (जोरदार आंदोलन) शैलियां प्रमुख हैं
    • साथ ही जटिल हस्तमुद्राएं, बेलनाकार स्कर्ट वाली वेशभूषा और पंग-कर्तल जैसे वाद्ययंत्रों का उपयोग होता है। यह नृत्य धार्मिक उत्सवों और कृष्ण लीला से प्रेरित होता है।
  • उपलब्धियां और योगदान
    • बिम्बावती देवी मणिपुरी नृतनालय की प्रदर्शनकारी और एकल कलाकार रही हैं।
    • उन्होंने भारत और विदेशों में अनेक मंचों पर प्रदर्शन कर इस शैली को वैश्विक पहचान दिलाई, विशेषकर भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) से जुड़कर।
    • अन्य मणिपुरी नर्तकों में उनके पिता गुरु बिपिन सिंह, राजकुमार सिंहजीत सिंह और चारू माथुर शामिल हैं।

14. हर साल मनाए जाने वाले गुरु केलुचरण महापात्रा पुरस्कार उत्सव का नाम निम्नलिखित में से किस नृत्य शैली के प्रसिद्ध शास्त्रीय नर्तक के नाम पर रखा गया है? [CGL (T-I) 26 जुलाई, 2023 (III-पाली), MTS (T-I) 08 मई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) ओडिसी
Solution:
  • हर साल मनाए जाने वाले गुरु केलुचरण महापात्रा पुरस्कार उत्सव का नाम 'ओडिसी' नृत्य शैली के प्रसिद्ध शास्त्रीय नर्तक 'गुरु केलुचरण महापात्रा' के नाम पर रखा गया है।
  • गुरु केलुचरण महापात्रा के पुत्र और अनुयायी श्री रतिकांत महापात्रा ने वर्ष 1995 में इस पुरस्कार की शुरुआत की थी।
  • गुरु केलुचरण महापात्रा का जीवन परिचय
    • गुरु केलुचरण महापात्रा का जन्म 8 जनवरी 1926 को ओडिशा के रघुराजपुर गांव में हुआ था।
    • उन्होंने कम उम्र में ही नृत्य सीखना शुरू किया और ओडिसी को आधुनिक शास्त्रीय रूप प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
    • उनके गुरु पंकज चरण दास के मार्गदर्शन में उन्होंने 'गोटीपुआ' और 'महारी' परंपराओं का गहन अध्ययन किया, जिससे ओडिसी को नया स्वरूप मिला।
  • ओडिसी नृत्य शैली
    • ओडिसी भारत के आठ प्रमुख शास्त्रीय नृत्यों में से एक है, जो ओडिशा के जगन्नाथ मंदिर की मूर्तियों से प्रेरित है।
    • इसमें अभिनय, नृत्य और गायन का सुंदर समन्वय होता है, जिसमें कोमल मुद्राएं, नेत्र अभिनय और त्रिभंगी मुद्रा प्रमुख हैं।
    • गुरु केलुचरण ने इसे 20वीं सदी में पुनर्जीवित किया और वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय बनाया।
  • पुरस्कार उत्सव का महत्व
    • गुरु केलुचरण मोहपात्रा पुरस्कार उत्सव हर साल आयोजित होता है, जो युवा कलाकारों को सम्मानित करता है।
    • यह उनके श्रीजन संस्थान से जुड़ा है, जहां ओडिसी नृत्य को बढ़ावा दिया जाता है।
    • उत्सव में शास्त्रीय नृत्य प्रदर्शन होते हैं और यह ओडिसी की विविध शैलियों को प्रदर्शित करता है।
  • प्राप्त सम्मान और योगदान
    • उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1966) और पद्म विभूषण जैसे उच्च सम्मान मिले।
    • उनकी शिष्याएं जैसे संयुक्ता पाणिग्रही, सोनल मानसिंह और यामिनी कृष्णमूर्ति विश्वविख्यात हुईं।
    • उन्होंने ओडिसी को कोरियोग्राफी के माध्यम से नाटकीय रूप दिया।

15. प्रसिद्ध नृत्य व्यक्ति केलुचरण महापात्रा निम्न में से किस नृत्य शैली से संबंधित हैं? [CGL (T-I) 25 जुलाई, 2023 (II-पाली), MTS (T-I) 19 मई, 2023 (II-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 21 नवंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) ओडिसी
Solution:
  • हर साल मनाए जाने वाले गुरु केलुचरण महापात्रा पुरस्कार उत्सव का नाम 'ओडिसी' नृत्य शैली के प्रसिद्ध शास्त्रीय नर्तक 'गुरु केलुचरण महापात्रा' के नाम पर रखा गया है।
  • गुरु केलुचरण महापात्रा के पुत्र और अनुयायी श्री रतिकांत महापात्रा ने वर्ष 1995 में इस पुरस्कार की शुरुआत की थी।
  • प्रारंभिक जीवन
    • केलुचरण महापात्र का जन्म 1926 में ओडिशा के रघुराजपुर गांव में हुआ था।
    • युवावस्था में उन्होंने गोटीपुआ नृत्य प्रस्तुत किया, जहां लड़के महिला वेश में भगवान जगन्नाथ की स्तुति करते हैं।
    • बाद में गोटीपुआ और महरी नृत्य पर शोध से उन्हें ओडिसी को पुनर्गठित करने की प्रेरणा मिली।
  • ओडिसी में योगदान
    • वे ओडिसी को शास्त्रीय दर्जा दिलाने वाले पहले गुरु बने, जो पहले मंदिरों में देवदासियों द्वारा किया जाने वाला लोक नृत्य था।
    • उन्होंने रासलीला, गीतगोविंद, कृष्णलीला जैसी रचनाएं कोरियोग्राफ कीं और शिष्यों को प्रशिक्षित किया।
    • 1994 में श्रीजन संगठन स्थापित कर ओडिसी को विलुप्त होने से बचाया।
  • सम्मान और विरासत
    • उन्हें पद्म विभूषण जैसे पुरस्कार मिले; वे ओडिशा से यह सम्मान पाने वाले पहले व्यक्ति थे।
    • 2004 में उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी कोरियोग्राफी आज भी ओडिसी प्रस्तुतियों में जीवित है।
    • ओडिसी की विशेषताएं जैसे मुद्राएं, अभिनय और मंदिर शैली को उन्होंने आधुनिक रूप दिया।

16. निम्नलिखित में से किस शास्त्र में भरतनाट्यम की सैद्धांतिक नींव पाई गई है? [CGL (T-I) 24 जुलाई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) नाट्य शास्त्र
Solution:
  • भरतनाट्यम की सैद्धांतिक नींव का पता 'नाट्य शास्त्र' से लगाया जा सकता है, जो भरत मुनि द्वारा लिखित प्रदर्शन कलाओं पर एक प्राचीन भारतीय ग्रंथ है।
  • नाट्यशास्त्र में नृत्य, संगीत और रंगमंच से संबंधित विषयों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है।
  • नाट्य शास्त्र का परिचय
    • नाट्य शास्त्र प्राचीन भारत का सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसे ऋषि भरत मुनि ने रचा।
    • यह दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से 200 ईस्वी तक का माना जाता है और इसमें नृत्य, नाटक, संगीत व रंगमंच के सिद्धांत विस्तार से वर्णित हैं।
    • भरतनाट्यम जैसी शास्त्रीय नृत्य शैलियों की जड़ें इसी ग्रंथ में हैं, जो प्रदर्शन कलाओं का पंचम वेद कहा जाता है।​
    • यह ग्रंथ नाट्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के माध्यम के रूप में स्थापित करता है।
  • भरतनाट्यम से संबंध
    • भरतनाट्यम दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु से उत्पन्न शास्त्रीय नृत्य है, जिसकी सैद्धांतिक आधारभूत संरचना नाट्य शास्त्र पर टिकी है।
    • ग्रंथ में वर्णित तांडव (पुरुष प्रधान नृत्य), रास (लास्य), भाव, रस, अभिनय, मुद्राएँ और 108 करण (मूल नृत्य позы) भरतनाट्यम के नृत्त, नृत्य और नाट्य तत्वों का आधार हैं।
    • यह नृत्य मंदिर पूजा से जुड़ा था, जहाँ शिव के नटराज रूप की आराधना होती थी
    • नाट्य शास्त्र ही इसके तकनीकी व सौंदर्यबोधी मार्गदर्शन का स्रोत है।​
  • अन्य शास्त्रों से तुलना
    • अर्थशास्त्र: कौटिल्य द्वारा रचित, अर्थनीति व राजनीति पर केंद्रित; नृत्य से असंबंधित।​
    • वैमानिक शास्त्र: भारद्वाज ऋषि का विमान विज्ञान ग्रंथ; प्रदर्शन कला से कोई लेना-देना नहीं।​
    • धर्मशास्त्र: धार्मिक-नैतिक नियमों का संग्रह, पुराण आधारित; नृत्य सिद्धांतों का उल्लेख नहीं।​
    • नाट्य शास्त्र ही एकमात्र शास्त्र है जो भरतनाट्यम के जटिल फुटवर्क, हस्तमुद्राओं, नेत्राभिनय और भावप्रदर्शन को व्यवस्थित रूप देता है।
  • ऐतिहासिक महत्व
    • भरतनाट्यम का आधुनिक स्वरूप 20वीं सदी में रानी बाला और रुक्मिणी देवी अरुंडेल जैसे कलाकारों ने पुनर्जीवित किया, लेकिन इसकी जड़ें नाट्य शास्त्र के सिद्धांतों में ही हैं।​
    • ग्रंथ में 36 अध्याय हैं, जिनमें नृत्य वर्गीकरण (मार्गी व देशी), रंगमंच निर्माण और दर्शक-कलाकार संबंध शामिल हैं। यह सभी शास्त्रीय नृत्यों का आधारभूत दस्तावेज है।​
    • आज भी भरतनाट्यम प्रशिक्षण में नाट्य शास्त्र के करण, भेद और रस सिद्धांत अनिवार्य हैं।

17. कथक चार अलग-अलग रूपों में पाया जाता है, जिन्हें घराना कहा जाता है, जिनका नाम उन शहरों के नाम पर रखा गया है जहां कथक नृत्य की परंपरा विकसित हुई थी। उन शहरों के नाम बताइए। [CGL (T-I) 26 जुलाई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) जयपुर, बनारस, लखनऊ
Solution:
  • कथक को चार अलग-अलग शैलियों में विभाजित किया गया है जिन्हें 'घराना' कहा जाता है
  • जिनका नाम उन स्थानों के नाम पर रखा गया है, जहां कथक नृत्य की परंपरा विकसित हुई।
  • इन घरानों में शामिल हैं-जयपुर, रायगढ़, बनारस और लखनऊ घराना।
  • घरानों के शहर
    • कथक के ये चार घराने नृत्य शैलियों में विविधता लाते हैं। मुख्य शहर इस प्रकार हैं:
    • जयपुर
    • लखनऊ
    • बनारस (वाराणसी)
    • रायगढ़
  • जयपुर घराना
    • यह घराना राजस्थान के जयपुर शहर से जुड़ा है।
    • इसमें तेज़ पैरों की गति (तत्कार), चक्कर और लयबद्ध तकनीक पर जोर दिया जाता है।
    • यह शैली शक्तिशाली और जटिल फुटवर्क के लिए प्रसिद्ध है।
  • लखनऊ घराना
    • उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर से उत्पन्न यह घराना नवाबी दरबारों से प्रभावित है।
    • अभिनय, भाव-भंगिमा, कोमल हस्तमुद्राएँ और अभिव्यक्ति इसकी विशेषता है। यह सबसे लोकप्रिय घराना माना जाता है।
  • बनारस घराना
    • वाराणसी (बनारस) से विकसित यह शैली भक्ति और कथावाचन पर केंद्रित है।
    • चेहरे के भाव, आकर्षक हस्तgesture और धार्मिक कहानियों का चित्रण इसमें प्रमुख है। यह लखनऊ से मिलता-जुलता लेकिन अधिक नाटकीय है।
  • रायगढ़ घराना
    • छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से जुड़ा यह कम प्रसिद्ध लेकिन महत्वपूर्ण घराना है। यह अन्य घरानों का मिश्रण है
    • जिसमें तेज़ फुटवर्क और अभिनय दोनों शामिल हैं। महाराजा चक्रपाणि से इसकी शुरुआत मानी जाती है।
    • ये घराने कथक की गुरु-शिष्य परंपरा से विकसित हुए, और आजकल कलाकार अक्सर इन्हें मिलाकर प्रस्तुत करते हैं।

18. भगोरिया सांस्कृतिक पर्व निम्नलिखित में से किस भारतीय राज्य से संबंधित है? [C.P.O.S.I. (T-I) 11 नवंबर, 2022 (III-पाली)]

Correct Answer: (d) मध्य प्रदेश
Solution:
  • भगोरिया सांस्कृतिक पर्व मुख्यतः मध्य प्रदेश राज्य से संबंधित है।
  • भगोरिया हाटों के उत्सव की शुरुआत होलिका दहन के सात दिवस पूर्व हो जाती है।
  • हजारों की संख्या में नौजवान युवक-युवतियां सज-धज कर पारंपरिक परिधान में इन मेलों में शिरकत करते हैं।
  • पर्व का समय और महत्व
    • यह उत्सव होली के सात दिन पहले से शुरू होता है, आमतौर पर मार्च महीने में, जब फसल कटाई का समय होता है।
    • भगोरिया एक फसल उत्सव के रूप में जाना जाता है, जिसमें आदिवासी लोक संस्कृति चरम पर होती है
    • नृत्य, संगीत, हाट (मेला) और सामाजिक मेलजोल प्रमुख होते हैं। मान्यता है
    • इसकी शुरुआत राजा भोज काल में भगोर गांव से हुई, जहां भील राजाओं ने मेले आयोजित किए।
  • उत्सव की तैयारियां और गतिविधियां
    • आदिवासी एक महीने पहले से तैयारियां शुरू कर देते हैं। वे दिवाली जैसे शगुन के लिए नही
    • बल्कि भगोरिया हाट में मौज-मस्ती के लिए सोने-चांदी के आभूषण, कपड़े और सामान खरीदते हैं
    • बिना मोलभाव के, जिससे व्यापारियों को भारी मुनाफा होता है। हाट में कुंवारे लड़के-लड़कियां सज-धजकर आते हैं
    • एक-दूसरे को गुलाल लगाते हैं, पारंपरिक भगोरिया नाच करते हैं, जो कई बार विवाह तक ले जाता है
    • यह एक तरह का 'मैरिज ब्यूरो' कार्य करता है। नृत्य में मंडल बनाकर थाली-मटकी के साथ लोक धुनें गाई जाती हैं।
  • सांस्कृतिक विशेषताएं
    • भगोरिया नाच भीलों का प्रसिद्ध लोक नृत्य है, जो त्योहार और हाट से जुड़ा है। युवा विशेष रूप से सजते हैं
    • लड़कियां घाघरा-चोली, लड़के धोती-कुर्ता पहनते हैं। उत्सव में आधुनिकता और परंपरा का संगम दिखता है
    • जैसे जींस पहनकर नाचते युवा। यह पर्व देश-विदेश में प्रसिद्ध है और आदिवासी अंचल को उत्सव की खुमारी में डुबो देता है।
    • हालांकि कुछ स्रोत महाराष्ट्र का भी उल्लेख करते हैं, लेकिन मुख्य केंद्र मध्य प्रदेश ही है।
  • ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ
    • यह प्राचीनतम त्योहारों में से एक है, जो भील, भीलाला, पटेलिया और राठवा जनजातियों से जुड़ा।
    • झाबुआ के भगोर गांव का शिवालय इसका उद्गम माना जाता है।
    • उत्सव सामाजिक एकता, प्रेम और विवाह के लिए अवसर प्रदान करता है, जहां परिवार बाद में दहेज-मुहब्बत पर सहमति बनाते हैं।​

19. निम्नलिखित में से किस नृत्य में नर्तक अपने सिर पर जले हुए दीपों वाले बर्तनों को संतुलित रखते हैं? [CGL (T-I) 21 अप्रैल, 2022 (I-पाली)]

Correct Answer: (b) चरी नृत्य
Solution:
  • चरी नृत्य भारत में राजस्थान का आकर्षक व अत्यधिक प्रसिद्ध लोक नृत्य है। इस नृत्य में नर्तक अपने सिर पर जले हुए दीपों वाले बर्तनों को संतुलित रखते हैं।
  • यह नृत्य उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र (मथुरा-वृंदावन) से जुड़ा है और मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा किया जाता है, जो होली, जन्माष्टमी या अन्य उत्सवों पर प्रस्तुत होता है।
  • उत्पत्ति और क्षेत्र
    • चरकुला नृत्य ब्रज संस्कृति का अभिन्न अंग है, जहां कृष्ण भक्ति से प्रेरित लोक कथाओं को नृत्य के माध्यम से जीवंत किया जाता है।
    • यह मथुरा, वृंदावन और आसपास के गांवों में प्रचलित है।
    • नर्तकियां सिर पर 108 या अधिक जलते दीपक सजाए चरकुला (एक लकड़ी का जंजीरों वाला ढांचा) को घुमाते हुए नृत्य करती हैं
    • जो संतुलन, कौशल और भक्ति का प्रतीक है।​
  • प्रदर्शन की विशेषताएं
    • नृत्य अंधेरी रात में किया जाता है, जहां दीपकों की लौ चमकदार दृश्य बनाती है।
    • संगीत में तबला, ढोलक, मंजीरा और भक्ति भजनों का प्रयोग होता है; गीत कृष्ण-राधा की लीला पर आधारित होते हैं।
    • नर्तकियां रंग-बिरंगे घाघरा-चोली पहनती हैं
    • चूड़ियां और बिछिया से सजती हैं, तथा तेज चाल और घुमावों से बर्तनों को गिराए बिना नृत्य करती हैं।
  • सांस्कृतिक महत्व
    • यह नृत्य न केवल शारीरिक कुशलता दर्शाता है बल्कि सामाजिक एकता और भक्ति को मजबूत करता है।
    • आधुनिक समय में यह लुप्तप्राय हो रहा है, लेकिन सांस्कृतिक उत्सवों और सरकारी प्रयासों से पुनरुद्धार हो रहा है।
    • महिलाओं की भागीदारी से सशक्तिकरण का संदेश भी मिलता है।

20. निम्नलिखित में से शास्त्रीय नर्तकों का कौन-सा समूह कथक से संबंधित है? [CGL (T-I) 26 जुलाई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) सितारा देवी, शाश्वती सेन और उर्मिला नागर
Solution:
  • प्रश्नगत विकल्पों में शास्त्रीय नृत्यांगना सितारा देवी, शाश्वती सेन और उर्मिला नागर 'कथक' नृत्य शैली से संबंधित हैं
  •  इस नृत्य रूप को "कथाकारों" (कहानीकारों) से जोड़ा जाता है
  • जो प्राचीन काल में मंदिरों में भगवान कृष्ण, शिव या देवी की कथाएँ नृत्य, गीत और हाव-भाव के माध्यम से सुनाते थे
  • कथक की उत्पत्ति वैदिक काल के "कथा" शब्द से मानी जाती है
  • जिसका अर्थ "कहानी" होता है, और यह भागवत पुराण या महाकाव्यों पर आधारित होता है ।
  • कथक के प्रमुख घराने
    • कथक को तीन मुख्य घरानों (शैलियों) में विभाजित किया जाता है: जयपुर, लखनऊ और बनारस।
    • जयपुर घराना पैरों की जटिल गतियों (तात्कार) पर केंद्रित है ।​
    • लखनऊ और बनारस घराने चेहरे के भावों (अभिनय), हाथों के मुद्राओं और अभिव्यक्ति पर अधिक जोर देते हैं ।
    • बाद में रायगढ़ घराना (मध्य प्रदेश) भी विकसित हुआ, जो संगीत और वाद्यों पर विशेष है, लेकिन यह कथक का मूल घराना नहीं ।​
    • मुगल काल में कथक ने दरबारी रूप लिया, जहाँ हिंदू धार्मिक कथाओं के साथ फारसी और उर्दू कविताओं का समावेश हुआ
    • जिससे यह घुंघरू-बद्ध तालबद्ध चक्करों और तेज़ फुटवर्क के लिए प्रसिद्ध हो गया ।
  • कथक से जुड़े प्रमुख नर्तक
    • प्रश्न में उल्लिखित समूह सितारा देवी, शास्वती सेन और उर्मिला नागर कथक के प्रसिद्ध शास्त्रीय नर्तक हैं ।​
    • सितारा देवी: कथक की "कथक रानी" के नाम से जानी जाती हैं, जिन्होंने लखनऊ घराने को लोकप्रिय बनाया और कृष्ण लीला पर आधारित प्रदर्शन दिए।
    • शास्वती सेन: आधुनिक कथक की प्रखर व्याख्याकार, जो अभिनय और संगीत के संयोजन के लिए विख्यात हैं।
    • उर्मिला नागर: जयपुर घराने की विशेषज्ञ, जिन्होंने कथक को वैश्विक मंचों पर पहुँचाया।
    • ये नर्तक कथक की शुद्ध शास्त्रीय परंपरा को आगे बढ़ाती हैं, जिसमें 100+ घुंघरुओं के साथ पदचाप, चक्र (चक्कर) और हस्तमुद्राएँ प्रमुख हैं ।
    • अन्य शास्त्रीय नृत्यों (जैसे भरतनाट्यम या ओडिसी) से भिन्न, कथक में पुरुष और महिला दोनों नृत्य करते हैं, और यह सीधे पैरों पर आधारित है ।
  • कथक की विशेषताएँ
    • नृत्य तत्व: तंत्र (ताली-बंद ताल), लaya (गति), अभिनय (भाव-प्रदर्शन)।
    • वाद्य: तबला, पखावज, सरोद, सितार।
    • वेशभूषा: चूड़ीदार, अंगरखा, घुंघरू; महिलाओं के लिए लहंगा-अनारकली ।​
      कथक को सनातन धर्म की कथावाचन परंपरा से जोड़ा जाता है
    • लेकिन मुगल प्रभाव से यह अधिक नाटकीय हो गया
    • आज यह राष्ट्रीय बाल भवन जैसी संस्थाओं में सिखाया जाता है ।