सांस्कृतिक गतिविधियां (परम्परागत सामान्य ज्ञान) भाग-I

Total Questions: 50

41. चेरा पंहारा (Chera Panhara) अनुष्ठान किससे संबंधित है? [MTS (T-I) 11 जुलाई, 2022 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) ओडिशा की रथ यात्रा
Solution:
  • चेरा पंहारा अनुष्ठान ओडिशा की रथ यात्रा (जगन्नाथ रथ यात्रा) से संबंधित है। इस उत्सव का उद्घाटन चेरा पंहारा द्वारा किया जाता है।
  • इसमें भगवान के सेवक के रूप में गजपति शासक, रथों के आगे बढ़ने से पहले प्रत्येक रथ के मंच पर झाडू लगाते हैं।
  • भक्त इन बड़े रथों (भगवान जगन्नाथ रथ, देवी सुभद्रा रथ और भगवान बलभद्र रथ) को मुख्य मार्ग पर तीन किमी., देवताओं के 'वाटिका गृह' उनकी मौसी 'गुंडीचा' के घर तक ले जाते हैं।
  • एक सप्ताह तक यहां रहने के बाद देवताओं को श्री मंदिर में लाया जाता है।
  • अनुष्ठान का अर्थ
    • यह शब्द संस्कृत के 'छेरा' (झाड़ू लगाना) और 'पंहारा' (पानी छिड़कना) से बना है, जो रथों के मार्ग को शुद्ध करने की प्रक्रिया दर्शाता है।
    • रथ यात्रा के पहले दिन, पोहंडी बिजे (भगवान को रथ पर विराजमान करने) के ठीक बाद यह रस्म होती है।
  • कैसे किया जाता है
    • पुरी के गजपति महाराज (ओडिशा के पारंपरिक राजा) स्वर्ण झाड़ू (सोने की झाड़ू) से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के रथों के आगे के रास्ते की सफाई करते हैं।
    • इसके बाद चंदन मिश्रित पवित्र जल छिड़का जाता है।
    • राजा खुद को भगवान का 'प्रथम सेवक' मानकर यह सेवा निभाते हैं।
  • महत्व और संदेश
    • यह रस्म विनम्रता, समानता और भक्ति का प्रतीक है
    • जो सिखाती है कि ईश्वर के सामने राजा और सामान्य भक्त बराबर हैं।
    • यह सदियों पुरानी परंपरा है, जिसका उल्लेख स्कंद पुराण जैसे ग्रंथों में मिलता है, और यह सेवा, शुद्धता व समर्पण का संदेश देती है।

42. पद्मश्री और पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित, यामिनी कृष्णमूर्ति भरतनाट्यम और निम्नलिखित में से किस नृत्य के लिए प्रसिद्ध हैं? [CGL (T-I) 20 जुलाई, 2023 (IV-पाली), MTS (T-I) 15 जून, 2023 (I-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 16 नवंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) कुचिपुड़ी
Solution:
  • यामिनी कृष्णमूर्ति 'भरतनाट्यम' और 'कुचिपुड़ी' नृत्य शैलियों के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • भारतीय शास्त्रीय नृत्य में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री और पद्म भूषण से सम्मानित किया गया है।
  • कुचिपुड़ी आंध्र प्रदेश का एक शास्त्रीय नृत्य है।
  • नृत्य प्रशिक्षण और प्रारंभिक करियर
    • बचपन से ही उन्होंने कलाक्षेत्र (रुक्मिणी देवी अरुंडेल की संस्था) में भरतनाट्यम की शिक्षा ली
    • जहां उन्होंने कांचीपुरम एल्लप्पा पिल्लई और थंजावुर कित्तप्पा पिल्लई जैसे गुरुओं से प्रशिक्षण प्राप्त किया।
    • 1957 में मद्रास (अब चेन्नई) में उनका पहला प्रदर्शन हुआ, जिसके बाद वे तेजी से भारत की प्रमुख नृत्यांगना बनीं।
    • उन्होंने भरतनाट्यम की ज्यामितीय गतियों, लयबद्ध पैरों की थाप और मुद्राओं को निखारकर प्रस्तुत किया।
  • प्रसिद्ध नृत्य शैलियां
    • भरतनाट्यम: यह उनकी प्राथमिक शैली थी, जिसमें वे नृत्य (शुद्ध नृत्य), नृत्य (अभिनय) और आभिनय का संतुलन बनाती थीं।
    • इसमें कमर झुकाकर खड़ी होने वाली मुद्रा, जटिल फुटवर्क और 11 प्रमुख मुद्राओं का उपयोग प्रमुख था।
    • कुचिपुड़ी: उन्हें कुचिपुड़ी की "टॉर्च बेयरर" कहा जाता था।
    • इस आंध्र प्रदेश की शैली को उन्होंने एकल नृत्य रूप के रूप में स्थापित किया, जो अधिक तरल, कथात्मक और सुंदर होती है।
    • उन्होंने ओडिसी जैसे अन्य रूपों में भी निपुणता हासिल की।
    • वे इन शैलियों में गंधियन जीवन दर्शन या काली देवी जैसे विषयों पर नवीन रचनाएं प्रस्तुत करती रहीं।​
  • पुरस्कार और योगदान

    • उनके नृत्य ने शास्त्रीय नृत्य को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई, विशेषकर कुचिपुड़ी को।
    • भारत सरकार के अलावा उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार और नृत्य नाटक अकादमी फेलोशिप भी मिली।
    • उनकी आत्मकथा "A Passion for Dance" उनकी कला के प्रति समर्पण को दर्शाती है।
    • वे 20 दिसंबर 1940 को जन्मीं और 2016 के आसपास सक्रिय रहीं, अपनी मूर्तिमय प्रस्तुतियों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करती रहीं।

43. गुजरात के किस जिले में गुजरात सरकार द्वारा मोढेरा नृत्य महोत्सव का आयोजन किया जाता है? [CGL (T-I) 20 जुलाई, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (c) मेहसाणा
Solution:
  • मोढेरा नृत्य महोत्सव का आयोजन गुजरात सरकार द्वारा गुजरात राज्य के मेहसाणा जिले में आयोजित किया जाता है।
  • मोढेरा सूर्य मंदिर का निर्माण सोलंकी शासक भीमदेव प्रथम के शासनकाल में हुआ था।
  • महोत्सव का इतिहास और महत्व
    • यह तीन दिवसीय वार्षिक सांस्कृतिक आयोजन गुजरात पर्यटन निगम द्वारा संचालित होता है
    • जो भारतीय शास्त्रीय नृत्य-संगीत की विरासत को बढ़ावा देता है। सूर्य मंदिर 11वीं शताब्दी का चालुक्य वंश का वास्तुशिल्प चमत्कार है
    • जो सूर्य देव को समर्पित है और इसकी जटिल नक्काशी प्रसिद्ध है।
    • महोत्सव उत्तरायण उत्सव के समापन के बाद सूर्य की उत्तरायण यात्रा (धनु से मकर राशि) के 'उत्तरार्ध' पर आधारित है, जो सर्दी के अंत का प्रतीक है।
  • आयोजन का समय और अवधि
    • यह जनवरी के तीसरे सप्ताहांत में, उत्तरायण के ठीक बाद आयोजित होता है
    • आमतौर पर तीन रातें। मंदिर की प्राकृतिक वास्तुकला में चांदनी रातों में नृत्य प्रदर्शन भव्य लगते हैं।
    • 2025 संस्करण भी इसी पैटर्न पर चला, जो गुजरात के सांस्कृतिक कैलेंडर का हिस्सा है।​
  • प्रदर्शन और आकर्षण
    • मुख्य आकर्षण भरतनाट्यम, कथक, कुचिपुड़ी, ओडिसी जैसे शास्त्रीय नृत्य हैं, जो मंदिर की दीवारों पर प्रतिबिंबित होते हैं।
    • इसके अलावा हस्तशिल्प मेला गुजराती कला को और खाद्य स्टॉल स्थानीय व्यंजनों को प्रदर्शित करते हैं।
    • यह पर्यटकों को इतिहास, संस्कृति और कला का अनूठा संगम प्रदान करता है।
  • मेहसाणा जिले का संदर्भ
    • मेहसाणा उत्तर गुजरात का प्रमुख जिला है, जो कृषि, उद्योग और ऐतिहासिक स्थलों के लिए जाना जाता है।
    • मोढेरा गांव यहां से 25 किमी दूर है, पुष्पावती नदी के किनारे। जिला गांधीनगर से सटा है और सूर्य मंदिर यूनेस्को की नजर में है।

44. ....... का दासकथिया नृत्य ऐतिहासिक और पौराणिक कथाओं (घटनाओं) को चित्रित करते हुए दो पुरुषों द्वारा किया जाने वाला आदिवासी नृत्य है। [CGL (T-I) 14 जुलाई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (c) ओडिशा
Solution:
  • ओडिशा का दासकथिया नृत्य ऐतिहासिक और पौराणिक कथाओं (घटनाओं) को चित्रित करते हुए पुरुषों द्वारा किया जाने वाला आदिवासी नृत्य है।
  • यह नृत्य शैली 'ओड़िया संस्कृति' का एक अभिन्न अंग है। यह त्योहारों और महत्वपूर्ण अवसरों के दौरान किया जाता है।
  • उत्पत्ति और इतिहास
    • यह नृत्य ओडिशा के आदिवासी समुदायों से निकला है, मुख्य रूप से गाथागीत या लोकनाट्य के रूप में जाना जाता है।
    • 19वीं शताब्दी के आसपास विकसित, यह मौखिक परंपरा को जीवंत रखता है
    • जहां रामायण, महाभारत या स्थानीय वीरगाथाओं का वर्णन होता है।
    • ओडिशा की उड़िया संस्कृति का अभिन्न हिस्सा, यह त्योहारों, विवाहों और धार्मिक अनुष्ठानों में प्रमुख है।
  • प्रदर्शन शैली
    • दो कलाकार होते हैं: मुख्य गायक (गायक या गयक) और सहायक (पलिया या सह-वाचक), जो संवाद के जरिए कथा आगे बढ़ाते हैं।
    • चेहरे के भाव, हस्त मुद्राएं और शरीर की गतिविधियां कथा को जीवंत बनाती हैं
    • जबकि कठिया नामक लकड़ी का विशेष वाद्य यंत्र नाम का आधार है।
    • मृदंग, ढोल, बांसुरी जैसे यंत्रों का साथ रहता है, और प्रदर्शन रात्रिकालीन होता है।
  • पोशाक और सहायक तत्व
    • कलाकार पारंपरिक उड़िया पोशाक धारण करते हैं—रंगीन धोती, कुर्ता, पगड़ी और अलंकृत आभूषण।
    • मेकअप चरित्रानुसार बदलता है, जैसे राक्षसों के लिए उग्र या देवताओं के लिए शांत।
    • कथा हास्य, व्यंग्य या भक्ति से भरपूर होती है, दर्शकों को बांधे रखती है।​
  • सांस्कृतिक महत्व
    • दस्कथिया ओडिशा की जनजातीय पहचान को मजबूत करता है, नैतिक शिक्षा और सामाजिक संदेश प्रसारित करता है।
    • आधुनिक समय में भी ग्रामीण मेलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जीवित, यह युवा पीढ़ी को विरासत से जोड़ता है।
    • अन्य राज्यों जैसे गुजरात या उत्तर प्रदेश से भिन्न, यह विशुद्ध ओडिशाई है।

45. निम्नलिखित में से कौन-सा ओडिशा का एक प्रसिद्ध लोक नृत्य है? [CGL (T-I) 05 दिसंबर, 2022 (IV-पाली)]

Correct Answer: (c) रंगबती
Solution:
  • प्रश्नानुसार, 'रंगबती' दक्षिण ओडिशा क्षेत्र का अत्यधिक लोकप्रिय लोक नृत्य है।
  • छऊ नृत्य का इतिहास
    • छऊ नृत्य की उत्पत्ति ओडिशा के मयूरभंज, सुंदरगढ़ और पुरी क्षेत्रों से हुई है, जहां इसे मयूरभंज छऊ के नाम से जाना जाता है।
    • यह प्राचीन काल से चला आ रहा है और रामायण, महाभारत तथा स्थानीय पौराणिक कथाओं पर आधारित होता है।
    • योद्धाओं की वीरता, युद्ध कौशल और नाटकीय अभिनय को मुखौटों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है, जो इसे अनोखा बनाता है।
  • प्रदर्शन शैली
    • इस नृत्य में कलाकार रंग-बिरंगे लकड़ी के मुखौटे पहनते हैं, जो पात्रों जैसे राम, कृष्ण, शिव या राक्षसों को दर्शाते हैं।
    • ऊर्जावान गतियां, जोरदार कदम और पारंपरिक वाद्ययंत्र जैसे ढोल, महुरी तथा चहुता के साथ संगीत इसे जीवंत बनाते हैं।
    • नृत्य सामूहिक होता है और चंद्रभागा उत्सव या छऊ यज्ञ जैसे अवसरों पर किया जाता है।
  • अन्य प्रमुख लोक नृत्य
    • ओडिशा में छऊ के अलावा कई अन्य लोकप्रिय नृत्य हैं:
    • डालखाई: महिलाओं द्वारा किया जाने वाला उत्साहपूर्ण नृत्य, जो दुर्गा पूजा के दौरान संबलपुर क्षेत्र में लोकप्रिय है। लाल-सफेद वेशभूषा और तालियों की थाप पर आधारित।
    • गोटिपुआ: लड़के लड़कियों के वेश में नृत्य करते हैं, ओडिशी शैली से प्रेरित, पुरी के मंदिरों से जुड़ा।​
    • चैती घोड़ा: चैत्र मास में मछुआरा समुदाय द्वारा घोड़े की आकृति बनाकर किया जाता है, समृद्धि का प्रतीक।
    • घूमुरा: कालाहांडी का लोकप्रिय नृत्य, ढोल के साथ युद्ध जैसी शैली।
  • सांस्कृतिक महत्व
    • ये नृत्य ओडिशा की जनजातीय विविधता, कृषि चक्र और धार्मिक उत्सवों को दर्शाते हैं।
    • छऊ को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रदर्शित किया जाता है
    • जो राज्य की पहचान मजबूत करता है। इन्हें संरक्षित करने के लिए सरकारी प्रयास जारी हैं।

46. दर्पण एकेडमी ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स (Darpana Academy of Performing Arts) के संस्थापक और संचालक रह चुके किस प्रसिद्ध भारतीय नर्तक/नर्तकी को 1965 में पद्मश्री पुरस्कार मिला था? [MTS (T-I) 13 जून, 2023 (II-पाली), MTS (T-I) 11 जुलाई, 2022 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) मृणालिनी साराभाई
Solution:
  • दर्पण एकेडमी ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स की सह-संस्थापक मृणालिनी साराभाई हैं। उन्हें वर्ष 1965 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
  • संस्थापक और अकादमी का इतिहास
    • मृणालिनी साराभाई ने 1949 में अपने पति विक्रम साराभाई के साथ अहमदाबाद में दर्पण एकेडमी की स्थापना की।
    • यह संस्थान नृत्य, नाटक, संगीत और कठपुतली कला में प्रशिक्षण प्रदान करता है
    • जो भारतीय शास्त्रीय कलाओं को बढ़ावा देने के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता पर केंद्रित रहा।
    • उनकी बेटी मल्लिका साराभाई ने बाद में अकादमी का संचालन संभाला
    • यह आज भी विक्रम साराभाई इंटरनेशनल आर्ट्स फेस्टिवल जैसे आयोजनों के लिए जाना जाता है।​​
  • पद्मश्री पुरस्कार
    • मृणालिनी साराभाई को 1965 में भारतीय शास्त्रीय नृत्य, विशेष रूप से भरतनाट्यम और कथकली में योगदान के लिए पद्मश्री प्रदान किया गया।
    • बाद में 1992 में उन्हें पद्मभूषण भी मिला, जो उनके कला क्षेत्र में लंबे योगदान को दर्शाता है।​​
    • यह पुरस्कार उन्हें भारत सरकार के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक था
    • जो उनकी अकादमी के माध्यम से 18,000 से अधिक छात्रों को प्रशिक्षित करने वाली भूमिका को मान्यता देता है।​
  • उनके जीवन और योगदान
    • मृणालिनी साराभाई (11 मई 1918 - 21 जनवरी 2016) एक प्रसिद्ध शास्त्रीय नर्तकी, कोरियोग्राफर और शिक्षाविद् थीं।
    • उन्होंने अकादमी को सामाजिक टिप्पणी और जागरूकता का मंच बनाया, जहां कलाओं का उपयोग सामाजिक परिवर्तन के लिए किया गया।​​
    • उनकी विरासत आज भी जीवित है, क्योंकि अकादमी ने 35,000 से अधिक छात्रों को प्रशिक्षित किया है
    • कला के माध्यम से सांस्कृतिक परिवर्तन को प्रोत्साहित करती रहती है।​

47. 2018 में गूगल डूडल ने मृणालिनी साराभाई का 100वां जन्मदिन मनाया। वह निम्नलिखित में से किस नृत्य शैली की प्रतिपादक हैं? [CGL (T-I) 14 जुलाई, 2023 (I-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 21 नवंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (b) भरतनाट्यम और कथकली
Solution:
  • मृणालिनी साराभाई भरतनाट्यम और कथकली नृत्य शैलियों की नृत्यांगना हैं। वर्ष 2018 में गूगल डूडल ने मृणालिनी साराभाई का 100वां जन्मदिन मनाया।
  • उन्हें वर्ष 1992 में पद्म भूषण और वर्ष 1965 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।
  • जीवन परिचय
    • मृणालिनी का जन्म केरल के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बचपन से ही नृत्य- संगीत में रुचि रखने वाली वे शांतिनिकेतन गईं
    • जहां रवींद्रनाथ टैगोर ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। बाद में उन्होंने भरतनाट्यम के गुरु से सीखा और कथकली में भी महारत हासिल की।
    • 1948 में उन्होंने अहमदाबाद में दर्पणा अकादमी की स्थापना की, जो शास्त्रीय नृत्य, संगीत और थिएटर का केंद्र बनी।
  • योगदान और उपलब्धियां
    • उन्होंने नृत्य को सामाजिक संदेश देने का माध्यम बनाया।
    • जैसे, "चंडालिका" में अस्पृश्यता और "ताश का देश" (Kingdom of Cards) में सामाजिक अन्याय पर कथकली आधारित प्रस्तुति की।
    • वे पद्मश्री (1965) और पद्मभूषण (1992) से सम्मानित हुईं।
    • प्रसिद्ध वैज्ञानिक विक्रम साराभाई की पत्नी होने के बावजूद उन्होंने अपना कला सफर स्वतंत्र रखा। उनकी बेटी मल्लिका साराभाई भी नृत्यांगना हैं।
  • प्रश्न का उत्तर
    • प्रश्न के विकल्पों में से सही उत्तर है: भरतनाट्यम और कथकली।
    • वे इन शैलियों की न केवल विशेषज्ञ थीं, बल्कि इन्हें आधुनिक संदर्भ में प्रतिपादित करने वाली भी।
    • अन्य विकल्प जैसे कुचिपुड़ी, ओडिसी या यक्षगान से उनका प्रमुख संबंध नहीं था।
  • विरासत
    • दर्पणा अकादमी आज भी सक्रिय है, जहां भरतनाट्यम, कथकली के अलावा मोहिनीयाट्टम भी सिखाया जाता है।
    • उनकी प्रस्तुतियां भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तक को प्रभावित कर चुकी थीं।
    • नृत्य के माध्यम से स्वदेशी कला और हस्तशिल्प को बढ़ावा दिया। 21 जनवरी 2016 को उनका निधन हो गया।

48. वर्ष 1965 में 'पद्मश्री' प्राप्त करने वाली मृणालिनी साराभाई ....... की एक जानी मानी नर्तकी थीं। [MTS (T-I) 02 मई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) भरतनाट्यम
Solution:
  • मृणालिनी साराभाई भरतनाट्यम और कथकली नृत्य शैलियों की नृत्यांगना हैं।
  • वर्ष 2018 में गूगल डूडल ने मृणालिनी साराभाई का 100वां जन्मदिन मनाया।
  • उन्हें वर्ष 1992 में पद्म भूषण और वर्ष 1965 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।
  • वैवाहिक जीवन और परिवार
    • 1942 में उनका विवाह प्रसिद्ध वैज्ञानिक विक्रम साराभाई से हुआ
    • जो भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक थे।
    • दंपति ने अहमदाबाद में 'दर्पण अकादमी फॉर परफॉर्मिंग आर्ट्स' की स्थापना 1949 में की
    • जो नृत्य, संगीत और रंगमंच का प्रमुख केंद्र बना।
    • उनकी बेटी मल्लिका साराभाई भी एक विख्यात नृत्यांगना और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।
  • नृत्य करियर
    • मृणालिनी साराभाई को भरतनाट्यम की प्रमुख प्रचारक के रूप में जाना जाता है।
    • उन्होंने पारंपरिक नृत्य को आधुनिक विषयों जैसे सामाजिक न्याय, पर्यावरण और नारीवाद से जोड़ा।
    • उनके प्रसिद्ध नृत्य नाटक 'शकुंतला' (1975) और अन्य प्रस्तुतियां विश्व स्तर पर सराही गईं।
    • उन्होंने 75 वर्षों तक सक्रिय रहकर हजारों शिष्यों को प्रशिक्षित किया।
  • पुरस्कार सम्मान
    • 1965 में उन्हें पद्मश्री, 1992 में पद्मभूषण और अन्य राष्ट्रीय सम्मान मिले।
    • 1990 में पेरिस में अंतर्राष्ट्रीय नृत्य परिषद की कार्यकारी समिति में नामित हुईं।
    • वे भारत की सांस्कृतिक राजदूत बनीं और संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर भारतीय नृत्य प्रस्तुत किया।
  • सामाजिक योगदान
    • नृत्य के अलावा वे सामाजिक कार्यकर्ता थीं। उन्होंने नारी सशक्तिकरण, शांति और सांप्रदायिक सद्भाव के लिए काम किया।
    • दर्पण अकादमी के माध्यम से उन्होंने सामाजिक मुद्दों पर नृत्य प्रस्तुतियां कीं, जैसे युद्ध विरोधी 'मनुष्य'।​
  • निधन
    • मृणालिनी साराभाई का निधन 21 जनवरी 2016 को 97 वर्ष की आयु में अहमदाबाद में हुआ।
    • नका योगदान भारतीय कला जगत को हमेशा प्रेरित करता रहेगा।

49. निम्नलिखित में से कौन भरतनाट्यम और कथकली नर्तकी हैं? [MTS (T-I) 06 सितंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (c) मृणालिनी साराभाई
Solution:
  • मृणालिनी साराभाई भरतनाट्यम और कथकली नृत्य शैलियों की नृत्यांगना हैं। वर्ष 2018 में गूगल डूडल ने मृणालिनी साराभाई का 100वां जन्मदिन मनाया।
  • उन्हें वर्ष 1992 में पद्म भूषण और वर्ष 1965 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।
  • मृणालिनी साराभाई का परिचय
    • मृ स्वतंत्रता सेनानी अम्बालाल साराभाई की बेटी। उन्होंने भरतनाट्यम सीखा तमिलनाडु की गुरु रुकीमणि देवी अरुंडेल से, जबकि कथकली में केरल के विशेषज्ञों से प्रशिक्षण लिया।
    • उनकी नृत्य यात्रा 1940 के दशक से शुरू हुई, जब उन्होंने मंदिर परंपराओं से प्रेरित होकर इन शैलियों को आधुनिक मंच पर पेश किया।​
  • भरतनाट्यम में योगदान
    • भरतनाट्यम, जो तमिलनाडु से उत्पन्न शास्त्रीय नृत्य है, में मृणालिनी ने भाव, राग और ताल के समन्वय पर जोर दिया।
    • उन्होंने इसे मंदिरों से निकालकर वैश्विक मंचों तक पहुंचाया, जैसे लंदन और अमेरिका के थिएटरों में प्रदर्शन।
    • उनकी शैली में हस्तमुद्राओं और नृत्य तत्वों का कुशल उपयोग था
    • जो देवदासी परंपरा से प्रेरित था। इससे भरतनाट्यम को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में मदद मिली।
  • कथकली में विशेषज्ञता
    • कथकली, केरल का नाट्य-प्रधान नृत्य, मृणालिनी ने अपने प्रदर्शनों में अपनाया, जहां चेहरे के भाव, वेशभूषा और आंखों की अभिव्यक्ति मुख्य हैं।
    • वे उन चुनिंदा नर्तकियों में थीं जिन्होंने इस पुरुष-प्रधान शैली को महिलाओं के लिए सुलभ बनाया।
    • उनके कथकली प्रदर्शन रामायण और महाभारत की कहानियों पर आधारित थे, जो जटिल हावभाव से जीवंत हो उठते थे।
  • दर्पण अकादमी और विरासत
    • 1956 में उन्होंने अहमदाबाद में दर्पण अकादमी ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स की स्थापना की
    • जहां भरतनाट्यम, कथकली समेत कई शैलियां सिखाई जाती हैं।
    • इस संस्था ने हजारों छात्रों को प्रशिक्षित किया और नृत्य को सामाजिक मुद्दों से जोड़ा।
    • उनके योगदान के लिए उन्हें 1962 में पद्म श्री और 1992 में पद्म भूषण मिला। वे 2016 तक सक्रिय रहीं।

50. भरतनाट्यम दक्षिण भारत के धार्मिक विषयों और ....... के आध्यात्मिक विचारों को व्यक्त करता है। [CGL (T-I) 14 जुलाई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (b) शैव धर्म
Solution:
  • भरतनाट्यम एक शास्त्रीय नृत्य शैली है, जिसकी उत्पत्ति भारतीय राज्य तमिलनाडु में हुई थी।
  • यह नृत्य शैली दक्षिण भारत के धार्मिक विषयों और विशेष रूप से 'शैव धर्म' के आध्यात्मिक विचारों को व्यक्त करती है, जो हिंदू धर्म की प्रमुख शाखाओं में से एक है।
  • उत्पत्ति और इतिहास
    • भरतनाट्यम की जड़ें प्राचीन नाट्यशास्त्र में हैं, जो भरत मुनि द्वारा रचित ग्रंथ है।
    • सदियों तक तमिलनाडु के देवदासी (मंदिर नर्तकियों) परंपरा से जुड़ा रहा।
    • 20वीं शताब्दी में रुक्मिणी देवी अरुंडेल जैसे कलाकारों ने इसे मंचीय रूप दिया।
    • यह नृत्य शिव के नटराज रूप से प्रेरित है, जो नृत्य के देवता माने जाते हैं।
  • धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
    • यह नृत्य दक्षिण भारतीय धार्मिक विषयों, विशेषकर शैव धर्म के आध्यात्मिक विचारों को व्यक्त करता है।
    • शैव धर्म में शिव को परम देवता मानकर भक्ति, योग, ध्यान और मोक्ष पर जोर दिया जाता है।
    • प्रदर्शन अक्सर शिव, पार्वती, नटराज या भक्ति कथाओं पर आधारित होते हैं।
    • वैष्णव और शाक्त परंपराओं के विषय भी शामिल होते हैं, लेकिन शैव प्रभाव प्रमुख है।
  • प्रदर्शन की संरचना
    • भरतनाट्यम का पारंपरिक प्रदर्शन अलारिप्पू से शुरू होता है, जो भगवान को नमस्कार है।
    • उसके बाद जटिस्वरम (शुद्ध नृत्य), शब्दम (अभिनय सहित), वरनम (नृत्य-अभिनय का मुख्य भाग) और तिल्लाना (समापन) आता है।
    • वर्णम में शैव भक्ति कथाएं प्रमुख होती हैं। संगीत कार्नाटक शैली का होता है।
  • तत्व और तकनीकें
    • नृत्य (Nritta): लयबद्ध फुटवर्क और मुद्राएं, बिना अभिव्यक्ति के।
    • नृत्य (Nritya): भावपूर्ण कथा वाचन।
    • अभिनय: नेत्र, मुख और अंगों से भाव व्यक्त करना।
    • मुद्राएं संस्कृत श्लोकों या पौराणिक कथाओं का प्रतीक होती हैं।
  • पोशाक, आभूषण और मंच
    • नर्तकी सिल्क साड़ी या पंचकच्छी धोती, मंदिर शैली पोशाक पहनती है।
    • आभूषण सोने के, माथे पर बिंदी, पैरों में घुंघरू।
    • मंच पर चित्रित पृष्ठभूमि शिव मंदिर जैसी होती है। पुरुष भी प्रदर्शन करते हैं।​
  • सांस्कृतिक प्रभाव
    • भरतनाट्यम ने दक्षिण भारत की भक्ति आंदोलनों को मजबूत किया।
    • आज यह योग, ध्यान से जोड़कर आध्यात्मिक साधना है।
    • वैश्विक स्तर पर UNESCO द्वारा अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर मान्यता प्राप्त।
    • यह नृत्य न केवल कला है, बल्कि शिव भक्ति का माध्यम है जो दर्शक को आध्यात्मिक जागरण प्रदान करता है।