हुमायूं और शेरशाह (UPPCS)

Total Questions: 31

1. निम्न नामों में से उसे चिह्नित करिए, जो हुमायूं के भाइयों में से किसी का नाम नहीं था- [U. P. Lower Sub. (Pre) 2008]

Correct Answer: (b) उस्मान
Solution:

कामरान, अस्करी एवं हिन्दाल बाबर के पुत्र तथा हुमायूं के भाई थे। हुमायूं बाबर का ज्येष्ठ पुत्र था। हुमायूं 1508 ई. में काबुल में पैदा हुआ था। उसकी मां माहम बेगम शिया संप्रदाय से संबंधित थीं।

2. हुमायूं द्वारा लड़े गए चार प्रमुख युद्धों का तिथि अनुसार सही क्रम अंकित करें, युद्ध-स्थलों के नाम नीचे अंकित हैं- [41st B.P.S.C. (Pre) 1996]

Correct Answer: (d) देवरा, चौसा, कन्नौज, सरहिंद
Solution:

युद्धों का विवरण:
• देवरा (दौहरिया) का युद्ध (1531): हुमायूँ ने महमूद लोदी को हराया।
• चौसा का युद्ध (1539): शेरशाह सूरी ने हुमायूँ को पराजित किया।
• कन्नौज (बिलग्राम) का युद्ध (1540): शेरशाह ने हुमायूँ को हराकर भारत से निर्वासित किया।
• सरहिंद का युद्ध (1555): हुमायूँ ने सिकंदर सूरी को हराकर दिल्ली का सिंहासन पुनः प्राप्त किया।

3. इनमें से किसने हुमायूं को यह प्रस्ताव दिया था कि यदि उसे बंगाल पर अधिकार करने दिया गया तो वह बिहार को समर्पित कर देगा और 10 लाख दीनार की वार्षिक श्रद्धांजलि अर्पित करेगा? [68thB.P.S.C (Pre) 2022]

Correct Answer: (b) शेर खान
Solution:

यह प्रस्ताव शेर खान (जिन्हें बाद में शेरशाह सूरी के नाम से जाना गया) ने हुमायूँ को दिया था। यह घटना 1537-38 ईस्वी के दौरान की है, जब हुमायूँ ने चुनार के किले का घेरा डाला था। शेर खान अपनी शक्ति को संगठित कर रहा था और उसने कूटनीति का सहारा लेते हुए हुमायूँ के सामने यह संधि का प्रस्ताव रखा था। शेर खान ने हुमायूँ को उलझाए रखा और गुप्त रूप से बंगाल की राजधानी गौड़ पर कब्जा कर लिया। इस घटनाक्रम ने भारत में द्वितीय अफगान साम्राज्य (सूरी वंश) की नींव रखने का मार्ग प्रशस्त किया। इसी संघर्ष के कारण आगे चलकर चौसा का युद्ध (1539) और कन्नौज/बिलग्राम का युद्ध (1540) हुआ, जिसमें शेरशाह ने हुमायूँ को हराकर भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया।

4. निम्नलिखित में से किन दो शासकों के मध्य 17 मई, 1540 में कन्नौज के पास युद्ध हुआ? [U.P.B.E.O. (Pre) 2019]

Correct Answer: (b) शेरशाह एवं हुमायूं
Solution:

17 मई, 1540 को कन्नौज (जिसे बिलग्राम का युद्ध भी कहा जाता है) के पास शेरशाह सूरी और हुमायूँ के मध्य युद्ध हुआ था। 1539 में चौसा के युद्ध में हारने के बाद हुमायूँ अपनी शक्ति संगठित कर रहा था, लेकिन शेरशाह ने उसे संभलने का मौका नहीं दिया। इस युद्ध के बाद हुमायूँ को दिल्ली और आगरा छोड़कर सिंध और फिर फारस (ईरान) भागना पड़ा। इस हार के 15 साल बाद, 1555 में सरहिंद के युद्ध में सूरी साम्राज्य के सिकंदर शाह सूरी को हराकर हुमायूँ ने पुनः दिल्ली की सत्ता हासिल की थी।

5. फरीद, जो बाद में शेरशाह सूरी बना, ने कहां से शिक्षा प्राप्त की थी? [R.A.S./R.T.S. (Pre) 2013]

Correct Answer: (c) जौनपुर
Solution:

फरीद, जो बाद में शेरशाह सूरी बना, ने अपनी शिक्षा जौनपुर से प्राप्त की थी। 1494 ई. में फरीद ने घर छोड़ दिया तथा विद्याध्ययन के लिए जौनपुर चला आया, जो तत्कालीन समय में 'सिराज-ए-हिंद' नाम से प्रसिद्ध था।

6. निम्नलिखित मध्ययुगीन शासकों में से कौन एक उच्च शिक्षित था? [U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2010]

Correct Answer: (d) शेरशाह
Solution:

मध्यकालीन भारतीय शासकों में शेरशाह सूरी अपनी उच्च शिक्षा और विद्वत्ता के लिए विख्यात थे। यद्यपि वे एक महान योद्धा और कुशल प्रशासक थे, लेकिन उनका प्रारंभिक जीवन शिक्षा और ज्ञानार्जन में बीता था। उन्होंने जौनपुर में रहकर अरबी और फारसी साहित्य का गहन अध्ययन किया था। जौनपुर उस समय मध्यकालीन भारत में शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र था। उनकी इसी उच्च शिक्षा का परिणाम था कि जब वे शासक बने, तो उन्होंने 'रुपया' मुद्रा की शुरुआत की और 'ग्रैंड ट्रंक रोड' (GT Road) जैसी विशाल ढांचागत परियोजनाओं को अंजाम दिया।

7. निम्नलिखित में से किस सुल्तान ने पहले "हजरते आला" की उपाधि अपनाई और बाद में 'सुल्तान' की ? [44th B.P.S.C. (Pre) 2000]

Correct Answer: (c) शेरशाह सूरी
Solution:

बंगाल के शासक नुसरत शाह को पराजित करके शेर खां (शेरशाह सूरी) ने 'हजरते आला' की उपाधि धारण की। 1539 ई. में चौसा के युद्ध में हुमायूं को पराजित करके उसने 'शेरशाह' की उपाधि धारण की तथा अपने नाम का खुतबा पढ़वाया और सिक्का चलवाया।

8. शेरशाह सूरी द्वारा किए गए सुधारों में सम्मिलित थे- [Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2003]

1. राजस्व सुधार               2. प्रशासनिक सुधार
3. सैनिक सुधार             4. करेंसी प्रणाली में सुधार

नीचे दिए गए कूटों में से सही उत्तर का चयन कीजिए-

Correct Answer: (d) उपर्युक्त सभी
Solution:

शेरशाह सूरी का मध्ययुगीन भारत में एक महत्वपूर्ण स्थान है। साम्राज्य निर्माता एवं प्रशासक के रूप में उसे अकबर का पूर्वगामी माना जाता है।

1. राजस्व सुधार-शेरशाह का विश्वास था कि साम्राज्य को स्थायित्व प्रदान करने के लिए कृषकों का सुखी एवं संतुष्ट होना आवश्यक है। उसकी यह भी धारणा थी कि भू-राजस्व के रूप में कृषकों पर भारी धनराशि बकाया रह जाती है, जिससे राजकोष को काफी हानि उठानी पड़ती है। अतः भू-राजस्व की धनराशि बकाया नहीं रहनी चाहिए। इस उद्देश्य से शेरशाह ने भूमि व्यवस्था में अनेक सुधार किए। उसकी लगान व्यवस्था मुख्य रूप से रैयतवाड़ी थी, जिसमें किसानों से प्रत्यक्ष संपर्क स्थापित किया गया था।

2. प्रशासनिक सुधार-शेरशाह ने सर्वप्रथम अपने पिता की जागीर के प्रबंधक के रूप में प्रशासन की जानकारी प्राप्त की थी। मुगल सेवा में रहने के कारण उसे मुगलों के प्रशासन, सैनिक संगठन एवं वित्तीय व्यवस्था का पूर्ण ज्ञान था। यही कारण है कि शेरशाह ने अपने पांच वर्षों के अल्प शासनकाल में जो प्रशासन कार्य दिखाया उसके कारण उसकी गणना दिल्ली के सर्वश्रेष्ठ सुल्तानों में की जाती है। शेरशाह का प्रशासन अत्यंत केंद्रीकृत था। शासक स्वयं शासन का प्रधान होता था और संपूर्ण शक्तियां उसी में केंद्रित थीं। शेरशाह ने अपने बंगाल विजय के पूर्व साम्राज्य को 47 सरकारों में विभाजित किया था। शेरशाह ने बंगाल सूबे के लिए एक अलग प्रकार की व्यवस्था की, संपूर्ण सूबे को उसने 19 सरकारों में बांट दिया था तथा प्रत्येक सरकार को एक सैनिक अधिकारी (शिकदार) के नियंत्रण में छोड़ दिया था। उसकी सहायता के लिए एक असैनिक अधिकारी अमीर-ए-बंगाल की नियुक्ति होती थी। यह प्रबंध विद्रोह की आशंका को समाप्त करने के लिए किया गया था।

3. सैनिक सुधार-अपने साम्राज्य को सुदृढ़ करने के लिए शेरशाह ने सैनिक संगठन के क्षेत्र में अनेक सुधार किए। वह सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के सुधारों से बहुत प्रभावित था। बेईमानी को रोकने के लिए उसने घोड़ों को दागने की प्रथा तथा सैनिकों का हुलिया लिखने की प्रथा को लागू किया था।

4. करेंसी प्रणाली में सुधार- शेरशाह का शासनकाल भारतीय मुद्राओं के इतिहास में एक परीक्षण का काल था। उसके मुद्रा सुधार के बारे में वी.ए. स्मिथ ने लिखा था कि "यह रुपया वर्तमान ब्रिटिश मुद्रा प्रणाली का आधार है।" शेरशाह ने पुराने घिसे-पिटे सिक्कों के स्थान पर शुद्ध सोने, चांदी एवं तांबे के सिक्कों का प्रचलन किया। उसने शुद्ध चांदी का रुपया (178 ग्रेन) तथा तांबे का दाम (380 ग्रेन) चलाया। अतः शेरशाह सूरी को उपर्युक्त सभी सुधारों का श्रेय प्राप्त है।

9. दिल्ली सल्तनत के पराभव के उपरांत किस शासक द्वारा स्वर्ण मुद्रा का सर्वप्रथम प्रचलन किया गया? [Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2012]

Correct Answer: (b) हुमायूं
Solution:

दिल्ली सल्तनत के पराभव के उपरांत हुमायूं द्वारा सर्वप्रथम स्वर्ण मुद्रा का प्रचलन किया गया था। हुमायूं के बाद शेरशाह द्वारा भी स्वर्ण मुद्रा जारी करने का उल्लेख प्राप्त होता है। उत्तराखंड लोक सेवा आयोग ने अपने उत्तर-पत्रक में विकल्प (a) को सही माना है, जो कि गलत है।

10. हुमायूं ने चुनार दुर्ग पर प्रथम बार आक्रमण कब किया? [48th to 52nd B.P.S.C. (Pre) 2008]

Correct Answer: (a) 1532 ई.
Solution:

हुमायूं ने चुनार दुर्ग पर प्रथम बार आक्रमण 1532 ई. में किया। यह दुर्ग उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में गंगा नदी के तट पर स्थित है और उस समय आगरा से बंगाल जाने वाले मार्ग पर नियंत्रण रखता था। इस किले को उसने लगभग चार महीने तक घेरे रखा, जिसके बाद शेर खां (शेरशाह) ने हुमायूं की अधीनता स्वीकार कर ली। चुनार दुर्ग को 'पूर्वी भारत का द्वार' कहा जाता था। इसके अतिरिक्त 1531 ई. में उसने कालिंजर पर आक्रमण किया और 1532 ई. में रायसीन के महत्वपूर्ण किले को जीत लिया।