उच्च न्यायालय एवं अधीनस्थ न्यायालय

Total Questions: 14

1. निम्नलिखित में से किस रिट के तहत सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय अधिकार क्षेत्र से अतिरेक होने के आरोप पर अधीनस्थ न्यायालय या अर्ध-न्यायिक निकाय से किसी मामले के रिकॉर्ड की मांग कर सकते हैं? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 17 नवंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (d) प्रतिषेध
Solution:
  • प्रतिषेध-जब कोई निचली अदालत अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण करके किसी मुकदमे की सुनवाई करती है
  • तो ऊपर की अदालतें (उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय) उसे ऐसा करने से रोकने के लिए 'प्रतिषेध' आदेश जारी करती हैं।
  • सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय अधिकार क्षेत्र के अतिरेक (excess of jurisdiction) के आरोप पर अधीनस्थ न्यायालय या अर्ध-न्यायिक निकाय से मामले के रिकॉर्ड की मांग करने के लिए उत्प्रेषण (Certiorari) की रिट जारी करते हैं।
  • यह रिट निचली अदालत या निकाय द्वारा गलत तरीके से जारी किए गए आदेश को रद्द करने और रिकॉर्ड को उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने के लिए प्रयोग होती है
  • जिससे न्यायिक प्रक्रिया की अखंडता सुनिश्चित होती है।​
  • उत्प्रेषण रिट का संवैधानिक आधार
    • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय और अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालयों को यह शक्ति प्राप्त है
    • जो मौलिक अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ प्रशासनिक या न्यायिक अतिरेक को रोकने के लिए रिट जारी करने की अनुमति देती है।
    • उत्प्रेषण रिट मुख्य रूप से तब जारी की जाती है जब निचला निकाय अपनी सीमाओं से बाहर जाकर कार्य करता है या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है
    • इसके लिए उच्च न्यायालय मामले के पूर्ण रिकॉर्ड (जैसे प्रमाण, आदेश) की मांग करता है। यह रिट निवारक नहीं बल्कि सुधारात्मक होती है
    • जो पहले से पारित गलत आदेशों को सुधारती है।​
  • अन्य रिटों से अंतर
    • प्रतिषेध (Prohibition) रिट: यह निचली अदालत को आगे की कार्यवाही रोकने का आदेश देती है जब अधिकार क्षेत्र का अतिरेक स्पष्ट हो, लेकिन रिकॉर्ड की मांग नहीं करती।​
    • निषेध (Mandamus): सार्वजनिक कर्तव्य पालन के लिए आदेश देती है, रिकॉर्ड मांगने से संबंधित नहीं।​
    • अन्य रिटें (जैसे बंदी प्रत्यक्षीकरण या अधिकार पृच्छा): हिरासत या अधिकार वैधता पर केंद्रित होती हैं।​

2. निम्नलिखित में से कौन-सा उच्च न्यायालय 1866 में स्थापित किया गया था? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 28 नवंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (c) इलाहाबाद उच्च न्यायालय
Solution:
  • इलाहाबाद उच्च न्यायालय की स्थापना वर्ष 1866 में हुई थी और यह भारत के सबसे पुराने उच्च न्यायालयों में से एक है।
  • पहले तीन उच्च न्यायालय – कलकत्ता, बंबई और मद्रास – की स्थापना 1862 में हुई थी।
  • इलाहाबाद उच्च न्यायालय पहले आगरा में स्थापित किया गया था और बाद में इसे इलाहाबाद (अब प्रयागराज) स्थानांतरित कर दिया गया।
  • इलाहाबाद उच्च न्यायालय की स्थापना वर्ष 1866 में हुई थी।
  • यह भारत के सबसे पुराने उच्च न्यायालयों में से एक है।
  • यह न्यायालय शुरू में आगरा में उत्तर-पश्चिमी प्रांतों के लिए उच्च न्यायालय के रूप में स्थापित किया गया था।
  • 1869 में, उच्च न्यायालय की सीट आगरा से इलाहाबाद स्थानांतरित कर दी गई थी।
    Other Information
  • बॉम्बे उच्च न्यायालय
    •  1862 में स्थापित, यह भारत के सबसे पुराने उच्च न्यायालयों में से एक है।
    •  महाराष्ट्र और गोवा राज्यों और दमन और दीव, तथा दादरा और नगर हवेली के केंद्र शासित प्रदेशों में कार्य करता है।
  • कलकत्ता उच्च न्यायालय
    •  1862 में स्थापित, यह भारत का सबसे पुराना उच्च न्यायालय है।
    •  पश्चिम बंगाल राज्य और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के केंद्र शासित प्रदेश में कार्य करता है।
  •  मद्रास उच्च न्यायालय
    •  1862 में स्थापित, तमिलनाडु राज्य और पुदुचेरी के केंद्र शासित प्रदेश में कार्य करता है।
    •  भारत के तीन उच्च न्यायालयों में से एक जिसे महारानी विक्टोरिया द्वारा दिए गए लेटर पेटेंट द्वारा स्थापित किया गया था।
  •  केरल उच्च न्यायालय
    •  1956 में स्थापित, केरल राज्य और लक्षद्वीप के केंद्र शासित प्रदेश में कार्य करता है।
  •  गुजरात उच्च न्यायालय
    • इसकी स्थापना 1960 में बम्बई राज्य के गुजरात और महाराष्ट्र में विभाजन के बाद हुई थी।

3. निम्नलिखित में से किस राज्य के उच्च न्यायालय का न्यायिक अधिकार-क्षेत्र केंद्रशासित प्रदेश दमन और दीव तक फैला हुआ है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 2 दिसंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (b) बंबई उच्च न्यायालय
Solution:
  • बंबई उच्च न्यायालय (Bombay High Court) का न्यायिक अधिकार क्षेत्र केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है।
  • यह महाराष्ट्र राज्य, गोवा राज्य, तथा केंद्र शासित प्रदेशों दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव (Dadra and Nagar Haveli and Daman and Diu) पर भी अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करता है।
  • इस उच्च न्यायालय की बेंच नागपुर, पणजी (गोवा) और औरंगाबाद में भी हैं।
  •  यह भारत के तीन उच्च न्यायालयों में से एक थी जो 26 जून, 1862 को महारानी विक्टोरिया द्वारा प्रदान किए गए लेटर पेटेंट द्वारा प्रेसीडेंसी शहरों में स्थापित किया गया था।
  •  उच्च न्यायालय महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में स्थित है।
  •  न्यायालय की क्षेत्रीय शाखाएँ नागपुर, औरंगाबाद और पणजी (गोवा) में हैं।
    Other Information
  • भारत में उच्च न्यायालय
    • भारत में प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में एक उच्च न्यायालय है, हालांकि कुछ उच्च न्यायालयों का अधिकार क्षेत्र एक से अधिक राज्य या केंद्र शासित प्रदेशों पर है।
    • उच्च न्यायालय प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में मूल अधिकार क्षेत्र के प्रमुख दीवानी न्यायालय हैं
    • वे दीवानी और फौजदारी दोनों मामलों की सुनवाई करने के लिए अधिकृत हैं।
    • उनके पास निचली अदालतों से अपील सुनने और मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए रिट जारी करने की भी शक्ति है।
    • उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश और राज्य के राज्यपाल के परामर्श से की जाती है।
  •  दमन और दीव के केंद्र शासित प्रदेश
    •  दमन और दीव 2019 तक दमन और दीव के केंद्र शासित प्रदेश के दो अलग-अलग जिले थे।
    • 2020 में, उन्हें दादरा और नगर हवेली के साथ मिलाकर दादरा और नगर हवेली और दमन और दीव का नया केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया।
    • ये क्षेत्र 1961 में भारत द्वारा अपने अधीन किए जाने तक पुर्तगाली भारत का हिस्सा थे।
    • इन क्षेत्रों पर अधिकार क्षेत्र वाला उच्च न्यायालय बॉम्बे उच्च न्यायालय है।
  • अधिकार क्षेत्र
    • अधिकार क्षेत्र का अर्थ है कानूनी निर्णय और निर्णय लेने की आधिकारिक शक्ति।
    • उच्च न्यायालयों के संदर्भ में इसका अर्थ है भौगोलिक क्षेत्र या मामलों की श्रेणी जिस पर न्यायालय का अधिकार है।
    • कछ उच्च न्यायालयों का अधिकार क्षेत्र कई राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों पर है, जबकि अन्य एक राज्य या केंद्र शासित प्रदेश तक सीमित हैं।
    • उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को विधान द्वारा बढ़ाया या बदला जा सकता है।

4. परिवार न्यायालय (संशोधन) विधेयक निम्नलिखित में से किन राज्यों में परिवार न्यायालय अधिनियम के कार्यक्षेत्र के विस्तार के लिए प्रावधान करना चाहता है? [MTS (T-I) 09 मई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) हिमाचल प्रदेश और नगालैंड
Solution:
  • परिवार न्यायालय (संशोधन) विधेयक, 2022 को जुलाई 2022 में संसद में पेश किया गया था।
  • इस विधेयक का उद्देश्य परिवार न्यायालय अधिनियम, 1984 को हिमाचल प्रदेश और नागालैंड राज्य के कुछ जिलों तक विस्तारित करना था
  • जहाँ केंद्र सरकार ने इन न्यायालयों को स्थापित करने की अधिसूचना नहीं दी थी। यह विधेयक इन राज्यों में अधिनियम के तहत स्थापित पारिवारिक न्यायालयों को वैधता प्रदान करता है।
  • यह कदम उन दो राज्यों में संरचित न्यायिक ढांचे को एक समान केंद्रीय ढांचे के अनुरूप लाने के लिए उठाया गया है।​
  • पार्श्व प्रभाव:
    • विधेयक प्रस्तावित करता है कि राज्य सरकारें पहले से स्थापित परिवार न्यायालयों के जजों की नियुक्ति, पोस्टिंग, प्रमोशन, आदि से संबंधित आदेश भी मान्य माने जाएँ; जिससे उन जजों के अधिकार क्षेत्र और कार्यवाही केंद्रीय अधिनियम के अनुरूप बने रहें।​
  • पूर्वव्यापी मान्यता:
    • हिमाचल प्रदेश (15 फरवरी 2019 से) और नगालैंड (12 सितंबर 2008 से) में स्थापित परिवार न्यायालयों के लिए पूर्वव्यापी वैधानिक कवरेज सुनिश्चित किया जाना है।
    • इससे दोनों राज्यों के परिवार न्यायालयों से जुड़ी पूर्व रिपोर्टेड कार्रवाइयों और नियुक्तियों की वैधानिक वैधता मिलती है।​
  • किन राज्यों में विस्तार के प्रावधान
    • हिमाचल प्रदेश: 15 फरवरी 2019 से स्थापित परिवार न्यायालयों के लिए अधिनियम के दायरे का विस्तार (विधेयक के अनुसार) और पूर्वव्यापी मान्यता।​
    • नगालैंड: 12 सितंबर 2008 से स्थापित परिवार न्यायालयों के लिए अधिनियम के दायरे का विस्तार (विधेयक के अनुसार) और पूर्वव्यप मान्यता।​
  • प्रमुख वैधानिक बिंदु (संशोधन की प्रकृति)
  • धारा 3ए:
    • नया प्रावधान जोक्षेत्र-स्तरीय (state-level) परिवार न्यायालयों के क्षेत्राधिकार के विस्तार, नियुक्ति/पदस्थापन के आदेशों के मान्यता और अन्य संरचनात्मक पहलुओं को वैधानिक आधार देता है।
    • इससे मध्यस्थता/सुलह पर जोर देने के उद्देश्य को बनाए रखने के साथ साथ राज्य स्तर के न्यायालयों को केंद्रीय अधिनियम के अनुरूप संचालित किया जा सके।​
  • क्षेत्राधिकार का अनुपालन:
    • एक बार किसी क्षेत्र के लिए परिवार न्यायालय स्थापित हो जाने पर उसका क्षेत्राधिकार अनन्य माना जाएगा, ताकि अन्य न्यायाधिकरणों का вмешान कम हो और न्यायिक प्रक्रिया में स्पष्टता बनी रहे। यह अवधारणा उसी प्रकार रहेगी जैसे केंद्रीय अधिनियम के अंतर्गत निर्धारित है।​
  • राज्यों के ऐतिहासिक संदर्भ
    • हिमाचल प्रदेश और नगालैंड में पहले से स्थापित परिवार न्यायालयों के कार्यों को केंद्र की अधिनियम-रेखा के हिसाब से वैधानिक रूप से मान्यता देना, ताकि उनके निर्णय, नियुक्तियाँ, ट्रांसफर आदि केंद्र-आधारित मानकों के अनुरूप हों। हिमाचल प्रदेश में 2019 से, नगालैंड में 2008 से परिवार न्यायालय अस्तित्व में हैं।​
    • इस प्रकार, यह विधेयक उन दो राज्यों के लिए “पूर्वव्यापी मान्यता” और “कार्य-क्षेत्र विस्तार” का औपचारिक अधिकार देता है ताकि कानूनी स्थिति स्पष्ट और एकरूप हो सके।​
  • तुलना (संक्षिप्त)
    • उद्देश्य: क्षेत्रीय विस्तार और पूर्वव्यापी वैधानिक कवरेज बनाना।
    • प्रभाव: जजों की नियुक्ति/स्थानांतरण आदि के आदेश मान्य; क्षेत्राधिकार अनन्य बनना।
    • सीमाएं: केवल हिमाचल प्रदेश और नगालैंड के लिए प्रस्तावित; अन्य राज्यों के लिए समान विस्तार के लिए अलग प्रक्रिया की आवश्यकता होगी।​

5. अक्टूबर, 2022 की स्थिति के अनुसार, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए ऊपरी आयु-सीमा क्या है? [MTS (T-I) 19 जून, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) 62 वर्ष
Solution:
  • संविधान उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए कोई ऊपरी आयु सीमा निर्धारित नहीं करता है।
  • हालांकि, एक बार नियुक्त होने के बाद, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु तक अपना पद धारण करते हैं (अनुच्छेद 217(1))। चूंकि सेवानिवृत्ति की आयु 62 वर्ष है, इसलिए अनौपचारिक रूप से यह नियुक्ति के लिए अधिकतम विचारणीय आयु बन जाती है।
  • अक्टूबर 2022 तक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए अधिकतम आयु सीमा 62 वर्ष है।
  • केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा 2021 में यह सीमा 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष कर दी गई।
  • अनुभवी वकीलों को न्यायाधीश बनने के अधिक अवसर प्रदान करने के लिए आयु सीमा बढ़ा दी गई।
  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु 62 वर्ष है।
    Other Information
  •  भारत में जिला न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए अधिकतम आयु सीमा 57 वर्ष है।
  •  भारत में अधीनस्थ न्यायपालिका के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए अधिकतम आयु सीमा 55 वर्ष है।
  •  उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए अधिकतम आयु सीमा 60 वर्ष थी, जिसे 2021 में बढ़ाकर 62 वर्ष कर दिया गया था।
  • आयु-सीमा: ऊपरी आयु-सीमा 62 वर्ष (अक्टूबर 2022 तक मान्य).​
  • प्रासंगिक नियम/तारीख: 2021 में 60 से 62 वर्ष की वृद्धि हुई थी; यह वृद्धिहट उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के लिए लागू है.​
  • अन्य नियुक्ति आयु-सीमाएं (कीवर्ड तुलना): जिला न्यायालय के लिए सामान्यतः 35-45 वर्ष के भीतर नियम और उच्च न्यायालय के लिए 60-62 वर्ष तक की रेंज के संदर्भ मिलते हैं, परन्तु अक्टूबर 2022 तक उच्च न्यायालय के लिए 62 वर्ष अधिकतम आयु थी.​
  • SSC/अन्य परीक्षाओं के पूर्व प्रश्नों में अक्टूबर 2022 तक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के लिए अधिकतम आयु 62 वर्ष बताई गई है.​

6. उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति की आयु क्या है? [CHSL (T-I) 07 जून, 2022 (II-पाली)]

Correct Answer: (b) 62
Solution:
  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 217(1) के अनुसार, एक उच्च न्यायालय का न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक पद पर बना रहता है।
  • यह आयु-सीमा 15वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1963 द्वारा 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष की गई थी।
  • इसके विपरीत, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्ष है।
  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति आयु अनुच्छेद 217(1) और 15वें संशोधन (1963) के ऐतिहासिक बदलाव से संबद्ध है।
  • प्रारंभ में यह आयु 60 वर्ष थी, जिसे 1963 में 62 वर्ष कर दिया गया था, ताकि न्यायिक सेवाओं में स्थायित्व और अनुभव बना रहे.​
  • सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति आयु अलग है और वही 65 वर्ष निर्धारित है, जबकि उच्च न्यायालय के लिए 62 वर्ष ही मान्य मानक है.​
  • यह व्यवस्था भारत के संविधान के अंतर्निहित प्रावधानों के अनुसार बनी है ताकि न्यायिक निकाय में क्रमिक बदलाव और रिक्तियों के समुचित प्रबंधन को सुनिश्चित किया जा सके.​
  • सेवानिवृत्ति आयु के बारे में बहसें चलती रहती हैं ताकि न्यायिक कार्यभार और लंबित मामलों के समाधान में संतुलन रहे, पर अभी के वर्तमान मानक के अनुसार उच्च न्यायालय के लिए 62 वर्ष निर्धारित है.​

  • समय-समय पर इस आयु वृद्धि पर नीति-चर्चाएं और विधेयक प्रसंग रहते हैं, लेकिन वास्तविक प्रावधान के अनुसार वर्तमान स्थिति यही है.

  • प्रमुख स्रोत
    • 60 से 62 वर्ष के बीच की आयु वृद्धि से उम्रदराज न्यायाधीशों के अनुभव को बनाए रखने में मदद मिलती है जबकि युवा पीढ़ी के succession planning के लिए अवसर खुलते हैं.​
    • सुप्रीम कोर्ट के लिए 65 वर्ष की आयु मानक है, जबकि उच्च न्यायालय के लिए 62 वर्ष है; इनके बीच का अंतर संविधान के अनुच्छेदों और संशोधनों द्वारा निर्धारित है.
    • उच्च न्यायालय न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति आयु 62 वर्ष (1963 के 15वें संशोधन द्वारा बदलाव).​
    • सुप्रीम Court और उच्च न्यायालय के आयु मानक तुलना.

7. निचली अदालत या सरकारी अधिकारी को अनिवार्य या पूर्णतः कार्यालयी कर्तव्यों को सही ढंग से निर्वाह करने हेतु बाध्य करने के लिए निम्न में से कौन-सी रिट एक उच्च न्यायालय द्वारा जारी की जाती है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 20 नवंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) परमादेश
Solution:
  • परमादेश रिट (Writ of Mandamus) का शाब्दिक अर्थ है 'हम आदेश देते हैं' (We command)।
  • यह रिट किसी सार्वजनिक अधिकारी, अधीनस्थ न्यायालय, निगम या अर्ध-सरकारी निकाय को उनके वैधानिक या सार्वजनिक कर्तव्य को निभाने के लिए आदेश देने के लिए जारी की जाती है, जब वे ऐसा करने से अस्वीकार करते हैं या विफल रहते हैं।
  • उच्च न्यायालय द्वारा निचली अदालत या सरकारी अधिकारी को बाध्य करने के लिए जारी की जाने वाली रिट है बंदी प्रत्यक्षीकरण जैसी संरचनाएं भी शामिल हो सकती हैं, लेकिन केंद्रित प्रश्न का पालन कराए” के संदर्भ में सबसे सामान्य और स्पष्ट उत्तर है:
  • रिट युक्त उच्च न्यायालय द्वारा जारी की जाने वाली रिटें, जो अधिकार क्षेत्र के अनुसार विभिन्न प्रकार की होती हैं—परिप्रेक्ष्य के अनुसार सबसे अक्सर पूछे जाने वाले प्रकार हैं: बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश , निषेध  और उत्प्रेषण .
  • इस प्रश्न के लिए विशेष रूप से पूर्णतः कार्यालयीय कर्तव्यों के निर्वहन को बाध्य कराने हेतु उच्च न्यायालय द्वारा जारी रिट “Mandamus” है।
  • महत्वपूर्ण बिंदु
  • Mandamus का अर्थ: एक तथ्य-आधारित आदेश जो किसी निचली अदालत, सरकारी अधिकारी या किसी अधिकारी/संस्थात्मक अधिकारी को उनका कानून-निर्दिष्ट कर्तव्य निर्वहन करने के लिए बाध्य करता है। यह तब जारी किया जाता है जब अधिकारी स्वयं अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर स्पष्ट कर्तव्यों के उल्लंघन या अवहेलना कर रहा हो ।​
  • Mandamus सीधे तौर पर “कर्तव्य निर्वहन” के लिए एक प्रमुख रिट है। जब किसी सरकारी अधिकारी ने अपना कानूनी कर्तव्य पूरा नहीं किया या उचित प्रशासनिक आचरण नहीं किया, तो उच्च न्यायालय Mandamus जारी कर उस कर्तव्य के पालन की दिशा निर्देश देता है ।​
  • यह अधिकारिक-प्रशासनिक प्रणाली में न्यायायोग्य नियंत्रण स्थापित करता है ताकि भ्रष्टाचार, देरी या दायित्व-उल्लंघन रोका जा सके ।​
  • नोट्स और सावधानियाँ
  • रिट का चयन और उपयोग न्यायिक विवेक, कानून और तथ्य-परिस्थितियों पर निर्भर करता है; अदालतों द्वारा उपयुक्त रिट उसी अनुसार तय की जाती है ।​
  • भारत के संविधान और न्यायिक इतिहास में उच्च न्यायालयों के पास मूल, अपीलीय और सलाहकार अधिकार क्षेत्र हैं, पर Mandamus जैसे आदेश उनके मौलिक अधिकारों के संरक्षण और प्रशासनिक नियंत्रण के भाग हैं ।​

8. किस वर्ष तक दिल्ली के उच्च न्यायालय ने हिमाचल प्रदेश पर अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करना जारी रखा? [CHSL (T-I) 27 जुलाई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (c) 1971
Solution:
  • दिल्ली उच्च न्यायालय की स्थापना 1966 में हुई थी। 1966 से 1971 तक, यह केंद्र शासित प्रदेशों दिल्ली और हिमाचल प्रदेश दोनों के लिए अपील की सर्वोच्च अदालत के रूप में कार्य करता था।
  • जब 25 जनवरी, 1971 को हिमाचल प्रदेश को राज्य का दर्जा मिला, तो उसका अपना अलग उच्च न्यायालय (हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय) स्थापित हुआ और दिल्ली उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार समाप्त हो गया।
  • 1971 में, हिमाचल प्रदेश राज्य को अपना स्वयं का उच्च न्यायालय प्रदान किया गया, जिसने राज्य में दिल्ली उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार को प्रतिस्थापित कर दिया।
  • 1966 में, पंजाब को दो राज्यों (पंजाब और हरियाणा) में विभाजित कर दिया गया और दिल्ली उच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली और हिमाचल प्रदेश तक सीमित कर दिया गया।
  •  हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय अधिनियम, 1971 द्वारा 25 जनवरी, 1971 को हिमाचल प्रदेश राज्य को अपना स्वयं का उच्च न्यायालय प्रदान किया गया।
    Other Information
  • किसी राज्य में सर्वोच्च न्यायिक न्यायालय उच्च न्यायालय है।
  • इसे भारत के सर्वोच्च न्यायालय के बाद देश में दूसरा सबसे बड़ा न्यायालय कहा जाता है।
  • संसद ने भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम 1861 पारित किया जिसमें तीन प्रेसीडेंसी: कलकत्ता, मद्रास और बॉम्बे में उच्च न्यायालयों की स्थापना का सुझाव दिया गया।
  • प्रारम्भिक संरचना:
    • भारत के उच्च न्यायालय 1861 के उस कानून के अंतर्गत स्थापित अनेक प्रेसीडेंसी उच्च न्यायालयों के अंतर्गत आते थे, जिनमें दिल्ली भी एक थी।
    • इसके बाद समय के साथ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के कानूनन विभाजन के कारण उच्च न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र भी बदले गए।
    • दिल्ली उच्च न्यायालय का कारण: 1966-1967 के समय में निरीक्षण और पुनर्गठन के कारण हिमाचल प्रदेश पर भी दिल्ली उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का प्रभाव बना रहा।
    • यह व्यवस्था इसलिए बनी ताकि हिमाचल प्रदेश में न्यायिक मामलों की देखरेख दिल्ली उच्च न्यायालय के पदावधि में कामचलाऊ तरीके से होती रहे।
    • स्रोतों के अनुसार, 1967 तक हिमाचल प्रदेश के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय की हिमाचल बेंच या न्यायिक आयुक्त के न्यायालय के रूप में व्यवस्था चलती रही। [web स्रोतों के संक्षेप विवरण के अनुसार यह संक्रमण 1967 तक बना रहा]।​
  • हिमाचल प्रदेश का स्वतंत्र उच्च न्यायालय:
    • 1971 के हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय अधिनियम के माध्यम से हिमाचल प्रदेश राज्य को अपना स्वयं का उच्च न्यायालय मिला; 25 जनवरी 1971 को यह नई संस्थागत व्यवस्था प्रभावी हुई।
    • इस अधिनियम के साथ दिल्ली उच्च न्यायालय का हिमाचल प्रदेश पर अधिकार क्षेत्र पूरी तरह समाप्त हो गया और हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय स्थापित हो गया। [web स्रोतों के अनुसार 25 जनवरी 1971 को हिमाचल प्रदेश को अपना उच्च न्यायालय दिया गया]​
    • प्रासंगिक संदर्भ: 1966-1967 के बीच दिल्ली उच्च न्यायालय अधिनियम के क्रियान्वयन और हिमाचल प्रदेश में न्यायिक व्यवस्था के संक्रमण के कारण Delhi High Court का हिमाचल प्रदेश पर अधिकार क्षेत्र अस्थायी रूप से रहा; हिमाचल प्रदेश के स्वतंत्र उच्च न्यायालय के निर्माण के साथ यह अधिकार क्षेत्र समाप्त हो गया।​
    • महत्व: यह परिवर्तन भारतीय न्याय व्यवस्था में केंद्र-राज्य के अधिकार क्षेत्र के री-डायरेक्शन का एक ठोस उदाहरण है
    • जिसमें एक केंद्र शासित प्रदेश के भीतर स्थानीय न्यायिक संरचना के लिए स्वतंत्र उच्च न्यायालय का निर्माण भी सम्मिलित है।​

9. दिल्ली उच्च न्यायालय की स्थापना वर्ष ....... में की गईथी। [MTS (T-I) 08 मई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (d) 1966
Solution:
  • दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) की स्थापना दिल्ली उच्च न्यायालय अधिनियम, 1966 के तहत 31 अक्टूबर 1966 को की गई थी।
  • इसकी स्थापना से पहले, पंजाब उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार दिल्ली तक फैला हुआ था।
  • दिल्ली उच्च न्यायालय की स्थापना 1966 में हुई थी।
  •  दिल्ली उच्च न्यायालय भारत के छह उच्च न्यायालयों में से एक है।
  •  इसका अधिकार क्षेत्र राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली और केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ पर है।
  •  दिल्ली उच्च न्यायालय की स्थापना 1966 में संसद के एक अधिनियम द्वारा की गई थी, जिसने पहले पंजाब उच्च न्यायालय की जगह ली थी, जिसका 1956 में केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली के गठन से पहले दिल्ली पर अधिकार क्षेत्र था।
    Other Information
  • भारतीय उच्च न्यायालय सभी भारतीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों पर अपीलीय अधिकार वाले सर्वोच्च न्यायालय हैं।
  •  अधिकांश उच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के अनुसार रिट याचिकाओं के साथ-साथ अधीनस्थ न्यायालयों की अपीलों को भी संभालते हैं।
  • उच्च न्यायालय का एक अन्य मूल क्षेत्राधिकार रिट क्षेत्राधिकार है।
  • वर्ष 1956 वह वर्ष है जब केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली का गठन हुआ था।
  • वर्ष 1862 वह वर्ष है जब कलकत्ता उच्च न्यायालय की स्थापना हुई थी, जिसका उस समय दिल्ली पर अधिकार क्षेत्र था।

10. भारतीय संविधान का निम्नलिखित में से कौन-सा अनुच्छेद उच्च न्यायालयों की रिट से संबंधित है? [CHSL (T-I) 09 मार्च, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (c) 226
Solution:
  • अनुच्छेद 226 प्रत्येक उच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों को लागू करने के साथ-साथ किसी अन्य उद्देश्य के लिए भी पाँच प्रकार की रिट (बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार पृच्छा) जारी करने की शक्ति प्रदान करता है।
  • अनुच्छेद 32 सर्वोच्च न्यायालय की रिट जारी करने की शक्ति से संबंधित है, लेकिन यह केवल मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए है।
  • इस प्रकार, उच्च न्यायालय की रिट शक्ति (अनुच्छेद 226) सर्वोच्च न्यायालय की रिट शक्ति (अनुच्छेद 32) की तुलना में अधिक व्यापक है।
  • उच्च न्यायालय को मौलिक अधिकार के प्रवर्तन के लिए निर्देश, आदेश या रिट जारी करने का अधिकार है और किसी भी अन्य उद्देश्य के लिए इसमें शामिल हैं:
  •  बन्दी प्रत्यक्षीकरण
  •  परमादेश
  •  प्रतिषेध
  •  अधिकार-पृच्छा
  •  उत्प्रेषण लेख
  •  सर्वोच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों का रक्षक और प्रत्याभूतिकर्ता माना जाता है (अनुच्छेद 32)।
    Other Information
  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 को डॉ. बी. आर. अम्बेडकर द्वारा भारतीय संविधान के हृदय और आत्मा' के रूप में वर्णित किया गया है।
  • यह एक नागरिक को उनके मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामले में सर्वोच्च न्यायालय से संपर्क करने का अधिकार देता है।
  • इसे संवैधानिक उपचारों का अधिकार भी कहा जाता है।
  • यह रिट आधारित आदेशों के माध्यम से अधीनस्थ न्यायालयों, प्रशासनिक अधिकारियों या अन्य संस्थाओं के विरुद्ध न्यायिक नियंत्रण सुनिश्चित करता है.​
  • यह प्रवर्तनाधिकार प्रमुख रूप से उच्च न्यायालयों को दिए गए हैं; सर्वोच्च न्यायालय के समान रिट अधिकार अनुच्छेद 32 के अंतर्गत आता है, जो संविधान की सुरक्षा के लिए दृश्य-हीन परामर्श देता है, जबकि अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों के लिए विशिष्ट है.​
  • रिट के प्रकार और प्रयोजन:
    • Writs: habeas corpus, mandamus, prohibition, certiorari, prohibition आदि के माध्यम से कानूनी अधिकारों का संरक्षण और अवरोधन सुनिश्चित करना.उच्च
    • न्यायालयों के पास अपने क्षेत्र में नागरिकों के मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए यह अधिकार है
    • मामलों में सर्वोच्च न्यायालय भी रिट जारी कर सकता है (अनुच्छेद 32 के तहत).​
  • ध्यान दें
    • अन्य अनुच्छेद भी रिट-प्रदान करते हैं (जैसे अनुच्छेद 32 सर्वोच्च न्यायालय के रिट अधिकार), लेकिन आपकी विशेष प्रश्न के अनुसार उच्च न्यायालयों की रिट से जुड़ा प्रमुख अनुच्छेद अनुच्छेद 226 है.