उद्देशिका (भारतीय राजव्यवस्था)

Total Questions: 6

1. भारतीय संविधान में निम्नलिखित में से किस शब्द का उल्लेख नहीं है? [CHSL (T-I) 4 अगस्त, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) संघवाद
Solution:
  • भारतीय संविधान में "संघवाद" (Federation) शब्द का कहीं भी स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं है। इसके बजाय, अनुच्छेद 1 भारत को "राज्यों का संघ" (Union of States) घोषित करता है।
  • हालांकि भारतीय राजव्यवस्था प्रकृति में संघीय है, लेकिन संविधान में "संघवाद" शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है।
  • धर्मनिरपेक्ष," "समाजवादी," और "गणतंत्र" शब्दों का उल्लेख संविधान की प्रस्तावना में है।
  • प्रस्तावना का पाठ
    • भारतीय संविधान की प्रस्तावना में मुख्य शब्द हैं: संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, गणराज्य, न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व।
    • यह 26 नवंबर 1949 को अपनाई गई थी और 42वें संशोधन (1976) द्वारा समाजवादी, पंथनिरपेक्ष तथा अखंडता जोड़े गए।
    • प्रस्तावना संविधान के मूल दर्शन को प्रतिबिंबित करती है, लेकिन "संघीय" जैसे शब्द का इसमें कहीं स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता।​
  • संघीयता का संदर्भ
    • संविधान अनुच्छेद 1 में भारत को "राज्यों का भारत संघ" कहता है, जो संघीय ढांचे को इंगित करता है, परंतु शुद्ध रूप से "संघीय" शब्द संपूर्ण दस्तावेज में अनुपस्थित है।
    • यह विशेषता भारतीय संविधान को इकाई-संघीय (quasi-federal) बनाती है, जहां केंद्र मजबूत है।
    • परीक्षाओं में अक्सर "संघीय" को प्रस्तावना से गैर-उल्लिखित शब्द के रूप में पूछा जाता है।​
  • अन्य समान उदाहरण
    • संविधान में "संघ" शब्द सीमित रूप से प्रयुक्त है, लेकिन "संघीय" नहीं।
    • प्रस्तावना के शब्दों का क्रम: न्याय, स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व—ये सभी मौजूद हैं।​

2. निम्नलिखित में से कौन-सा शब्द भारतीय संविधान की मूल प्रस्तावना का हिस्सा नहीं था? [CHSL (T-I) 02 अगस्त, 2023 (IV-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 14 नवंबर, 2023 (1-पाली)]

Correct Answer: (a) धर्मनिरपेक्ष
Solution:
  • भारतीय संविधान की मूल प्रस्तावना में 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द शामिल नहीं था। इसे 'समाजवादी' और 'अखंडता' शब्दों के साथ 42वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा प्रस्तावना में जोड़ा गया था।
  • मूल प्रस्तावना में केवल 'संप्रभु/सार्वभौम,' 'लोकतांत्रिक,' और 'गणराज्य' शब्द शामिल थे।
  •  मूल प्रस्तावना में निम्नलिखित शब्द थे. "हम, भारत के लोग, भारत को एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने का गंभीरतापूर्वक संकल्प लेते हैं ... "
  • लोकतांत्रिक", "'रिपब्लिक' और ''संप्रभु" सभी मूल प्रस्तावना का हिस्सा थे और भारतीय संविधान का अभिन्न अंग बने हुए हैं।
  • लोकतांत्रिक" का तात्पर्य जनता द्वारा और जनता के लिए सरकार के सिद्धांत से है।
  • गणतंत्र" का अर्थ है कि राज्य का प्रमुख निर्वाचित होता है, वंशानुगत नहीं।
  • संप्रभु'' का अर्थ है कि भारत एक स्वतंत्र और स्वतंत्र देश है जो बाहरी नियंत्रण के अधीन नहीं है।
    other Information
  • भारतीय संविधान की प्रस्तावना को 26 नवंबर 1949 को अपनाया गया था।
  • यह एक परिचयात्मक वक्तव्य है जो संविधान के मूलभूत सिद्धांतों और मूल्यों को निर्धारित करता है।
  • प्रस्तावना में मूल रूप से 22 शब्द थे, लेकिन 1976 के 42वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम द्वारा इसमें ''समाजवादी" और "धर्मनिरपेक्ष' शब्दों को शामिल करने के लिए संशोधन किया गया था।
  • 1976 में प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ जोड़ा गया था ताकि यह दर्शाया जा सके कि भारत एक ऐसा देश है जिसका कोई आधिकारिक धर्म नहीं है
  • राज्य द्वारा सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार किया जाता है।
  • भारतीय संविधान की मूल प्रस्तावना, जो 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा अपनाई गई थी, में "धर्मनिरपेक्षता" (Secular) शब्द शामिल नहीं था।
  • इसमें मुख्य रूप से "सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य" का उल्लेख था, साथ ही न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व जैसे मूल्य।​
  • मूल प्रस्तावना के प्रमुख शब्द
    • न्याय: सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय।
    • स्वतंत्रता: विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था और उपासना की।
    • समता: प्रतिष्ठा और अवसर की।
    • बंधुत्व: व्यक्ति की गरिमा तथा राष्ट्र की एकता सुनिश्चित करने वाली।
      "धर्मनिरपेक्षता" को 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा जोड़ा गया।​
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
    • मूल प्रस्तावना जवाहरलाल नेहरू के उद्देश्य प्रस्ताव (13 दिसंबर 1946) पर आधारित थी, जो संविधान के मूल्यों को परिभाषित करती है।
    • 1976 के संशोधन ने "समाजवादी", "पंथनिरपेक्ष" और "अखंडता" शब्द जोड़े, जिससे प्रस्तावना का स्वरूप बदला। यह संशोधन आपातकाल के दौरान हुआ था।

3. भारतीय संविधान के 42वें संशोधन की प्रस्तावना में निम्नलिखित में से कौन-से शब्द जोड़े गए थे? [MTS (T-I) 15 जून, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) समाजवादी
Solution:
  • 42वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा प्रस्तावना में तीन नए शब्द जोड़े गए थे: 'समाजवादी' (Socialist), 'धर्मनिरपेक्ष' (Secular), और 'अखंडता' (Integrity)। विकल्प (a), (c), और (d) (गणतंत्र, सार्वभौम, लोकतांत्रिक) मूल प्रस्तावना का हिस्सा थे।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
    • यह संशोधन आपातकाल (1975-1977) के दौरान इंदिरा गांधी सरकार द्वारा पारित किया गया, जिसे "मिनी संविधान" कहा जाता है
    • क्योंकि इसने संविधान के 59 भागों में बदलाव किए। प्रस्तावना में ये शब्द जोड़कर भारत की सामाजिक-आर्थिक नीतियों को समाजवादी ढांचा, धार्मिक तटस्थता और राष्ट्रीय एकता पर जोर दिया गया।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने केशवानंद भारती मामले (1973) में प्रस्तावना को संविधान का हिस्सा माना था, लेकिन इन शब्दों को मूल ढांचे का उल्लंघन न मानते हुए 2024 में इनकी वैधता की पुष्टि की।​
  • शब्दों का महत्व
    • समाजवादी: आर्थिक समानता, गरीबी उन्मूलन और संसाधनों के समान वितरण को बढ़ावा देना, जो नीति-निर्देशक तत्वों से जुड़ा।
    • धर्मनिरपेक्ष: राज्य का सभी धर्मों से समान व्यवहार और कोई राज्य धर्म न होना, जो भारतीय संदर्भ में सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता दर्शाता।
    • अखंडता: राष्ट्र की क्षेत्रीय, सांस्कृतिक और भावनात्मक एकता की रक्षा, विशेषकर विभाजन के बाद।
      ये शब्द मूल प्रस्तावना (26 नवंबर 1949) में अनुपस्थित थे और संशोधन ने संविधान की आत्मा को परिभाषित किया।​
  • अन्य प्रमुख प्रावधान
    • 42वें संशोधन ने मौलिक कर्तव्य (अनुच्छेद 51क) जोड़े, नीति-निर्देशक तत्वों का विस्तार किया (जैसे अनुच्छेद 39A: निःशुल्क कानूनी सहायता)
    • संसद की शक्तियों को बढ़ाया, न्यायिक समीक्षा सीमित की और लोकसभा/विधानसभाओं का कार्यकाल 5 से 6 वर्ष किया (बाद में 44वें संशोधन द्वारा पूर्ववत)। कई राज्य सूची विषय समवर्ती सूची में स्थानांतरित हुए।​

4. भारतीय संविधान की प्रस्तावना में, ....... किसी व्यक्ति की गरिमा को सुनिश्चित करता है। [MTS (T-I) 02 मई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) बंधुता
Solution:
  • प्रस्तावना में कहा गया है कि बंधुता (भाईचारा) दो बातों को सुनिश्चित करेगी: व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता तथा अखंडता।
  • बंधुता की भावना ही सभी नागरिकों में एक-दूसरे के प्रति सम्मान और अपनत्व की भावना पैदा करती है, जो व्यक्ति की गरिमा के लिए आवश्यक है।
  • प्रस्तावना का संदर्भ
    • भारतीय संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है कि हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए
    • उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख
    • 26 नवम्बर 1949 ई॰ को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं। यहां "बंधुत्व" स्पष्ट रूप से व्यक्ति की गरिमा, राष्ट्र की एकता और अखंडता को आश्वस्त करने वाला मूल्य है।​
  • बंधुत्व का अर्थ और महत्व
    • बंधुत्व का तात्पर्य सभी नागरिकों के बीच भाईचारे, एकजुटता और पारस्परिक सम्मान से है, जो व्यक्ति की व्यक्तिगत गरिमा को सुरक्षित रखता है। यह सुनिश्चित करता है
    • जाति, धर्म, लिंग या सामाजिक स्थिति की परवाह किए बिना हर व्यक्ति को सम्मान और मूल्यवान महसूस हो। बंधुत्व सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देता है
    • क्योंकि यह मानवता की सहज एकता पर जोर देता है और राष्ट्र की अखंडता को मजबूत बनाता है।​
  • अन्य मूल्यों से तुलना
    • प्रस्तावना के चार मुख्य मूल्य—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व—एक-दूसरे के पूरक हैं। न्याय सभी को समान व्यवहार सुनिश्चित करता है, स्वतंत्रता व्यक्तिगत अधिकार देती है
    • समानता अवसर प्रदान करती है, जबकि बंधुत्व विशेष रूप से गरिमा और एकता पर केंद्रित है। बिना बंधुत्व के, अन्य मूल्य अधूरे रहते, क्योंकि यह ही सामाजिक विभाजन को रोकता है।​
  • संवैधानिक व्याख्या
    • सुप्रीम कोर्ट ने केशवानंद भारती मामले (1973) में प्रस्तावना को संविधान का हिस्सा माना, जो बंधुत्व सहित इन मूल्यों को मूल संरचना का भाग बनाता है।
    • यह व्यक्ति की गरिमा को मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 21) से जोड़ता है, जहां जीवन का अधिकार सम्मानजनक जीवन का अर्थ रखता है।​

5. भारत के संविधान की प्रस्तावना में निम्नलिखित में से किसका उल्लेख है? [CGL (T-I) 27 जुलाई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (b) विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था और उपासना की स्वतंत्रता
Solution:
  • प्रस्तावना में पाँच प्रकार की स्वतंत्रता का उल्लेख है: विचार (Thought), अभिव्यक्ति (Expression), विश्वास (Belief), आस्था (Faith), और उपासना (Worship)। न्याय का उल्लेख 'सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक' न्याय के रूप में है, जबकि समानता 'प्रतिष्ठा और अवसर' की है, न कि 'स्थिति और रोजगार' की।
  • भारतीय संविधान की प्रस्तावना में न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व, संप्रभुता, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र जैसे मूल्यों का स्पष्ट उल्लेख है।
  • यह प्रस्तावना संविधान का प्रारंभिक भाग है जो पूरे दस्तावेज के उद्देश्यों, दर्शन और आदर्शों को संक्षेप में व्यक्त करती है।​
  • प्रस्तावना का पूर्ण पाठ
    • प्रस्तावना इस प्रकार है: "हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को: सामाजिक
    • आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता
    • अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर, 1949 ई० को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं
    • यह पाठ मूल रूप से 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा अपनाया गया था और 42वें संशोधन (1976) द्वारा 'समाजवादी', 'धर्मनिरपेक्ष' तथा 'अखंडता' शब्द जोड़े गए।​
  • प्रमुख उल्लिखित मूल्य
    • न्याय (Justice): सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, जो सभी नागरिकों को समान अवसर और संसाधनों का वितरण सुनिश्चित करता है।​
    • स्वतंत्रता (Liberty): विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, जो मौलिक अधिकारों का आधार है।​
    • समानता (Equality): प्रतिष्ठा और अवसर की समता, जो भेदभाव को समाप्त कर सामाजिक समानता को बढ़ावा देती है।​
    • बंधुत्व (Fraternity): व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता-अखंडता, जो सामाजिक सद्भाव और एकता को मजबूत करता है।​
    • अन्य विशेषताएँ: संप्रभुता (बाहरी नियंत्रण से मुक्ति), समाजवाद (आर्थिक समानता), धर्मनिरपेक्षता (सभी धर्मों का समान सम्मान) और लोकतंत्र (जनता का शासन)।​
  • महत्व और व्याख्या
    • प्रस्तावना को संविधान की 'आत्मा' कहा जाता है, जैसा कि संविधान सभा सदस्य पंडित ठाकुर दास भार्गव ने उल्लेख किया।
    • यह संविधान के मूल दर्शन को प्रतिबिंबित करती है
    • न्यायालय द्वारा व्याख्या में आधार बनी है, हालांकि यह विधायी शक्ति का स्रोत नहीं है।
    • केशवानंद भारती मामले (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे संविधान की 'मूल संरचना' का हिस्सा माना।
    • यह सामाजिक-आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना का खाका प्रस्तुत करती है।​

6. किसने भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) को 'भारतीय संविधान की राजनीतिक कुंडली' के रूप में वर्णित किया? [CHSL (T-I) 13 अक्टूबर, 2020 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी
Solution:
  • प्रसिद्ध विधिवेत्ता, संविधान विशेषज्ञ और प्रारूप समिति के सदस्य कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने प्रस्तावना को "भारतीय संविधान की राजनीतिक कुंडली" (Political Horoscope of the Indian Constitution) कहकर संबोधित किया था।
  • यह प्रस्तावना के महत्त्व और संविधान के मूल दर्शन को दर्शाता है।
  • के.एम. मुंशी का परिचय
    • के.एम. मुंशी (कन्हैयालाल मनिकलाल मुंशी) एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, वकील, लेखक, राजनीतिज्ञ और संविधान सभा के सदस्य थे।
    • वे गुजराती साहित्यकार के रूप में प्रसिद्ध थे और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सक्रिय नेता रहे। संविधान निर्माण में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही, विशेषकर मसौदा समिति में योगदान के रूप में।​
  • इस वर्णन का संदर्भ
    • मुंशी ने अपनी पुस्तक "द फ्रेमिंग ऑफ इंडियाज कॉन्स्टिट्यूशन" में इस अभिव्यक्ति का उपयोग किया।
    • उन्होंने प्रस्तावना को संविधान की "राजनीतिक कुंडली" कहा क्योंकि यह संपूर्ण दस्तावेज के मूल सिद्धांतों, उद्देश्यों और शासन व्यवस्था की रूपरेखा प्रस्तुत करती है,
    • ठीक वैसे ही जैसे कुंडली किसी व्यक्ति के भविष्य की भविष्यवाणी करती है।
    • यह वर्णन संविधान सभा की बहसों के दौरान उभरा, जहां प्रस्तावना को देश के राजनीतिक भविष्य का मार्गदर्शक माना गया।​​
  • प्रस्तावना का महत्व इस संदर्भ में
    • यह उपमा प्रस्तावना की व्याख्यात्मक शक्ति को रेखांकित करती है, जो संविधान की आत्मा के समान कार्य करती है।
    • सर्वोच्च न्यायालय के केशवानंद भारती मामले (1973) में इसे मूल संरचना का हिस्सा माना गया, जो मुंशी के दृष्टिकोण को मजबूत करता है।
    • अन्य विद्वानों जैसे ठाकुर दास भार्गव ने इसे "संविधान की आत्मा" कहा, जबकि अर्नेस्ट बार्कर ने "कुंजी"।​