1. पंडित नेहरू द्वारा प्रस्तुत "ऑब्जेक्टिव प्रस्ताव" अंततोगत्वा उद्देशिका बना।
2. इसकी प्रकृति न्याययोग्य (Justiciable) नहीं है।
3. इसका संशोधन नहीं किया जा सकता।
4. संविधान के विशिष्ट प्रावधानों को यह रद्द (Override) नहीं कर सकता।
Correct Answer: (b) केवल 1,2 और 4
Solution:पंडित नेहरू द्वारा 13 दिसंबर, 1946 को प्रस्तुत तथा संविधान सभा द्वारा 22 जनवरी, 1947 को स्वीकृत ऑब्जेक्टिव (उद्देश्य) प्रस्ताव ही अंततोगत्वा भारतीय संविधान की उद्देशिका बना था। प्रस्तावना का विधिक स्वरूप यह है कि इसे लागू नहीं किया जा सकता। इसकी प्रकृति न्याययोग्य (Justiciable) नहीं है। यद्यपि संविधान के विशिष्ट प्रावधानों को यह रद्द (override) नहीं कर सकती तथापि केशवानंद भारती मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार, संविधान की उद्देशिका का उपयोग संविधान के अस्पष्ट क्षेत्रों की व्याख्या करने में किया जा सकता है। उद्देशिका में संशोधन संभव है तथा 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा इसमें 'समाजवादी', 'पंथनिरपेक्ष' एवं 'अखंडता' शब्द जोड़े गए थे। उद्देशिका संविधान के स्पष्ट प्रावधानों को रद्द नहीं कर सकती है। इसका उपयोग भ्रम को दूर करने में किया जाता है। उद्देशिका का उपयोग इस निष्कर्ष के समर्थन में किया जाता है कि संविधान के मूल ढांचे में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है।