कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र (अर्थव्यवस्था)

Total Questions: 32

21. भारत में शुरू में उच्च उपज विविधता कार्यक्रम (HYVP) कितने क्षेत्र में लागू किया गया था? [CGL (T-I) 05 दिसंबर, 2022 (IV-पाली)]

Correct Answer: (c) 2 मिलियन हेक्टेयर
Solution:
  • भारत में वर्ष 1966-67 के खरीफ मौसम में उच्च उपज विविधता कार्यक्रम शुरू किया गया था।
  • शुरू में यह कार्यक्रम लगभग 2 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में लागू किया गया था।
  • प्रारंभिक क्षेत्र
    • HYVP को भारत में शुरुआत में लगभग 2 मिलियन हेक्टेयर (20 लाख हेक्टेयर) क्षेत्र में लागू किया गया था।
    • यह क्षेत्र मुख्य रूप से सिंचित और अच्छी जलवायु वाले इलाकों जैसे पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों तक सीमित था
    • जहां गेहूं, चावल, ज्वार, बाजरा और मक्का जैसी फसलों पर फोकस किया गया।
  • उद्देश्य और पृष्ठभूमि
    • कार्यक्रम का मुख्य लक्ष्य 1970-71 तक खाद्यान्नों में आत्मनिर्भरता हासिल करना था
    • क्योंकि 1965-66 के सूखे ने देश को खाद्यान्न संकट की ओर धकेल दिया था।
    • चौथी पंचवर्षीय योजना (1969-74) के दौरान इसे विस्तार दिया गया
    • लेकिन प्रारंभिक चरण में उच्च उपज वाली बीज किस्मों (HYV), उर्वरकों, कीटनाशकों और सिंचाई सुविधाओं पर जोर दिया गया।
    • भारतीय रिजर्व बैंक ने केंद्रीय सहकारी बैंकों के माध्यम से किसानों को वित्तीय सहायता प्रदान की।
  • कार्यान्वयन के चरण
    • पायलट परियोजना: इससे पहले 1960 के दशक में इंटेंसिव एग्रीकल्चर डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम (IADP) के तहत 7 जिलों में प्रयोग किया गया था
    • विस्तार: 1966-67 में 1.9 से 2 मिलियन हेक्टेयर में शुरूआत हुई, जो बाद में बढ़कर पूरे देश के प्रमुख अनाज उत्पादक क्षेत्रों तक फैल गया।
    • फसल-विशिष्ट: केवल 5 फसलों (गेहूं, चावल, ज्वार, बाजरा, मक्का) तक सीमित रहा, जिससे गहन कृषि को बढ़ावा मिला।
  • प्रभाव और सीमाएं
    • इस कार्यक्रम ने खाद्यान्न उत्पादन में तेज वृद्धि की, जैसे गेहूं का उत्पादन दोगुना हो गया।
    • हालांकि, यह बड़े किसानों और सिंचित क्षेत्रों तक सीमित रहा, जिससे छोटे किसानों और वर्षा आधारित क्षेत्रों में असमानता बढ़ी।
    • मिट्टी की उर्वरता में कमी और जल स्तर गिरना जैसे नकारात्मक प्रभाव भी सामने आए।​

22. इनमें से किस क्षेत्र में हरित क्रांति पैकेज की पहली लहर चली? [CHSL (T-I) 14 अगस्त, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (a) पंजाब
Solution:
  • भारत में हरित क्रांति का प्रारंभ वर्ष 1966-67 में हुआ था। इसका प्रथम चरण वर्ष 1966-67 से वर्ष 1981 तक चला।
  • प्रथम चरण में इसे हरियाणा, पंजाब तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लागू किया गया था।
  • पहली लहर का क्षेत्र
    • हरित क्रांति की पहली लहर अधिक समृद्ध और सिंचाई-सुविधाओं वाले राज्यों तक सीमित रही
    • जिनमें पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु प्रमुख थे।
    • पंजाब को विशेष प्राथमिकता मिली क्योंकि यहां कृषि अवसंरचना मजबूत थी, नहरें उपलब्ध थीं
    • प्राकृतिक आपदाओं का खतरा कम था। इन क्षेत्रों में HYV बीज, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक और आधुनिक सिंचाई ने फसलों की पैदावार में क्रांतिकारी वृद्धि की।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
    • भारत में हरित क्रांति तीसरी पंचवर्षीय योजना (1961-66) के दौरान 1965-66 से शुरू हुई
    • जब एम.एस. स्वामीनाथन ने नॉर्मन बोरलॉग के विकसित गेहूं बीजों को अपनाया।
    • पहला चरण (1965-1980) फसल-विशिष्ट (गेहूं, चावल, ज्वार, बाजरा, मक्का) और क्षेत्र-विशिष्ट था
    • जिसका लक्ष्य खाद्यान्न आत्मनिर्भरता था। इससे 1960 के दशक के अंत तक गेहूं उत्पादन दोगुना हो गया।
  • प्रभाव और विशेषताएं
    • पहली लहर ने पंजाब-हरियाणा बेल्ट को अन्न भंडार बना दिया
    • लेकिन छोटे किसानों और कम सिंचित क्षेत्रों को लाभ कम मिला।
    • HYV बीजों ने उपज बढ़ाई, परंतु मिट्टी क्षरण, जल स्तर गिरावट और असमानता जैसे नकारात्मक प्रभाव भी पड़े।
    • दूसरी लहर (1980-1991) पूर्वी क्षेत्रों (बिहार, पश्चिम बंगाल) तक फैली।
  • मुख्य फसलें और तकनीकें
    • गेहूं और चावल मुख्य फोकस रहे, जहां HYV बीजों ने 1.5-2 गुना उपज दी।
    • उर्वरक, कीटनाशक और ट्यूबवेल सिंचाई का पैकेज अपनाया गया।​
    • पंजाब में गेहूं उत्पादन 1960 के 1.9 मिलियन टन से 1970 तक 7.2 मिलियन टन हो गया।​

23. निम्नलिखित में से कौन-सा पुराने कुओं के सूखने में योगदान देने वाला प्राथमिक कारक है? [CHSL (T-I) 8 अगस्त, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (b) आस-पास के इलाकों में काफी संख्या में बोरिंग पंप लगा दिए गए हैं।
Solution:
  • प्रश्नगत विकल्पों में आस-पास के इलाकों में काफी संख्या में बोरिंग पंप लगा देने के कारण पुराने कुएं सूख गए हैं।
  • बोरिंग पंप लगाने के कारण पानी का जलस्तर नीचे हो गया, जिससे पुराने कुएं सूख गए।
  • पुराने कुओं के सूखने के पीछे के प्रमुख तत्त्व
    • भूजल स्तर की गिरावट: समय के साथ क्षेत्र की जलापूर्ति घटने पर कुओं में पानी का स्तर नीचे गिर जाता है
    • सूखा पड़ सकता है। भूजल पुनर्संचयन में कमी और अधिक खींचतान दोनों कारण बनते हैं.
    • अत्यधिक बोरिंग पम्पिंग: आसपास के इलाक़े में अनियंत्रित या अत्यधिक बोरिंग पम्प लगने से भूमिगत जल का माँग बढ़ता है और कुओं में पानी खत्म हो सकता है.
    • सतही आच्छादन (हार्डस्केपिंग): पेड़ों की कटाई के साथ-साथ सीमेंट/कोलतार से आस-पास की सतह को ढकना पानी के भूमिगत प्रवेश (percolation) को रोकता है
    • जिससे कुओं में पुनः जल आना कम हो जाता है.
    • मिट्टी और जल प्रवाह में परिवर्तन: पेड़ों की जड़ें मिट्टी के स्पंज-जैसे संरचना बनाती हैं
    • बारिश के पानी को सोखकर धीरे-धीरे भूमिगत जल में पहुंचाए।
    • पेड़ हटाने या मिट्टी के संरचनात्मक परिवर्तन से यह स्पंज-फंक्शन घट जाता है और जल भूग्रहण कम होता है.
    • वर्षा और सतही जल का नुकसान: जलग्रहण क्षेत्र के अवरोधन से बारिश का पानी भूमिगत प्रवेश नहीं कर पाता
    • जिससे सतह पर ही पानी समाप्त होकर नीचे नहीं जा पाता.​​
  • उच्चारण और व्यावहारिक उदाहरण
    • गाँव/कुल-घिस के नमूनों में देखा गया है कि आसपास के क्षेत्र में बहुत से बोरिंग पम्प लगाए जाने के कारण भूजल-स्तर तेजी से घटा
    • साथ ही पानी संरक्षण के अभाव में कुओं के आसपास का क्षेत्र цемेंट/आवरण से ढक दिया गया, जिससे जल रिसाव नहीं हो पाता और कुएँ सूख जाते हैं.
    • बावड़ियाँ/बावरी (दीर्घ गड्ढे में एक जल-संरचना) भी पानी संचयन का एक पारंपरिक तरीका रहे हैं
    • परन्तु आधुनिक कटिंग/हार्डस्केपिंग से सतह से जल नीचे नहीं पहुँच पाता, जिससे कुएँ में पानी घटता है.​
  • क्या किया जा सकता है (संशोधन और रोकथाम के उपाय)
    • कुएँ की सफाई और मरम्मत: गाद/मरम्मत की आवश्यकता हो तो उसे साफ करना
    • दीवारों की मरम्मत और जल-रिसाव रोकना, पानी के दबाव के अनुसार ताले/ढक्कन ठीक करना आदि उपाय मददगार हो सकते हैं.​
    • हार्डस्केपिंग कम करना: कुएं के पास से पेड़ लगाना और मृत जल संचयन को बढ़ावा देना
    • सतह पर कंक्रीट-फर्श हटाकर जल को मिट्टी में प्रवेश करने देना चाहिए.​
    • जल-प्रवर्तन संरचना बनाना: वातावरण में जलधारणा के लिए स्पंज-स्थापना या जल-संरक्षित क्षेत्र बढ़ाने के उपाय करना
    • वर्षा का पानी धीरे-धीरे भूमिगत में जा सके.​
    • समुदाय-स्तर पर जल-मैनेजमेंट: बोरिंग पम्प के उचित नियंत्रण
    • जल-यूनिटों के साथ जल-स्तर_monitoring, और सतत जल-प्रबंधन नीति अपनाना ताकि भूजल-स्तर स्थिर रहे.​
  • अनुसंधान-निर्देश और पाठसार
    • उपरोक्त कारणों के बारे में शिक्षण-स्रोतों/नीतियों में भूजल-स्तर गिरावट, अत्यधिक विद्युत पम्पिंग
    • सतह अवरोधन को पुराने कुओं के सूखने के प्रमुख कारक के रूप में प्रस्तुत किया गया है.
    • यदि किसी क्षेत्र में विशेष कुएँ के सूखने की स्थिति स्पष्ट है
    • तो स्थानीय जल-खपत, पम्पिंग-नियमावली, और सतह-आच्छादन का आकलन कर उपयुक्त जल-प्रबंधन योजना बनाई जानी चाहिए.​
  • उल्लेखित स्रोतों से संक्षेप प्रमाण
    • प्रमुख कारणों में भूजल कमी, बोरिंग पम्पिंग की बढ़ोतरी, और सतह/मिट्टी के परिवर्तन शामिल हैं; ये कारण एक साथ कुओं के सूखने में योगदान करते हैं.
    • पारिवारिक/शिक्षण स्रोतों में भी यही तर्क दिया गया है
    • पानी के अवरोधन से जमीन के जल-भंडार में कमी आती है और कुएँ सूख जाते हैं.​​

24. सामान्य रूप से कम श्रम और पूंजी के साथ बड़े-बड़े खेतों में कृषि को ....... कहा जाता है। [CHSL (T-I) 4 अगस्त, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (d) विस्तृत खेती
Solution:
  • विस्तृत आकार वाले खेतों पर यांत्रिक विधियों से की जाने वाली कृषि को विस्तृत खेती (Extensive Farming) कहते हैं।
  • इस प्रकार की कृषि में श्रम तथा पूंजी का उपयोग कम होता है, किंतु प्रति व्यक्ति उत्पादन की मात्रा अधिक होती है।
  • स्पष्ट परिभाषा
    • व्यापक कृषि वह पद्धति है जिसमें भूमि के बड़े हिस्से पर कम-से-कम श्रम और पूंजी के इनपुट के साथ भोजन उत्पादन किया जाता है
    • परिवार की भूख पूरी हो सके और स्थानीय समुदाय के लिए खाद्य सुरक्षा बनाए रखी जा सके।
    • इस पद्धति में प्राकृतिक पूरक खेती, घटे हुए उन्नत तकनीकों और कम लागत वाले इनपुट का उपयोग प्रमुख होता है।
    • यह अक्सर कम जनसंख्या घनत्व वाले इलाकों में सफल रहती है और फसल उपज अपेक्षाकृत अधिक नहीं पर स्थिर रहती है।
    • (उद्धरणात्मक जानकारी के संदर्भ के लिए संदर्भित शिक्षण स्रोतों से मिलान किया जा सकता है)
  • महत्वपूर्ण बिंदु
  • लाभ:
    • कम लागत और सरल तकनीकें, जिससे छोटे किसान भी अपनाते हैं।
    • स्थानीय खाद्य जरूरतों पर केंद्रित उत्पादन।
    • पारंपरिक ज्ञान और पारिस्थितिकी के अनुकूलन के साथ स्थिरता।
  • सीमाएं:
    • प्रति हेक्टेयर उपज अपेक्षा से कम हो सकती है।
    • बड़े बाजारों के लिए निर्यात-आधारित उत्पादन की कमी।
    • मौसमी जोखिमों (सूखा, बाढ़) पर अधिक संवेदनशीलता।
  • विकल्प और संबंधित प्रकार
    • गहन कृषि: कम भूमि पर उच्च उपज के लिए भारी पूंजी-श्रम इनपुट और आधुनिक तकनीक का उपयोग।
    • संकर/आधुनिक बायोटेक कृषि: उन्नत किस्में, त्वरित पैदावार, रोग-कीट प्रतिरोध आदि।
    • पूंजीवादी कृषि: बड़े कॉर्पोरेट इनपुट और वैश्विक बाज़ार के लिए उत्पादन।
  • उपयोगी नोट्स
    • यदि आप पाठ्य-पुस्तक या आईएएस/यूपीएससी जैसे परीक्षाओं के लिए उत्तर खोज रहे हैं
    • तो "व्यापक कृषि" या "विस्तृत कृषि" शब्द पाए जाते हैं, जो कम इनपुट में बड़े खेतों की खेती को दर्शाते हैं।
    • ऐतिहासिक संदर्भ में इसे “extensive farming” भी कहा गया है।
    • आप चाहें तो मैं इसे एक सुधरी हुई, सेक्शन-बाय-सेक्शन परिभाषा-उदाहरण शैली में अधिक विस्तृत फ्रेम में दे सकता हूँ
    • पाठ्यपुस्तकीय उदाहरणों के साथ तुलना सारणी बना सकता हूँ।
    • यदि चाहें, मैं आपको एक संक्षिप्त, चरणबद्ध उदाहरण दे सकता हूँ कि कैसे व्यापक कृषि के अंतर्गत खेत कैसे आते हैं
    • किस प्रकार के फसल पैटर्न आम होते हैं, और इनके आर्थिक/पर्यावरणीय प्रभाव कैसे मापे जाते हैं।

25. 2011-2012 तक भारत के प्राथमिक क्षेत्रक में कार्यरत महिलाओं का प्रतिशत कितना था? [CHSL (T-I) 4 अगस्त, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) 62.8%
Solution:
  • वर्ष 2011-12 की स्थिति के अनुसार, भारत के प्राथमिक क्षेत्रक में कार्यरत महिलाओं का प्रतिशत 62.8 प्रतिशत था।
  • आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण, 2022-23 के अनुसार, सामान्य स्थिति के संदर्भ में देश के कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी वर्ष 2017-18 के 23.3 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2022-23 में लगभग 37 प्रतिशत हो गई है।
  • 2011-2012 में भारत के प्राथमिक क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी
    • यह आंकड़ा उस समय के आर्थिक सर्वेक्षणों और श्रम बल डेटा पर आधारित है
    • जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की प्रमुख भूमिका को दर्शाता है।​
  • प्राथमिक क्षेत्र का संदर्भ
    • प्राथमिक क्षेत्र भारत की अर्थव्यवस्था का आधार रहा है, जहां कुल कार्यबल का बड़ा हिस्सा लगा हुआ था।
    • 2011 की जनगणना और NSSO (राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन) के 68वें दौर (2011-12) के आंकड़ों के अनुसार, महिलाएं इस क्षेत्र में मुख्य रूप से कृषि मजदूर
    • किसान और संबद्ध गतिविधियों में सक्रिय थीं। कुल कार्यरत महिलाओं में से करीब 62.8% इसी क्षेत्र में थीं
    • जबकि पुरुषों की तुलना में उनकी संख्या अधिक थी
    • क्योंकि ग्रामीण महिलाएं अक्सर परिवारिक खेती में बिना वेतन के योगदान देती हैं।
  • क्षेत्रीय और लिंग-आधारित वितरण
    • ग्रामीण क्षेत्रों में यह प्रतिशत और ऊंचा था, जहां कुल महिला श्रमिकों का लगभग 70-75% प्राथमिक क्षेत्र में केंद्रित था।
    • 2011 जनगणना के अनुसार, कुल श्रमिकों में महिलाओं की हिस्सेदारी 25.51% थी, जिसमें प्राथमिक क्षेत्र का वर्चस्व स्पष्ट था (कृषि में 54.6% कुल कार्यबल)।​
    • शहरी महिलाओं की भागीदारी कम थी, लेकिन ग्रामीण प्रवास के कारण प्राथमिक क्षेत्र में उनका योगदान महत्वपूर्ण बना रहा।​
  • ट्रेंड्स और चुनौतियां
    • इस अवधि में महिलाओं की कुल श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) 25.51% थी, जो पुरुषों के 53.26% से काफी कम थी।
    • प्राथमिक क्षेत्र में उच्च प्रतिशत के बावजूद, यह क्षेत्र कम उत्पादकता, मौसमी रोजगार और जलवायु प्रभावों से ग्रस्त था।
    • सरकार ने NRLM (राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन) और MKSP जैसी योजनाओं से महिलाओं को सशक्त बनाने का प्रयास किया
    • लेकिन लिंग असमानता बनी रही। 2011-12 के बाद यह प्रतिशत धीरे-धीरे घटा, क्योंकि अर्थव्यवस्था तृतीयक क्षेत्र की ओर खिसकी।

26. इनमें से कौन-सा हरित क्रांति के नकारात्मक प्रभावों में से एक नहीं है? [CHSL (T-I) 9 अगस्त, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (c) हरित क्रांति के कारण शहरी से ग्रामीण क्षेत्रों में प्रवास में वृद्धि हुई।
Solution:
  • विकल्प (c) को छोड़कर अन्य सभी विकल्प हरित क्रांति के नकारात्मक प्रभावों में शामिल हैं।
  • हरित क्रांति के फलस्वरूप केवल मध्यम तथा बड़े किसान ही नई तकनीक से लाभान्वित हुए।
  • इससे लघु किसान, जिनकी कृषि क्षेत्र में अधिक भागीदारी है, अछूते रहे। इनके कारण लघु किसानों का ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर विस्थापन बढ़ा।
  • मुख्य नकारात्मक प्रभाव
    • हरित क्रांति के प्रमुख नकारात्मक प्रभावों में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरता में कमी
    • मृदा क्षरण, लवणीकरण और अम्लीकरण शामिल हैं। जल संसाधनों का अंधाधुंध दोहन सिंचाई के लिए हुआ
    • जिससे भूजल स्तर गिरा और जल संकट उत्पन्न हुआ। फसल विविधता की कमी से जैव विविधता का ह्रास हुआ
    • एकल फसलों (जैसे गेहूं-चावल) पर निर्भरता बढ़ी, और छोटे किसानों के लिए मशीनरी तथा रसायनों का बोझ असहनीय साबित हुआ।
  • जो नकारात्मक प्रभाव नहीं है
    • हरित क्रांति के नकारात्मक प्रभावों में शहरी से ग्रामीण क्षेत्रों की ओर प्रवासन में वृद्धि नहीं आता
    • वास्तव में, इसके विपरीत ग्रामीण से शहरी प्रवासन बढ़ा क्योंकि बड़े किसानों को लाभ हुआ
    • छोटे किसान तथा भूमिहीन मजदूर शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हुए।
    • अन्य सामान्य विकल्प जैसे "बढ़ती कीमतें और नकद भुगतान" या "बांधों का निर्माण" भी कभी-कभी भ्रमित किए जाते हैं
    • ये या तो सकारात्मक परिणाम हैं या हरित क्रांति से असंबंधित।
  • सामाजिक-आर्थिक असर
    • सामाजिक असमानता बढ़ी क्योंकि बड़े किसान (पंजाब, हरियाणा जैसे क्षेत्रों में) उच्च उपज वाली बीजों, उर्वरकों और सिंचाई से लाभान्वित हुए
    • जबकि छोटे तथा सीमांत किसान कर्ज के जाल में फंसे और भूमिहीन श्रमिक बन गए।
    • ग्रामीण गरीबी, स्वास्थ्य समस्याएं (रसायनों से प्रदूषण) और ऋण जाल की समस्या उभरी।
    • पर्यावरणीय रूप से, जल प्रदूषण, यूट्रोफिकेशन और लाभकारी कीटों का नुकसान हुआ।
  • दीर्घकालिक परिणाम
    • रासायनिक इनपुट्स ने मिट्टी के सूक्ष्मजीवों को नष्ट किया, जिससे दीर्घकालिक उत्पादकता घटी।
    • पारंपरिक फसलों की आनुवंशिक विविधता कम हुई, फसलें रोगों के प्रति संवेदनशील हो गईं।
    • आज भी नई हरित क्रांति की मांग मृदा स्वास्थ्य सुधार और टिकाऊ कृषि के लिए हो रही है।​

27. नाबार्ड (NABARD) द्वारा 2015 में कृषि और गैर-कृषि गतिविधियों दोनों में लोगों की आजीविका को बढ़ावा देने के लिए निम्नलिखित में से कौन-सा कार्यक्रम शुरू किया गया था? [CHSL (T-I) 02 अगस्त, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (d) एलईडीपी (LEDP)
Solution:
  • दिसंबर, 2015 में नाबार्ड द्वारा कृषि एवं गैर-कृषि गतिविधियों में लगे लोगों की आजीविका को बढ़ावा देने के लिए
  • आजीविका और उद्यम विकास कार्यक्रम (LEDP) प्रारंभ किया गया था।
  • इसके तहत समूहों में आजीविका संवर्धन कार्यक्रमों के संचालन की परिकल्पना की गई थी।
  • कार्यक्रम का उद्देश्य
    • LEDP का मुख्य लक्ष्य ग्रामीण परिवारों को कृषि (जैसे बागवानी, पशुपालन, मत्स्यपालन) और गैर-कृषि (जैसे हस्तशिल्प, खाद्य प्रसंस्करण, ग्रामीण उद्योग) क्षेत्रों में टिकाऊ आजीविका विकल्प प्रदान करना है।
    • यह स्वयं सहायता समूहों (SHG), संयुक्त दायित्व समूहों (JLG) और व्यक्तिगत उद्यमियों को लक्षित करता है
    • खासकर महिलाओं, कारीगरों और सीमांत किसानों को।
    • कार्यक्रम प्रशिक्षण, कौशल उन्नयन और वित्तीय सहायता के माध्यम से मार्जिनलाइज्ड समुदायों को सशक्त बनाता है।
  • प्रमुख विशेषताएं
    • प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण: कृषि एवं गैर-कृषि गतिविधियों में व्यावहारिक प्रशिक्षण, जिसमें उद्यम प्रबंधन, बाजार लिंकेज और तकनीकी कौशल शामिल हैं।
    • वित्तीय सहायता: अनुदान, ऋण रिफाइनेंसिंग और सब्सिडी के माध्यम से फंडिंग, जो SHG और JLG के माध्यम से वितरित की जाती है।
    • लक्षित लाभार्थी: ग्रामीण युवा, महिलाएं, छोटे किसान और गैर-कृषि उत्पादक, जो वैकल्पिक रोजगार विकल्प चुन सकें।
    • साझेदारी मॉडल: एनजीओ, वित्तीय संस्थान और सरकारी एजेंसियों के साथ सहयोग।
  • कार्यान्वयन और प्रभाव
    • कार्यक्रम नाबार्ड के उद्भवन केंद्रों और सहायक संस्थाओं के माध्यम से लागू होता है
    • जो स्टार्ट-अप्स को 'वैली ऑफ डेथ' चरण में सहायता देते हैं।
    • 2017 से विस्तारित रूप में ग्रामीण गैर-कृषि उत्पादकों का समूहन और मूल्य श्रृंखला विकास पर जोर दिया गया।
    • इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में रोजगार बढ़ा, आय स्रोत विविधीकृत हुए और सतत विकास को प्रोत्साहन मिला।
  • अन्य संबंधित पहलें
    • नाबार्ड की अन्य योजनाएं जैसे फार्म सेक्टर प्रमोशन फंड (FSPF) और डेयरी एंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट स्कीम (DEDS) कृषि को बढ़ावा देती हैं
    • लेकिन LEDP ही 2015 में दोनों क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से लॉन्च हुआ।
    • यह पर्यावरणीय संरक्षण और आधुनिक तकनीकों को एकीकृत करता है।

28. निम्नलिखित में से कौन-सी जैविक खेती की एक विशेषता 'नहीं' है? [MTS (T-I) 16 मई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) मिश्रित कृषि का कोई उपयोग नहीं
Solution:
  • प्रश्नगत विकल्प (b) को छोड़कर सभी विकल्प जैविक खेती की विशेषता में शामिल हैं।
  • जैविक खेती के तहत जैविक उर्वरकों का उपयोग, रसायनों का न्यूनतम या कोई उपयोग नहीं तथा कृषि अपशिष्ट का पुनर्चक्रण आदि को शामिल किया जाता है।
  • आमतौर पर जैविक खेती की पांच प्रमुख विशेषताएं
    • रसायन उर्वरकों, सिंथेटिक pesticides, GMOs, growth promoters आदि का उपयोग नहीं किया जाना।
    • मिट्टी की उर्वरता और जैव विविधता की संरक्षा के लिए कम्पोस्ट, हरी खाद, जैव-संरक्षित उर्वरक आदि का प्रयोग।
    • crop rotation, घनिष्ठ फसल चक्रण, मौसमी और स्थानीय अनुकूलन का पालन।
    • प्राकृतिक नियंत्रण (जैविक कीट नियंत्रण) और पर्यावरणीय अवधारणा पर आधारित pest management।
    • स्थानीय बाजार और स्वास्थ्य-उन्मुख उत्पादों पर जोर।
    • रसायन उर्वरकों का नियमित और बड़े पैमाने पर उपयोग
    • GMOs या आणविक संशोधित जीवों का प्रयोग
    • सिंथेटिक कीटनाशकों का व्यापक उपयोग
    • non-organic pesticides का बार-बार प्रयोग
    • फसलों में वृद्धि हार्मोन या एंटीबायोटिक्स का प्रयोग
    • इनमें से जो विकल्प जैविक खेती की परंपरागत विशेषताओं के विपरीत है वही सही उत्तर होगा।
    • यदि आप मुझे उन विकल्पों की सूची दे दें, तो मैं उसी के अनुसार स्पष्ट, पूर्ण विवरण और सही विकल्प के साथ विश्लेषण दे दूँगा।
  • निम्नलिखित बिंदुओं के साथ विस्तृत स्पष्टीकरण
    • जैविक खेती का मुख्य उद्देश्य मिट्टी की उर्वरता और जैव विविधता बनाए रखना है
    • ताकि फसल स्वास्थ्य और पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित हो सके.
    • प्राकृतिक पत्थर/घरेलू उर्वरकों का उपयोग प्रमुख है, जबकि सिंथेटिक रसायनों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है.
    • कुछ सीमाएं भी हैं, जैसे उत्पादन लागत अधिक हो सकती है
    • प्रसंस्करण/उपज कम हो सकती है, और मार्केटिंग/प्रमाणीकरण आवश्यकताएं अधिक हो सकती हैं.
  • संभावित विकल्प-विश्लेषण (यदि आप विकल्प दे दें तो मैं सीधे उत्तर दूँगा)
    • “रसायन उर्वरकों का उपयोग” — जैविक खेती के विरुद्ध, इसलिए यह नहीं है।
    • “GMOs का उपयोग” — जैविक farming के मानकों के अनुसार प्रतिबंधित/कम जोखिम वाला, इसलिए यह सामान्यतः नहीं मानी जाती है।
    • “सिंथेट कीटनाशक” — जैविक खेती में निषेध, इसलिए यह नहीं है।
    • “घरेलू/प्राकृतिक उर्वरक” — यह जैविक खेती की सही विशेषता है, नहीं-नहीं।
    • अगर आप चाहें, सूची के साथ विकल्प दें
    • उसी अनुसार मैं एक स्पष्ट, सुविचार-युक्त उत्तर (सही विकल्प के साथ कारण) दे दूँगा और स्रोत भी संक्षेप में उद्धृत कर दूँगा ताकि पढ़ने में स्पष्टता रहे।

29. किस प्रकार की कृषि में भूमि का उपयोग भोजन व चारे की फसलें उगाने और पशुधन पालन के लिए किया जाता है? [MTS (T-I) 20 जून, 2023 (I-पाली), MTS (T-I) 02 मई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) मिश्रित कृषि
Solution:
  • मिश्रित कृषि में भूमि का उपयोग भोजन व चारे की फसलें उगाने तथा पशुपालन के लिए किया जाता है। यह मुख्यतः विकसित देशों में देखने को मिलता है।
  • मिश्रित कृषि क्या है
    • परिभाषा: एक ही कृषि क्षेत्र में एक साथ फसल उत्पादन और पशुधन पर पालन को मिलाकर संचालित करने वाली व्यवस्था है।
    • फसलें खाने-पीने लायक खाद्यान्न हो सकती हैं
    • गेंहूँ, चावल, मक्का, दालें आदि), जबकि पशुधन के लिए चारे-चबाने योग्य घास-फोडर या अन्य चारे की फसलें भी उगाई जाती हैं
    • घास, धान का भूसा, दलहन-चारे आदि).
    • प्रमुख उद्देश्य: आय के विविध स्रोत बनना—फसल बिक्री, दूध/मांस/पोल्ट्री आदि पशुधन से उपज
    • ताकि जोखिम कम हों और भूमि की उत्पादकता मजबूत रहे.
  • क्यों मिश्रित कृषि लोकप्रिय है
    • मिट्टी का स्वास्थ्य और संरचना सुधरती है: फसल-चारे के चक्र से भू-संरचना बेहतर होती है और मिट्टी का उर्वरक संतुलन बना रहता है.​
    • आय में विविधता और जोखिम कमी: एक ही भूमि पर एक से अधिक उत्पाद, बाजार में मांग घटने पर भी दूसरे उत्पाद से आय सुनिश्चित रहती है.​
    • जलवायु और क्षेत्रीय परिस्थितियों के अनुकूलन: पूरक फसल-चारे का संयोजन क्षेत्रीय मांग और जलवायु के अनुसार ढाला जा सकता है.​
  • मिश्रित कृषि के मुख्य घटक
    • खाद्य फसलें: गेहूं, चावल, मक्का, दालें, तिलहन आदि जो भोजन के लिए सीधे उपयोग या बाजार में बिक्री के लिए उगाई जाती हैं.​
    • चारे की फसलें: घास (क्लोवरेड, रुई-घास आदि), चारा-फसलें जैसे सारसो-चारा, जई, केल, बारिस आदि जो पशुधन के लिए भोजन का स्रोत बनती हैं.​
    • पशुधन: गाय–भैंस, बकरी, भेड़, सूअर, मुर्गी आदि जिनका दूध, मांस, अंडे आदि
    • उत्पादन के लिए पालन किया जाता है. मिश्रित प्रणाली में इनकी जरूरतें सुनिश्चित की जाती हैं ताकि फसल-चारे के बीच संतुलन बना रहे.
  • किस प्रकार के खेतों में लागू होता है
    • छोटे-छोटे परिवारिक खेतों में यह प्रणाली विशेष रूप से प्रचलित है ताकि भूमि-उपज और पारिवारिक आय दोनों जुटाई जा सके.​
    • ग्रामीण भूगोल, जलवायु, और बाज़ार की मांग के अनुसार मिश्रित कृषि की मात्रा बढ़ती-घटती रहती है
    • उदाहरण के तौर पर भारत के कई कृषि नोट्स में इसे मिश्रित कृषि के रूप में विवरणित किया गया है.
  • लाभ और चुनौतियाँ
  • लाभ:
    • मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार और फसल चक्रण से भूमि उपज बढ़ती है.​
    • जोखिम संतुलन: एक उत्पादन घट जाए तो दूसरा सहारा देता है.​
    • पशुधन से प्राप्त उत्पादों के लिए स्थिर बाजार बन सकते हैं (दूध, मांस, अंडे आदि).​
  • चुनौतियाँ:
    • प्रबंधन की कुशलता और संसाधन-समन्वय की आवश्यकता बढ़ती है (पोषण, संसाधन आवंटन, पशुपालन-फसल-उत्पादन का समायोजन).​
    • लागत और निवेश अधिक हो सकता है क्योंकि फसल-चारे दोनों के लिए बीज, खाद, पशु-पोषण आदि की व्यवस्था करनी पड़ती है.​
  • आधुनिक संदर्भ और पालना के उपाय
    • चारे की कमी और चारे के इंतजाम के लिए सरकार/संस्थाएं चारा फसलों की बुवाई और घास-भूमि सुधार पर केंद्रित योजनाएं चला रही हैं
    • हरित चारे की उपलब्धता बढ़ सके.​
    • मिश्रित कृषि के लिए फसल-चारे के चयन में स्थानीय खाद्यान्न-चाह और पशुधन के प्रकार को ध्यान में रखा जाता है ताकि उत्पादन-आय संतुलित रहे.​

30. निम्नलिखित में से कौन-सा पेशा मौसमी बेरोज़गारी का एक प्रकार है? [MTS (T-I) 14 जून, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) किसान
Solution:
  • मौसमी बेरोज़गारी कृषि क्षेत्र में सर्वाधिक पाई जाती है। कृषि क्षेत्र में वर्ष के कुछ महीनों में कार्य की अधिकता होने से रोजगार की संख्या में वृद्धि हो जाती है
  • परंतु शेष महीनों में बेरोज़गारी बनी रहती है। यह बेरोजगारी विकासशील एवं अल्पविकसित देशों की सामान्य विशेषता है।
  • इस बेरोज़गारी से सर्वाधिक रूप से किसान प्रभावित होते हैं।
  • विस्तृत विवरण
    • परिभाषा: मौसमी बेरोज़गारी वह स्थिति है जिसमें श्रम की माँग मौसम के साथ घटती-बढ़ती रहती है
    • इसलिए कुछ महीनों या कुछ निश्चित अवधि के भीतर रोजगार मिल जाता है जबकि अन्य अवधि में नौकरी नहीं मिलती।
    • मुख्य उद्योग: कृषि (कटाई/बुवाई seasons), पर्यटन (हॉलिडे/सीज़नल घूमने के कारण बड़े पैमाने पर रोजगार-सार), निर्माण ( mûताबिक मौसम/जलवायु स्थितियाँ), रिटेल (त्योहारी खरीदारी के मौसम), आदि।
    • कारण: उद्योगों की वास्तविक मांग का मौसमी होना, फसल वर्ष, छुट्टियाँ, जलवायु-आधारित सुविधाओं का निर्भर होना।
    • प्रभाव: ऑफ-सीज़न में बेरोज़गारी स्पष्ट बढ़ना, आय स्थिरता में कमी, ग्रामीण या औद्योगिक क्षेत्रों में आय स्रोतों की अस्थिरता।
  • उदाहरण:
    • कृषि क्षेत्र में खेतिहर मजदूर during harvesting season काम करते हैं और बाकी समय बेरोज़गार रहते हैं।
    • पर्यटन क्षेत्र में हॉलिडे सीज़न में होटल-रेस्टोरेंट के कर्मचारी अधिक रहते हैं, अन्य समय में नौकरियाँ कम मिलती हैं।
    • निर्माण क्षेत्र में अनुकूल मौसम में काम बढ़ते हैं, बर्फीले/बरसाती माह में कमी हो सकती है।
  • बनाम अन्य बेरोज़गारी प्रकार:
    • प्रच्छन्न बेरोज़गारी (disguised unemployment) में अधिक लोगों को काम पर रखा जाता है
    • जिन्हे marginal product of labor बहुत कम होता है—यह मौसमी बेरोज़गारी से भिन्न है
    • क्योंकि मौसमी अस्थायी रहती है जबकि प्रच्छन्न बेरोज़गारी संरचनात्मक या प्रदर्शन-सम्बन्धी हो सकती है।
    • चक्रीय बेरोज़गारी अर्थव्यवस्था के चक्र के कारण होती है और मौसम पर निर्भर नहीं होती।
  • पाठ्यसंदेश और निष्कर्ष
    • मौसमी बेरोज़गारी एक सामान्य और भविष्यवाणी योग्य घटना है
    • जिसका समाधान नीति के स्तर पर ऑफ-सीजन के लिए रोजगार schemes, कौशल-उन्नयन, और विविधीकृत आय स्रोतों के विकास से किया जा सकता है।
    • किसान, पर्यटन-उद्योग, और निर्माण जैसी मौसमी-निर्भर क्षेत्रों के लिए सुरक्षा nets (योजनाएं) और सामाजिक सुरक्षा उपाय महत्वपूर्ण होते हैं।
  • उद्धरण/सूत्र (नीति-संदेश के लिए संदर्भ)
    • मौसमी बेरोज़गारी के सामान्य सिद्धांत और उद्योग-आधारित उदाहरणों को कई शिक्षण स्रोतों में स्पष्ट किया गया है
    • उदा. आधिकारिक अध्ययन-संरचनाओं और शिक्षक-आधारित नोट्स में मौसमी बेरोज़गारी के वर्णन और उदाहरण साझा किए जाते हैं।