कृषि (भारत का भूगोल)Total Questions: 541. भारतीय राष्ट्रीय कृषि आयोग (1976) ने सामाजिक वानिकी को कितनी श्रेणियों में वर्गीकृत किया है? [C.P.O.S.I. (T-I) 10 नवंबर, 2022 (II-पाली)](a) 2(b) 4(c) 5(d) 3Correct Answer: (d) 3Solution:भारतीय राष्ट्रीय कृषि आयोग (1976) ने सामाजिक वानिकी को 3 श्रेणियों में वर्गीकृत किया है।इन तीन श्रेणियों में शहरी वानिकी, ग्रामीण वानिकी और कृषि (फॉर्म) वानिकी शामिल हैं।श्रेणियाँ और विवरणशहरी वानिकी (Urban Forestry)स्थान: शहरी क्षेत्रों में सार्वजनिक और निजी भूमि पर, जैसे बगीचे, सड़क के किनारे, हरित पट्टियाँ, पार्क आदि।उद्देश्य: शहर-स्थानीय हरित आवरण बढ़ाना, पलायन रोकना, गर्मी Island घटाना आदि.ग्रामीण वानिकी (Rural/Community Forestry)स्थान: ग्राम-स्तर और ग्रामीण समुदायों के अंतर्गत भूमि और चरागाह आदि पर।उद्देश्य: ग्रामीण बस्तियों में संसाधन की उपलब्धता बढ़ाना, पर्यावरणीय स्थिरता और आजीविका सुधारना.कृषि वानिकी (Farm/Plantation Forestry)स्थान: किसानों की अपने खेतों/जमीन पर पेड़ लगवाने को प्रेरित करना।उद्देश्य: घरेलू लकड़ी, चारा, ईंधन, छोटे पेड़-उत्पादन के लिए सतत स्रोत तयार करना; खेत-आधारित वानिकी को प्रोत्साहन.उपयोग और उद्देश्यपर्यावरण से जुड़ी सुरक्षा: धरा के कटाव नियंत्रण, जल संरक्षण और जैव विविधता संरक्षण सहयोगी।सामाजिक-आर्थिक लाभ: ग्रामीण आर्थिकी का संवर्धन, ईंधन-कठिनाई कम करना, छोटे उद्योगों के लिए संसाधन उपलब्ध कराना।योजना-कार्यान्वयन: यह तीनों श्रेणियाँ मिलकर वन संसाधनों के प्रबंधन और स्थानीय लोगों की भागीदारी को सक्षम बनाती हैं.संदर्भ/संदेहकुछ स्रोतों में इसी तीन-भागी विभाजन को “शहरी वानिकी, ग्रामीण वानिकी और फार्म वानिकी” के रूप में स्पष्ट किया गया है ।समय-रेखा और विवरण में विविधता हो सकती है क्योंकि अन्य článk में भी सामाजिक वानिकी के उद्देश्यों और उप-योजनाओं के उदाहरण मिलते हैं ।2. पीएल 480 योजना के तहत भारत किस देश से गेहूं का आयात करता था ? [CGL (T-I) 21 जुलाई, 2023 (II-पाली)](a) यूके(b) यूएसए(c) फ्रांस(d) यूएसएसआरCorrect Answer: (b) यूएसएSolution:पीएल 480 योजना के तहत, भारत संयुक्त राज्य अमेरिका से गेहूं का आयात करता था।पीएल 480 योजना विकासशील देशों को अधिशेष कृषि वस्तुएं प्रदान करने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा शुरू किया गया एक खाद्य सहायता कार्यक्रम था।गेहू आयात का मुख्य देशइस योजना के तहत भारत ने मुख्य रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) से गेहूं आयात किया।स्वतंत्रता के बाद खाद्य संकट के दौरान, विशेषकर 1950-60 के दशक में, भारत ने USA से लाखों टन गेहूं प्राप्त कियाक्योंकि विदेशी मुद्रा की कमी थी और यह योजना रुपये में भुगतान की सुविधा देती थी.ऐतिहासिक संदर्भ1954 में भारत ने USA के साथ दीर्घकालिक PL 480 समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत गेहूं, मक्का आदि अनाज आयात हुए।नेहरू सरकार ने 1949-50 से मदद मांगी, और विजयलक्ष्मी पंडित की मध्यस्थता से 20 लाख टन गेहूं आयाहालांकि इसमें पार्थेनियम घास के बीज भी आए जो बाद में समस्या बने ।अन्य देश जैसे USSR, फ्रांस या UK ने PL 480 के तहत गेहूं नहीं दिया; यह विशुद्ध रूप से अमेरिकी योजना थी ।प्रभाव और परिणामसकारात्मक: अनाज कमी पूरी हुई, जिससे हरित क्रांति की नींव पड़ी।नकारात्मक: आयात पर निर्भरता बढ़ी, और रिजेक्टेड गेहूं आने से गुणवत्ता की शिकायतें हुईं।आज भारत गेहूं उत्पादन में चीन के बाद दूसरे स्थान पर है ।योजना ने भारत को स्वावलंबी बनने के लिए प्रेरित किया, और अब भारत निर्यातक देश है ।3. पूरे विश्व में हरित क्रांति के जनक के रूप में किसे जाना जाता है? [CGL (T-I) 19 जुलाई, 2023 (II-पाली)](a) नॉर्मन बोरलॉग(b) एम. एस. स्वामीनाथन(c) लिनस पॉलिंग(d) राल्फ बंचेCorrect Answer: (a) नॉर्मन बोरलॉगSolution:पूरे विश्व में नॉर्मन बोरलॉग को हरित क्रांति के जनक के रूप में जाना जाता हैवहीं भारत में एम.एस. स्वामीनाथन को हरित क्रांति के जनक के रूप में जाना जाता है।परिचयहरित क्रांति एक वैश्विक कृषि सुधार श्रृंखला है जो 1960 के दशक में उच्च उपज देने वाली बीज, रासायनिक उर्वरक, सिंचाई और वैज्ञानिक खेती के प्रयोगों से गेहूं और धान जैसे अनाजों के उत्पादन में तेजी लाने पर केंद्रित थी।इसके क्षेत्रीय वितरण और प्रभाव देश-दर-देश भिन्न रहे हैंमूल प्रेरक और सफलताओं के नाम विश्व स्तर पर Borlaug से जुड़े होते हैं.मुख्य घटनाक्रम और प्रमुख व्यक्तित्वNorman Borlaug: अमेरिकी कृषि বিজ্ঞান, जिन्हें 1960s-1970s के दौरान HYV (High Yielding Varieties) गेहूं और अन्य फसलों के विकास के लिए जाना गया और 1970 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला।उनकी खोजों ने दुनिया के कई देशों में अनाज उत्पादन में भारी वृद्धि की और उन्हें “हरित क्रांति के जनक” के रूप में मान्यता मिली है.M. S. Swaminathan: भारत के प्रमुख कृषि वैज्ञानिक, जिन्हें भारत में हरित क्रांति के जनक माना जाता है।उन्होंने भारत में उच्च उपज देने वाले बीजों (खासकर गेहूं) की breeding और तैनाती के काम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाईजिससे देश की खाद्यान्न सुरक्षा मजबूत हुई और 1960s-1970s के दौरान खेती की आधुनिक तकनीकों को राष्ट्रीय स्तर पर फैला दिया गया.उद्देश्य, पद्धतियाँ और उपलब्धियाँउद्देश्य: फसल उपज बढ़ाने, खाद्यान्न आत्मनिर्भरता प्राप्त करने, और खाद्य सुरक्षा को मजबूत करना।यह कृषि biome में तकनीकी नवाचारों को त्वरीत लागू करने पर केंद्रित था.पद्धतियाँ: High Yielding Varieties (HYVs) की खेती, उन्नत उर्वरक और कीटनाशक का उपयोग, सिंचाई और जल-प्रबंधन की आधुनिक तकनीकें, तथा किसानों के लिए प्रशिक्षण और सहयोगी संस्थागत संरचनाओं की स्थापना.उपलब्धियाँ: गेहूं आदि फसलों की उपज में तेज वृद्धि, कृषि-व्यवसाय में परिवर्तन, और कई देशों में खाद्यान्न आयात पर निर्भरता घटना।Borlaug को नोबेल पुरस्कार तथा अन्य सम्मान प्राप्त हुए, जबकि Swaminathan ने भारतीय कृषि के लिए राष्ट्रीय स्तर पर यह परिवर्तन संचालित किया.आलोचना और सीमाएँ (संक्षेप में)हरित क्रांति के साथ पानी, मिट्टी, बीज-स्वास्थ्य और दीर्घकालीन पर्यावरणीय प्रभावों पर चिंता बढ़ीछोटे किसानों के लिए लागत, ऋण एवं सिंचाई सुविधाओं तक पहुँच विभिन्न देश-नागरिकों में असमान रही।फिर भी, उत्पादन-स्थार पर प्रभाव व्यापक रहा.प्रमुख निष्कर्षवैश्विक संदर्भ में Borlaug को “हरित क्रांति के जनक” के रूप में पहचाना जाता है, जिन्होंने कृषि उत्पादन में क्रांतिकारी तकनीकी परिवर्तन लाए: HYVs, उर्वरक, सिंचाई आदि के एकीकृत मॉडल के साथ।भारत के संदर्भ में Swaminathan को उसी आंदोलन का राष्ट्रीय चिह्न माना जाता हैजिन्होंने भारत में इसे व्यवहारिक और राजनीतिक स्तर पर लागू किया और किसान-उत्पादन में बड़े स्तर पर वृद्धि संभव बनायी.अगर चाहें,ीन मैं इन स्रोतों से अधिक विस्तृत उद्धरण, तिथियाँ, और पाठ-संश्लेषण के साथ एक विस्तृत निबंध-स्तर लेख बना सकता/सकती हूँकिसी एक हिस्से (जैसे Borlaug बनाम Swaminathan की भूमिकाओं का तुलनात्मक विश्लेषण) को संरचित रूप में प्रस्तुत कर सकता/सकती हूँ।कृपया बताएं कि आपको कौन सा फॉर्मेट पसंद है (निबंध, टाइमलाइन, या तुलना-तालिका) और कितने शब्दों का विस्तृत संस्करण चाहिए।4. डॉ. डी. एस. अठवाल को "भारत में ....... क्रांति के जनक" के रूप में जाना जाता था। [CGL (T-I) 21 जुलाई, 2023 (I-पाली)](a) तिलहन(b) बाजरा(c) चावल(d) गेहूंCorrect Answer: (d) गेहूंSolution:डॉ. डी.एस. अठवाल, जिनका पूरा नाम दिलबाग सिंह अठवाल था, भारत में गेहूं क्रांति के जनक के रूप में जाना जाता है।जीवन परिचयडॉ. दिलबाग सिंह अठवाल (Dilbagh Singh Athwal, 1928-2017) एक प्रमुख भारतीय-अमेरिकी कृषि वैज्ञानिक, आनुवंशिकीविद् और पादप प्रजनक थे।उनका जन्म 12 अक्टूबर 1928 को पंजाब के कल्याणपुर गांव (अब पाकिस्तान के लायलपुर में) में हुआ था।उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से कृषि विज्ञान में स्नातक और ऑस्ट्रेलिया के सिडनी विश्वविद्यालय से आनुवंशिकी तथा पादप प्रजनन में पीएचडी प्राप्त की।प्रमुख योगदानडॉ. अठवाल ने भारत में हरित क्रांति के दौर में उच्च उपज वाली गेहूं की किस्मों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।उन्होंने नॉर्मन बोरलॉग द्वारा विकसित मैक्सिकन ड्वार्फ गेहूं की प्रजातियों को भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल बनाया।1966 में उन्होंने "पीवी 18" और 1967 में प्रसिद्ध एम्बर-दानेदार गेहूं की किस्म "कल्याणसोना" विकसित की, जिसका नाम उनके जन्मस्थान कल्याणपुर पर रखा गया। ये किस्में उर्वरकों और सिंचाई के प्रति संवेदनशील थींजिससे फसल लेटना (lodging) रुका और उपज में अभूतपूर्व वृद्धि हुई।हरित क्रांति में भूमिकापंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू), लुधियाना में पादप प्रजनन विभाग के संस्थापक प्रमुख के रूप में उन्होंने गेहूंबाजरा, चना और तंबाकू की प्रजनन तकनीकों पर काम किया।उनकी खोजों ने भारत को खाद्यान्न आयातक से निर्यातक बनायाखासकर पंजाब-हरियाणा क्षेत्र में गेहूं उत्पादन में क्रांति लाई।1967 में वे फिलीपींस के इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (IRRI) में उप महानिदेशक बने।सम्मान और विरासतउन्हें पद्म भूषण और शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार से सम्मानित किया गया।उनकी देन ने भारत की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की और लाखों किसानों की आय बढ़ाई।14 मई 2017 को अमेरिका में उनका निधन हुआलेकिन "गेहूं क्रांति के जनक" के रूप में उनकी स्मृति बनी हुई है।5. हरित क्रांति के संबंध में निम्न में से कौन-सा कथन सही नहीं है? [CHSL (T-I) 14 अगस्त, 2023 (III-पाली)](a) यह केवल उन क्षेत्रों में शुरू किया गया था, जहां सिंचाई का आश्वासन दिया गया था।(b) यह मुख्य रूप से गेहूं और चावल उगाने वाले क्षेत्रों पर लक्षित था।(c) यह कृषि आधुनिकीकरण के लिए एक निजी क्षेत्र का कार्यक्रम था।(d) यह अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा वित्तपोषित किया गया था।Correct Answer: (c) यह कृषि आधुनिकीकरण के लिए एक निजी क्षेत्र का कार्यक्रम था।Solution:हरित क्रांति के संबंध में विकल्प (c) को छोड़कर अन्य सभी विकल्प सत्य हैं। हरित क्रांति मुख्यतः गेहूं तथा चावल उगाने वाले क्षेत्रों पर केंद्रित था।इसके तहत उर्वरकों तथा सिंचाई सुविधाओं के पर्याप्त विकास पर बल दिया गया था।इसे सफल बनाने हेतु अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा वित्तपोषित किया गया था।हरित क्रांति का संक्षिप्त परिचयहरित क्रांति 1960-70 के दशक में शुरू हुई एक आधुनिक कृषि योजना थी जिसका उद्देश्य विश्वभर में खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाना था।यह उच्च उपज वाली बीज (HYV) varieties, उर्वरक, सिंचाई और कीटनाशकों के उचित संयोजन पर आधारित थी.इसके परिणामस्वरूप गेहूं, चावल आदि फसलों की उपज में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जिससे खाद्यान्न उपलब्धता और खाद्य सुरक्षा में सुधार हुआ.परन्तु इसके सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभाव भी रहे, जैसे छोटे किसानों पर अधिक बोझ, ग्रामीण आय में असमानता की बढ़ोतरी, मिट्टी का क्षरण, रासायनिक उर्वरकों का बढ़ना, और जल संसाधनों का दबाव.कौन-सा कथन सही नहीं है? (कथनों की संभावित क्रमबद्ध क्लस्टर)HYV बीजों, सिंचाई, उर्वरक और आधुनिक कृषि तकनीकों की शुरूआत से फलदायी परिणाम मिले—यह भाग सही हैहरित क्रांति की बुनियादी पहचान दर्शाता है.पहली और दूसरी चरण की विभाजन और 1980 के दशक में हरित क्रांति के दूसरे चरण की शुरुआत—यह भी सामान्यतः स्वीकार्य सार हैदूसरे चरण में सिंचाई सुविधाओं वाले क्षेत्रों में नई तकनीकें शामिल की गईं.सामाजिक-आर्थिक प्रभाव: उत्पादन बढ़ा, लेकिन छोटे किसान असमानताओं, अति-पूंजीकरण, और पर्यावरणीय समस्याओं का उदाहरण देते हैंयह प्रभाव भी सच है.विशेषकर “पारंपरिक खेती से एकल फसल वाली खेती में बदलाव का छोटे किसानों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा” जैसे दायरे, यह कथन भी कई अध्ययन/तैयार प्रश्नों में सही माना गया हैपरन्तु यह एक पंक्ति-स्थिति के तौर पर हरित क्रांति के सभी स्थानों/ावस्था पर समान नहीं है, क्योंकि कई क्षेत्रों में किसानों ने पूंजी निवेश से लाभ भी देखे हैं.एक कथन जो सामान्यतः गलत व्याख्या हो सकता है वह यह है कि हरित क्रांति ने “कृषि श्रमिकों की मजदूरी बढ़ी” या “कृषि श्रमिकों का रोजगार बढ़ा”आमतौर पर मजदूरी बढ़ने के बजाय तकनीकी बदलाव व माइक्रो-स्तर के पूंजीकरण के कारण कुछ मजदूरी-नुकसान/ असमानताएं उभरीं, हालांकि कुछ क्षेत्रों में रोजगार बनाए रहे या बढ़े भी, लेकिन यह शुद्ध रूप से सार्वत्रिक नहीं माना जाता।ऐसी व्याख्या कई स्रोतों में संतुलित नहीं होती (कुछ जगहों पर रोजगार का नुकसान, कुछ जगहों पर लाभ).सारांशहरित क्रांति की सफलता के साथ सामाजिक-आर्थिक असमानताएं, पर्यावरणीय दबाव और पूंजीकरण के बढ़ने जैसे नकारात्मक परिणाम भी आयेजबकि खाद्यान्न सुरक्षा में महत्वपूर्ण सुधार भी दिखे—यह मिश्रित सच है.इसलिए, यदि प्रश्न में पूछा जाए कि “इनमें से कौन-सा कथन सही नहीं हैतो अधिक संभावना है कि ऐसी कथन जो बताएं “हरित क्रांति ने व्यापक तौर पर किसानों की मजदूरी बढ़ाई” या “हरित क्रांति के कारण छोटे किसानों के लिए आर्थिक लाभ हर जगह समान रूप से हुआये आम तौर पर गलत (या अतिशय सामान्यीकृत) व्याख्या मानी जाती हैं.6. हरित क्रांति द्वारा पारंपरिक खेती के विरुद्ध किस कृषि तकनीक को बढ़ावा दिया गया? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 20 नवंबर, 2023 (III-पाली)](a) जैविक खेती(b) स्वदेशी खेती(c) श्रम प्रधान खेती(d) वैज्ञानिक खेतीCorrect Answer: (d) वैज्ञानिक खेतीSolution:हरित क्रांति द्वारा पारंपरिक खेती के विरुद्ध वैज्ञानिक खेती तकनीकी को बढ़ावा दिया गया।भारत में हरित क्रांति का प्रथम चरण वर्ष 1966 से 1981 तक, दूसरा चरण वर्ष 1981 से 1995 तक चला। इसका तीसरा चरण वर्ष 1995 से प्रारंभ हुआ।कंटेक्स्ट और परिभाषायह परिवर्तन विशेषकर गेहूं और चावल जैसे प्रमुख खाद्यान्नों में उपज बढ़ाने के मकसद से किया गया था.इसका उद्देश्य संसाधनों के कुशल उपयोग के साथ क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय खाद्यान्न सुरक्षा सुनिश्चित करना था, ताकि आयात पर निर्भरता कम हो सके.मुख्य तकनीकी परिवर्तनउन्नत बीज (HYV): उच्च उपज और रोग-प्रतिरोधी विशेषताओं वाले बीजों का चयन और वितरण किया गयाजिससे प्रति एकड़ उत्पादन में वृद्धि संभव हो सकी.सिंचाई का विस्तार: ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी जल-संरक्षणयुक्त पद्धतियों के माध्यम से निरंतर जल उपलब्धता सुनिश्चित की गईजिससे फसल चक्र बेहतर बना और सूखे में भी उपज स्थिर रही.उर्वरक और पेस्टीसाइड: मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और कीट/बीमारियों से बचाने के लिए रसायनिक उर्वरक, कीटनाशक और खरपतवारनाशी का बड़े पैमाने पर प्रयोग हुआ.कृषि यंत्रण (मशीनरीकरण): ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, बुवाई/जुताई उपकरण आदि के उपयोग से श्रम लागत कम हुईखेतों के भीतर गतिविधियाँ तेज़ हुईं, जिससे कृषि क्रमिक अधिक खेतों तक फैल पाया.खेती की घनत्व (घनघनाहट): एक वर्ष में दो फसलों की उत्पादन प्रणाली (डुअल-फसलिंग) जैसी प्रणालियों के माध्यम से क्षेत्रीय उपज बढ़ाने पर बल दिया गया.प्रभाव और लाभखाद्यान्न सुरक्षा में सुधार: उत्पादन बढ़ने से भारत जैसे देश के लिए आत्म-नियंत्रित खाद्यान्न सुरक्षा संभव बनी और आयात निर्भरता घटी.आर्थिक आय और आयात-निर्यात प्रभाव: किसानों के लिए अधिक आय के अवसर बने, परन्तु लागत बढ़ने से पंरम्परागत किसान-समूहों पर भी वित्तीय दबाव आया, खासकर उन्नत तकनीकों के लिए ऋण और इनपुट लागत का बढ़ना.क्षेत्रीय विस्तार: अर्ध-शुष्क और शुष्क क्षेत्रों में सिंचाई-सक्षम भू भागों में उपज वृद्धि संभव हुई, जिससे कृषि क्षेत्र का भौगोलिक विस्तार हुआ.चुनौतियाँ और आलोचनाएँलागत और ऋण आवश्यकताएँ: HYV बीज, उर्वरक, पेस्टीसाइड, और मशीनरीकरण की लागत बढ़ीजिससे छोटे और मध्यम किसान ऋण-ज्वाल में फंस सकते हैं.पर्यावरणीय प्रभाव: रसायनिक उर्वरक-पेस्टीसाइड की अधिकता से मिट्टी की दीर्घकालिक उर्वरा शक्ति और जल-प्रदूषण जैसे मुद्दे उभरते गए (हरित क्रांति के ecological footprint पर बहस रहती है).आजीविका पर प्रभाव: पारंपरिक कृषि ज्ञान और कौशल का कम महत्व, संयुक्त परिवारों के बजाय एकल खेत-स्वामित्व वाले मॉडल का प्रभाव, और ग्रामीण रोजगार में अस्थिरता जैसी विचारधाराएं उठीं.संक्षिप्त तुलना (पारंपरिक बनाम हरित क्रांति के मुख्य बिंदु)बीज: पारंपरिक फसलों के मौजूदा वेरायटीज़ बनाम HYV/उच्च उपज वाले बीजजल-संरचना: बिना/कम सिंचाई के तरीके बनाम विस्तृत सिंचाई (ट्यूबवेल, नहरें, स्प्रिंकलर)इनपुट: सीमित उर्वरक-कीटनाशक बनाम व्यापक उर्वरक-कीटनाशक व घुलनशील पोषणमशीनरीकरण: कम या नहीं का प्रयोग बनाम ट्रैक्टर-हार्वेस्टर-ड्रिल जैसी मशीनरीक्षेत्र-प्रसार: सीमित भूभाग बनाम अधिक भूभाग पर खेती7. हरित क्रांति के दौरान किसानों द्वारा बाजार में अधिशेष के रूप में कौन-सी उपज उपलब्ध थी ? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 16 नवंबर, 2023 (III-पाली)](a) गेहूं और ज्वार(b) गेहूं और चावल(c) तिलहन(d) चावल और मक्काCorrect Answer: (b) गेहूं और चावलSolution:हरित क्रांति के दौरान किसानों द्वारा बाजार में अधिशेष के रूप में गेहूं और चावल की उपज उपलब्ध थी।भारत में हरित क्रांति की शुरुआत वर्ष 1966-67 में हुई। हरित क्रांति के जनक नार्मन बोरलॉग थे।भारत में हरित क्रांति के जनक एम.एस. स्वामीनाथन थे।हरित क्रांति क्या थीलगभग 1960 के दशक में भारत में शुरू हुआ एक सामूहिक प्रयास थाजिसमें हाईयील्डिंग वैरायटी (HYV) बीज, उर्वरक, कीटनाशक, सिंचाई और मशीनरी का व्यापक उपयोग किया गया ताकि फसल उपज में तेज वृद्धि हो सकेयह पहल खाद्यान्न उत्पादन को बढ़ाकर आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम थी.HYV बीज और प्रमुख फसलेंHYV बीजों ने गेहूं और चावल जैसी प्रमुख खाद्यान्न फसलों की उपज में खासा उछाल दिया; HYVP (High Yielding Varieties Programme) का कवरेज मुख्यतः पाँच फसलों तक सीमित रहा: गेहूं, चावल, ज्वार, बाजरा और मक्काइस अवधि में गेहूं और चावल “अधिशेष” के प्रमुख स्रोत बन गए.अधिशेष का बाजारिकरणफलों-फसलों में उन्नत किस्मों के कारण उत्पादन में काफी वृद्धि हुई, जिससे किसानों के पास बिक्री हेतु अधिक(quantity) उपलब्ध हुआइस अधिशेष उत्पादन ने खाद्यान्न की कीमतों में कुछ कमी और बाजारीय उपलब्धता बढ़ाने में योगदान दिया.आर्थिक प्रभावअधिशेष उपज के बाजार में पहुँचने से ग्रामीण आय बढ़ी और खाद्य सुरक्षा की स्थिति सुधरी; साथ ही कुछ उपलब्ध उपज के कारण खाद्यान्न निर्यातक देश के रूप में भारत की स्थिति मजबूत हो गई.सीमाएं और विशिष्ट बिंदुहरित क्रांति का प्रभाव कृषि के सभी क्षेत्रों में समान नहीं थाकुछ प्रमुख व्यावसायिक फसलें (जैसे कपास, जूट, गन्ना) इसमें अधिक प्रभावित नहीं हुईं या सीमित कवरेज के साथ रह गईं.टिप्पणियाँ और संदर्भHYV बीज और HYVP कार्यक्रम का महत्व: यह रणनीति कैसे उपज बढ़ाने के लिए केन्द्रित थीकिन-किन फसलों पर इसका प्रभाव रहा है.गेहूं और चावल की भूमिका: ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताता है कि 1970s में गेहूं और चावल उत्पादन ने भारतीय खाद्यान्न सुरक्षा पर बड़ा प्रभाव डाला.समग्र प्रभाव: हरित क्रांति ने खाद्य सुरक्षा की दिशा में प्रगति की, जबकि पूंजी निवेश और क्षेत्रीय असमानताओं के कारण आय वितरण पर भिन्न प्रभाव भी देखा गया.8. निम्नलिखित में से क्या भारत में हरित क्रांति का एक नकारात्मक प्रभाव है? [CGL (T-I) 20 जुलाई, 2023 (I-पाली)](i) भूजल स्तर का हास(ii) मृदा की गुणवत्ता में गिरावट(iii) बढ़ी हुई इनपुट लागत(a) केवल (iii)(b) (i) और (ii)(c) (ii) और (iii)(d) (i), (ii) और (iii)Correct Answer: (d) (i), (ii) और (iii)Solution:रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग हरित क्रांति की एक प्रमुख विशेषता थी।समय के साथ इससे मिट्टी का क्षरण हुआ, मिट्टी की उर्वरता में कमी आई और फसल की पैदावार में कमी आई।भूजल स्तर का ह्रास तेजी से हुआ। साथ ही कृषि क्षेत्र में मशीनीकरण यंत्र शामिल होते गए, जिससे कृषकों की इनपुट लागत में बढ़ोतरी हुई।हरित क्रांति क्या बदला था – संक्षेपउद्देश्य: कृषि उत्पादन में तेज़ वृद्धि के लिए उच्च उपज वाले बीज, उर्वरक, समीक्षा-युक्त कीटनाशक, सिंचाई और मशीनरी का प्रसार।परिणाम: कुछ क्षेत्रों (जैसे पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश) में बहुत अधिक उपज और किसानों की आय बढ़ी; जबकि अन्य क्षेत्र पीछे रह गए।यह क्षेत्रीय असमानता बढ़ाने का प्रमुख कारण बना। [web स्रोतों के अनुसार यह प्रभाव स्पष्ट तौर पर दर्ज है].नकारात्मक प्रभाव (विस्तार)क्षेत्रीय और सामाजिक-आर्थिक असमानता बढ़नाप्रति-क्षेत्र उपज और आय में असमानता ऊँची हो गई, जिससे धनी किसानों के लिए लाभ अधिक और गरीब/छोटे किसान के लिए कम रहा।इससे समुदायों के बीच आर्थिक और सामाजिक दूरी बढ़ी।छोटे और सीमांत किसानों पर भार बढ़नाबड़े किसान और बेहतर सिंचाई सुविधाओं वाले जिलों में लाभ ज्यादा मिलने से छोटे किसान पीछे रह गए और ऋण-आधार पर निर्भरता बढ़ी।अति पूंजीकरण और उधार-ग्रहणउच्च लागत पर आधारित तकनीकें (बिजली, पेसिंग, इनपुट) के कारण कृषि पूंजीकरण बढ़ा; ऋण लेने की ज़रूरत बढ़ी, जिससे किसानों की वित्तीय सशक्तता अस्थिर हुई।मिट्टी और पर्यावरण पर दबावलगातार रसायनों और उर्वरकों के उपयोग से मिट्टी की उर्वरता और जैव विविधता घटने की आशंका बढ़ी; दीर्घकालिक मिट्टी स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव संभव।जल-नीति पर दबावबढ़ते जल-उपयोग के कारण भू-जल स्तर में गिरावट और जल-स्रोतों पर अधिक दबाव पड़ा; सतही जल/नीर-निर्भरता भी बढ़ी।फसल विविधता का कम होनाउच्च-उपज वाले गेहूँ-चावल जैसी एकल-फसल पद्धति ने विविधता घटाई, जिससे रोग-कीटियों के लिए अधिक संकुल बन सकता हैपोषण संरचना पर असर पड़ सकता है।स्वास्थ्य और सामाजिक दुष्प्रभावकीटनाशकों और उर्वरकों के बढ़ते इस्तेमाल के कारण मानव और पशु स्वास्थ्य पर संभावित जोखिम और ग्रामीण इलाकों में सामाजिक-धार्मिक बदलावों के संकेत मिलते हैंकुछ जगहों पर शराब/नशे जैसी प्रवृत्तियाँ भी बढ़ी बताई गईं।9. हरित क्रांति का पहला चरण मुख्य तौर पर दो फसलों और उनके उगाए जाने वाले क्षेत्रों तक सीमित था। निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म इन दो फसलों का सबसे अच्छा निरूपण करता है? [CGL (T-I) 25 जुलाई, 2023 (II-पाली)](a) गेहूं, चावल(b) कपास, नील(c) चावल, मक्का(d) बाजरा, गेहूंCorrect Answer: (a) गेहूं, चावलSolution:हरित क्रांति का पहला चरण मुख्य तौर पर गेहूं और चावल फसलों के उगाए जाने वाले क्षेत्रों तक सीमित था।हरित क्रांति की शुरुआत वर्ष 1966-67 में हुई, जिससे विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि हुई।हरित क्रांति के चरण इस चरण में गेहूं की मेक्सिकन किस्मों को भारत लाया गया, जिससे पंजाब-हरियाणा में उत्पादन कई गुना बढ़ा।चावल को भी बाद में शामिल किया गया, लेकिन गेहूं ही आधारशिला बना।दूसरा चरण (1980-1991) चावल-केंद्रित था और पूर्वी तथा दक्षिणी क्षेत्रों (जैसे पश्चिम बंगाल, बिहार) पर केंद्रित रहा।मुख्य फसलें और क्षेत्रगेहूं: पहला चरण का प्रमुख फसल, मुख्यतः पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में।1967-68 में HYV गेहूं से उत्पादन 11 मिलियन टन से बढ़कर 20 मिलियन टन हो गया।चावल: सहायक फसल, लेकिन पहले चरण में सीमित; पंजाब-हरियाणा के सिंचित इलाकों में।ज्वार, बाजरा, मक्का जैसी अन्य फसलें बाद में आईं, लेकिन दो मुख्य गेहूं-चावल ही थीं।अन्य फसलें जैसे दालें, तिलहन या व्यावसायिक फसलें (कपास, गन्ना) इससे बाहर रहीं।प्रभाव और सीमाएंपहले चरण ने खाद्य कमी दूर की, लेकिन क्षेत्रीय असमानता बढ़ाई क्योंकि केवल अच्छी सिंचाई वाले क्षेत्र लाभान्वित हुए।गेहूं उत्पादन में 3-4 गुना वृद्धि हुई, जबकि चावल में केवल 1.5 गुना।एम.एस. स्वामीनाथन और नॉर्मन बोरलॉग की भूमिका महत्वपूर्ण रही।10. भारत की हरित क्रांति में किस प्रकार के बीजों ने एक अहम भूमिका निभाई थी ? [CHSL (T-I) 15 अगस्त, 2023 (III-पाली)](a) उच्च उपज वाली किस्म(b) निम्न पोषण वाली किस्म(c) उच्च पोषण वाली किस्म(d) निम्न उपज वाली किस्मCorrect Answer: (a) उच्च उपज वाली किस्मSolution:भारत की हरित क्रांति में उच्च उपज वाली किस्म प्रकार के बीजों ने एक अहम भूमिका निभाई।भारत में हरित क्रांति की शुरुआत वर्ष 1966-67 में हुई। हरित क्रांति से मुख्यतः पंजाब, हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश राज्य अधिक लाभान्वित हुए।संक्षिप्त उत्तरHYV बीजों (उच्च उपज देने वाली किस्मों के बीज) ने हरित क्रांति की तकनीकी नींव रखी और गेहूं, चावल आदि फसलों के उत्पादन में चमत्कारिक वृद्धि की।इन HYV बीजों के साथ उचित सिंचाई, उर्वरक और कीटनाशकों का संतुलित उपयोग संभव हुआजिससे दाल-तिलहन के अलावा गेहूं-चावल जैसी मुख्य खाद्य फसलों की उपज बढ़ी।हरित क्रांति की शुरुआत 1960s के दशक में HYV बीजों के सक्रिय विकास और उनका पायलट-प्रकार के क्षेत्रों में परीक्षण से होकर1966-67 के दशक में औपचारिक रूप से लागू हुई।HYV बीज क्या थेHYV का पूरा अर्थ है High Yielding Variety, अर्थात ऐसी किस्में जो कम समय में अधिक उपज दें और रोगों के प्रति अधिक प्रतिरोधी हों।भारत में कृषि अनुसंधान संस्थानों ने गेहूं, चावल, दलहन आदि के लिए HYV बीज विकसित किए और इनकी खेती को प्रमुखता दी गई।इन बीजों की सफलता के पीछे M. S. Swaminathan जैसे वैज्ञानिकों की भूमिका मानी जाती हैजिन्हें हरित क्रांति के जनक के रूप में उद्धृत किया जाता है।किस फसल में प्रभाव रहागेहूं: HYV बीजों ने पंजाब, हरियाणा आदि उत्तरी राज्यों में बड़े पैमाने पर उपज बढ़ाई।चावल: HYV चावल ने दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ मिलकर भारत में खाद्यान्न उत्पादन को बढ़ाने में योगदान दिया।अन्य फसलें: मक्का, बाजरा आदि के HYV बीजों का विकास भी किया गया ताकि कुल खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि हो।अन्य आवश्यक घटकसिंचाई-घरेलू जल संसाधन: HYV बीजों के साथ वर्षा-निर्भरता घटाने के लिए ट्यूबवेल, नहर और बांध जैसी सिंचाई सुविधाओं में सुधार आवश्यक रहा।उर्वरक और कीटनाशक: उपज बढ़ाने के लिए उचित रसायन प्रयोग के साथ खेतों में फसल पोषक संतुलन बनाए रखना प्रमुख रहा।संस्थागत पहल: किसान प्रशिक्षण, कृषि सेवाओं की पहुंच और वित्त पोषण योजनाओं ने HYV बीजों के सफल प्रसार में सहायक भूमिका निभाई।सामाजिक-आर्थिक प्रभावखाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि से भारत आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठा पाया।क्षेत्रीय असमानताओं के बावजूद, हरित क्रांति ने पंजाब, हरियाणा जैसे बेहतर आर्थिकी और जल-संरक्षण क्षेत्र में अधिक लाभ दिखाया।प्रमुख निष्कर्षहरित क्रांति में “उच्च उपज देने वाली किस्मों के बीज” प्रमुख चालक थे।HYV बीजों के द्वारा उत्पादन में भारी वृद्धि संभव हुई, जो बाद के वर्षों में आधुनिक कृषि पद्धतियों के आधार बने।Submit Quiz123456Next »