कृषि (भारत का भूगोल)

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41. भारत का कौन-सा शहर चाय उद्योग से जुड़ा है? [MTS (T-I) 19 मई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (b) दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल
Solution:
  • भारत में चाय सबसे महत्वपूर्ण बागानी फसल है। चाय का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य असम है।
  • भारत का दार्जिलिंग शहर, जो पश्चिम बंगाल राज्य में स्थित है, चाय उद्योग से जुड़ा है।
  • चाय उद्योग से जुड़ा शहर: व्यापक दृष्टिकोण
    • असम का डिब्रूगढ़: असम उगाने वाले क्षेत्र में मुख्य चाय केंद्र है।
    • डिब्रूगढ़, लक्ष्मीपुर, कामरूप आदि जिले चाय बागान और उद्योग के लिए प्रमुख केंद्र माने जाते हैं।
    • असम में चाय उत्पादन का बड़ा भाग इन क्षेत्रों से निकलता है, और डिब्रूगढ़ जैसे शहरों के साथ यह क्षेत्र चाय संस्कृति का प्रतीक बन चुका है।
    • यह शहर चाय के निर्यात, processing और मार्केटिंग का एक बड़ा नोड है.​
    • दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल: दार्जिलिंग चाय विश्व-प्रसिद्ध है और इसे चाय उद्योग का एक “प्रमुख केंद्र” माना जाता है।
    • दार्जिलिंग चाय उच्च गुणवत्ता वाली चाय मानी जाती है और यहाँ की बागान-पर्यटन भी एक खास आकर्षण है.​
    • पश्चिम बंगाल अन्य चाय केंद्र: दार्जिलिंग के अलावा जलपाईगुड़ी, कूचबिहार आदि जिलों में भी चाय उत्पादन होता है
    • जो राज्य के चाय उद्योग के हिस्से हैं.​
    • तमिलनाडु और केरल: ये राज्य भी चाय उत्पादक हैं, किंतु व्यापक मात्रा में नहीं जो असम या पश्चिम बंगाल के बराबर हो
    • इन जगहों पर छोटे-छोटे बागान और चाय उत्पादन का अस्तित्व है.​
  • पोस्ट्मॉडर्न आर्थिक परिप्रेक्ष्य
    • चाय उद्योग का योगदान: भारत विश्व के बड़े चाय उत्पादकों में से एक है
    • असम जैसे केंद्र कुल उत्पादन का बड़ा हिस्सा देते हैं। चाय उद्योग न केवल किसान-उत्पादन तक सीमित है
    • बल्कि बागान-प्रबंधन, प्रसंस्करण, विपणन और निर्यात को भी मिलाकर एक विशाल रोजगार-आधार बनाता है।
    • विशेषज्ञ स्रोतों के अनुसार असम 50% से अधिक चाय उत्पादन के लिए जाना जाता है
    • जबकि पश्चिम बंगाल और अन्य राज्य भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.​
  • महत्त्वपूर्ण बिंदु (तार्किक सार)
  • चाय उद्योग के प्रमुख शहर/क्षेत्र:
    • डिब्रूगढ़ (असम): चाय उत्पादन के सबसे बड़े केंद्रों में से एक; शहर-स्तर पर चाय उद्योग की गतिविधियाँ, निर्यात और मार्केटिंग से जुड़ा नोड।
    • तर्ज/बागान केंद्र: लखीमपुर, गोलाघाट, शिवसागर आदि असम के जिले बड़े उत्पादक केंद्र हैं.​
    • दार्जिलिंग (पश्चिम बंगाल): उच्च गुणवत्ता वाली चाय के लिए वैश्विक पहचान; पर्यटन के साथ चाय उद्योग का मजबूत केंद्र.​
    • पश्चिम बंगाल अन्य क्षेत्र: जलपाईगुड़ी, कूचबिहार आदि; राज्य के भीतर चाय उत्पादन का योगदान.​

42. निम्नलिखित में से कौन-सा भारतीय राज्य अपने विशाल चाय बागानों के लिए जाना जाता है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 29 नवंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) असम
Solution:
  • असम राज्य अपने विशाल चाय बागानों के लिए जाना जाता है।
  • चाय उष्ण एवं उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु का पौधा है।
  • चाय के पौधों के लिए 25°C से 30°C तक तापमान की आवश्यकता होती है।
  • पूरा विवरण:
    • असम भारत के सबसे बड़े चाय उत्पादक राज्यों में से है और यहां चाय बागानों की संख्या सबसे अधिक मानी जाती है।
    • विश्लेषण के अनुसार असम में लगभग 800 से अधिक चाय बागान हैं
    • जो इसे देश में चाय नियंत्रण के प्रमुख हब का दर्जा दिलाते हैं ।
    • यह क्षेत्र चाय उत्पादन का बड़ा हिस्सा भी संजोता है और इसकी चाय विश्व स्तर पर प्रसार के लिए जानी जाती है.​
    • दार्जिलिंग शृंखला के विपरीत, जो पश्चिम बंगाल में है
    • असम खुद एक स्वतंत्र चाय उत्पादन केंद्र के रूप में जाना जाता है
    • यह भारत के कुल चाय उत्पादन का एक बड़ा भाग भी देता है।
    • असम के चाय बागान विशेष रूप से बड़े पैमाने पर उद्योग-स्तरीय उत्पादन के लिए मशहूर हैं
    • जहाँ निर्यात और घरेलू बाजारों में चाय की आपूर्ति मुख्य होती है ।​
    • दायरे की व्यापकता के कारण असम में चाय के उत्पादन का औसत वार्षिक योगदान भारत के कुल चाय उत्पादन में बड़े हिस्से के बराबर माना जाता है
    • जो इसे चाय के संदर्भ में एक अग्रणी राज्य बनाता है ।​
    • अन्य राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु आदि भी चाय उत्पादन में अहम हैं
    • लेकिन घर-घर चर्चा में सबसे अधिक विशाल बागान और व्यापक उत्पादन असम के ही हिस्से में माने जाते हैं ।​
    • यदि चाहें, तो इन बिंदुओं को एक तालिका के रूप में भी प्रस्तुत किया जा सकता है
    • जैसे असम vs दार्जिलिंग बनाम अन्य चाय-उत्पादन केंद्र—ताकि तुलना साफ नजर आए।
    •  अगर चाहें तो असम के प्रमुख चाय बागान जिले (जैसे करीमगंज, कामरूप, गोलपारा आदि) की सूची भी दे दूँ ताकि क्षेत्रीय संदर्भ स्पष्ट हो सके।

43. निम्नलिखित में से कौन, कर्नाटक में कॉफी के फूलों को खिलने में मदद करता है? [CGL (T-I) 20 जुलाई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (d) मंजरी वर्षण
Solution:
  • मंजरी वर्षण कर्नाटक में कॉफी के फूलों को खिलने में मदद करता है।
  • आम्र बौछार कर्नाटक तथा केरल में ग्रीष्म ऋतु के अंत में होने वाली मानसून से पहले की वर्षा होती है।
  • इन्हें आम्र वर्षा के रूप में जाना जाता है। लू उत्तर तथा उत्तर-पश्चिमी भारत में गर्मियों में चलने वाली हवा को कहते हैं।
  • तथ्यात्मक विवरण
    • फसल फूलना एक संवेदनशील चरण है
    • जिसे अच्छी फूल-फसल के लिए उपयुक्त तापमान, पर्याप्त सुख-हवा, और पौधों के बीच उचित हवादार माइक्रो-क्लाइमेट की जरूरत होती है
    • कॉफी फूल सामान्यतः 18-25°C के तापमान रेंज में बेहतर सेट होता है
    • अत्यधिक तापमान या अत्यधिक आर्द्रता फूलों की गिरावट या फूल-झड़ जैसी समस्याओं को बढ़ा सकती है.​
    • कर्नाटक भारत का सबसे बड़ा कॉफी उत्पादक राज्य है और यहां रोबस्टा तथा अरेबिका किस्में बड़ी मात्रा में उगती हैं
    • राज्य का मौसम, खासकर pre-monsoon (ब्लॉसम शावर) और आगे की बारिश, फूलों के विकास और फूलों के सेटिंग को प्रभावित कर सकता है.​
    • प्री-मानसून बारिश, जिसे कुछ जगहों पर ब्लॉसम शावर के नाम से भी जाना जाता है
    • कॉफी पौधों को फूलने के लिए प्रेरित करती है; इसके बाद की बारिश (बैकिंग शावर) फूलों के स्थायित्व और फसल सेटिंग में मदद कर सकती है.​
    • असमान बरसातें, तापमान वृद्धि, और मौसमी परिवर्तन के कारण कुछ वर्षों में कर्नाटक के कुछ कॉफी क्षेत्रों में फूल आने की मात्रा और फूलों की गुणवत्ता पर असर दिखा है
    • यह प्रभावित मौसम के कारण भी होता है किसान इन स्थितियों के अनुसार खेती बचाव/अनुकूलन उपाय अपनाते हैं.​
    • खेतों में सूर्यछाँव/छायादार पेड़ों की उपस्थिति भी फूलों के खिलने और फसल की मजबूती के लिए सहायक है
    • क्योंकि कॉफी पौधों को हल्की छाया चाहिए होती है ताकि तापमान नियंत्रित रहे और फूलों के सेट में सुधार हो सके.​
  • कौन-सी “फैक्टर” कारगर होते हैं?
    • जलवायु तनाव: हल्की सूखा-स्थिति फूलों के लिए सहमत हो सकती है, लेकिन अत्यधिक सूखा या अत्यधिक आर्द्रता फूलों को खतरे में डालते हैं.​
    • फसल प्रबंधन: छायादार संरचना और मिट्टी-आधारित पोषक तत्व संतुलन फूल-फसल के लिए जरूरी हैं
    • उर्वरक पद्धतियाँ और मिट्टी परीक्षण भी फूलने की स्थिति पर प्रभाव डालते हैं.​
    • मौसम-पूर्व चेतावनी और किसान-अनुदेशन: कुछ क्षेत्रों में मौसम विभाग की भविष्यवाणी के अनुसार सिंचाई/कीटनाशक के इस्तेमाल से फूलना प्रभावित किया जा सकता है; यह क्षेत्रीय खबरों में भी दिखता है.​
  • संक्षिप्त निष्कर्ष
    • कर्नाटक में कॉफी के फूलों को खिलाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण कारक मौसम-आधारित नियंत्रण है
    • सही तापमान (लगभग 18-25°C), समय पर बारिशें (ब्लॉसम शावर और बैकिंग शावर), और छायादार/हवा-पूर्ण पर्यावरण।
    • ये मिलकर फूलों की मात्रा और फसल सेटिंग पर सीधे असर डालते हैं.​
    • इसके अलावा, क्षेत्रीय स्थिति के अनुसार मिट्टी का पोटेशियम/नाइट्रोजन-आधारित पोषक तत्व संतुलन, मिट्टी की जल-नियोजन और छाया-योजना भी फूलों के स्वस्थ विकास में सहायक होते हैं.

44. भारत में बाबा बूदन पहाड़ियों पर ....... की खेती शुरू की गई थी। [CGL (T-I) 18 जुलाई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) कॉफी
Solution:
  • भारत में बाबा बूदन की पहाड़ियों पर कॉफी की खेती शुरू की गई थी।
  • 18वीं शताब्दी के दौरान कॉफी की वाणिज्यिक खेती भारत में प्रारंभ हुई।
  • भारत में कॉफी पूर्वी एवं पश्चिमी घाट के संवेदनशील पर्यावरणीय क्षेत्र में छायादार पेड़ों के नीचे उगाई जाती है।
  • कॉफी की खेती की शुरुआत और इतिहास
    •  यह कॉफी के शुरुआती उन्नयन और Malnad क्षेत्र के विकास की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण चरण माना गया है।
    • यह कहानी बाबा बुদান के साथ जुड़ी मान्याताओं और स्थानिक इतिहास के कारण लोकप्रिय है ।​
  • बाबा बुдан और इनाम Lands (inam lands)
    • Mysore क्षेत्र के इनाम भूमि (inam lands) कॉफी की खेती के लिए एक बहुप्रतीक्षित भू-भाग रहे हैं
    • जहाँ native cultivators तथा यूरोपीय योजनाकारों के बीच भूमि और श्रम के अधिकारों के संघर्ष हुए थे।
    • इस संघर्ष ने कॉफी Economía की दो मुख्य धारा बनाईं: native growers और European planters ।​
  • स्रोतों के बारे में स्पष्टता
    • एक अकादमिक स्टडी लेखन में बाबा बुदान पहाड़ियों के इतिहास को कॉफी की खेती, भूमि-अधिकार, और स्थानीय प्रतिरोध के संदर्भ में विश्लेषित किया गया है
    • जो इस क्षेत्र में कॉफी के विकास के पीछे के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने को उजागर करता है.​
    • हिंदी/उच्चारण स्रोत भी यही संकेत देते हैं
    • बाबा बुदान पहाड़ियों पर कॉफी की खेती भारत में शुरू करने के संदर्भ के रूप में दर्ज है ।​
  • कहाँ-कहाँ स्थिति और तथ्य
    • बाबा बुदान पहाड़ी श्रृंखला दक्षिण-पूर्वी कर्नाटक के चिक्कमगलुरु जिले में चन्द्रगिरि/बाबा बुদান इलाके के साथ जुड़ी है
    • जिसे भारतीय कॉफी इतिहास के “ cradle ” के रूप में माना जाता है ।​
    • कोर्ग (Coorg) क्षेत्र में बाबा बुदान से जुड़ी परंपरा और इतिहास आधुनिक कॉफी उद्योग के लिए प्रेरणा का स्रोत रहे हैं
    • जहाँ बाबा बुदान ने सात कॉफी बीज اليمن से लाकर भारत में रोपण कर दिया गया घटना के साथ जुड़ा है
    • जिससे क्षेत्र में कॉफी खेती की शुरुआत मानी जाती है ।​
  • ध्यान दें:
    • bata-बोध: कुछ स्रोत इतिहासकारों के अनुसार कॉफी की खेती बाबा बुदान पहाड़ियों में वास्तविक रूप से 17वीं शताब्दी के दौरान उभरना शुरू हुई
    • क्षेत्र में कॉफी अर्थव्यवस्था के विकास में इस क्षेत्र की भूमिका अहम मानी जाती है ।​
    • भारत में कॉफी की खेती की ऐतिहासिक शुरुआत के बारे में विविध स्रोतों में हल्की-फुल्की भिन्नताएं भी मिलती हैं
    • क्योंकि लोककथाओं और ऐतिहासिक दस्तावेज़ों में इनमें थोड़ा भिन्न विवरण मिल सकता है ।​
    • अगर चाहें, इस विषय पर मैं:
    • एक क्रॉस-वेरिफाइड टाइमलाइन बना दूँ जिसमें Baba Budan से जुड़ी कथाएं, इनाम-भूमि के अधिकार, और Mysore कॉफी के विकास की क्रमबद्ध तिथियाँ हों।
    • क्षेत्रीय इतिहास के लिए हिंदी/अंग्रेजी प्राथमिक स्रोतों के उद्धरण (कथन-संदर्भ) दे दूँ ताकि आप अपने अध्ययन या लेखन के लिए सीधे संदर्भ प्राप्त कर सकें।

45. यह एक उष्ण और उपोष्ण कटिबंधीय फसल है। यह फसल 21°C से 27° C तापमान और 75 सेमी. से 100 सेमी. के बीच वार्षिक वर्षा वाली उष्ण और आर्द्र जलवायु में अच्छे से उगती है। ऊपर दी गई जानकारी में किस फसल की चर्चा की जा रही है? [CHSL (T-I) 16 मार्च, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) गन्ना
Solution:
  • गन्ना एक उष्णकटिबंधीय पौधा है, परंतु उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में भी, जैसे गर्म आर्द्र दशाओं के अंतर्गत उत्तरी भारत में उगाया जा सकता है।
  • यह ग्रेमिनी कुल का पौधा है। गन्ना की फसल के लिए सामान्यतया 21° - 27°C तापमान एवं 75-100 सेमी. वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है।
  • संभावित फसल: गन्ना (चीनी गन्ना)
    • तापमान और वर्षा के अनुरूपता: 21–27°C तापमान और वार्षिक वर्षा 75–100 सेमी के बीच होने पर यह उष्णकटिबंधीय–उपोष्णकटिबंधीय जलवायु में अच्छी तरह पनपती है
    • जो आधारित जानकारी में गन्ना के लिए उपयुक्त माना गया है.​
    • फसल पहचान के कारण: दी गई जलवायु-तापमान सीमा और वर्षा-विभाजन गन्ना के लिए स्थापित मापदंडों से मेल खाते हैं
    • गन्ना एक बारहमासी घास है और चीनी का मुख्य स्रोत है.​
    • आपके दिए गए विवरण के आधार पर पोस्ट किया गया उत्तर यह दर्शाता है कि चर्चा गई फसल गन्ना है
    • यह फसल आम तौर पर ऊष्ण-उपोष्ण जलवायु क्षेत्रों में 75–100 सेमी वर्षा और 21–27°C के तापमान में सबसे बेहतर फसल होती है.​
  • विशेष नोट
    • गन्ना पौधा उष्णकटिबंधीय चक्र के भीतर दीर्घकालिक विकास के लिए उपयुक्त है
    • पुष्पण-कटाई के चरणों में तापमान-संवेदनशीलता ध्यान रखनी पड़ती है.​
    • यह फसली समूह घास परिवार का सदस्य है
    • भारत जैसी प्रमुख कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्थाओं में प्रमुख स्रोत—चीनी का—का योगदान देता है.​
  • यदि चाहें, इस पूछे गए विषय के लिए आप अधिक विस्तृत विवरण, जैसे:
    • गन्ना की फसल चक्र (बोई से कटाई तक),
    • जल प्रबंधन और तापमान-वार्षिक वितरण का प्रभाव,
    • रसायन/जैव उर्वरकों और रोग-कीट नियंत्रण के सुझाव,
    • अन्य उष्णकटिबंधीय फसलों के साथ तुलना (जैसे चावल, बाजरा) जैसे उप-शीर्षक भी बना सकता हूँ।

46. निम्नलिखित में से कौन-सा मोटे अनाज का एक उदाहरण नहीं है? [MTS (T-4) 02 मई , 2023 (111-पाली)]

Correct Answer: (a) गेहूं
Solution:
  • मोटे अनाज के अंतर्गत ज्वार, बाजरा, रागी आदि आते हैं।
  • गेहूं इस श्रेणी में नहीं आता है। अतः सही उत्तर विकल्प (a) होगा
  • विस्तार और स्पष्टता:
    • इनमें ज्वार, बाजरा, रागी, कोदा, सामा, कुटकी आदि प्रमुख हैं। अरहर एक दाल है
    • जिसे मोटे अनाज की श्रेणी में गिना नहीं जाता [उदाहरण: ज्वार, बाजरा, रागी ये मोटे अनाज हैं; अरहर दाल है]।
    • इसलिए यदि विकल्पों में अरहर हो, तो वह मोटे अनाज का उदाहरण नहीं होगा।
    • अन्य विकल्प जो सामान्य रूप से मोटे अनाज की सूची में आते हैं, वे ज्वार, बाजरा, रागी आदि होते हैं।
  • महत्वपूर्ण बिंदु:
    • मोटे अनाज की सूची विविध स्रोतों में भिन्न हो सकती है
    • लेकिन सामान्यतः ज्वार, बाजरा, रागी, कोदो, सामा, कुटकी आदि को मोटे अनाज के तौर पर माना जाता है।
    • अरहर एक दाल है, न कि मोटे अनाज।

47. जिन प्रदेशों में कृषक केवल सब्जियां पैदा करता है, वहाँ इसको ...... का नाम दिया जाता है। [MTS (T-1) 13 जून, 2023 (1-पाली)]

Correct Answer: (d) ट्रक कृषि
Solution:
  • जिन प्रदेशों में कृषक केवल सब्जियां पैदा करते हैं, वहां इसे ट्रक कृषि (Truck Farming) कहते हैं।
  • ट्रक फार्म एवं बाजार के मध्य की दूरी, जो एक ट्रक रात भर में तय करता है, उसी आधार पर इसका नाम ट्रक कृषि रखा गया है।
  •  इन्हें शहरों/नजदीकी बाजारों में सीधे या थोक विक्रेताओं को बेचे जाते हैं।
  • यह नाम इस लिए पड़ा क्योंकि ऐसी फसलें अक्सर ट्रकों पर शहरों के बाजारों तक पहुँचती थीं
  • ताकि Fresh produce जल्दी पहुँच सके और बाजार-डिमांड के अनुरूप ताज़ा वस्तुएँ मिल सकें। [उच्च विश्वसनीय विवरण/तथ्य के लिए स्रोत देखें]
  • क्षेत्रीय प्रसार: यह पद्धति भारत के कई राज्य/क्षेत्रों में प्रचलित है
  • विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ ग्रामीण आबादी शहरों के नज़दीक रहते हुए ताज़ा सब्ज़ियों की माँग अधिक रहती है और परिवहन मार्ग बेहतर होते हैं।
  • फसल प्रकार: ट्रक कृषि में आम तौर पर टमाटर, पत्तेदार सब्ज़ियाँ (जैसे सलाद, पत्ता गोभी), मूली, खीरा, गोभी, ब्रोकोली, प्याज, मूँगफली जैसी प्राथमिक फसलें हो सकती हैं, जो वैश्विक और स्थानीय बाज़ारों में उच्च मूल्य पर बिकती हैं।
  • कुछ अध्ययन/जानकारियाँ इसे ट्रक खेती के रूप में चिन्हित करते हैं
  • जिसमें किसान सब्ज़ियों के अलावा फल/फूल जैसी अन्य उच्च मांग वाली फसलों को भी उगा सकते हैं।
  • [उद्धृत जानकारी अलग-अलग स्रोतों में मिलती है]
  • फायदे:
    • उच्च आय की संभावना क्योंकि बाजार-आवश्यकता ताज़ा और उच्च गुणवत्ता वाली वस्तुओं पर होती है।
    • सीधे उपभोक्ता या खुदरा विक्रेताओं को बेचने से मध्यस्थ-खर्च कम होते हैं।
  • चुनौतियाँ:
    • फसल चयन और मार्केटिंग में सटीक मार्गदर्शन की जरूरत।
    • ताज़गी बनाए रखना आवश्यक है; परिवहन/संग्रहण लागत बढ़ सकती है।
    • मौसम और जलवायु के अनुरूप फसलों का चुनाव कठिन हो सकता है।
    • अन्य नाम/संस्थानिक संदर्भ: इसे कुछ जगहों पर ट्रक फार्मिंग/ट्रक फसलें (truck crops) के रूप में भी कहा जाता है
    • विभिन्न परीक्षा और पाठ्यपुस्तकों में यही शब्दावली उद्धृत मिलती है। (कई स्रोतों में उत्तर-चयन के रूप में भी यही नाम दिया गया है)
  • यदि आप चाहें तो:
    • मैं आपके लिए हिंदी/उच्चारित ग्रंथों में ट्रक कृषि के बारे में विश्वसनीय स्रोतों के साथ एक संदर्भ-सूची (references) बना सकता हूँ।
    • या आप यह जानना चाहें कि भारत के किन राज्यों में ट्रक कृषि अधिक प्रचलित है, उनके बारे में संक्षिप्त-सूचियाँ दे सकता हूँ।

48. कर्तन-दहन प्रणाली (Slash and Burn) कृषि को राज्य में 'बेबर' या 'दहिया' के नाम से जाना जाता है। [MTS (T-I) 16 जून, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (c) मध्य प्रदेश
Solution:
  • कर्तन-दहन प्रणाली कृषि को मध्य प्रदेश राज्य में 'बेबर' या 'दहिया' के नाम से जाना जाता है।
  • कर्तन-दहन कृषि प्रणाली को असम, मेघालय, मिजोरम सहित पूर्वोत्तर भारत में झूर्मिंग या झूम के नाम से जाना जाता है।
  • प्रयोजन और प्रक्रिया
    • उद्देश्य: जल्दी से खेत के लिए उपजाऊ भूमि तैयार करना, ग्रामीण आबादी को खाद्यान्न उत्पादन की एक मौलिक स्रोत उपलब्ध कराना।
    • विधि: वन or जंगल के एक हिस्से को साफ किया जाता है
    • साफ भूमि को जलाकर जलने से उर्वरक तत्व मिट्टी में मिल जाते हैं; बाद में उसी भूमि पर कुछ वर्षों तक फसल उगाई जाती है।
    • स्थानांतरण: भूमि के उर्वरक तत्व तीव्रता से खत्म होने लगते हैं
    • तो किसान एक अन्य वन भूमि के टुकड़े को साफ कर खेती शुरू कर देता है
    • पुराने क्षेत्र पर थोड़ा समय बाद पुनः खेती संभव हो सकता है, परंतु क्रम बदलता रहता है।
  • क्षेत्रीय नाम और परिचय
  • भारत के विभिन्न राज्यों में इसे विभिन्न नामों से जाना जाता है:
    • बेवर या दहिया: मध्य प्रदेश, उड़ीसा आदि में सामान्यतः इस पद्धति को यही शब्दों से पुकारा जाता है ।​
    • वालरा: राजस्थान के कुछ क्षेत्रों में इस पद्धति को वालरा कहा जाता है ।​
    • कुरुवा: झारखंड की स्थानीय बोली-परंपरा में इसी पद्धति को कुरुवा कहा जाता है ।​
    • झूम-असम, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड: पूर्वोत्तर के कुछ क्षेत्रीय नाम भी दिखते हैं ।​
    • दीपा-छत्तीसगढ़ और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में भी इसी प्रकार की भूमि-उपजाऊ बनाने की चाल प्रचलित मानी जाती है ।​
  • फायदे और नुकसान
  • फायदे
    • लंबे समय तक खेत की तैयारी के लिए कम लागत।
    • जलाने से कुछ पोषक तत्व मिट्टी में मिल जाते हैं, जो शुरुआती वर्ष में फसलों के लिए सहायक होते हैं।
  • नुकसान
    • मिट्टी की उर्वरता का अस्थिर होना और मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट, खासकर पोषक तत्वों का स्थिर नुकसान।
    • जैव-विविधता और वनावरण के नुकसान, मृदा अपरदन का खतरा बढ़ना।
    • जलवायु-निर्भरতা और आवर्त भूमिगत जल स्तर पर प्रभाव पड़ सकता है
    • वन संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से इसकी जोखिम बढ़ती है।
    • आधुनिक कृषि तकनीकों की कमी वाले क्षेत्रों में खाद-बाला उर्वरक, बीज-विविधता और उत्पादन क्षमता का सीमित लाभ।
  • सामाजिक-आर्थिक संदर्भ
    • यह पद्धति कभी-कभी निर्धन और दूर-दराज के ग्रामीण समुदायों में पारंपरिक जीवन-यापन का आधार बनती है
    • क्योंकि इसका प्रारंभिक खर्च कम रहता है और स्थानीय संसाधनों पर निर्भर रहता है ।​
    • आधुनिक समय में कई सरकारें और संगठनों सतत कृषि Practices को बढ़ावा दे रहे हैं
    • ताकि पर्यावरणीय क्षति कम हो, मृदा पुनःउर्वरता बनाए रखी जा सके और स्थानीय समुदायों को सुरक्षित रखा जा सके ।​
  • राज्यों के नमूनों के आधार पर उपयोगी तथ्य
    • मध्य प्रदेश में कर्तन-दहन को बेवर या दहिया कहा जाता है
    • जो इसे shifted/non-permanent farming के रूप में पहचान देता है ।​
    • राजस्थान में इस पद्धति को वालरा कहा जाता है, जो क्षेत्रीय विशेषता के अनुरूप नामात्मक पहचान है ।​
    • झारखंड में इसे कुरुवा के नाम से जाना जाता है, जो स्थानीय भाषिक-परंपराओं के अनुरूप है ।​
    • पूर्वोत्तर भारत के कुछ राज्यों में इसे विभिन्न नामों से नहीं बल्कि व्यावहारिक रूप से same अवधारणा के रूप में उपयोग किया जाता है
    • जैसे ज़ंगल काटकर जलाना और भूमि साफ करना ।​
  • आधुनिक परिप्रेक्ष्य और संरक्षण
    • सतत कृषि के हिस्से के रूप में वनावरण की सुरक्षा, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखना और जैव विविधता संरक्षित करना प्राथमिक लक्ष्य होते जा रहे हैं ।​
    • जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में यह पद्धति अधिक जोखिमपूर्ण मानी जाती है
    • क्योंकि यह मृदा कटाव और प्राकृतिक संसाधन depletion को बढ़ाती है।

49. निम्नलिखित में से सही जोड़ी (स्थानांतरित कृषि का नाम और संबंधित राज्य) की पहचान कीजिए। [MTS (T-I) 12 सितंबर, 2023 (1-पाली)]

Correct Answer: (c) बेवर - मध्य प्रदेश
Solution:
  • झूम कृषि एक स्थानांतरित कृषि पद्धति है।
  • झूम कृषि को असम, मेघालय, मिजोरम और नगालैंड में झूम, आंध्र प्रदेश में पोडु अथवा पेंडा तथा मध्य प्रदेश में बेबर या दहिया आदि नामों से जाना जाता है।
  • पोडू ( Podu ) – आंध्र प्रदेश और ओडिशा के पहाड़ी और जंगली क्षेत्रों में प्रयुक्त एक स्थानीय नाम है
  • जहाँ स्थानांतरित कृषि के संदर्भ में यह नाम सुनाई देता है। [आंध्र प्रदेश, ओडिशा]।
  • कुमारी ( Kumari ) – पश्चिमी घाट के पहाड़ी क्षेत्रों में प्रयुक्त एक क्षेत्रीय नाम माना गया है
  • खास तौर पर मध्य भारत के कुछ हिस्सों में भी इसका उल्लेख मिलता है। [पश्चिमी घाट क्षेत्र / मध्य प्रदेश के कुछ भाग]।
  • बेवर/दहिया ( Bewar/Dahiyar) – मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र सहित कुछ मध्यभारत के हिस्सों में पहचाना जाने वाला स्थानीय नाम है। [मध्य प्रदेश]।
  • मिलपा ( Milpa ) – मेक्सिको और युकाटन/ग्वाटेमाला जैसे मध्य अमेरिका के क्षेत्र में स्थानांतरित कृषि का प्रमुख नाम है
  • यहाँ पर सामुदायिक खेतों में कई फसलें होती हैं, और फसल चक्रण के साथ धान/मक्का/शकरकंद आदि उगायी जाती हैं।
  • [मैक्सिको, युकाटन, ग्वाटेमाला]।
  • कांनुको/कोनुको ( Coñuco/Conuco ) – वेनेजुएला और कुछ दक्षिणी अमेरिकी हिस्सों में प्रयुक्त नाम है
  • यह भी स्थानांतरित कृषि का एक रूप है। [वेनेजुएला]।
  • रॉका ( Roca ) – ब्राजील के कुछ क्षेत्रों में प्रयुक्त नाम है
  • साथ ही ब्राजील में शिफ्टिंग-क्राउटिंग के प्रकार के रूप भी देखे जाते हैं। [ब्राजील]।
  • चेतेमिनी ( Chetemini/ Chetemine ) – उन्नत संदर्भों के मुताबिक उगाने के तरीके के रूप में पूर्वी अफ्रीका के कुछ हिस्सों के साथ-साथ अन्य क्षेत्रीय भाषिक नामों में भी सुनाई देता है
  • मुक्कदस रूप से यह नाम दक्षिणी राज्यों के कुछ हिस्सों में मिलता है। [उल्लेखित क्षेत्रीय संदर्भों में पूर्वी अफ्रीका]।
  • महत्वपूर्ण नोट:
    • स्थानांतरित कृषि के नाम और उनका क्षेत्रीय वितरण देश-राज्यवार विविध है
    • ऊपर दिए उदाहरण बहुधा UPSC/राज्य सेवा/पूर्व-प्रश्नोत्तर संदर्भ में प्रयुक्त नामावली हैं।
    • यदि किसी विशिष्ट राज्य/देश के लिए शुद्ध नाम चाहिए
    • तो कृपया बताएं—ताकि सिर्फ उसी क्षेत्र के नाम स्पष्ट और सुसंगत रूप से तालिका या सूची में प्रस्तुत कर दूं।

50. भारत में 'ऑस (Aus)', 'अमन (Aman)' और 'बोरो (Boro)' शब्द का संबंध निम्नलिखित में से किस फसल से है? [MTS (T-I) 11 सितंबर, 2023 (1-पाली)]

Correct Answer: (a) धान
Solution:
  • भारत में ऑस, अमन और बोरो शब्द का संबंध धान की खेती से है।
  • ऑस धान की बुआई मई-जून में, अमन धान की बुआई जून-जुलाई में तथा बोरो धान की बुआई नवंबर-दिसंबर में की जाती है।
  • भूमिका और परिभाषा
    • Aus, Aman और Boro तीन प्रमुख धान की किस्में या मौसम-समय के नाम हैं
    • जो पूर्वी भारतीय राज्यों में चावल की खेती के विविध मौसमों को दर्शाते हैं
    • इस पारंपरिक वर्गीकरण से स्थानीय किसान वर्षभर धान उगाते हैं.​
  • मौसम-आधारित विवरण
    • Aus (पूर्व-मानसून खरीफ): बोई जाती है गर्मियों में और जुलाई–अगस्त तक कटाई होती है
    • वातावरण में तेज गर्मी और बढ़ते मानसून के साथ फसल विकसित होती है
    • यह धान की शुरुआती फसल मानी जाती है.​
    • Aman (मानसून/खरीफ): बोई जाती है बारिश के मानसून मौसम में (जून–जुलाई), और आमतौर पर नवंबर–दिसंबर में कटाई होती है
    • यह भारत के पूर्वी हिस्सों में पारंपरिक रूप से प्रमुख है.​
    • Boro (शीतकालीन/सर्दी-फसल): सर्दियों में बोई जाती है और अप्रैल–मई में कटाई होती है
    • धान की यह फसल बंगाल-आसपास के क्षेत्रों में विशेष रूप से प्रचलित है.​
  • क्षेत्रीय महत्ता
    • ये तीनों शब्द पश्चिम बंगाल, असम, ओड़िशा आदि पूर्वी भारत के धान-उत्पादन में प्रमुख भूमिका निभाते हैं
    • जहाँ एक साल में तीनों फसल प्रकार उगाई जाती हैं
    • यह विविधन मौसम-आधारित खेती की खासियत को दर्शाता है.​
  • उत्पादन और कृषि अर्थव्यवस्था
    • धान भारत का प्रमुख खाद्यान्न है और Aus/Aman/Boro के रूप में इन वर्षों के अनुसार फसल-चक्र किसानों को सालभर उत्पादन के अवसर देते हैं
    • यह देश की खाद्यान्न सुरक्षा और ग्रामीण आय से जुड़ा अहम हिस्सा है.​
  • सांस्कृतिक और भूगोलिक संदर्भ
    • इन शब्दों का उपयोग विशेषकर बंगाल-बांग्लादेश के सांस्कृतिक-सामाजिक संदर्भों और धान-उत्पादन प्रथाओं में सामान्य है
    • जहाँ धान की विविध किस्में और मौसम मिलकर एक स्थानीय कृषि प्रणाली बनाते हैं.