क्रांतिकारी गतिविधियां (आधुनिक भारतीय इतिहास)Total Questions: 251. निम्नलिखित में से कौन, लाहौर षड्यंत्र मामले में भारत की ब्रिटिश सरकार द्वारा मृत्युदंड पाने वाले दोषियों में से नहीं था ? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 17 नवंबर, 2023 (II-पाली)](a) शिवराम राजगुरु(b) सुखदेव थापर(c) उधम सिंह(d) भगत सिंहCorrect Answer: (c) उधम सिंहSolution:लाहौर षड्यंत्र मामला जॉन सॉन्डर्स की हत्या से संबंधित है, जिसके लिए भगत सिंह, सुखदेव, और राजगुरु को 23 मार्च 1931 को फाँसी दी गई थी।उधम सिंह इस मामले के दोषी नहीं थे। उन्होंने 1940 में लंदन में माइकल ओ'डायर की हत्या की थी ताकि जलियाँवाला बाग हत्याकांड का बदला लिया जा सके।चूंकि माइकल ओ'डायर ही उस समय पंजाब का लेफ्टिनेंट गवर्नर था जिसने हत्याकांड की मंजूरी दी थी। इसलिए, लाहौर षड्यंत्र मामले में मृत्युदंड पाने वाले दोषियों में उधम सिंह शामिल नहीं थे।उधम सिंह लाहौर षड्यंत्र केस में मौत की सजा पाने वाले दोषियों में शामिल नहीं थे।लाहौर षड्यंत्र केस में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे प्रमुख क्रांतिकारी शामिल थे। भगत सिंह, सुखदेव थापर और शिवराम राजगुरु मुख्य दोषी थे जिन्हें इस मामले में मौत की सजा सुनाई गई थी। Other Information लाहौर षड्यंत्र केस1929 का लाहौर षड्यंत्र केस भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ एक महत्वपूर्ण घटना थी।इसमें 8 अप्रैल, 1929 को दिल्ली में केंद्रीय विधान सभा पर भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा बमबारी शामिल थीं।उद्देश्य दमनकारी कानूनों का विरोध करना और जनता को भारतीय स्वतंत्रता के कारण के प्रति जागरूक करना था।भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव पर बाद में मुकदमा चलाया गया और षड्यंत्र में शामिल होने और जे.पी. सॉन्डर्स, एक ब्रिटिश पुलिस अधिकारी की हत्या के लिए उन्हें मौत की सजा सुनाई गई।भगत सिंहभगत सिंह एक करिश्माई स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।वे ब्रिटिश राज के खिलाफ अपने साहसिक कार्यों के लिए जाने जाते हैं, जिसमें केंद्रीय विधान सभा पर बमबारी और जे.पी. सॉन्डर्स की हत्या शामिल है।23 मार्च, 1931 को उनके निष्पा निष्पादन ने उन्हें एक शहीद और ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ लड़ाई के प्रतीक में बदल दिया।2. सूर्यसेन अंग्रेजों के खिलाफ निम्नलिखित में से किस कट्टरपंथी गतिविधियों से जुड़े थे? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 2 दिसंबर, 2023 (II-पाली)](a) मुजफ्फरपुर षड्यंत्र केस(b) चटगांव शस्त्रागार छापा(c) काकोरी षड्यंत्र(d) दिल्ली षड्यंत्र केसCorrect Answer: (b) चटगांव शस्त्रागार छापाSolution:सूर्यसेन, जिन्हें 'मास्टर दा' के नाम से जाना जाता है, ने अप्रैल 1930 में चटगांव शस्त्रागार छापा का नेतृत्व किया था।यह अंग्रेजों के खिलाफ एक बड़ा सशस्त्र प्रयास था, जिसका उद्देश्य चटगांव में पुलिस और सहायक बलों के शस्त्रागारों पर कब्जा करना और एक क्रांतिकारी सरकार की घोषणा करना था।यह घटना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक महत्वपूर्ण कट्टरपंथी गतिविधि थी, जिसने युवाओं को प्रेरणा दी।सूर्यसेन अंग्रेजों के खिलाफ कट्टरपंथी गतिविधियों में सबसे प्रमुख रूप से चटगाँव शस्त्रागार छापे से जुड़े थे।उन्होंने 18 अप्रैल 1930 की रात चटगांव के दो बड़े ब्रिटिश शस्त्रागारों पर हमला किया, जिसमें उन्होंने अंग्रेजों के हथियारों को लूटकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में हथियारबंद क्रांति की शुरुआत की।इस छापेमारी का उद्देश्य अंग्रेजी शासन को चुनौती देना और उसकी सैन्य शक्ति को प्रभावित करना था। सूर्यसेन ने खुद की एक भारतीय रिपब्लिक आर्मी (IRA) भी बनाई थी, जिसमें लगभग 500 क्रांतिकारी शामिल थे।इस आर्मी ने अंग्रेजों के खिलाफ सक्रिय सशस्त्र विद्रोह किया।छापे के दौरान, जो भी अंग्रेजी विरोधी हुआ या शस्त्रागार की रक्षा में आया, उसे गोली मार दी गई। इसके बाद सूर्यसेनउनके क्रांतिकारियों ने चटगांव जलालाबाद की पहाड़ी पर कब्जा कर लिया और चार दिनों तक उन्होंने वहाँ अंग्रेजों के शासन को चुनौती दी।इस संघर्ष में कई क्रांतिकारी और अंग्रेज सैनिक मारे गए, पर सूर्यसेन पकड़े नहीं गए। तीन साल बाद 1933 में उनकी गिरफ्तारी हुई1934 में उन्हें फांसी दी गई। फांसी से पहले उनके नाखून और दांत निकाल दिए गए थे ताकि वे फांसी के वक्त जिंदाबाद का नारा न लगा सकें।सूर्यसेन के इस विद्रोह ने यह दिखाया कि अंग्रेज़ अजेय नहीं थे और उन्होंने सशस्त्र संघर्ष के ज़रिए आजादी के लिए लड़ने का रास्ता दिखाया।उन्हें "मास्टर दा" के नाम से भी जाना जाता था, क्योंकि वे एक शिक्षक भी थे और युवाओं को क्रांतिकारी विचारों के लिए संगठित किया।संक्षेप में, सूर्यसेन की कट्टरपंथी गतिविधियों का मुख्य केंद्र 1930 की चटगांव शस्त्रागार छापा और इसकी परिणामी सशस्त्र विद्रोह थी जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण क्रांतिकारी घटना थी.3. हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन ने 1928 में किसके नेतृत्व में समाजवादी विचारों को अपनाया ? [Phase-XI 30 जून, 2023 (I-पाली)](a) भगत सिंह(b) राम प्रसाद बिस्मिल(c) राजगुरु(d) चंद्रशेखर आजादCorrect Answer: (d) चंद्रशेखर आजादSolution:मूल रूप से 1924 में स्थापित हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) ने 1928 में भगत सिंह के नेतृत्व में दिल्ली के फ़िरोज़ शाह कोटला में आयोजित एक बैठक में अपना नाम बदलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन कर दिया।यह परिवर्तन भगत सिंह के गहन अध्ययन और मार्क्सवादी (समाजवादी) विचारों के प्रति झुकाव को दर्शाता है।इस संशोधन के बाद, संगठन का उद्देश्य केवल स्वतंत्रता प्राप्त करना नहीं था, बल्कि समाजवादी सिद्धांतों पर आधारित एक भारतीय गणराज्य की स्थापना करना भी था। इस बदलाव का नेतृत्व भगत सिंह ने किया था। इस नए संगठन का मुख्य उद्देश्य राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ सामाजिक-आर्थिक समानता को स्थापित करना था।भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव थापर, और अन्य क्रांतिकारियों ने मिलकर इस संगठन को पुनर्जीवित किया और समाजवादी विचारधारा के तहत ब्रिटिश शासन के खिलाफ संगठित क्रांति की दिशा दी।क्रांतिकारी प्रयासों में राजनीतिक स्वतंत्रता की लड़ाई को समाजवादी सिद्धांतों के साथ जोड़ा, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक नया मोड़ था।इस संगठन ने सामाजिक न्याय और समानता के लिए संघर्ष किया, जो तत्कालीन अन्य स्वाधीनता संगठनों से अलग था।इस परिवर्तन के पीछे मुख्य कारण था ब्रिटिश सरकार के खिलाफ अधिक आक्रामक और प्रभावी क्रांतिकारी गतिविधि को बढ़ावा देना, साथ ही समाज में आर्थिक असमानता को समाप्त करने की कोशिश करना।स्थापना दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में हुई थी और यह संगठन काकोरी कांड, जॉन सॉन्डर्स की हत्या जैसे ऐतिहासिक क्रांतिकारी घटनाओं से जुड़ा था।इस प्रकार, भगत सिंह के नेतृत्व में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन ने 1928 में समाजवादी विचारधारा को अपनाया और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के रूप में पुनर्गठन किया गया.4. 1928 में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के गठन में निम्नलिखित में से किसने महत्वपूर्ण योगदान दिया था? [कांस्टेबिल 3 दिसंबर, 2023 (I-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 23 नवंबर, 2023 (I-पाली), MTS (T-I) 20 जून, 2023 (I-पाली)](a) बाल गंगाधर तिलक(b) सुभाष चंद्र बोस(c) लाला लाजपत राय(d) भगत सिंहCorrect Answer: (d) भगत सिंहSolution:हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के गठन में भगत सिंह ने 1928 में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।उन्होंने चंद्रशेखर आजाद और अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिलकर HRA को पुनर्गठित किया।भगत सिंह ने इस संगठन को एक नई वैचारिक दिशा दी, जिसमें सिर्फ हिंसा नहीं बल्कि समाजवाद को भी एक मुख्य लक्ष्य बनाया गया।यह संगठन जॉन सॉन्डर्स की हत्या और केंद्रीय विधानसभा में बम फेंकने जैसी महत्वपूर्ण गतिविधियों के लिए जिम्मेदार था।यह संगठन पहले हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी के नाम से जाना जाता था, जिसे राम प्रसाद बिस्मिल, सचिंद्रनाथ सान्याल, सचिंद्र नाथ बख्शी और जोगेश चंद्र चटर्जी ने स्थापित किया था।1928 में इस संगठन का नाम बदलकर किया गया ताकि उसमें समाजवादी विचारधारा को भी शामिल किया जा सके, जिसका प्रभाव खासकर भगत सिंह के कारण था। उद्देश्य ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ सशस्त्र क्रांति के माध्यम से लड़ना था और सामाजिक आर्थिक समानता, श्रमिकों और किसानों की क्रांति के लिए काम करना था।इस संगठन ने काकोरी षड्यंत्र, जॉन सॉन्डर्स की हत्या और सेंट्रल असेंबली बॉम्बिंग जैसी कई क्रांतिकारी गतिविधियों में भूमिका निभाई।प्रोलेटेरियाई वर्ग की तानाशाही और राजनीतिक सत्ता से परजीवियों के निर्वासन की बात की, जो स्पष्ट रूप से समाजवादी झुकाव को दर्शाता था।संक्षेप में, 1928 में गठन में चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, सुखदेव थापर, जोगेश चंद्र चटर्जी, अशफाकुल्ला खान और अन्य क्रांतिकारियों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया थाजिन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी और समाजवादी विचारधाराओं को प्रभावी रूप से जोड़ा और ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का नेतृत्व किया.5. रानी गाइदिनल्यू निम्नलिखित में से किस आंदोलन से जुड़ी हैं? [Phase-XI 27 जून, 2023 (I-पाली)](a) निशा बंध(b) हेराका(c) नुपी लान(d) मीरा पैबिCorrect Answer: (b) हेराकाSolution:रानी गाइदिनल्यू मणिपुर, नागालैंड और असम के ज़ेलियांगरोंग नागाओं के बीच एक आध्यात्मिक और राजनीतिक आंदोलन, हेराका आंदोलन से जुड़ी थीं।1930 के दशक में, उन्होंने अपने चचेरे भाई हैपौ जादोनंग के बाद इस आंदोलन का नेतृत्व संभाला।यह आंदोलन ईसाई धर्म के प्रवेश का विरोध करने और ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक स्थानीय विद्रोह शुरू करने पर केंद्रित था। इस संघर्ष के लिए उन्हें ब्रिटिशों द्वारा 14 वर्षों के लिए कैद किया गया था।रानी गाइदिनल्यू हेराका आंदोलन से जुड़ी थीं, जो नागा समुदाय में एक सुधारवादी और स्वतंत्रता संग्राम का आंदोलन था।इस आंदोलन का मूल उद्देश्य नागा क्षेत्र से ब्रिटिश उपनिवेशवाद को समाप्त करना था।उन्होंने 13 साल की उम्र में अपने चचेरे भाई हाईपू जदोनांग के साथ इस आंदोलन से जुड़कर ब्रिटिश शासन के खिलाफआवाज उठाई नागा आदिवासियों के बीच एकता स्थापित कर अंग्रेजों के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा बनाया।रानी गाइदिनल्यू ने ब्रिटिश शासन के अमानवीय कर और नियमों के विरोध में लोग कर भुगतान से मना कर दिया था।हेराका आंदोलन शुरू में एक धार्मिक पुनरुद्धार आंदोलन था, लेकिन बाद में यह राजनीतिक आंदोलन में परिवर्तित हो गयाजिसका उद्देश्य नागा राज व स्वतंत्रता को कायम रखना और अंग्रेजों को मणिपुर व नागा क्षेत्र से बाहर करना था।उन्होंने गांधीजी के स्वतंत्रता संग्राम को भी अपने आंदोलन से जोड़ा और गांधीवादी विचारधारा को नागा लोगों तक पहुंचाया।इसके चलते अंग्रेजों ने इस आंदोलन को दबाने के लिए गांव जलाए और सख्त कार्रवाई की, लेकिन रानी गाइदिनल्यू और उनके अनुयायियों ने जुझारूपन से लड़ाई जारी रखी।रानी गाइदिनल्यू को उनके नेतृत्व और साहस के लिए "रानी" की उपाधि मिली, और स्वतंत्रता के बाद उन्हें पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया।उनके प्रयासों और नेतृत्व के कारण उन्हें नागाओं के बीच एक देवी के रूप में भी पूजा गया।अंग्रेजों ने उनके खिलाफ झूठे आरोप लगाए उन्हें काला पानी की सजा दी, लेकिन उनका संघर्ष नागाओं और भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण रहा।इस प्रकार, रानी गाइदिनल्यू मुख्य रूप से हेराका आंदोलन से जुड़ी थींजिसने न केवल नागा समुदाय में एकता और स्वतंत्रता की भावना जागृत की, बल्कि अंग्रेजी शासन के विरुद्ध एक सशक्त विद्रोह भी प्रस्तुत किया.6. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन 1925 में ....... में पहले पार्टी सम्मेलन में हुआ था। [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 20 नवंबर, 2023 (II-पाली)](a) दिल्ली(b) कानपुर(c) मद्रास (वर्तमान चेन्नई)(d) बॉम्बे (वर्तमान मुंबई)Correct Answer: (b) कानपुरSolution:भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) का औपचारिक गठन 26 दिसंबर 1925 को कानपुर में पहले पार्टी सम्मेलन में हुआ था।हालांकि पार्टी के कुछ संस्थापक सदस्य एम. एन. रॉय जैसे लोग विदेशों में सक्रिय थेभारत के भीतर पार्टी की औपचारिक स्थापना कानपुर में हुई थी।यह भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में समाजवादी और कम्युनिस्ट विचारों को संगठित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।एस. वी. घाटे CPI के पहले सचिव थे।पार्टी के गठन में योगदान देने वाले मुख्य प्रतिभागी श्रमिक, छात्र, किसान और बुद्धिजीवी थे।CPI भारत की सबसे पुरानी कम्युनिस्ट पार्टी है। Other Informationकम्युनिस्ट सम्मेलन जिसमें CPI का गठन हुआ था, कानपुर में उसी स्थान पर आयोजित किया गया थाजहाँ कांग्रेस अधिवेशन आयोजित किया गया था।कम्युनिस्ट सम्मेलन सत्य भक्त द्वारा बुलाया गया था।CPI ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ मिलकर कार्य किया।लेबर किसान पार्टी ऑफ हिंदुस्तान (LKPH) जैसे कई छोटे राजनीतिक समूह CPI में विलय हो गए।6 फरवरी 1926 को कृष्णानगर में आयोजित सम्मेलन में पार्टी का नाम बदलकर बंगाल की वर्कर्स एंड पिसेट्स पार्टी कर दिया गया। इस सम्मेलन को "कानपुर कम्युनिस्ट सम्मेलन" के नाम से जाना जाता है। इस सम्मेलन की अध्यक्षता सिंगरावेलु चेट्टियार ने की थीपहली बार पार्टी ने आधिकारिक रूप से अपने संगठन का गठन किया। इस सम्मेलन में विभिन्न कम्युनिस्ट समूहों को एकजुट करके पार्टी का गठन किया गया।पार्टी के पहले महासचिव एस. वी. घाटे थे। पार्टी की स्थापना में एम. एन. रॉय जैसे नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही।हालांकि कुछ दृष्टिकोणों के अनुसार पार्टी की शुरुआत 1920 में ताशकंद में हुई थीपरंतु औपचारिक और आधिकारिक गठन 1925 में कानपुर में हुआ माना जाता है।7. 1908 में, ....... और प्रफुल्ल चाकी ने एक गाड़ी पर बम फेंका, जिसमें उनका मानना था कि मुजफ्फरपुर के अलोकप्रिय न्यायाधीश किंग्सफोर्ड थे। [CGL (T-I) 19 जुलाई, 2023 (IV-पाली)](a) भगत सिंह(b) खुदीराम बोस(c) राजगुरु(d) जतींद्रनाथ बोसCorrect Answer: (b) खुदीराम बोसSolution:1908 में, खुदीराम बोस और उनके साथी प्रफुल्ल चाकी ने मुजफ्फरपुर के न्यायाधीश किंग्सफोर्ड की हत्या करने के प्रयास में उनकी गाड़ी पर बम फेंका था।किंग्सफोर्ड कलकत्ता के एक मजिस्ट्रेट थे जो क्रांतिकारियों को कठोर दंड देने के लिए बदनाम थे।हालाँकि, किंग्सफोर्ड बच गए, लेकिन दुर्भाग्य से दो ब्रिटिश महिलाएँ मारी गईं।खुदीराम बोस को गिरफ्तार कर लिया गया और 18 वर्ष की आयु में उन्हें फाँसी दे दी गईजिससे वे सबसे कम उम्र के क्रांतिकारियों में से एक बन गए।1908 में मुजफ्फरपुर में भारतीय क्रांतिकारियों खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने मुजफ्फरपुर के मुख्य प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट डी. एच. किंग्सफोर्ड की हत्या करने का प्रयास किया।उन्होंने किंग्सफोर्ड को उसके क्रूर और कठोर कार्यों के कारण निशाना बनाया था, क्योंकि वह बंगाल के स्वतंत्रता सेनानियों के विरोधी था और उनके खिलाफ सख्त फैसले देता था।खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने 30 अप्रैल 1908 को किंग्सफोर्ड के उस वाहन पर बम फेंका, जो उनके अनुसार किंग्सफोर्ड को लेकर जा रहा था।लेकिन दुर्भाग्यवश, उन्होंने गलती से उस गाड़ी पर बम फेंका जिसमें किंग्सफोर्ड नहीं बल्कि दो ब्रिटिश महिलाएं सवार थीं।इस बम हमले में ये दोनों महिलाएं गंभीर रूप से घायल हो गईं और उनकी मृत्यु हो गई। किंग्सफोर्ड इस हमले में बच गया।खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने ब्रिटिश पुलिस से बचने के लिए अलग-अलग नामों का इस्तेमाल किया और कई सप्ताह तक अपनी पहचान छुपाए रखी।बम फेंकने के बाद खुदीराम बोस को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया, जबकि प्रफुल्ल चाकी गिरीफ्तारी से बचने के लिए आत्महत्या कर ली।इस घटना के कारण खुदीराम बोस को फांसी की सजा मिली और वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे कम उम्र के शहीदों में से एक बन गए।यह हमला भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांतिकारियों की सशस्त्र लड़ाई का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थाजिसमें उन्होंने अत्याचारों के खिलाफ अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की.8. अभिनव भारत सोसायटी के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए। [MTS (T-I) 13 सितंबर, 2023 (II-पाली)](1) यह सोसायटी समाजवादियों का एक समुदाय था जो सशस्त्र क्रांति में विश्वास रखता था। (2) इस सोसायटी की स्थापना जय प्रकाश नारायण द्वारा की गई थी। (3) मित्र मेला, एक क्रांतिकारी गुप्त संस्था का नाम बदलकर 1904 में अभिनव भारत रखा गया।नीचे दिए गए कोड का उपयोग करके सही कथन/नों का चुनाव कीजिए।(a) 1, 2 और 3(b) 1 और 3 दोनों(c) 2 और 3 दोनों(d) 1 और 2 दोनोंCorrect Answer: (b) 1 और 3 दोनोंSolution:वी.डी. सावरकर तथा गणेश सावरकर ने 'मित्र मेला' नामक संगठन शुरू किया।वर्ष 1904 में मित्र मेला के 200 सदस्य नासिक में एकत्र हुए तथा सावरकर ने मित्र मेला का नाम बदलकर 'अभिनव भारत सोसायटी' करने की घोषणा की।यह संस्था समाजवादियों का एक समुदाय था, जो सशस्त्र क्रांति में विश्वास रखता था।अभिनव भारत सोसायटी एक गुप्त भारतीय स्वतंत्रता संगठन था इसे शुरू में "मित्र मेला" के नाम से नासिक में स्थापित किया गया थाबाद में महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों के सदस्यों की बैठक में इसका नाम "अभिनव भारत" रखा गया, जो कि इटली के यंग इटली आन्दोलन के प्रेरणा से था।यह सोसायटी सशस्त्र क्रांति में विश्वास रखती थी और ब्रिटिश शासन के खिलाफ हथियारबंद विद्रोह को स्वतंत्रता प्राप्ति का माध्यम मानती थी।सोसायटी के सदस्य कई क्रांतिकारियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं से मिलकर बनी शाखाओं में फैल गए थेयहां तक कि सावरकर लंदन में कानून की पढ़ाई करते समय भी इसके सदस्य थे।अभिनव भारत सोसायटी ने ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ कुछ हत्याएं भी कीं, जिसके कारण विनायक सावरकर और उनकी भ्राता को जेल की सजा हुई।यह संगठन भारत के विभिन्न भागों में सक्रिय था और 1952 में इसे आधिकारिक तौर पर भंग कर दिया गया था।यह सोसायटी समाजवादियों का समुदाय था जो हथियारबंद क्रांति में विश्वास रखते थे, लेकिन इसकी स्थापना जयप्रकाश नारायण ने नहीं बल्कि सावरकर बंधुओं ने की थी।Other Informationस्थापना: 1904 में विनायक दामोदर सावरकर और गणेश सावरकर ने की।प्रारंभ: नासिक में "मित्र मेला" के रूप में।उद्देश्य: ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति।गतिविधि: ब्रिटिश अधिकारियों की हत्याएं, गुप्त संगठन।विघटन: 1952 में।अभिनव भारत सोसायटी भारत के स्वतंत्रता संग्राम के भीतर क्रांतिकारी आंदोलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थीजिसने आंतरिक विद्रोह को बढ़ावा दिया और भारतीय स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र संघर्ष का रास्ता दिखाया था.9. 'मित्र मेला' (Mitra Mela) ....... द्वारा स्थापित एक क्रांतिकारी संगठन था। [MTS (T-I) 01 सितंबर, 2023 (II-पाली)](a) खुदीराम बोस(b) विनायक सावरकर(c) शिशिर कुमार बोस(d) भूपेंद्र नाथ बोसCorrect Answer: (b) विनायक सावरकरSolution:'मित्र मेला' (Mitra Mela) की स्थापना 1899 में विनायक दामोदर सावरकर और उनके भाई गणेश सावरकर द्वारा नासिक में की गई थी।यह एक क्रांतिकारी गुप्त संस्था थी जिसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन को समाप्त करने के लिए सशस्त्र क्रांति के लिए लोगों को संगठित करना था।बाद में, 1904 में, इस संगठन को और अधिक संगठित रूप देने के लिए इसका नाम बदलकर अभिनव भारत सोसायटी कर दिया गया।इस संगठन की स्थापना का उद्देश्य ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ देशभक्ति और क्रांतिकारी विचारों को फैलाना था।मित्र मेला ने युवाओं में राष्ट्रवादी भावना उत्पन्न करने और सशस्त्र संघर्ष के लिए उन्हें तैयार करने का काम किया।मित्र मेला एक गुप्त समाज था जो स्वतंत्रता संग्राम के शुरुआती चरणों में सक्रिय रहा। यह संगठन बाद में अभिनव भारत सोसायटी के रूप में विकसित हुआजिसे भी सावरकर भाइयों ने स्थापित किया था। अभिनव भारत सोसायटी ने भारत में व्यापक क्रांतिकारी गतिविधियों का नेतृत्व किया और ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष के सिद्धांत को आगे बढ़ाया।वी. डी. सावरकर और उनके भाई गणेश सावरकर ने मित्र मेला के माध्यम से देशभक्त साहित्य वितरण, राजनीतिक संवादक्रांतिकारी प्रशिक्षण की गतिविधियां संचालित कीं। इस तरह मित्र मेला ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में युवाओं को संगठित कर क्रांतिकारी आंदोलन को मजबूती प्रदान की।यह समाज ब्रिटिश सरकार के लिए एक खतरा था क्योंकि यह गुप्त रूप से विद्रोह की तैयारी कर रहा था।संक्षेप में, मित्र मेला ने भारतीय क्रांतिकारी आंदोलनों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और इसे भारत के स्वतंत्रता संग्राम के शुरुआती क्रांतिकारी संगठनों में गिना जाता है।इसका प्रभाव बाद में हुए कई अन्य क्रांतिकारी आंदोलनों और संगठनों में देखा गया, जो ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष की राह पर थे.10. सन् 1904 में विनायक सावरकर ने किस नाम से क्रांतिकारियों का एक गुप्त संगठन बनाया था? [CHSL (T-I) 11 अगस्त, 2023 (IV-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 23 नवंबर, 2023 (II-पाली)](a) फॉरवर्ड ब्लॉक(b) अभिनव भारत(c) हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन(d) नौजवान भारत सभाCorrect Answer: (b) अभिनव भारतSolution:विनायक सावरकर ने 1904 में अपनी पहले स्थापित गुप्त संस्था 'मित्र मेला' का नाम बदलकर अभिनव भारत कर दिया।यह संगठन इटली के क्रांतिकारी मेज़िनी के 'यंग इटली' आंदोलन से प्रेरित था।अभिनव भारत का लक्ष्य ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह के लिए भारतीय युवाओं को एकजुट करना और उन्हें गुप्त रूप से प्रशिक्षित करना थायह भारत में क्रांतिकारी आंदोलनों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण संगठन था।1906 में इसका नाम बदलकर अभिनव भारत कर दिया गया। इस संगठन का उद्देश्य ब्रिटिश शासन को सशस्त्र विद्रोह के माध्यम से उखाड़ फेंकना और देश में राष्ट्रीय गौरव और एकता की भावना को बढ़ावा देना थाअभिनव भारत ने अनेक युवा क्रांतिकारियों को प्रेरित किया, जिनमें भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे स्वतंत्रता सेनानी शामिल थे।अभिनव भारत संगठन ने गुप्त बैठकों, राष्ट्रवादी साहित्य के प्रचार-प्रसार, और ब्रिटिश अधिकारियों पर हमलों की कई योजनाओं में भाग लिया। इसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के शुरुआती वर्षों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।ब्रिटिश अधिकारियों की कुछ हत्याओं के बाद सावरकर और इस संगठन के सदस्यों को जेल की सजा भी हुई।यह संगठन 1952 में औपचारिक रूप से भंग कर दिया गया, लेकिन इसका प्रभाव भारत के स्वतंत्रता संग्राम पर गहरा था।संक्षेप में, विनायक सावरकर का अभिनव भारत संगठन उस समय की एक प्रमुख क्रांतिकारी संस्था थीजो भारत की आज़ादी के लिए सशस्त्र संघर्ष की राह पर अग्रसर थी और युवाओं को राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भाग लेने के लिए प्रेरित करती थी.Submit Quiz123Next »