क्रांतिकारी गतिविधियां (आधुनिक भारतीय इतिहास)

Total Questions: 25

11. 1904 में, विनायक दामोदर सावरकर ने निम्नलिखित में से किस संगठन की स्थापना की थी? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 2 दिसंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (d) अभिनव भारत सोसाइटी
Solution:
  • विनायक दामोदर सावरकर ने 1904 में अभिनव भारत सोसाइटी की स्थापना की।
  • यह संगठन उनके द्वारा 1899 में स्थापित 'मित्र मेला' नामक गुप्त संस्था का ही परिवर्तित और विस्तारित रूप था।
  • अभिनव भारत एक गुप्त क्रांतिकारी समाज था, जिसका उद्देश्य सशस्त्र क्रांति के माध्यम से ब्रिटिश शासन को समाप्त करना था।
  • यह संगठन इटली के क्रांतिकारी नेता मेज़िनी के 'यंग इटली' आंदोलन से प्रेरित था और पूरे भारत के कई हिस्सों में फैला हुआ था
  • जिसने कई युवा राष्ट्रवादियों को प्रेरित किया।
  • यह संगठन शुरुआत में नासिक में "मित्र मेला" के रूप में स्थापित हुआ था जब सावरकर पुणे के कॉलेज के विद्यार्थी थे।
  • बाद में इसे कई महाराष्ट्र के कस्बों और ब्रिटेन के लंदन में भी फैलाया गया।
  • अभिनव भारत का उद्देश्य ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह करना और देश को आज़ादी दिलाना था।
  • इस संगठन ने ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ कई साहसिक कार्य किए, जिनके कारण सावरकर और उनके साथियों को गिरफ्तार भी किया गया।
  • अभिनव भारत समाज ने युवाओं में देशभक्ति और क्रांतिकारी भावना को बढ़ावा दिया और भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद जैसे कई क्रांतिकारियों को प्रेरित किया।
  • समूह का नाम Giuseppe Mazzini के यंग इटली संगठन से प्रेरित था। यह संगठन आज़ादी की लड़ाई के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में जाना जाता है
  • सन् 1952 में खुद सावरकर ने इसे भंग कर दिया, यह कहते हुए कि स्वतंत्रता का लक्ष्य अब प्राप्त हो चुका है।
  • संक्षेप में, अभिनव भारत एक क्रांतिकारी गुप्त संगठन था जिसकी स्थापना विनायक दामोदर सावरकर ने 1904 में की थी
  • जिसका उद्देश्य ब्रिटिश हुकूमत को सशस्त्र संघर्ष के जरिए समाप्त करना था.​

12. एक नाटक में, हिमा ने कहा "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगी" यह नारा किस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ने दिया था? [CHSL (T-I) 16 मार्च, 2023 (I-पाली), MTS (T-I) 10 मई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) बाल गंगाधर तिलक
Solution:
  • यह प्रसिद्ध और शक्तिशाली नारा बाल गंगाधर तिलक ने दिया था। यह नारा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सबसे यादगार नारों में से एक बन गया।
  • तिलक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उग्रवादी (गरम दल) समूह के प्रमुख नेता थे।
  • उन्होंने इस नारे का उपयोग भारतीयों को स्व-शासन (स्वराज) के महत्व को समझाने और स्वतंत्रता आंदोलन को एक जन आंदोलन बनाने के लिए किया।
  • यह नारा उनके दृढ़ विश्वास को दर्शाता है कि स्वतंत्रता भारतीयों का प्राकृतिक और जन्मसिद्ध अधिकार है।
  • लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और में इसे लेकर रहूँगा"' का नारा दिया।
    लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक एक प्रमुख भारतीय राष्ट्रवादी नेता, समाज सुधारक और स्वतंत्रता सेनानी
  • जिन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
    Other Information
    • महात्मा गांधी, जिन्हें राष्ट्रपिता के नाम से भी जाना जाता है, एक अन्य भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
    •  वह अपने अहिंसक प्रतिरोध के दर्शन के लिए जाने जाते हैं।
    •  अंबिका चरण मजूमदार एक भारतीय क्रांतिकारी थे जिन्होंने 1930 में चटगांव शस्त्रागार छापे में भाग लिया था।
    • 1931 में ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें फाँसी दे दी।
    •  भगत सिंह एक भारतीय समाजवादी क्रांतिकारी थे जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
    •  उन्हें लाहौर षड्यंत्र मामले में शामिल होने और 23 साल की छोटी उम्र में अपनी शहादत के लिए जाना जाता है।

13. दिल्ली में हुए 1929 के असेंबली बम कांड के मुख्य आरोपी कौन थे ? [MTS (T-I) 15 मई, 2023 (III-पाली), MTS (T-I) 08 मई, 2023 (II- पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 30 नवंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (b) भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त
Solution:
  • 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली में केंद्रीय विधानसभा के अंदर बम फेंका था।
  • इस घटना का उद्देश्य किसी को मारना नहीं था, बल्कि "बहरे कानों तक अपनी आवाज़ पहुँचाना" था।
  • यह कृत्य ब्रिटिश सरकार द्वारा लाए गए 'पब्लिक सेफ्टी बिल' और 'ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल' जैसे दमनकारी कानूनों के विरोध में किया गया था।
  • इन दोनों क्रांतिकारियों ने जानबूझकर आत्मसमर्पण किया ताकि वे अदालत को अपने क्रांतिकारी और समाजवादी विचारों का प्रचार मंच बना सकें।
  • इन बमों का मकसद किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं था बल्कि यह विरोध प्रदर्शनी थी
  • ताकि ब्रिटिश शासन की अन्यायपूर्ण नीतियों को उजागर किया जा सके।
  • वे फटकार के साथ तुरंत गिरफ्तार हो गए और अपने न्यायालयीन मुकदमे का उपयोग राजनीतिक और क्रांतिकारी विचारों को फैलाने के लिए किया।
  • भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के सदस्य थे। उनके मुकदमे में, बटुकेश्वर दत्त के लिए असफ अली ने वकालत की, जबकि भगत सिंह ने खुद अपनी रक्षा की।
  • उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई, जिसे 'ट्रांसपोर्टेशन फॉर लाइफ' के रूप में जाना गया। यह कांड भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था
  • जिसने युवाओं को ब्रिटिश शासन के खिलाफ हथियार उठाने के लिए प्रेरित किया।
  • इस कांड में अन्य क्रांतिकारियों जैसे उधम सिंह, मंगल पांडे, सूर्य सेन, राम प्रसाद चटगांव आदि शामिल नहीं थे।
  • भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की यह बहादुरी और बलिदान आज भी भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक प्रेरणादायक घटना के रूप में याद किया जाता है।
  • उनके इस कृत्य ने ब्रिटिश शासन की क्रूर नीतियों के विरुद्ध देश में जागरूकता और असंतोष बढ़ाया था.

14. 8 अप्रैल 1929 को निम्नलिखित में से किन दो क्रांतिकारियों ने केंद्रीय विधानसभा (Central Legislative Assembly) में बम फेंका था? [MTS (T-I) 04 सितंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (d) भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त
Solution:
  • 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली में केंद्रीय विधानसभा के अंदर बम फेंका था।
  • इस घटना का उद्देश्य किसी को मारना नहीं था, बल्कि "बहरे कानों तक अपनी आवाज़ पहुँचाना" था।
  • यह कृत्य ब्रिटिश सरकार द्वारा लाए गए 'पब्लिक सेफ्टी बिल' और 'ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल' जैसे दमनकारी कानूनों के विरोध में किया गया था।
  • इन दोनों क्रांतिकारियों ने जानबूझकर आत्मसमर्पण किया ताकि वे अदालत को अपने क्रांतिकारी और समाजवादी विचारों का प्रचार मंच बना सकें।
  • इस बम फेंकने का उद्देश्य ब्रिटिश सरकार द्वारा लागू किए गए दमनकारी लोक सुरक्षा विधेयक और व्यापार विवाद विधेयक के खिलाफ विरोध जताना था।
  • यह बम फेंकने का कार्य किसी को चोट पहुंचाने के लिए नहीं था, बल्कि इसका मकसद ब्रिटिश शासकों को भारत की स्वतंत्रता की मांग सुनाना और जागरूक करना था।
  • इस दिन भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने विधानसभा के विजिटर गैलरी से बम फेंके और साथ ही वाक्यांश "इंक़लाब ज़िंदाबाद" के नारे लगाए।
  • वे दोनों स्वेच्छा से पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर गए, जिससे यह क्रांतिकारी कार्य एक प्रभावशाली प्रतीक बन गया।
  • यह घटना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण मोड़ मानी जाती है, जिसने युवाओं को एकजुट किया और देशभर में ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक मजबूत संदेश पहुंचाया।
  • इस बम विस्फोट से विधानसभा में हलचल मच गई और घटनास्थल पर धुआं फैल गया, लेकिन किसी सदस्य को गंभीर चोट नहीं पहुंची।
  • इसके बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया और बाद में इस घटना के लिए उन्हें मुकदमा चलाया गया।
  • संक्षेप में, 8 अप्रैल 1929 को केंद्रीय विधानसभा में बम फेंकने वाले दो क्रांतिकारी भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त थे
  • जिन्होंने ब्रिटिश दमन के खिलाफ यह साहसिक कदम उठाया था, जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना रही

15. अल्लूरी सीताराम राजू भारत के ....... राज्य के एक आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी थे। [MTS (T-I) 15 मई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) आंध्र प्रदेश
Solution:
  • अल्लूरी सीताराम राजू भारत के आंध्र प्रदेश राज्य के एक आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने 1922 से 1924 तक रम्पा विद्रोह (Rampa Rebellion) का नेतृत्व किया।
  • यह विद्रोह अंग्रेजों के दमनकारी वन कानूनों के खिलाफ था, जिन्होंने आदिवासियों के उनके पारंपरिक वन संसाधनों तक पहुँच के अधिकार को छीन लिया था।
  • राजू को स्थानीय आदिवासियों द्वारा एक वीर और चमत्कारी व्यक्ति के रूप में देखा जाता था
  • उन्होंने गुरिल्ला युद्ध रणनीति का उपयोग करके ब्रिटिश अधिकारियों को चुनौती दी थी।
  • वे ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह के लिए प्रसिद्ध हैं
  • जिन्होंने आदिवासी समुदाय को संगठित करके रम्पा क्षेत्र (जो पूर्वी घाट का हिस्सा है) में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई।
  • उनके इस विद्रोह को इतिहास में "राम विद्रोह" के नाम से जाना जाता है।
  • अल्लूरी सीताराम राजू का जीवनीगत विवरण यह है कि वे 1897 या 1898 में आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम जिले के एक गांव में जन्मे थे।
  • युवावस्था में उन्होंने ज्योतिष, आयुर्वेद, हस्तरेखा विज्ञान और घुड़सवारी में रुचि ली। वे एक साधु जीवन भी जी चुके थे
  • लेकिन बाद में उन्होंने आदिवासी शोषण के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने आदिवासी युवाओं को संगठित किया
  • स्वतंत्र सैनिक संगठन की स्थापना कर अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह शुरू किया। उन्होंने पुलिस थानों पर हमला करके हथियार लूटे और अपने अनुयायियों को युद्ध के गुर सिखाए।
  •  अंततः मई 1924 में अंग्रेजों द्वारा पकड़ कर, उन्हें गोली मार कर हत्या कर दी गई। वे आदिवासी समाज के नायक और आज़ादी के लिए एक महत्तवपूर्ण क्रांतिकारक माने जाते हैं
  • जिनकी वीरता और लड़ाई आज भी भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अमर है.

16. भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को ....... को फांसी दी गई थी। [MTS (T-I) 09 मई, 2023 (III-पाली), MTS (T-I) 16 जून, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) मार्च 23, 1931
Solution:
  • भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को 23 मार्च 1931 को फाँसी दी गई थी।
  • यह सज़ा उन्हें लाहौर षड्यंत्र मामले (मुख्य रूप से पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या) के लिए दी गई थी।
  • उनकी फाँसी की खबर ने पूरे देश में व्यापक आक्रोश पैदा किया और स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी विचारों को एक नई गति प्रदान की।
  • इन तीनों शहीदों के बलिदान को आज भी भारतीय इतिहास में वीरता और राष्ट्रभक्ति के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है।
  • 17 दिसंबर, 1927 को क्रांतिकारियों भगत सिंह और शिवराम राजगुरु ने पुलिस सहायक अधीक्षक जॉन सॉन्डर्स की गोली मारकर हत्या कर दी।
  •  उनके स्वदेशवासी सुखदेव थापर और चंद्रशेखर आजाद ने इस कृत्य में उनकी मदद की।
  •  हालाँकि, उनका प्रारंभिक लक्ष्य सॉन्डर्स नहीं, बल्कि पुलिस अधीक्षक जेम्स स्कॉट था, जिसने राष्ट्रवादी नेता लाला लाजपत राय की मौत के लिए जिम्मेदार घटना के दौरान प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज करने का निर्देश दिया था।
  •  बाद में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी पर लटका दिया गया।
  •  भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को लाहौर षड्यंत्र मामले में मौत की सजा सुनाई गई और 24 मार्च 1931 को फांसी देने का आदेश दिया गया।
  •  समय सारिणी को 11 घंटे आगे बढ़ा दिया गया और तीनों को 23 मार्च 1931 को लाहौर जेल में शाम 7:30 बजे फांसी दे दी गई।
    other Information
  •  भगत सिंह, भारतीय कम्युनिस्ट क्रांतिकारी थे। भारत में अंग्रेजों के खिलाफ उनके दो शानदार और बहादुरी भरे कामों के चलते केवल 23 वर्ष की उम्र में उन्हें फांसी की सजा दे दी गई।
  • उनके इस बलिदान ने उन्हें भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक प्रसिद्ध नायक बना दिया।
  •  शिवराम हरि राजगुरु, महाराष्ट्र के एक भारतीय राष्ट्रवादी थे जो मुख्य रूप से ब्रिटिश पुलिस अधिकारी की हत्या में अपनी भूमिका के लिए जाने जाते थे।
  • सुखदेव थापर, एक दूरदर्शी भारतीय थे। हिंदू सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के एक वरिष्ठ सदस्य थे। उन्होंने भगत सिंह और शिवराम राजगुरु के साथ मिलकर कई अन्य कार्य भी किए थे।

17. निम्नलिखित में से किसने चटगांव शस्त्रागार छापा (Chittagong Armoury Raid) या चटगांव विद्रोह का नेतृत्व किया था? [MTS (T-I) 19 जून, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) सूर्य सेन
Solution:
  • चटगांव शस्त्रागार छापा (Chittagong Armoury Raid) का नेतृत्व सूर्य सेन ने किया था, जिन्हें उनके अनुयायी 'मास्टर दा' के नाम से जानते थे।
  • यह छापा अप्रैल 1930 में हुआ था, जिसमें क्रांतिकारियों के एक समूह ने चटगांव में पुलिस और सहायक बलों के शस्त्रागार पर धावा बोल दिया था।
  • हालाँकि वे गोला-बारूद प्राप्त करने में विफल रहे, इस घटना ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक बड़ा सशस्त्र विद्रोह शुरू किया और क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई।
  •  जिसमें ब्रितानी पुलिस और सहायक बलों के शस्त्रागारों पर कब्जा करने की योजना बनाई गई थी।
  • सूर्य सेन ने एक क्रांतिकारी समूह का गठन किया था, जिसे भारतीय रिपब्लिकन सेना कहा जाता था
  • जिसके सदस्य ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ लड़ने के लिए हथियारबंद विद्रोह में विश्वास करते थे।
  • सूर्य सेन एक स्कूल शिक्षक थे और क्रांतिकारियों में उन्हें "मास्टर दा" के नाम से जाना जाता था।
  • उन्होंने गणेश घोष, लोकनाथ बल, और अनंत सिंह जैसे आत्मसमर्पित क्रांतिकारियों का एक समूह बनाया, जिन्होंने चटगांव के दो मुख्य शस्त्रागारों पर हमला कर हथियार और गोला-बारूद अपने कब्जे में ले लिए।
  • इसके बाद उन्होंने टेलीग्राफ और टेलीफोन कार्यालयों को नष्ट किया और यूरोपीय क्लब के सदस्यों को बंधक बनाकर ब्रिटिश प्रशासन को चुनौती दी।
  • यह छापा अंग्रेजों के खिलाफ युवाओं द्वारा की गई एक साहसी और दिलेर क्रांति थी।
  • सूर्य सेन की इस योजना का मकसद ब्रिटिश शक्तियों को कमजोर करना और स्वतंत्रता संग्राम को एक सशस्त्र रूप देना था।
  • इस विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने सूर्य सेन और उनके साथियों को भारी दमन सहना पड़ा। सूर्य सेन को 1933 में गिरफ्तार किया गया और 1934 में फांसी दे दी गई।
  • यह घटना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी आंदोलन की एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में देखी जाती है।
  • इस प्रकार, चटगांव शस्त्रागार छापे का प्रमुख और प्रेरक नेता सूर्य सेन थे, जिन्होंने इस विद्रोह का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया और क्रांतिकारियों को संगठित किया था

18. किस स्वतंत्रता सेनानी को भारतीय क्रांति की जननी (Mother of the Indian revolution) के तौर पर जाना जाता है? [MTS (T-I) 16 जून, 2023 (III-पाली), MTS (T-I) 06 सितंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) मैडम भीकाजी कामा
Solution:
  • मैडम भीकाजी कामा को 'भारतीय क्रांति की जननी' (Mother of the Indian revolution) के रूप में जाना जाता है। उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम किया।
  • उन्हें विशेष रूप से 1907 में जर्मनी के स्टटगार्ट में अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में भारत का पहला राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए याद किया जाता है।
  • उन्होंने यूरोप में भारतीय राष्ट्रवाद का प्रचार किया और ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता के विचार को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रमुखता से रखा।
  • भारतीय क्रांति की जननी (Mother of the Indian Revolution) के रूप में मैडम भीकाजी कामा को जाना जाता है।
  • वे एक प्रमुख भारतीय क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी थीं जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए विदेशी जमीन पर भी सक्रिय रूप से संघर्ष किया।
  • मैडम भीकाजी कामा ने महिलाओं की शिक्षा और अधिकारों की भी प्रबल समर्थक थीं
  • ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की मुखर आलोचना की। उन्हें रूसी लोग "भारत की जोन ऑफ आर्क" और भारतीय बोलचाल में "भारतीय क्रांति की माता" कहकर संबोधित करते थे।
  • ब्रिटिश सरकार द्वारा भी उन्होंने भारतीय क्रांति के एक प्रमुख नेता के रूप में मान्यता प्राप्त की थी। इसके अलावा, उन्होंने महिला भारतीय संघ (WIA) की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और सामाजिक सुधार के लिए काम किया था.​
  • ध्यान दें कि कुछ स्रोतों में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को भी भारतीय क्रांति की जननी कहा जाता है
  • क्योंकि वे 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अपनी वीरता और नेतृत्व कौशल के लिए प्रसिद्ध थीं, लेकिन ऐतिहासिक दृष्टि से "भारतीय क्रांति की जननी" के रूप में मैडम भीकाजी कामा की पहचान अधिक व्यापक और विशेष रूप से की जाती है

19. 1925 के काकोरी कांड (काकोरी ट्रेन एक्शन) में कौन-सा स्वतंत्रता सेनानी शामिल था, जिसके लिए ब्रिटिश सरकार ने उसे मौत की सजा सुनाई थी ? [MTS (T-I) 15 जून, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) राम प्रसाद बिस्मिल
Solution:
  • 1925 के काकोरी ट्रेन एक्शन (काकोरी कांड) में शामिल होने के लिए ब्रिटिश सरकार ने राम प्रसाद बिस्मिल को मौत की सज़ा सुनाई थी।
  • यह एक्शन हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) द्वारा सरकारी खजाना लूटने के उद्देश्य से किया गया था।
  • बिस्मिल के अलावा, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी, और ठाकुर रोशन सिंह को भी इस मामले में फाँसी दी गई थी, जो क्रांतिकारी आंदोलनों के एक प्रमुख अध्याय का प्रतीक है।
  •  इस कांड में ब्रिटिश सरकार ने इन क्रांतिकारियों को मुकदमा चलाकर मौत की सजा सुनाई थी।
  • विशेषतः पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, अशफाक उल्ला खान और ठाकुर रोशन सिंह को 1927 में मौत की सजा दी गई थी।
  • म प्रसाद बिस्मिल को 19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल में, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी को 17 दिसंबर 1927 को गोंडा में, अशफाक उल्ला खान को फैज़ाबाद और ठाकुर रोशन सिंह को इलाहाबाद की जेल में फांसी दी गई थी।
  • ब्रिटिश सरकार ने काकोरी ट्रेन लूट के इस कांड को बड़े गंभीरता से लिया था और इस घटना के आरोपियों को मौत की सजा देकर एक कड़ा संदेश देने की कोशिश की थी।
  • इस घटना ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों के साहस और बलिदान की एक नई मिसाल कायम की थी।
  • काकोरी कांड ने पूरे भारत में आजादी की लड़ाई को और भी गति दी और इसे युवाओं के बीच जबरदस्त समर्थन मिला.​
  • काकोरी कांड की पूरी घटना यह थी कि 9 अगस्त 1925 को काकोरी रेलवे स्टेशन के पास अंग्रेजों की एक ट्रेन को रोककर क्रांतिकारियों ने उसमें से सरकारी खजाने से पैसे लूटे थे।
  • यह लूट आज़ादी की लड़ाई के लिए धन जुटाने के उद्देश्य से की गई थी। इस घटना के बाद पुलिस ने कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया और मुकदमा चलाया।
  • मुकदमे के चार प्रमुख दोषी—राम प्रसाद बिस्मिल, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, अशफाक उल्ला खान और ठाकुर रोशन सिंह को ब्रिटिश अधिकारियों ने मौत की सजा सुनाई थी। इन नेताओं का बलिदान भारत के युवा क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा स्रोत बना।
  • इस कांड ने यह भी दिखाया कि भारतीय युवा किस हद तक अंग्रेज़ों के खिलाफ जा सकते हैं और उनकी क्रांतिकारी सोच और कार्यभार कितनी तीव्र था।
  • काकोरी कांड भारत के आजादी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण एवं क्रांतिकारी घटना के रूप में याद किया जाता है

20. 1929 में निम्नलिखित में से किस अधिनियम के क्रियान्वयन का विरोध करने के लिए भगत सिंह और उनके एक सहयोगी ने दिल्ली में केंद्रीय विधानसभा में बम फेंका था? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 21 नवंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (e) इनमें से कोई नहीं
Solution:
  • 1929 में केंद्रीय विधानसभा में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने मुख्य रूप से 'पब्लिक सेफ्टी बिल' और 'ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल' के क्रियान्वयन का विरोध करने के लिए बम फेंका था।
  • 'पब्लिक सेफ्टी बिल' का उद्देश्य राजनीतिक कार्यकर्ताओं को बिना मुकदमे के निर्वासित करना था
  • जबकि 'ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल' का उद्देश्य मजदूर यूनियनों को नियंत्रित करना था।
  • दिए गए विकल्पों में से कोई भी सही अधिनियम नहीं है, इसलिए सही उत्तर (e) इनमें से कोई नहीं है।
  •  इसका मुख्य कारण अंग्रेजों द्वारा पारित किए जा रहे दो अत्यंत क्रूर और देशविरोधी कानून थे: 'पब्लिक सेफ्टी बिल' और 'ट्रेड डिस्प्यूट बिल'।
  • पब्लिक सेफ्टी बिल के तहत सरकार को बिना मुकदमा चलाए संदिग्ध लोगों को गिरफ्तार करने का अधिकार मिल रहा था
  • जबकि ट्रेड डिस्प्यूट बिल मजदूरों की हड़तालों पर पाबंदी लगाने का प्रावधान था। ये कानून भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए एक बड़ा झटका थे
  • युवाओं में भारी गुस्सा और विरोध का कारण बने। भगत सिंह ने आम जनता और किसानों-मजदूरों के अधिकारों पर लगाई जा रही इस पाबंदी को चुनौती देने के लिए यह अप्रतिम कदम उठाया।
  • 8 अप्रैल 1929 को, वे और बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय विधानसभा में बम फैंका लेकिन सावधानी बरतते हुए उन्होंने खाली स्थान में फेंक कर किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया।
  • उनका मकसद शोर मचाना था ताकि अंग्रेजों को यह पता चले कि भारतीय जनता किस कदर इन अत्याचारों के खिलाफ है।
  • उन्होंने बम फेंकने के बाद नारे लगाते हुए स्वयं अपनी गिरफ्तारी दी। इस कार्य में उनका उद्देश्य हिंसा से ज्यादा क्रांतिकारी विचारों और देशभक्ति की भावना फैलाना था।
  • इस घटना ने पूरे देश में जागरूकता बढ़ाई और युवा पीढ़ी को आज़ादी की लड़ाई में जोड़ने का काम किया.​
  • इस धार्मिक घटना ने ब्रिटिश सरकार के अत्याचारों की पोल खोली और स्वतंत्रता संग्राम में भगत सिंह को एक अमर क्रांतिकारी के रूप में स्थापित कर दिया।
  • इस ऐतिहासिक विरोध ने वर्षों तक भारतीय जनमानस को प्रभावित किया और स्वतंत्रता संग्राम को नई ऊर्जा दी।