चालकता एवं नाभिकीय भौतिकी (भौतिक विज्ञान)

Total Questions: 5

1. स्थैतिक चुंबकीय क्षेत्र की उपस्थिति में वर्णक्रमीय रेखा के कई घटकों में विभाजन के प्रभाव को क्या कहते हैं? [CGL (T-I) 16 अगस्त, 2021 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) जीमन प्रभाव
Solution:
  • जीमन प्रभाव (Zeeman effect) एक स्थिर चुंबकीय क्षेत्र की उपस्थिति में एक वर्णक्रमीय रेखा (spectral line) के कई घटकों में विभाजित होने का प्रभाव है।
  • इसका नाम डच भौतिक विज्ञानी पीटर जीमन के नाम पर रखा गया है।
  • इन्होंने यह प्रभाव 1896 ई. में खोजा था
  • जिसके लिए इन्हें वर्ष 1902 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार भी मिला था।
  • ज़ीमान प्रभाव की व्याख्या
    • ज़ीमान प्रभाव तब प्रकट होता है
    • जब किसी परमाणु या आयन को एक बाहरी स्थैतिक चुंबकीय क्षेत्र में रखा जाता है।
    • सामान्यतः, परमाणुओं द्वारा उत्सर्जित या अवशोषित वर्णक्रमीय रेखाएँ एकल होती हैं
    • लेकिन चुंबकीय क्षेत्र की उपस्थिति में ये रेखाएँ कई महीन घटकों (components) में विभाजित हो जाती हैं।
    • यह विभाजन ऊर्जा स्तरों के ज़ीमान विभाजन (Zeeman splitting) के कारण होता है
    • जहाँ चुंबकीय क्षेत्र परमाणु के इलेक्ट्रॉन की कक्षा गति और स्पिन गति को प्रभावित करता है।
    • परमाणु में इलेक्ट्रॉन का चुंबकीय आघूर्ण (magnetic moment) चुंबकीय क्षेत्र के साथ संरेखित होता है
    • जिससे ऊर्जा स्तर E में एक अतिरिक्त शब्द जुड़ जाता है:
    • यहाँ μB बोहर चुंबकत्व है, B चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता, ml कक्षा चुंबकीय क्वांटम संख्या, और gL लैंडे g-कारक है।
    • इससे मूल ऊर्जा स्तर कई उप-स्तरों में विभाजित हो जाते हैं, परिणामस्वरूप संक्रमणों से कई रेखाएँ बनती हैं।
  • ज़ीमान प्रभाव के प्रकार
    • ज़ीमान प्रभाव मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है
    • जो चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता और परमाणु की संरचना पर निर्भर करता है:
  • सामान्य ज़ीमान प्रभाव (Normal Zeeman Effect)
    • यह तब होता है जब परमाणु का कुल स्पिन क्वांटम संख्या s=0 होता है
    • (जैसे सिंगलेट अवस्था)। चुंबकीय क्षेत्र अपेक्षाकृत मजबूत होता है।
    • इसमें प्रत्येक वर्णक्रमीय रेखा 3 घटकों में विभाजित होती है
    • एक केंद्रीय π-घटक (ध्रुवीकृत प्रकाश समानांतर) और दो σ-घटक (अनुप्रस्थ ध्रुवीकृत)।
    • विभाजन की मात्रा चुंबकीय क्षेत्र के समानुपाती होती है।
  • विषम ज़ीमान प्रभाव (Anomalous Zeeman Effect):
    • यह अधिक सामान्य है
    • तब होता है जब s≠0 (स्पिन प्रभाव महत्वपूर्ण) और चुंबकीय क्षेत्र कमजोर होता है।
    • इसमें रेखाएँ 3 से अधिक घटकों (कई महीन रेखाओं) में विभाजित हो जाती हैं।
    • कुल कोणीय गति क्वांटम संख्या j=l±s के कारण जटिल पैटर्न बनता है।
    • यह प्रभाव वास्तविक परमाणुओं (जैसे सोडियम की D-रेखाएँ) में प्रेक्षित होता है।
  • भौतिक कारण और गणितीय आधार
    • ज़ीमान प्रभाव का मूल कारण लोरेंट्ज़ बल है, जो चुंबकीय क्षेत्र में इलेक्ट्रॉन की गति को प्रभावित करता है।
    • परमाणु के ऊर्जा स्तरों का विभाजन ज़ीमान हैमिल्टोनियन द्वारा वर्णित है:
    • यहाँ gs≈2 स्पिन g-कारक है।
    • कमजोर क्षेत्र में पासचेन-बैक प्रभाव (Paschen-Back effect) नामक एक उन्नत रूप भी होता है
    • जहाँ ऊर्जा स्तर पूरी तरह पुनर्संरेखित हो जाते हैं।
    • प्रयोग में, सोडियम वाष्प को मजबूत चुंबक के बीच जलाया जाता है
    • तो D-रेखा एक चौड़ी पट्टी में बदल जाती है
    • जो दूरबीन से महीन रेखाओं में अलग दिखती है।
  • अनुप्रयोग और महत्व
    • ज़ीमान प्रभाव परमाणु संरचना को समझने में क्रांतिकारी रहा।
    • यह परमाणु चुंबकीय क्षेत्र मापन के लिए उपयोगी है, जैसे सूर्य और तारों के चुंबकीय क्षेत्र का अध्ययन खगोल भौतिकी में।
    • आधुनिक अनुप्रयोगों में इलेक्ट्रॉन स्पिन रेजोनेंस (ESR) और नाभिकीय चुंबकीय रेजोनेंस (NMR) इसमें आधारित हैं।
    • यह क्वांटम यांत्रिकी के सत्यापन में भी सहायक है।

2. एल.ई.डी. (LED) अर्धचालक तकनीक में निम्न में से कौन- सी धातु प्रयुक्त की जाती है? [CGL (T-I) 16 अगस्त, 2021 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) गैलियम
Solution:
  • एल.ई.डी. (LED) प्रकाश उत्सर्जक डायोड होते हैं। इनका मुख्य अवयव गैलियम (Gallium) है।
  • गैलियम के विभिन्न यौगिकों का प्रयोग करके विभिन्न रंगों के LED बनाए जा सकते हैं।
  • एलईडी का कार्य सिद्धांत
    • एलईडी एक विशेष प्रकार का PN जंक्शन डायोड है
    • जो अग्र अभिनति (forward bias) में इलेक्ट्रॉनों और होल्स (viver) के पुनर्संयोजन (recombination) से ऊर्जा को प्रकाश के रूप में उत्सर्जित करता है।
    • सामान्य सिलिकॉन या जर्मेनियम डायोड में यह ऊर्जा ऊष्मा बनती है
    • लेकिन गैलियम-आधारित यौगिक अर्धचालक में सीधी बैंडगैप (direct bandgap) संरचना के कारण ऊर्जा फोटॉन (प्रकाश कण) के रूप में निकलती है।
    • GaAs जैसे पदार्थों में वर्जित ऊर्जा अंतराल (bandgap) दृश्य या अवरक्त प्रकाश के लिए उपयुक्त होता है।
  • प्रयुक्त सामग्रियाँ
    • LED निर्माण में गैलियम के साथ अन्य तत्वों का संयोजन रंग निर्धारित करता है:
    • GaAs: अवरक्त प्रकाश (850-940 nm) के लिए।
    • GaAsP: लाल (630-660 nm) या एम्बर (605-620 nm) प्रकाश।
    • GaP: हरा या पीला प्रकाश।
    • GaN या InGaN: नीला या सफेद प्रकाश (450 nm), आधुनिक सफेद LEDs के लिए।
    • ये यौगिक अर्धचालक गैलियम को आधार बनाकर बनाए जाते हैं
    • जो कोयला या बॉक्साइट जैसे खनिजों से प्राप्त होती है (परमाणु संख्या 31, प्रतीक Ga)।
  • निर्माण प्रक्रिया
    • LED चिप को गैलियम-आधारित अर्धचालक क्रिस्टल से बनाया जाता है
    • जिसमें N-टाइप (इलेक्ट्रॉन अधिक) और P-टाइप (होल अधिक) क्षेत्र होते हैं।
    • इस जंक्शन को एपॉक्सी लेंस में सील किया जाता है ताकि प्रकाश कुशलता से बाहर निकले।
    • डोपिंग (impurity addition) से बैंडगैप समायोजित कर रंग बदला जाता है।
    • अन्य सहायक धातुएँ जैसे एल्यूमिनियम (AlGaAs में) या इंडियम (InGaN में) भी उपयोग होती हैं, लेकिन गैलियम मूलभूत है।
  • उपयोग और लाभ
    • एलईडी डिजिटल डिस्प्ले, ऑप्टिकल फाइबर संचार, और ऊर्जा-कुशल प्रकाश व्यवस्था में प्रयुक्त होते हैं।
    • इनकी आयु लंबी (50,000 घंटे तक), ऊर्जा खपत कम, और पर्यावरण-अनुकूल होती है।
    • GaN-आधारित LEDs ने सफेद प्रकाश क्रांति लाई।

3. जब किसी वस्तु पर धनात्मक आवेश होता है, तो इसका क्या अर्थ है? [MTS (T-I) 19 मई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (b) इसमें इलेक्ट्रॉन की तुलना में प्रोटॉन अधिक होते हैं
Solution:
  • किसी वस्तु पर धनात्मक आवेश होता है, तो इसका अर्थ है
  • इसमें इलेक्ट्रॉन की तुलना में अधिक प्रोटॉन होते हैं
  • किसी वस्तु पर ऋणात्मक आवेश का अर्थ है
  • इसमें प्रोटॉन की तुलना में अधिक इलेक्ट्रॉन होते हैं।
  • परमाणु संरचना में आवेश
    • परमाणु के नाभिक में प्रोटॉन धनात्मक आवेशित कण होते हैं (+1 आवेश प्रत्येक), जबकि इलेक्ट्रॉन परमाणु के बाहर घूमते हैं
    • ऋणात्मक आवेशित (-1 आवेश प्रत्येक) होते हैं।
    • न्यूट्रॉन नाभिक में उदासीन होते हैं
    • आवेश पर प्रभाव नहीं डालते।
    • तटस्थ अवस्था में प्रोटॉनों और इलेक्ट्रॉनों की संख्या बराबर होती है
    • लेकिन जब इलेक्ट्रॉन लुप्त हो जाते हैं
    • (जैसे घर्षण या अन्य प्रक्रिया से)
    • तो प्रोटॉनों की अधिकता के कारण वस्तु धनात्मक हो जाती है।
  • धनात्मक आवेश कैसे उत्पन्न होता है
    • धनात्मक आवेश मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनों के ह्रास से बनता है।
    • उदाहरणस्वरूप, कांच की छड़ को रेशम से रगड़ने पर इलेक्ट्रॉन रेशम चले जाते हैं
    • जिससे छड़ में प्रोटॉनों की तुलना में इलेक्ट्रॉन कम रह जाते हैं।
    • यह प्रक्रिया विद्युत विभव अंतर पैदा करती है और वस्तु धनावेशित हो जाती है।
    • वैज्ञानिक रूप से, आवेश q = ne सूत्र से व्यक्त होता है
    • जहाँ n इलेक्ट्रॉनों की संख्या और e इलेक्ट्रॉन आवेश है।
  • गुण और प्रभाव
    • धनात्मक आवेशित वस्तु ऋणात्मक आवेशित वस्तु को आकर्षित करती है
    • लेकिन समान धनात्मक आवेश को विकर्षित। उदाहरण के लिए
    • यदि एक धनावेशित वस्तु किसी उदासीन वस्तु को स्पर्श करे
    • तो प्रेरण द्वारा उदासीन वस्तु के निकट भाग पर विपरीत आवेश आकर्षित होता है।
    • कूलॉम नियम के अनुसार, बल F = k(q1 q2)/r² से दो आवेशों के बीच बल निर्भर करता है।
    • रबड़ की छड़ को फर से रगड़ना: यह ऋणात्मक बनती है, जबकि फर धनात्मक।
    • बालों पर कंघी करना: प्लास्टिक कंघी ऋणात्मक, बाल धनात्मक हो जाते हैं।
    • ये उदाहरण दैनिक जीवन में धनात्मक आवेश की उपस्थिति दर्शाते हैं।
  • संरक्षण और मात्रक
    • आवेश संरक्षित राशि है, अर्थात् बंद प्रणाली में कुल आवेश स्थिर रहता है।
    • धनात्मक आवेश का मात्रक कूलॉम (C) है
    • जहाँ 1 C = 6.25 × 10¹⁸ इलेक्ट्रॉनों के बराबर।
    • न्यूनतम आवेश e = 1.6 × 10^{-19} C होता है।

4. सीमा, विद्युत परिपथ को चालू करती है और जल पीने के लिए चली जाती है। वह 2 मिनट बाद वापस आती है और देखती है कि परिपथ में 2.5A की धारा प्रवाहित हो रही है। परिपथ से प्रवाहित शुद्ध आवेश ज्ञात कीजिए। [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 16 नवंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) 300 C
Solution:
  • परिपथ में प्रवाहित विद्युत धारा (I) = 2.5A
  • समय (t) = 2 मिनट = 2 * 60 = 120 सेकंड
  • परिपथ में प्रवाहित शुद्ध आवेश (Q) = ?
  • Q = It
  • Q = 2.5 * 120
  • = 300C
  • मूल सूत्र
    • विद्युत धारा (I) का परिभाषा सूत्र I=Qt है
    • जहाँ Q शुद्ध आवेश (कूलॉम्ब में) और t समय (सेकंड में) है।
    • इसके व्युत्क्रम से आवेश Q=I×t निकाला जाता है।
    • यह सूत्र विद्युत परिपथों में आवेश की मात्रा निर्धारित करने के लिए आधारभूत है।
  • गणना चरणबद्ध
    • समय t = 2 मिनट = 2×60=120 सेकंड।
    • धारा I = 2.5 A।आवेश Q=2.5×120=300 C।
    • यह गणना स्थिर धारा (constant current) की धारणा पर आधारित है, जो समस्या में निहित है।
  • इकाइयों का विश्लेषण
    • एम्पियर (A) की SI परिभाषा: 1 A = 1 C/s, अतः A × s = C (कूलॉम्ब)।
    • समय को हमेशा सेकंड में बदलना आवश्यक होता है
    • क्योंकि मिनट विद्युत गणनाओं में मानक इकाई नहीं है।300 C आवेश लगभग
    • 300÷1.6×10−19≈1.875×1021 इलेक्ट्रॉनों के बराबर है।
  • भौतिक व्याख्या
    • शुद्ध आवेश से तात्पर्य उन इलेक्ट्रॉनों (ऋणात्मक आवेश वाहक) के कुल आवेश से है
    • जो परिपथ के किसी बिंदु से 120 सेकंड में गुजरे।
    • यह धारा औसत धारा के समान है, क्योंकि मापन स्थिरता दर्शाता है।
    • वास्तविक परिपथों में उतार-चढ़ाव हो सकता है
    • किंतु यहाँ आदर्श स्थिति मानी जाती है।
    • ओम के नियम से प्रतिरोध R = V/I ज्ञात हो सकता है
    • यदि वोल्टेज दिया हो, किंतु यहाँ केवल आवेश आवश्यक था।

5. प्रकाश-विद्युत प्रभाव प्रकाश की किस प्रकृति को दर्शाता है? [CHSL (T-I) 4 अगस्त, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) कणीय प्रकृति
Solution:
  • प्रकाश-विद्युत प्रभाव प्रकाश की कणीय प्रकृति को प्रदर्शित करता है।
  • जब कोई पदार्थ किसी विद्युत चुंबकीय विकिरण से ऊर्जा शोषित करने के बाद इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित करता है
  • तो इसे प्रकाश-विद्युत प्रभाव कहा जाता है।
  • क्या दर्शाता है (सीधा उत्तर)
    • प्रकाश-विद्युत प्रभाव मुख्य रूप से प्रकाश की कण प्रकृति (फोटॉन सिद्धांत) को सिद्ध करता है।
    • यह प्रभाव प्लांक और आइंस्टाइन के क्वांटम सिद्धांत का प्रत्यक्ष प्रायोगिक समर्थन है
    • जिसमें प्रकाश ऊर्जा को असतत पैकेट hv के रूप में माना जाता है।
  • प्रकाश-विद्युत प्रभाव की परिभाषा
    • जब किसी धातु की सतह पर पर्याप्त उच्च आवृत्ति का प्रकाश डाला जाता है
    • उस सतह से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होने लगते हैं
    • तो इस घटना को प्रकाश-विद्युत प्रभाव (Photoelectric Effect) कहा जाता है।
    • ऐसे उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों को फोटोइलेक्ट्रॉन और इनसे बनने वाली धारा को प्रकाश-विद्युत धारा कहा जाता है।
  • तरंग सिद्धांत क्यों असफल रहा
    • तरंग सिद्धांत के अनुसार, ऊर्जा निरंतर रूप से फैली होनी चाहिए
    • इसलिए पर्याप्त समय देने पर कम आवृत्ति (परंतु अधिक तीव्रता) का प्रकाश भी इलेक्ट्रॉन निकाल देना चाहिए
    • वास्तव में न्यूनतम आवृत्ति से कम पर कोई इलेक्ट्रॉन नहीं निकलता (कट-ऑफ/दैहिक आवृत्ति की उपस्थिति)।
    • तरंग सिद्धांत के अनुसार, अधिक तीव्रता का अर्थ अधिक ऊर्जा, इसलिए इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा तीव्रता पर निर्भर होनी चाहिए
    • जबकि प्रयोग बताते हैं कि अधिकतम गतिज ऊर्जा केवल आवृत्ति पर निर्भर होती है, तीव्रता पर नहीं।
  • आइंस्टाइन की व्याख्या और फोटॉन
    • प्लांक के क्वांटम सिद्धांत के आधार पर आइंस्टाइन ने माना कि प्रकाश ऊर्जा के छोटे-छोटे पैकेटों (फोटॉन) के रूप में धातु पर गिरता है
    • प्रत्येक फोटॉन की ऊर्जा E=hv होती है, जहाँ v आवृत्ति है।
    • प्रत्येक फोटॉन अपनी पूरी ऊर्जा किसी एक इलेक्ट्रॉन को दे देता है
    • यह ऊर्जा का असतत आदान-प्रदान प्रकाश की कण/क्वांटम प्रकृति को दिखाता है।
  • किन बिंदुओं से कण प्रकृति सिद्ध होती है
    • दैहिक आवृत्ति (Threshold frequency): किसी धातु से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन के लिए न्यूनतम आवृत्ति आवश्यक होती है
    • यह तभी समझ आता है जब हर फोटॉन की निश्चित ऊर्जा hv हो और धातु से इलेक्ट्रॉन निकालने हेतु न्यूनतम ऊर्जा (उत्क्रमण कार्य) चाहिए।
    • तात्कालिक उत्सर्जन: प्रकाश पड़ते ही इलेक्ट्रॉन तुरंत निकल जाते हैं
    • इसका अर्थ यह है कि ऊर्जा धीरे-धीरे नहीं, एकदम से पैकेट के रूप में इलेक्ट्रॉन को मिलती है।
    • अधिकतम गतिज ऊर्जा का आवृत्ति पर निर्भर होना: इलेक्ट्रॉन की अधिकतम ऊर्जा आवृत्ति बढ़ाने से बढ़ती है
    • जबकि तीव्रता बदलने से नहीं; यह इस विचार से मेल खाता है
    • एक फोटॉन की ऊर्जा केवल उसकी आवृत्ति से निर्धारित है।
  • द्वैत प्रकृति का संदर्भ
    • व्यतिकरण, विवर्तन, ध्रुवीकरण जैसी घटनाएँ प्रकाश की तरंग प्रकृति से ही समझाई जाती हैं
    • जबकि प्रकाश-विद्युत प्रभाव, कॉम्पटन प्रभाव, रेखा स्पेक्ट्रा आदि प्रकाश की कण प्रकृति को प्रदर्शित करते हैं।
    • अतः प्रकाश-विद्युत प्रभाव इस निष्कर्ष को मजबूती देता है
    • प्रकाश का स्वरूप द्वैत (तरंग तथा कण दोनों) है
    • विशेष रूप से यह प्रभाव प्रकाश की कण या क्वांटम प्रकृति को सामने लाता है।