ऐतिहासिक परिदृश्य (छत्तीसगढ़) Part -2

Total Questions: 19

11. बस्तर रियासत के भूमकाल विद्रोह के निम्नलिखित घटनाओं को तिथि से सुमेलित कीजिए- [Chhattisgarh P.C.S. (Pre), 2022]

सूची- 1

सूची - 2

(A) विद्रोह की घोषणा 

(i) 4 फरवरी, 1910

(B) कुकानार पर आक्रमण

(ii) 5 मार्च, 1910

(C) मुरिया राज की घोषणा

(iii) अक्टूबर, 1909

(D) रानी सुबरन कुंवर की गिरफ्तारी

(iv) 7 फरवरी, 1910 

कूट :

ABCD
(a)(i)(ii)(iii)(iv)
(b)(iii)(i)(iv)(ii)
(c)(iv)(iii)(i)(ii)
(d)(iii)(iv)(ii)(i)

 

Correct Answer: (b)
Solution:अक्टूबर, 1909 में दशहरे के दिन रानी सुबरन कुंवर ने कालेंद्र सिंह, भूतपूर्व सभासदों तथा हजारों आदिवासियों को संबोधित किया। उन्होंने आदिवासियों को याद दिलाया कि 1876 ई. में वे किस प्रकार ब्रिटिश कुप्रशासन के विरुद्ध एकजुट होकर उठ खड़े हुए थे और ब्रिटिश शासन को अंत में उनकी बात माननी पड़ी। इस उद्बोधन से जनता में लहर दौड़ गई और भूमकाल विद्रोह की घोषणा हुई। 4 फरवरी, 1910 को कूकानार के बाजार में बुंटू और सोमनाथ नामक दो विद्रोहियों ने आक्रमण करके एक व्यापारी की हत्या कर दी। 7 फरवरी, 1910 को विद्रोहियों ने गीदम में गुप्त सभा आयोजित कर मुरिया राज की घोषणा की। रानी सुबरन कुंवर को 5 मार्च, 1910 को गिरफ्तार किया गया। कहीं-कहीं इनकी गिरफ्तारी की तिथि 6 मार्च, 1910 भी मिलती है।

12. छत्तीसगढ़ के इतिहास की निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए- [Chhattisgarh P.C.S. (Pre), 2020]

(i) हल्बा विद्रोह

(ii) परलकोट के जमींदार गेंद सिंह को फांसी

(iii) सिपाही विद्रोह की शुरुआत

(iv) छत्तीसगढ़ में मराठों का आक्रमण

(v) मुरिया विद्रोह

(vi) रतनपुर की स्थापना

(vii) शहीद वीर नारायण सिंह को फांसी

उपर्युक्त घटनाओं का सही कालानुक्रम है-

Correct Answer: (b) (vi), (iv), (i), (ii), (vii), (iii), (v)
Solution:छत्तीसगढ़ में हल्बा विद्रोह 1774-1777 ई. के मध्य हुआ। परलकोट के जमींदार गेंद सिंह को 20 जनवरी, 1825 को फांसी दी गई। सिपाही विद्रोह की शुरुआत रायपुर में हनुमान सिंह के नेतृत्व में 18 जनवरी, 1858 को हुई। 1741 ई. में नागपुर के भोंसले शासक के सेनापति भास्कर पंत ने छत्तीसगढ़ के रतनपुर एवं रायपुर पर आक्रमण किया। मुरिया विद्रोह 1876 ई. में झाड़ा सिरहा के नेतृत्व में बस्तर में प्रारंभ हुआ। रतनपुर की स्थापना लगभग 1050 ई. (11वीं शताब्दी) में हुई। रायपुर के चौराहे पर शहीद वीर नारायण सिंह को 10 दिसंबर, 1857 को फांसी दी गई। इस प्रकार विकल्प (b) सही उत्तर है।

13. निम्नलिखित में से कौन-सी जोड़ी (छत्तीसगढ़ में जनजातीय विद्रोह एवं नेता) सुमेलित है? [Chhattisgarh P.C.S. (Pre), 2016]

(a) भोपालपटनम् विद्रोह (1795)            -        कोरा मांझी

(b) लिंगागिरी विद्रोह (1856-57)           -         दलगंजन सिंह

(c) कोई विद्रोह (1859)                        -         जुग्गा डोरला

(d) मुरिया विद्रोह (1876)                     -          झाड़ा सिरहा

(e) बस्तर विद्रोह (1910)                      -          दीनानाथ

Correct Answer: (d)
Solution:सही सुमेल इस प्रकार है-
जनजातीय विद्रोह (वर्ष)नेता
भोपालपटनम् (1795)दरिया देव राजपूत
लिंगागिरी विद्रोह (1856-57)धुरवाराम माड़िया
कोई विद्रोह (1859)नागुल दोरला
मुरिया विद्रोह (1876)झाड़ा सिरहा
बस्तर विद्रोह (1910)वीर गुंडाधुर

14. निम्नलिखित में से कौन-सी जोड़ी (छत्तीसगढ़ में आदिवासी विद्रोह एवं उसका नेता) सुमेलित नहीं है? [Chhattisgarh P.C.S. (Pre), 2014]

(a) परलकोट विद्रोह (1825)    -      गेंदसिंह

(b) तारापुर विद्रोह (1842)       -      दलगंजन सिंह

(c) मेड़िया विद्रोह (1842)        -     हिडमा मांझी

(d) कोई विद्रोह (1859)           -     गोपीनाथ

(e) बस्तर विद्रोह (1910)          -     गुंडाधुर

Correct Answer: (d)
Solution:परलकोट विद्रोह (1825) का नेतृत्व गेंदसिंह ने, तारापुर विद्रोह (1842) का नेतृत्व दलगंजन सिंह ने, मेड़िया विद्रोह (1842) का नेतृत्व हिडमा मांझी ने, बस्तर विद्रोह (1910) का नेतृत्व गुंडाधुर ने किया था, जबकि गोपीनाथ 1867 ई. में बस्तर राज्य का दीवान नियुक्त हुआ था, तो उसने बड़े पैमाने पर जनजातियों का शोषण किया, जिसके कारण मुड़िया जनजाति के लोगों ने 1876 ई. में विद्रोह कर दिया था। अतः गोपीनाथ किसी विद्रोह का नेता नहीं था।

15. 15 अगस्त, 1947 को दुर्ग में ध्वजारोहण किसके द्वारा किया गया? [Chhattisgarh P.C.S. (Pre), 2020]

Correct Answer: (c) श्री घनश्याम गुप्ता
Solution:15 अगस्त, 1947 को मध्य प्रांत एवं बरार विधानसभा अध्यक्ष के रूप में श्री घनश्याम गुप्ता ने दुर्ग में प्रातः चार बजे ध्वजारोहण किया और प्रधानमंत्री का संदेश पढ़कर लोगों को सुनाया। ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध कविता पढ़ने के आरोप में गुप्ता जी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था। वर्ष 1937 के चुनाव में सत्तारूढ़ कांग्रेस की सरकार में वे विधानसभा अध्यक्ष बने एवं वर्ष 1952 तक इस पद पर कार्यरत रहे।

16. रतनपुर के किस राजा के कार्यकाल में मराठा सेनापति भास्कर पंत ने आक्रमण किया था? [ Chhattisgarh P.C.S. (Pre), 2020]

Correct Answer: (b) रघुनाथ सिंह
Solution:1741 ई. में नागपुर के भोंसला राज्य के शासक रघुजी प्रथम के सेनापति भास्कर पंत ने रतनपुर पर आक्रमण किया, उस समय वहां के कल्चुरि शासक रघुनाथ सिंह थे। भास्कर पंत ने इस क्षेत्र को जीत लिया। रघुनाथ सिंह की मृत्यु के पश्चात मोहन सिंह (1745-1758 ई.) को रतनपुर राज्य का नया शासक नियुक्त किया गया। जब उसकी मृत्यु हुई तब भोंसला शासक ने वहां अपना प्रत्यक्ष शासन (नए प्रशासक) स्थापित किया, जिसके अनुसार, रघुजी प्रथम का पुत्र बिंबा जी भोंसले वहां का प्रथम मराठा शासक हुआ। छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग ने अपनी उत्तर-कुंजी में विकल्प (d) सही माना है, जो कि गलत है।

17. छत्तीसगढ़ में मराठा शासनकाल में निम्नलिखित स्थानों पर विद्रोह हुए- [Chhattisgarh P.C.S. (Pre), 2015]

(1) धमधा

(2) बरगढ़

(3) कवर्धा

(4) तारापुर

सही उत्तर चुनिए।

Correct Answer: (c) 1, 2, 4
Solution:छत्तीसगढ़ में प्रत्यक्ष मराठा शासन की सर्वप्रथम स्थापना 1758 ई. में हुई तथा बिम्बाजी भोंसले यहां के पहले शासक हुए। समय-समय पर जनजातियों ने मराठा शासन के विरुद्ध अनेक विद्रोह किए थे। इनमें धमधा, बरगढ़ तथा तारापुर के विद्रोह शामिल हैं।

18. असहयोग आंदोलन में दुर्ग के इन वकीलों ने वकालत का परित्याग किया- [Chhattisgarh P.C.S. (Pre), 2013]

1. राम दयाल तिवारी

2. घनश्याम सिंह गुप्त

3. प्यारेलाल सिंह

4. रत्नाकर झा

सही उत्तर चुनिए।

Correct Answer: (b) 2, 3 एवं 4
Solution:असहयोग आंदोलन के दौरान घनश्याम सिंह गुप्त, प्यारेलाल सिंह एवं रत्नाकर झा नामक वकीलों ने अपनी वकालत छोड़ी थी।

19. छत्तीसगढ़ में असहयोग आंदोलन के दौरान बहिष्कार स्वरूप बैरिस्टर नगेंद्रनाथ दे ने किस उपाधि का त्याग किया था? [Chhattisgarh P.C.S. (Pre), 2020]

Correct Answer: (b) राय बहादुर
Solution:

छत्तीसगढ़ में असहयोग आंदोलन के दौरान बहिष्कार स्वरूप बैरिस्टर नगेंद्रनाथ दे ने 'राय बहादुर' की उपाधि का त्याग किया था। इन्हें यह उपाधि वर्ष 1909 में प्रदान की गई थी। इनके साथ वामनराव लाखे, बैरिस्टर कल्याण सिंह, मोरार जी थेरकर, सेठ गोपी किसन ने भी अपनी उपाधियां त्याग दी थीं।