Solution:तमिलनाडु में शासन करने वाले चोलों के शिलालेख में बेट्टी या वेट्टी कर (Vetti Tax) का सर्वाधिक बार उल्लेख किया गया है। यह कर नकद में न लेकर जबरन श्रम (Forced Labour) और कदमाई या भू-राजस्व के रूप में लिया जाता था।चोल राजवंश का राजनीतिक इतिहास (850-1279 ई.)
- सुदूर दक्षिण भारत के तमिल प्रदेश में प्राचीनकाल में जिन राजवंशों का उत्कर्ष हुआ, उनमें चोलों का विशिष्ट स्थान है। चोल एक शक्तिशाली राजवंश था,
- जिसने 1500 वर्षों से अधिक समय तक दक्षिण भारत में शासन किया। यद्यपि इस राजवंश की स्थापना के संस्थापक का ज्ञान नहीं है,
- किंतु मौर्य सम्राट अशोक के तेरहवें शिलालेख में चोलों का प्रथम ऐतिहासिक उल्लेख मिलता है, जहाँ इनकी गणना सीमावर्ती राज्य के रूप में पांड्यों और चेरों के साथ की गई है।
- प्राचीन चोल राज्य 'चोडमंडलम्' पेन्नार और बेल्लारु नदियों के बीच स्थित था। इस राज्य की भौगोलिक सीमा इस राजवंश के शासकों की शक्ति एवं सामर्थ्य के अनुसार समय-समय पर बदलती रही।
- प्रारंभ में चोलों ने उरेयूर (तमिलनाडु में त्रिचनापल्ली के निकट) में अपनी राजधानी स्थापित की, किंतु आगे चलकर क्रमशः कावेरीपट्टनम्, तंजावुर (तंजोर) तथा गंगेकोंडचोलपुरम् भी उनकी राजधानियाँ बनीं।
- चोल वंश या चोल साम्राज्य का राजकीय चिन्ह बाघ था, जो उनके ध्वज पर भी अंकित मिलता है। किंतु तेलुगु प्रदेश के कुछ स्थानीय राजाओं के, जो अपने को करिकाल की संतान मानते हैं,
- कुलचिन्ह के रूप में सिंह का प्रयोग किया गया है। इसके साथ ही, चोल शासकों ने तमिल और संस्कृत को राजकीय भाषा के रूप में अपनाया। इन शासकों के अभिलेख संस्कृत, तमिल और तेलुगू भाषाओं में मिलते हैं।
ऐतिहासिक स्रोत(साहित्यिक स्रोत)
- आरंभिक चोलों के इतिहास-निर्माण के प्रमुख साधन साहित्यिक ही हैं, जिनमें संगम साहित्य (100-250 ई.) सबसे महत्त्वपूर्ण है।
- इन ग्रंथों में सुदूर दक्षिण में तीन प्रमुख राज्यों चोल, चेर और पांड्य के उद्भव और विकास का विवरण मिलता है।
- संगम साहित्य से न केवल आरंभिक चोल शासक करिकाल की उपलब्धियों की सूचना मिलती है, बल्कि पांड्य तथा चेर राजाओं के साथ उनके संबंधों का भी ज्ञान होता है।
- संगम साहित्य में वर्णित अनेक तथ्यों की पुष्टि पेरीप्लस और टॉलमी के विवरणों से होती है।
- परवर्ती चोल शासकों अर्थात् विजयालय और उसके उत्तराधिकारियों के इतिहास-निर्माण के लिए दशवीं ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी में प्रवर्तित शेव संतों के 'वरित' विशेष उपयोगी हैं।
- सबसे पहले नंबि आंडार ने शेव संतों का चरित उपनिबद्ध किया और जिसके आधार पर शेक्किलार ने 'तिरुतोंडर पुराणम्' नामक बृहत्काव्य की रचना की, जिसे 'पेरियप्राणम्' भी कहा जाद आगमों की तरह वेष्णवागम भी ऐतिहासिक दृष्टि से उपयोगी है