Correct Answer: (a) रबींद्रनाथ टैगोर
Solution:- रबींद्र संगीत की एक शैली है, जिसकी उत्पत्ति तत्कालीन बंगाल में हुई थी और यह मुख्यतः रबींद्रनाथ टैगोर जी के कार्यों से जुड़ी है।
- रबींद्र संगीत का पश्चिम बंगाल तथा बांग्लादेश में महत्वपूर्ण सांस्कृतिक प्रभाव रहा है।
- इसे प्रायः सामाजिक समारोहों और सांस्कृतिक समारोहों में आयोजित किया जाता है।
- उत्पत्ति और इतिहास
- उन्होंने लगभग 2,000 से अधिक गीत रचे, जो हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत, कर्नाटक संगीत, पश्चिमी धुनों और बंगाली लोक संगीत के मिश्रण से बने हैं।
- यह शैली टैगोर के साहित्यिक कार्यों जैसे गीतांजलि से निकली और बंगाल की सांस्कृतिक क्रांती का प्रतीक बनी।
- टैगोर ने कुछ नए ताल भी बनाए, जो पारंपरिक तालों की सीमाओं को पार करते थे।
- विशेषताएँ
- रवींद्र संगीत की खासियत इसकी काव्यात्मकता, मधुर धुनें और भावनात्मक गहराई है। इसमें हारमोनियम, तबला जैसे वाद्ययंत्रों का उपयोग होता है
- गीत प्रकृति, भक्ति, प्रेम, देशभक्ति जैसे विविध विषयों पर आधारित होते हैं। यह ठुमरी शैली से प्रभावित है
- लेकिन अलंकारों का सीमित प्रयोग और सहज भाव व्यक्त करता है। टैगोर के गीतों में ब्राह्मो भक्ति से लेकर कामुक रस तक की विविधता मिलती है।
- यह नृत्य प्रदर्शन कोलकाता में रवींद्र संगीत के साथ दिखाता है, जो इसकी जीवंत परंपरा को दर्शाता है।
- सांस्कृतिक महत्व
- रवींद्र संगीत बंगाल की पहचान है और सामाजिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों में गाया जाता है।
- स्वामी विवेकानंद जैसे महान व्यक्तियों ने भी इसे सराहा और इसमें रचना की।
- यह बंगाली लोकाचार की नींव है, जो 500 वर्षों के सांस्कृतिक मन्थन का परिणाम माना जाता है।
- अन्य से भ्रम
- कई बार इसे रवींद्र जैन (हिंदी फिल्म संगीतकार) या रवि शंकर (सितार वादक) से जोड़ने की भूल होती है, लेकिन इसका सीधा संबंध रवींद्रनाथ टैगोर से ही है।
- यह तस्वीर टैगोर को उनके नाटक वाल्मीकि प्रतीभा में दिखाती है, जो रवींद्र संगीत की प्रारंभिक प्रस्तुतियों का उदाहरण है।