प्रमुख व्यक्तित्व (परम्परागत सामान्य ज्ञान) भाग-I

Total Questions: 30

21. हमारे पहले प्रधानमंत्री कौन थे? [MTS (T-I) 12 सितंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) जवाहरलाल नेहरू
Solution:
  • भारत के पहले प्रधानमंत्री प. जवाहरलाल नेहरू थे। वह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक प्रमुख व्यक्ति थे
  • उन्हें आधुनिक भारत का निर्माता भी माना जाता है। पं. नेहरू की प्रसिद्ध पुस्तक का नाम 'द डिस्कवरी ऑफ इंडिया' है।
  • प्रारंभिक जीवन
    • जवाहरलाल नेहरू का जन्म 14 नवंबर 1889 को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में हुआ था।
    • वे प्रसिद्ध वकील और स्वतंत्रता सेनानी मोतीलाल नेहरू व स्वरूप रानी के पुत्र थे।
    • उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की और लंदन में बैरिस्टर बने, लेकिन जल्द ही भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हो गए।​
  • स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका
    • नेहरू महात्मा गांधी के प्रमुख अनुयायी बने और असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह तथा भारत छोड़ो आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
    • 1929 में लाहौर अधिवेशन में वे कांग्रेस अध्यक्ष बने और पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित कराया।
    • गांधीजी ने उन्हें अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी माना, जिससे 1946 में वे अंतरिम सरकार के प्रमुख बने।
  • प्रधानमंत्री कार्यकाल
    • 15 अगस्त 1947 को भारत की स्वतंत्रता के दिन नेहरू ने लाल किले से तिरंगा फहराया और 'ट्रिस्ट विद डेस्टिनी' भाषण दिया।
    • वे 27 मई 1964 तक लगातार 17 वर्ष प्रधानमंत्री रहे, जो सबसे लंबा कार्यकाल है।
    • इस दौरान उन्होंने पंचशील सिद्धांत, गैर-संरेखण नीति, पंचवर्षीय योजनाओं और भाखड़ा नांगल जैसे बांधों का निर्माण किया।
  • प्रमुख उपलब्धियाँ
    • नेहरू ने भारत को धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और समाजवादी गणराज्य बनाने पर जोर दिया।
    • उन्होंने आईआईटी, आईआईएम जैसे संस्थानों की स्थापना की तथा वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा दिया।
    • 1962 के भारत-चीन युद्ध में हार के बावजूद, उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में शांति की अपील की। उनके जन्मदिन को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है।
  • व्यक्तिगत जीवन
    • 1916 में उन्होंने कमला कौल से विवाह किया, जिनकी 1936 में मृत्यु हो गई।
    • उनकी एकमात्र पुत्री इंदिरा गांधी बाद में भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं।
    • नेहरू 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' और 'ग्लिम्प्सेस ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री' जैसी पुस्तकें लिखीं।

22. निम्नलिखित में से कुचिपुड़ी की श्री साईं नटराज अकादमी (Sri Sai Nataraja Academy of Kuchipudi) के संस्थापक सदस्य कौन थे, जो कुचिपुड़ी में प्रशिक्षण और उच्च शिक्षा प्रदान करती हैं? [MTS (T-I) 12 सितंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (b) पी. रमादेवी
Solution:
  • कुचिपुड़ी नृत्य की श्री साईं नटराज अकादमी की संस्थापक सदस्य पी. रमादेवी थीं।
  • पी. रमा देवी एक प्रसिद्ध वरिष्ठ कुचिपुड़ी नृत्य प्रतिपादक हैं।
  • उन्होंने सिकंदराबाद में श्री साईं नटराज अकादमी ऑफ कुचिपुड़ी डांस की स्थापना की थीं।
  • संस्थापक का परिचय
    • डॉ. पी. रामादेवी एक प्रसिद्ध वरिष्ठ कुचिपुड़ी नृत्यांगना, गुरु, विदुषी, कोरियोग्राफर, लेखिका और आयोजिका हैं।
    • उन्होंने 1989 में सिकंदराबाद (सेकुंडरबाद) में श्री साईं नटराज अकादमी ऑफ कुचिपुड़ी डांस की स्थापना की, जो 27 वर्षों (2014 तक की जानकारी के अनुसार) से सक्रिय है।
    • उनके पास बीएससी, बीएड, डिप्लोमा इन डोमेस्टिक साइंस, प्रवीण इन हिंदी और हायर डिप्लोमा इन सॉफ्टवेयर जैसी विभिन्न डिग्रियां हैं।
    • उन्होंने नृत्य के क्षेत्र में अनूठे योगदान से खुद को एक महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में स्थापित किया है।​
  • अकादमी का उद्देश्य और कार्य
    • यह अकादमी कुचिपुड़ी के शास्त्रीय नृत्य रूप में प्रशिक्षण और उच्च शिक्षा प्रदान करती है।
    • कुचिपुड़ी आंध्र प्रदेश से उत्पन्न भारत के आठ प्रमुख शास्त्रीय नृत्यों में से एक है
    • जो अपनी प्रभावशाली पदकौतुक (फुटवर्क), नाटकीय चरित्र चित्रण और अभिव्यंजक नेत्र गतियों के लिए जाना जाता है।
    • अकादमी कार्यशालाएं, सेमिनार और प्रदर्शन आयोजित करती है ताकि कुचिपुड़ी के प्रति जागरूकता फैलाई जा सके।
    • डॉ. रामादेवी ने कई छात्रों को प्रशिक्षित किया है, जो बाद में सफल नर्तक और शिक्षक बने।
    • अकादमी हिंदू महाकाव्यों और पौराणिक कथाओं के दृश्यों का चित्रण करती है, जिसमें नृत्य, संगीत और अभिनय का संयोजन होता है।​
  • कुचिपुड़ी नृत्य का संक्षिप्त इतिहास
    • कुचिपुड़ी की परंपरा 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में श्री वेंकटम लक्ष्मी नारायण शास्त्री द्वारा क्रांतिकारी परिवर्तन लाए गए
    • जिन्होंने नाट्य परंपरा में सोलो पेश करने शुरू किए और महिलाओं को इसमें प्रोत्साहित किया।
    • पद्मभूषण डॉ. वेम्पति चिन्ना सत्यन ने इस कला को विश्वव्यापी मान्यता दिलाई। डॉ. रामादेवी का कार्य इस परंपरा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण है।​
  • अतिरिक्त उपलब्धियां
    • डॉ. पी. रामादेवी को कुचिपुड़ी के संवर्धन और संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए जाना जाता है।
    • 2021 में भी उनके योगदान को मान्यता दी गई, जहां वे अकादमी की संस्थापक के रूप में उल्लेखित हैं।
    • यह अकादमी नृत्य शिक्षा को सुलभ बनाती है और कई प्रतिभाओं को निखारती है।

23. फिल्म 'उपकार' (1967) के प्रसिद्ध गीत 'मेरे देश की धरती सोना उगले' के गायक कौन थे? [MTS (T-I) 08 सितंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) महेंद्र कपूर
Solution:
  • प्रसिद्ध गीत 'मेरे देश की धरती सोना उगले' 1967 की हिंदी फिल्म 'उपकार' का एक हिंदी गीत है।
  • इस गाने के गायक महेंद्र कपूर थे। यह एक देशभक्ति गीत है।
  • गीत की पृष्ठभूमि
    • यह गीत 1967 में रिलीज़ हुई मनोज कुमार निर्देशित फिल्म 'उपकार' का हिस्सा है,
    • जो भारतीय किसान और देशभक्ति की थीम पर आधारित है। गीत के बोल गुलशन बावरा ने लिखे थे
    • जबकि संगीत कल्याणजी-आनंदजी ने दिया।
    • महेंद्र कपूर की शक्तिशाली और भावपूर्ण आवाज़ ने इसे अमर बना दिया, जो आज भी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर गाया जाता है।​
  • गायक का परिचय
    • महेंद्र कपूर (1934-2019) हिंदी सिनेमा के प्रमुख पार्श्वगायक थे, जिन्होंने 1960-80 के दशक में कई यादगार गीत गाए।
    • उन्होंने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी जीता और उनकी आवाज़ देशभक्ति से भरे गीतों के लिए खासतौर पर प्रसिद्ध रही।
    • इस गीत ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई, क्योंकि इसकी धुन और बोल किसानों की मेहनत व देश की उर्वरता को बखूबी दर्शाते हैं।​
  • गीत के बोल
    • गीत के मुखड़े हैं: "मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती"।
    • इसमें बैलों की घुंघरुओं की आवाज़, खेतों की हरियाली, और महापुरुषों जैसे गांधी, सुभाष, तिलक का उल्लेख है
    • जो देशप्रेम जगाता है। पूरा गीत चार अंतरे वाला है, जो ग्रामीण जीवन की सुंदरता और मातृभूमि के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है।
  • फिल्म का संदर्भ
    • 'उपकार' में मनोज कुमार मुख्य भूमिका में थे, साथ में आशा पारेख, कमिनी कौशल, प्रेम चोपड़ा और प्राण।
    • फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट रहा और मनोज कुमार को 'भारत कुमार' का खिताब दिलाया।
    • गीत का एक रोचक किस्सा मनोज कुमार ने साझा किया कि यह गुलशन बावरा के मंदिर दर्शन के बाद कार में गुनगुनाए गए विचार से प्रेरित था।​
  • लोकप्रियता विरासत
    • यह गीत भारतीय सिनेमा का आइकॉनिक देशभक्ति गान है, जिसे यूट्यूब पर लाखों बार देखा गया है।
    • गुलशन बावरा को इसके लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला।
    • आज भी स्कूलों, कार्यक्रमों में गाया जाता है, जो देश की समृद्धि और एकता का प्रतीक है।

24. त्रिमुखी, पंचमुखी, सप्तमुखी और नवमुखी जैसे तालों की रचना करने का श्रेय किस भारतीय संगीत दिग्गज को दिया जाता है? [MTS (T-I) 06 सितंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (d) एम. बालामुरलीकृष्ण
Solution:
  • त्रिमुखी, पंचमुखी, सप्तमुखी और नवमुखी जैसे तालों की रचना करने का श्रेय भारतीय संगीतकार मंगलमपल्ली बालामुरली कृष्ण को दिया जाता है।
  • बालामुरली का जन्म आंध्र प्रदेश में हुआ था। बालामुरलीकृष्ण ने तेलुगू, संस्कृत और तमिल सहित विभिन्न भाषाओं में 400 से भी ज्यादा संगीत रचनाएं की हैं।
  • उनके जीवन और पृष्ठभूमि
    • एम. बालमुरलीकृष्ण का जन्म 6 जुलाई 1930 को आंध्र प्रदेश के सिम्मामपुड्डी गाँव में हुआ था।
    • मात्र पाँच वर्ष की आयु से उन्होंने कर्नाटक संगीत की तालीम आरंभ कर दी थी और आठ वर्ष की उम्र में ही वे मंचीय प्रदर्शन करने लगे।
    • वे एक बहुमुखी संगीतकार थे—गायक, वादक (वायलिन, वीणा, मृदंगम, कंजीरा आदि), राग और ताल रचयिता
    • फिल्मों में पार्श्व गायक भी। 2016 में उनका निधन हुआ, लेकिन उनका संगीत आज भी जीवंत है।
  • इन तालों की रचना
    • बालमुरलीकृष्ण ने कर्नाटक संगीत की पारंपरिक ताल प्रणाली को विस्तार दिया।
    • उन्होंने नए लय चक्र (ताल) रचे, जो मुखों (भागों) के आधार पर वर्गीकृत हैं:
    • त्रिमुखी: तीन मुखों वाला ताल।
    • पंचमुखी: पाँच मुखों वाला।
    • सप्तमुखी: सात मुखों वाला।
    • नवमुखी: नौ मुखों वाला।
    • ये ताल संधामों (लयकारी के जटिल पैटर्न) को तार्किक ढाँचे में बाँधते हैं, जहाँ प्रत्येक मुख में भिन्न अंग और लयबद्ध तालियाँ होती हैं।
    • उन्होंने इन्हें अंगम (खंड) और परिभाषा के साथ विकसित किया, जो प्रदर्शन में नवीनता लाते हैं।
    • ये ताल चक्रीय होते हैं, जिन्हें दोहराया जाता है, और कर्नाटक संगीत की गायकी-प्रधान शैली के अनुकूल हैं।
  • कर्नाटक संगीत में योगदान
    • कर्नाटक संगीत दक्षिण भारत की प्राचीन परंपरा है, जो हिंदुस्तानी संगीत से भिन्न है।
    • बालमुरलीकृष्ण ने इसमें नए राग (जैसे वाचस्पति, शिवरंजनी के विस्तार) भी रचे, हालाँकि कुछ रूढ़िवादियों ने आलोचना की।
    • लेकिन त्यागराज की परंपरा में नवप्रवर्तन स्वाभाविक है।
    • उनके तालों ने लयकारी को समृद्ध किया, विशेषकर मृदंगम वादन में। वे सिद्धांत और व्यावहार दोनों में निपुण थे।
  • प्राप्त सम्मान
    • उनके योगदान के लिए पद्म भूषण (1963), पद्म विभूषण (2005), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार आदि मिले।
    • वे राष्ट्रपति भवन में भी प्रदर्शन कर चुके थे।
    • अन्य विकल्प जैसे बड़े गुलाम अली खान (हिंदुस्तानी गायक), के.जे. येसुदास (पार्श्व गायक) या पंडित जसराज (मेवाती घराना) इन तालों से असंबंधित हैं।
  • प्रभाव और विरासत
    • बालमुरलीकृष्ण के ताल आज कर्नाटक संगीतकारों द्वारा अपनाए जाते हैं, जो प्रदर्शनों में जटिल लय पैटर्न सर्जन में सहायक हैं।
    • उनकी रचनाएँ संगीत को गतिशील बनाती हैं
    • ये ताल कर्नाटक की गायकी-केंद्रित प्रकृति को मजबूत करते हैं। उनका कार्य भारतीय शास्त्रीय संगीत की सीमाओं को विस्तार देता है।

25. नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री मुहम्मद यूनुस द्वारा सूक्ष्म वित्त कार्यक्रम सबसे पहले किस दशक में बनाए गए थे? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 16 नवंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (b) 1970s
Solution:
  • 'माइक्रोफाइनेंसिंग' शब्द 1970 के दशक में बांग्लादेश के ग्रामीण बैंक के विकास के दौरान गढ़ा गया था
  • जिसे माइक्रोफाइनेंस अग्रणी मुहम्मद यूनुस ने बनाया था।
  • बांग्लादेश में ग्रामीण बैंक की स्थापना के साथ, यूनुस ने माइक्रोफाइनेंस प्रथाओं को औपचारिक रूप दिया।
  • यूनुस का प्रारंभिक सफर
    • मुहम्मद यूनुस, बांग्लादेश के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता, ने 1974 में बांग्लादेश में अकाल की भयावह स्थिति देखी।
    • उन्होंने चट्टोग्राम विश्वविद्यालय में पढ़ाते हुए अपने छात्रों के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर गरीबों, खासकर भूमिहीन किसानों और बुनकरों की मदद की कोशिश की।
    • जल्द ही उन्हें एहसास हुआ कि गरीबी का मूल कारण पूंजी की कमी है
    • इसलिए उन्होंने व्यक्तिगत रूप से छोटे-छोटे ऋण दिए, जैसे 1976 में एक बुनकर सुफिया बेगम को मात्र 27 डॉलर का ऋण।
  • सूक्ष्म वित्त की शुरुआत
    • 1970 के दशक के मध्य, विशेष रूप से 1976 में, यूनुस ने सूक्ष्म ऋण (माइक्रोक्रेडिट) की अवधारणा विकसित की
    • जो बिना किसी संपार्श्विक के गरीबों को छोटे ऋण प्रदान करती थी। यह कार्यक्रम जोबरा गांव से शुरू हुआ
    • जहां उन्होंने 42 परिवारों को कुल 27 डॉलर का ऋण दिया, जो चमत्कारिक रूप से समय पर लौटा दिया गया।
    • इस प्रयोग ने साबित किया कि गरीब लोग ऋण चुकाने के योग्य हैं यदि ऋण छोटे और समूह-आधारित हों।
    • यूनुस ने इसे "ग्रामीण बैंक प्रोजेक्ट" के रूप में विस्तार दिया, जो महिलाओं पर केंद्रित था क्योंकि वे परिवार की मुख्य आय स्रोत थीं।
  • ग्रामीण बैंक की स्थापना
    • हालांकि सूक्ष्म वित्त की नींव 1970 के दशक में पड़ी, ग्रामीण बैंक की आधिकारिक स्थापना 2 अक्टूबर 1983 को हुई। बैंक ने बिना गारंटी के ऋण दिए
    • साप्ताहिक बैठकें आयोजित कीं और सदस्यता शुल्क लिया। आज तक, यह 97% से अधिक रिकवरी दर बनाए रखे हुए है।
    • यूनुस का मॉडल समूह दायित्व (जॉइंट लायबिलिटी) पर आधारित था, जहां 5 सदस्यों के समूह ऋण लेते और एक-दूसरे की जिम्मेदारी लेते।
  • वैश्विक प्रभाव और नोबेल पुरस्कार
    • यूनुस के प्रयासों ने सूक्ष्म वित्त को वैश्विक आंदोलन बना दिया, जिसे 100 से अधिक देशों ने अपनाया।
    • 2006 में, मुहम्मद यूनुस और ग्रामीण बैंक को नोबेल शांति पुरस्कार मिला
    • क्योंकि उनके काम ने "गरीबी के नीचे से आर्थिक और सामाजिक विकास" को बढ़ावा दिया।
    • पुरस्कार समिति ने कहा कि यह गरीबी उन्मूलन का नया तरीका है, जिसने 90% महिलाओं को सशक्त बनाया।
    • ग्रामीण बैंक ने 90 लाख से अधिक ग्राहकों को ऋण दिए, जिनमें से 95% महिलाएं हैं।
  • चुनौतियां और विरासत
    • यूनुस को बांग्लादेश सरकार से विवादों का सामना करना पड़ा, लेकिन उनका मॉडल आज भी प्रासंगिक है।
    • सूक्ष्म वित्त ने न केवल आय बढ़ाई बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया।
    • यूनुस को "बैंकिंग के गरीबों का मसीहा" कहा जाता है, और उनका प्रयोग साबित करता है कि छोटे ऋण बड़े बदलाव ला सकते हैं।

26. विश्व में हरित क्रांति के जनक कहे जाने वाले नॉर्मन बोरलॉग किस देश से संबंधित हैं? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 15 नवंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) यू.एस.ए.
Solution:
  • नॉर्मन अर्नेस्ट बोरलॉग नोबेल पुरस्कार विजेता एक अमेरिकी कृषि-विज्ञानी थे, इन्हें हरित क्रांति का पिता माना जाता है।
  • इन्होंने वर्ष 1950 से 1970 के मध्य में मेक्सिको में बीमारियों से लड़ सकने वाली गेहूं की एक नई किस्म विकसित की थी।
  • प्रारंभिक जीवन
    • उन्होंने कृषि विज्ञान में रुचि लेते हुए मिनेसोटा विश्वविद्यालय से वनस्पति रोग विज्ञान में पीएचडी प्राप्त की।
    • बाद में वे रॉकफेलर फाउंडेशन के लिए मेक्सिको चले गए, जहां उन्होंने अपना प्रमुख कार्य शुरू किया।
  • हरित क्रांति में योगदान
    • 1960 के दशक में बोरलॉग ने उच्च उपज वाली गेहूं की किस्में (HYVs) विकसित कीं, जो रोग प्रतिरोधी, छोटे कद की और अधिक पैदावार देने वाली थीं।
    • उन्होंने मेक्सिको में जापान के नोरिन 10 गेहूं की किस्म को नॉर्वे की नॉर्विन 23 किस्म के साथ क्रॉस-ब्रीडिंग कर एक क्रांतिकारी किस्म तैयार की
    • जो संकरी पत्तियों वाली थी और जंग रोग से लड़ सकने वाली। इन किस्मों ने मेक्सिको की गेहूं उत्पादन को दोगुना कर दिया।
  • भारत और विश्व पर प्रभाव
    • भारत में 1965-66 के सूखे के समय बोरलॉग ने एमएस स्वामीनाथन के साथ मिलकर ये किस्में लाकर परीक्षण किया।
    • लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी के नेतृत्व में भारत ने इन्हें अपनाया
    • जिससे गेहूं उत्पादन 1967-68 में 11 मिलियन टन से बढ़कर 1970-71 में 23 मिलियन टन हो गया।
    • इससे भारत भुखमरी से बच गया। इसी तरह पाकिस्तान, ब्राजील, तुर्की जैसे देशों में भी हरित क्रांति फैली।
  • पुरस्कार और सम्मान
    • 1970 में उन्हें उच्च उपज वाली फसलों के विकास और भुखमरी रोकने के लिए नोबेल शांति पुरस्कार मिला।
    • भारत ने उन्हें 2006 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया।
    • उन्हें "विश्व का सबसे बड़ा भूख नाशक" भी कहा जाता है। बोरलॉग का निधन 12 सितंबर 2009 को हुआ।
  • विरासत
    • बोरलॉग की तकनीकों ने विश्व की खाद्य आपूर्ति को दोगुना से अधिक बढ़ाया
    • लेकिन पर्यावरणीय चिंताओं जैसे मिट्टी क्षरण और रसायनों के अधिक उपयोग को भी जन्म दिया।
    • उनकी विरासत बोरलॉग ग्लोबल रस्ट इनिशिएटिव जैसे कार्यक्रमों में जारी है।​

27. भारत के 12वें प्रधानमंत्री कौन थे? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 15 नवंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (c) इंद्र कुमार गुजराल
Solution:
  • इंद्र कुमार गुजराल भारत के 12वें प्रधानमंत्री थे।
  • इनके कार्यकाल में गुजराल सिद्धांत को भारत की अंतरराष्ट्रीय रणनीति में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जाता है।
  • प्रारंभिक जीवन
    •  वे स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहे और भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया, जिसके लिए उन्हें जेल भी हुई।
    • शिक्षा में स्नातक होने के बाद वे पत्रकारिता और राजनीति की ओर मुड़े। पंजाब विश्वविद्यालय से उन्होंने एमए किया।​
  • राजनीतिक यात्रा
    • गुजराल ने 1950 के दशक में राजनीति में प्रवेश किया। वे पहले कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े, लेकिन बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए।
    • 1964 से 1976 तक वे जालंधर लोकसभा सीट से सांसद रहे। इंदिरा गांधी सरकार में वे सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहे।
    • 1980 के दशक में जनता दल में शामिल हुए। वे दो बार विदेश मंत्री बने (1989-1990 और 1996)।
    • 1997 में संयुक्त मोर्चा सरकार के दूसरे चरण में एच. डी. देवेगौड़ा की जगह प्रधानमंत्री बने, जब कांग्रेस ने समर्थन वापस लिया।
  • प्रधानमंत्री कार्यकाल
    • उनका कार्यकाल मात्र 11 महीने का था। यह संयुक्त मोर्चा गठबंधन की सरकार थी, जो कम्युनिस्ट पार्टियों के बाहरी समर्थन पर टिकी थी।
    • अविश्वास प्रस्ताव से बचने के लिए उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी को अपना उत्तराधिकारी चुना।
    • इस दौरान आर्थिक स्थिरता बनी रही, लेकिन कोई बड़ा संकट नहीं आया। वे अल्पमत सरकार के प्रमुख रहे।
  • गुजराल सिद्धांत
    • उनकी सबसे बड़ी विरासत "गुजराल सिद्धांत" है
    • जो भारत की पड़ोसी देशों (बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, मालदीव, श्रीलंका) के साथ विदेश नीति का आधार बना। इसके पांच सिद्धांत हैं:
    • साथी देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना।
    • उनका विरोध न करना।
    • विवादों को बातचीत से सुलझाना।
    • एकतरफा रियायतें देना बिना पारस्परिकता की मांग।
    • पड़ोसियों के साथ सभी संबंधों में समान व्यवहार। यह भारत को क्षेत्रीय नेता के रूप में मजबूत करने वाला कदम था।
  • अन्य उपलब्धियाँ
    • वित्त मंत्री के रूप में भी कार्य किया।
    • कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान से बातचीत को बढ़ावा दिया।
    • कनाडा में राजदूत रहे (1976-1977)।
    • उनकी सरकार ने ग्रामीण विकास और विदेश नीति पर फोकस किया
    • हालांकि छोटे कार्यकाल के कारण बड़े सुधार सीमित रहे। वे कवि और साहित्य प्रेमी भी थे।​
  • बाद का जीवन और निधन
    • 1998 के बाद वे राज्यसभा सदस्य बने। 30 नवंबर 2012 को 92 वर्ष की आयु में नई दिल्ली में उनका निधन हो गया।
    • उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। गुजराल को शांतिप्रिय और कूटनीतिक नेता के रूप में याद किया जाता है।​

28. कम्युनिस्ट जर्नल 'वैनगार्ड' (Vanguard) के संपादक बनने वाले स्वतंत्रता सेनानी का नाम बताइए। [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 15 नवंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) एम.एन. रॉय
Solution:
  • कम्युनिस्ट जर्नल वैनगार्ड के संपादक बनने वाले स्वतंत्रता सेनानी एम.एन. राय थे।
  • एम.एन. रॉय का परिचय
    • मणबेंद्रनाथ रॉय (एम.एन. रॉय), मूल नाम नरेंद्रनाथ भट्टाचार्य, एक प्रमुख भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी और कम्युनिस्ट विचारक थे।
    • वे ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ शुरुआती क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रहे
    • जिसमें बंगाल में बम बनाने और हथियारों की तस्करी शामिल थी।
    • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ने के बाद वे उसके तरीकों से असंतुष्ट हो गए और मार्क्सवादी विचारधारा की ओर मुड़े।
  • 'वैनगार्ड' जर्नल से जुड़ाव
    • 1925 में एम.एन. रॉय 'वैनगार्ड' नामक कम्युनिस्ट जर्नल के संपादक बने, जो भारत और विदेशों में मार्क्सवादी विचारों को फैलाने का माध्यम बनी।
    • यह पत्रिका कम्युनिस्ट इंटरनेशनल (कॉमिन्टर्न) से प्रेरित थी, जिसके संस्थापक सदस्य रॉय खुद थे।
    • 1920 से कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़े रॉय ने इस जर्नल के माध्यम से ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ वैश्विक समाजवादी क्रांति को बढ़ावा दिया।
  • स्वतंत्रता संग्राम में योगदान
    • रॉय ने 1915 में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी से भारत में हथियार भेजने की कोशिश की, जिसके लिए उन्हें अफगानिस्तान होते हुए रूस तक पहुंचना पड़ा।
    • 1920 में ताशकंद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।
    • हालांकि, बाद में वे स्टालिनवाद के आलोचक बने और रैडिकल ह्यूमेनिज्म नामक अपनी विचारधारा विकसित की। वे स्वतंत्र भारत में कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में गिने जाते हैं।
  • बाद का जीवन और विरासत
    • रॉय को कई बार गिरफ्तार किया गया, लेकिन वे विचारों के प्रचार में लगे रहे। 1954 में उनका निधन हुआ।
    • उनका योगदान भारतीय कम्युनिज्म को वैचारिक आधार देने और स्वतंत्रता आंदोलन को वामपंथी दिशा देने में उल्लेखनीय है।
    • अन्य विकल्प जैसे के. केलप्पन या पी. कृष्ण पिल्लई स्वतंत्रता सेनानी तो थे, लेकिन 'वैनगार्ड' से उनका कोई संबंध नहीं।​

29. एनी बेसेंट ....... के प्रभाव में एक फैबियन समाजवादी थीं। [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 14 नवंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (d) जॉर्ज बर्नार्ड शॉ
Solution:
  • एनी बेसेंट जॉर्ज बर्नार्ड शॉ के प्रभाव में एक फैबियन समाजवादी थीं।
  • ब्रिटिश फैबियन समाजवादी, सिडनी वेब ने एनी बेसेंट को 19वीं शताब्दी की सबसे उल्लेखनीय महिलाओं में से एक कहा।
  • जॉर्ज बर्नार्ड शॉ के लिए वह सबसे महान महिला सार्वजनिक वक्ता थीं।
  • प्रारंभिक जीवन
    • एनी बेसेंट का जन्म 1 अक्टूबर 1847 को लंदन में हुआ था।
    • वे ब्रिटिश मूल की थीं और शुरू में धार्मिक पृष्ठभूमि से प्रभावित रहीं, लेकिन बाद में नास्तिकता और समाजवाद की ओर मुड़ीं।
    • उन्होंने महिलाओं के अधिकार, जन्म नियंत्रण और श्रमिक सुधारों पर काम किया।
  • फैबियन समाजवाद से जुड़ाव
    • फैबियन सोसाइटी, जो 1884 में स्थापित एक ब्रिटिश समाजवादी संगठन था, क्रमिक सुधारों के माध्यम से लोकतांत्रिक समाजवाद की वकालत करता था।
    • एनी बेसेंट 1885 में जॉर्ज बर्नार्ड शॉ से मिलीं, जो सोसाइटी के प्रमुख सदस्य और संस्थापक थे।
    • शॉ के विचारों से प्रेरित होकर वे फैबियन समाजवादी बनीं, जो क्रांति के बजाय शांतिपूर्ण बदलाव पर जोर देते थे।
  • जॉर्ज बर्नार्ड शॉ का प्रभाव
    • शॉ (1856-1950) एक प्रसिद्ध नाटककार, आलोचक और समाजवादी थे, जिन्हें 1925 में नोबेल पुरस्कार मिला।
    • उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की सह-स्थापना की और फैबियन सोसाइटी में सक्रिय रहे।
    • एनी को शॉ ने समाजवाद के सिद्धांतों से परिचित कराया, विशेष रूप से आर्थिक न्याय, सामाजिक सुधार और साम्राज्यवाद विरोधी दृष्टिकोण से।
    • एनी ने Why I am a Socialist जैसे लेखों में समाजवाद को
    • राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक अत्याचार के खिलाफ बताया।
  • प्रमुख गतिविधियाँ
    • मैच फैक्ट्री हड़ताल (1888): ब्रायंट एंड मे कंपनी की महिला मजदूरों का नेतृत्व किया, जो उनका सबसे बड़ा विजय था। इससे महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता को बढ़ावा मिला।​
    • फैबियन गतिविधियाँ: बेरोजगारी विरोधी प्रदर्शनों और फैबियन संसदीय लीग में भाग लिया। वे समाजवाद को नारीवाद से जोड़ती रहीं।​
    • भारत से पहले वे नेशनल सेक्युलर सोसाइटी और जन्म नियंत्रण अभियान में सक्रिय रहीं।​
  • भारत में योगदान
    • 1893 में भारत आकर थियोसॉफिकल सोसाइटी की नेता बनीं। 1917 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष बनीं।
    • होम रूल लीग चलाई, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना में योगदान दिया। उनका समाजवादी विचार भारतीय स्वतंत्रता से जुड़ा।
  • विरासत
    • एनी बेसेंट (मृत्यु: 1933) को समाज सुधारक, थियोसोफिस्ट और स्वतंत्रता सेनानी के रूप में याद किया जाता है।
    • भारत में सड़कें, पार्क उनके नाम पर हैं। फैबियन समाजवाद ने ब्रिटेन की लेबर पार्टी को प्रभावित किया।
    • यह फalk स्टूडियो द्वारा 1910 के आसपास लिया गया एनी बेसेंट का चित्रण है, जो उनके परिपक्व काल को दर्शाता है।

30. बाजपेयी सरकार के कार्यकाल के दौरान निम्नलिखित में से किसे विनिवेश मंत्रालय के पहले मंत्री के रूप में नियुक्त किया गया था? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 22, 23 नवंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) अरुण शौरी
Solution:
  • अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में विनिवेश मंत्रालय के पहले मंत्री के रूप में अरुण शौरी को नियुक्त किया गया था।
  • ध्यातव्य है कि वर्ष 1999 में अलग विनिवेश विभाग की स्थापना की गई
  • जिसे बाद में वर्ष 2001 को विनिवेश मंत्रालय नाम दिया गया था।
  • वर्ष 2016 में इसका नाम बदलकर निवेश और लोक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग कर दिया गया।
  • विनिवेश मंत्रालय की स्थापना
    • वाजपेयी सरकार ने 1999 में विनिवेश मंत्रालय की स्थापना की
    • जिसका मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (PSUs) में सरकारी हिस्सेदारी के विनिवेश को सुव्यवस्थित रूप से संचालित करना था।
    • अरुण शौरी को इस मंत्रालय का प्रभार सौंपा गया, जो भारत में निजीकरण की प्रक्रिया को गति देने वाले प्रमुख सुधारों के दौर में महत्वपूर्ण कदम था।
    • इससे पहले विनिवेश की प्रक्रिया वित्त मंत्रालय के अधीन चल रही थी, लेकिन अलग मंत्रालय बनाकर इसे स्वतंत्र पहचान मिली।
  • अरुण शौरी का योगदान
    • अरुण शौरी ने वाजपेयी के समर्थन से कई PSUs का सफल विनिवेश किया
    • जैसे हिंदुस्तान जिंक का निजीकरण, जिसने सरकारी खजाने में भारी राजस्व जुटाया।
    • उनके कार्यकाल को भारत की आर्थिक उदारीकरण नीतियों की मजबूत शुरुआत माना जाता है
    • हालांकि इससे विपक्ष की ओर से काफी आलोचना भी हुई।
    • शौरी ने विनिवेश को रफ्तार दी और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया, जो 2001 तक चली इस प्रक्रिया का आधार बना।
  • ऐतिहासिक संदर्भ
    • वाजपेयी सरकार (1998-2004) ने आर्थिक सुधारों पर विशेष ध्यान दिया
    • जिसमें गोल्डन क्वाड्रिलेटरल, संचार क्रांति जैसे अन्य कदम भी शामिल थे।
    • विनिवेश मंत्रालय 6 सितंबर 2001 को पूर्ण रूप से स्वतंत्र मंत्रालय बना, लेकिन शौरी 1999 से ही इसके पहले प्रमुख थे।
    • यह नियुक्ति NDA सरकार की PSUs में दक्षता बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा थी।