Correct Answer: (d) एम. बालामुरलीकृष्ण
Solution:- त्रिमुखी, पंचमुखी, सप्तमुखी और नवमुखी जैसे तालों की रचना करने का श्रेय भारतीय संगीतकार मंगलमपल्ली बालामुरली कृष्ण को दिया जाता है।
- बालामुरली का जन्म आंध्र प्रदेश में हुआ था। बालामुरलीकृष्ण ने तेलुगू, संस्कृत और तमिल सहित विभिन्न भाषाओं में 400 से भी ज्यादा संगीत रचनाएं की हैं।
- उनके जीवन और पृष्ठभूमि
- एम. बालमुरलीकृष्ण का जन्म 6 जुलाई 1930 को आंध्र प्रदेश के सिम्मामपुड्डी गाँव में हुआ था।
- मात्र पाँच वर्ष की आयु से उन्होंने कर्नाटक संगीत की तालीम आरंभ कर दी थी और आठ वर्ष की उम्र में ही वे मंचीय प्रदर्शन करने लगे।
- वे एक बहुमुखी संगीतकार थे—गायक, वादक (वायलिन, वीणा, मृदंगम, कंजीरा आदि), राग और ताल रचयिता
- फिल्मों में पार्श्व गायक भी। 2016 में उनका निधन हुआ, लेकिन उनका संगीत आज भी जीवंत है।
- इन तालों की रचना
- बालमुरलीकृष्ण ने कर्नाटक संगीत की पारंपरिक ताल प्रणाली को विस्तार दिया।
- उन्होंने नए लय चक्र (ताल) रचे, जो मुखों (भागों) के आधार पर वर्गीकृत हैं:
- त्रिमुखी: तीन मुखों वाला ताल।
- पंचमुखी: पाँच मुखों वाला।
- सप्तमुखी: सात मुखों वाला।
- नवमुखी: नौ मुखों वाला।
- ये ताल संधामों (लयकारी के जटिल पैटर्न) को तार्किक ढाँचे में बाँधते हैं, जहाँ प्रत्येक मुख में भिन्न अंग और लयबद्ध तालियाँ होती हैं।
- उन्होंने इन्हें अंगम (खंड) और परिभाषा के साथ विकसित किया, जो प्रदर्शन में नवीनता लाते हैं।
- ये ताल चक्रीय होते हैं, जिन्हें दोहराया जाता है, और कर्नाटक संगीत की गायकी-प्रधान शैली के अनुकूल हैं।
- कर्नाटक संगीत में योगदान
- कर्नाटक संगीत दक्षिण भारत की प्राचीन परंपरा है, जो हिंदुस्तानी संगीत से भिन्न है।
- बालमुरलीकृष्ण ने इसमें नए राग (जैसे वाचस्पति, शिवरंजनी के विस्तार) भी रचे, हालाँकि कुछ रूढ़िवादियों ने आलोचना की।
- लेकिन त्यागराज की परंपरा में नवप्रवर्तन स्वाभाविक है।
- उनके तालों ने लयकारी को समृद्ध किया, विशेषकर मृदंगम वादन में। वे सिद्धांत और व्यावहार दोनों में निपुण थे।
- प्राप्त सम्मान
- उनके योगदान के लिए पद्म भूषण (1963), पद्म विभूषण (2005), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार आदि मिले।
- वे राष्ट्रपति भवन में भी प्रदर्शन कर चुके थे।
- अन्य विकल्प जैसे बड़े गुलाम अली खान (हिंदुस्तानी गायक), के.जे. येसुदास (पार्श्व गायक) या पंडित जसराज (मेवाती घराना) इन तालों से असंबंधित हैं।
- प्रभाव और विरासत
- बालमुरलीकृष्ण के ताल आज कर्नाटक संगीतकारों द्वारा अपनाए जाते हैं, जो प्रदर्शनों में जटिल लय पैटर्न सर्जन में सहायक हैं।
- उनकी रचनाएँ संगीत को गतिशील बनाती हैं
- ये ताल कर्नाटक की गायकी-केंद्रित प्रकृति को मजबूत करते हैं। उनका कार्य भारतीय शास्त्रीय संगीत की सीमाओं को विस्तार देता है।