प्रमुख व्यक्तित्व (परम्परागत सामान्य ज्ञान) भाग-IITotal Questions: 331. निम्नलिखित में से किस शख्सियत को रंगा श्री लिटिल बैले दूप (Sri Little Ballet Troupe) नामक थिएटर समूह के माध्यम से शास्त्रीय और आधुनिक भारतीय नृत्य का समन्वय करने का श्रेय दिया जाता है? [CHSL (T-I) 11 अगस्त, 2023 (III-पाली)](a) गुरु बिपिन सिंह(b) शांति बर्धन(c) रेमो फर्नांडिस(d) पंडित बिरजू महाराजCorrect Answer: (b) शांति बर्धनSolution:शांति बर्धन को रंगा श्री लिटिल बैले टूप नामक थिएटर समूह के माध्यम से शास्त्रीय और आधुनिक भारतीय नृत्य का समन्द्रय करने का श्रेय दिया जाता है।शांति वर्धन को दिया जाता है श्रेय।रंगा श्री लिटिल बैले दूप (Ranga-Sri Little Ballet Troupe) की स्थापना जनवरी 1952 में मुंबई में शांति वर्धन के मार्गदर्शन में हुई थी।वे इस समूह के संस्थापक और प्रमुख कोरियोग्राफर थेजिन्होंने शास्त्रीय भारतीय नृत्य (जैसे कथक, भरतनाट्यम) को आधुनिक बैले शैली के साथ समन्वित कर एक अनोखा सामूहिक प्रदर्शन रूप विकसित किया।यह दृष्टिकोण भारतीय लोक नाट्य परंपराओं से प्रेरित था, जहां व्यक्तिगत तारतम्य के बजाय सामूहिक समन्वय पर जोर दिया गया।संस्था का इतिहाससमूह की शुरुआत लिटिल बैले ट्रूप के नाम से हुई, जहां 'लिटिल' शब्द महत्वाकांक्षा की छोटेपन को नहींबल्कि बैले को सामूहिक कला के प्रतीक के रूप में देखने वाली क्रांतिकारी सोच को दर्शाता था।शांति वर्धन ने अपनी पत्नी गुल बर्धन (जिन्हें गुलदी भी कहा जाता था) के सहयोग से इसे स्थापित किया।शुरुआती सदस्यों में देवकी, ज्ञान, अपुनी कार्था और अभनी दासगुप्ता जैसे कलाकार शामिल हुए।पहला प्रदर्शन मुंबई के बीच कैंडी स्थित भूलाभाई देसाई की छत पर रामायण पर आधारित बैले के रूप में हुआजिसमें उस्ताद अली अकबर खान का सरोद वाद्य और लोक नृत्य शामिल थे।1964 में समूह मुंबई से ग्वालियर स्थानांतरित हो गया और रंगा श्री लिटिल बैले ट्रूप के रूप में पुनर्गठित हुआजो अब प्रशिक्षण संस्थान और प्रदर्शन कंपनी दोनों के रूप में कार्य करता था। 1984 में यह भोपाल आ गयाजहां मध्य प्रदेश सरकार ने 2 एकड़ भूमि आवंटित की। शांति वर्धन की मृत्यु 1954 में होने के बाद उनकी पत्नी गुल बर्धन ने नेतृत्व संभाला।नृत्य समन्वय की विशेषताएंशांति वर्धन ने बैले को भारतीय संदर्भ में ढाला, जहां शास्त्रीय मुद्राओं को पश्चिमी बैले की कोरियोग्राफी से जोड़ा गया।उनका कालजयी उत्पादन 'बैले रामायण' (1960) को संगीत नाटक अकादमी ने 'सदी का निर्माण' घोषित किया।इसमें ढोल, खोल, मादल जैसे भारतीय वाद्यों का उपयोग हुआ, जो लोक और शास्त्रीय का मिश्रण था।यह दृष्टिकोण भारतीय पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (IPTA) से जुड़ा था, जहां सामाजिक संदेशों को नृत्य के माध्यम से व्यक्त किया जाता था।समूह ने शास्त्रीय नृत्यों को आधुनिक सामूहिकता के साथ मिलाकर ऐसे प्रदर्शन रचे, जो व्यक्तिवादी नहीं, बल्कि समग्र थे।उदाहरणस्वरूप, रामायण में ब्रज लीला, लंबाड़ी और रूमाल जैसे लोक तत्व शास्त्रीय अभिनय से जुड़े।उपलब्धियां और विरासतरंगा श्री ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित की:थिएटर डेस नेशन, फ्रांस (1960)एडिनबर्ग फेस्टिवल, पोलैंड (1960)हॉलैंड फेस्टिवल (1960)मुंडियल फोकलोर फेस्टिवल, मैक्सिको (1968)2. दिए गए कथनों से व्यक्ति को पहचानें। [CHSL (T-I) 14 मार्च, 2023 (IV-पाली)]लोकप्रिय रूप से "किंग ऑफ पॉप" के नाम से पहचाने जाने वाले, जो सबसे ज्यादा बिकने वाले अमेरिकी गायक, गीतकार और नर्तक हैं-(a) जॉन लेनन(b) माइकल जैक्सन(c) एल्टन जॉन(d) बेनी एंडरसनCorrect Answer: (b) माइकल जैक्सनSolution:माइकल जैक्सन एक अमेरिकी गायक, गीतकार, नर्तक थे। इन्हें किंग ऑफ पॉप के रूप में जाना जाता है।माइकल जैक्सन 20वीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक हस्तियों में से एक थे।माइकल जैक्सन कई बार गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में स्थान दर्ज करा चुके हैं।पहचान का सामान्य तरीकाकथनों से व्यक्ति पहचानने के लिए मुख्य बिंदुओं पर ध्यान दें:उपनाम या विशेष शीर्षक: जैसे "किंग ऑफ पॉप" से माइकल जैक्सन की पहचान होती है।वे अमेरिकी गायक, नर्तक थे, जिनका जन्म 29 अगस्त 1958 को हुआ और मृत्यु 25 जून 2009 को। उनके पास 13 ग्रैमी अवार्ड थे।ऐतिहासिक संदर्भ: यदि कथन स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े हों, जैसे "सौ अंग्रेजों द्वारा शासन असंभव" वाला बयान, तो यह किसी क्रांतिकारी से जुड़ सकता है।परोपकारी या शिक्षाविद्: "जगन्नाथ शंकरशेठ मुर्कुट" जैसे नाम से नाना शंकर शेठ (जन्म 1803) की पहचान, जो भारतीय परोपकारी थे।बॉडी लैंग्वेज और व्यवहार से पहचानयदि कथन व्यक्ति के स्वभाव पर आधारित हों:ईमानदारी की जाँच: जो व्यक्ति शब्दों और कर्मों में सामंजस्य रखता हैआलोचना स्वीकार करता है, और "हम" शब्द का अधिक प्रयोग करता है, वह विश्वसनीय होता है।झूठ का पता: बॉडी लैंग्वेज से—जैसे आँखें न मिलाना, हाथ छिपाना या बातों में विरोधाभास। भाषा और बोलने के ढंग से भी असली स्वभाव झलकता है।3. भारतीय परमाणु कार्यक्रम का जनक किसे माना जाता है? [CHSL (T-I) 09 मार्च, 2023 (II-पाली)](a) विक्रम साराभाई(b) होमी जे. भाभा(c) सी.वी. रमन(d) वेंकटरमन राधाकृष्णनCorrect Answer: (b) होमी जे. भाभाSolution:होमी जे. भाभा एक भारतीय भौतिक वैज्ञानिक थे। जिन्हें भारतीय परमाणु कार्यक्रम का जनक कहा जाता है। इनका जन्म मुंबई के एक समृद्ध परिवार में हुआ था।प्रारंभिक जीवन और शिक्षाडॉ. होमी जहांगीर भाभा का जन्म 30 अक्टूबर 1909 को मुंबई (तत्कालीन बॉम्बे) में एक प्रमुख पारसी परिवार में हुआ था।उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से प्राकृतिक विज्ञान में ट्राइपोस और भौतिकी में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।1939 में द्वितीय विश्व युद्ध के कारण वे भारत लौट आए और यहां वैज्ञानिक अनुसंधान पर ध्यान केंद्रित किया।उन्होंने मेसॉन कण की खोज में योगदान दिया और कॉस्मिक किरणों पर कैस्केड सिद्धांत विकसित किया।प्रमुख संस्थानों की स्थापना1945 में भाभा ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) की स्थापना कीजो भारत में मौलिक अनुसंधान का केंद्र बना। स्वतंत्रता के ठीक बाद 1948 में उन्होंने परमाणु ऊर्जा आयोग (AEC) की स्थापना कीजिसके पहले अध्यक्ष वे बने। 1954 में ट्रॉम्बे (अब मुंबई) में परमाणु ऊर्जा प्रतिष्ठान (AEET) की नींव रखीजो बाद में 1966 में भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) के रूप में जाना गया।एशिया का पहला एटॉमिक रिएक्टर इसी प्रयासों से ट्रॉम्बे में स्थापित हुआ।परमाणु कार्यक्रम का विकासभाभा ने परमाणु ऊर्जा को शांतिपूर्ण उपयोग के लिए बढ़ावा दिया, जैसे बिजली उत्पादन, चिकित्सा और कृषि।उन्होंने जवाहरलाल नेहरू के साथ मिलकर भारत की वैज्ञानिक नींव मजबूत की।1955 में संयुक्त राष्ट्र के पहले परमाणु ऊर्जा सम्मेलन की अध्यक्षता की। उनका दृष्टिकोण थाभारत थोरियम-आधारित कार्यक्रम पर जोर दे, क्योंकि देश में यूरेनियम की कमी थी लेकिन थोरियम के विशाल भंडार हैं।परमाणु बम के विकास की दिशा में भी उनकी दूरदृष्टि महत्वपूर्ण रही, हालांकि पहला परीक्षण (स्माइलिंग बुद्धा, 1974) उनके निधन के बाद हुआ।उपलब्धियां और विरासतभाभा को "परमाणु युग का वास्तुकार" कहा जाता है। उनके नेतृत्व में भारत ने परमाणु तकनीक में आत्मनिर्भरता हासिल की।वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित थे और भारत को वैश्विक मंच पर मजबूत किया।दुर्भाग्य से, 24 जनवरी 1966 को एयर इंडिया की उड़ान 101 दुर्घटना में मॉन्ट ब्लांक के पास उनकी मृत्यु हो गई।उनके बाद विक्रम साराभाई और डॉ. राजा रमन्ना जैसे वैज्ञानिकों ने कार्यक्रम को आगे बढ़ाया।आज BARC और अन्य संस्थान उनकी विरासत को आगे ले जा रहे हैं।अन्य योगदानकर्ताहालांकि भाभा को जनक माना जाता है, जवाहरलाल नेहरू ने राजनीतिक समर्थन दिया।डॉ. राजा रमन्ना ने 1974 के परमाणु परीक्षण की अगुवाई की।डॉ. राजगोपाल चिदंबरम जैसे वैज्ञानिकों ने बाद के परीक्षणों (पोकhran-II, 1998) में भूमिका निभाई।4. अंतरिक्ष में जाने वाली भारतीय मूल की पहली महिला कौन थीं? [CHSL (T-I) 15 मार्च, 2023 (II-पाली)](a) कल्पना चावला(b) नागिन कॉक्स(c) सिरीशा बांदला(d) योगिता शाहCorrect Answer: (a) कल्पना चावलाSolution:अंतरिक्ष यात्रा करने वाली भारतीय मूल की प्रथम महिला कल्पना चावला थीं।इन्होंने अपनी पहली उड़ान वर्ष 1997 में कोलम्बिया स्पेस शटल से शुरू की।वर्ष 2003 में अंतरिक्ष उड़ान के दौरान कोलम्बिया स्पेस शटल आपदा में अपने सात साथियों के साथ मारी गई थीं।प्रारंभिक जीवनकल्पना चावला चार भाई-बहनों में सबसे छोटी थीं और बचपन से ही विमान और अंतरिक्ष के प्रति आकर्षित रहीं।उन्होंने करनाल के टैगोर बाल निकेतन से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की तथा 1982 में पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज, चंडीगढ़ से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में बैचलर डिग्री हासिल की।अमेरिका移移后, उन्होंने कैलिफोर्निया के सैन जोस स्टेट यूनिवर्सिटी से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में मास्टर्स (1984) और यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो से पीएचडी (1988) पूरी की।पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाकात जीन-पियर्रे हैरिसन से हुई, जिनसे उन्होंने विवाह किया।नासा में करियर1991 में नासा के अमेस रिसर्च सेंटर में काम शुरू करने के बाद, 1994 में कल्पना को नासा के जॉनसन स्पेस सेंटर में अंतरिक्ष यात्री के रूप में चुना गया।उन्होंने कठोर प्रशिक्षण लिया, जिसमें अंतरिक्ष यान संचालन, रोबोटिक्स और वैज्ञानिक प्रयोग शामिल थे। 1997 तक वे मिशन विशेषज्ञ बन चुकी थीं।पहला अंतरिक्ष मिशन (STS-87)19 नवंबर 1997 को स्पेस शटल कोलंबिया से उड़ान भरते हुए कल्पना भारतीय मूल की पहली महिला बनीं जो अंतरिक्ष पहुंचीं।STS-87 मिशन में उन्होंने प्राइमरी रोबोटिक आर्म ऑपरेटर की भूमिका निभाई तथा स्पार्टान सैटेलाइट लॉन्च किया।वे 372 घंटे अंतरिक्ष में रहीं, पृथ्वी की 252 परिक्रमाएं कीं तथा 1.84 करोड़ मील की यात्रा तय कीं। मिशन 5 दिसंबर 1997 को सफलतापूर्वक समाप्त हुआ।दूसरा मिशन और त्रासदी (STS-107)जनवरी 2003 में STS-107 मिशन पर कल्पना फिर कोलंबिया शटल से गईं।इस 16-दिवसीय मिशन में उन्होंने 80 वैज्ञानिक प्रयोग किए, जो पृथ्वी विज्ञान, तकनीक विकास और स्वास्थ्य पर केंद्रित थे।दुर्भाग्यवश, 1 फरवरी 2003 को पृथ्वी वायुमंडल में पुनः प्रवेश के दौरान शटल विघटित हो गयाजिसमें कल्पना समेत सातों चालक दल सदस्यों की मृत्यु हो गई। जांच में बाएं पंख पर क्षति मुख्य कारण पाई गई।विरासत और सम्मानकल्पना की स्मृति में नासा ने चंद्रमा पर क्रेटर, मंगल ग्रह पर रोवर का नामकरण किया तथा कई पुरस्कार स्थापित किएजैसे कांग्रेशनल स्पेस मेडल ऑफ ऑनर। भारत में करनाल में उनका स्मारक और स्टेडियम है।उनकी प्रेरणा आज भी युवाओं को अंतरिक्ष क्षेत्र में प्रोत्साहित करती है।सुनीता विलियम्स जैसी अन्य भारतीय मूल की महिलाएं बाद में गईं, लेकिन कल्पना पहली रहीं।5. लियो टॉल्स्टॉय को उनके ....... के लिए जाना जाता है। [CHSL (T-I) 15 अगस्त, 2023 (IV-पाली)](a) अभिनय(b) निर्देशन(c) नृत्य(d) उपन्यासोंCorrect Answer: (d) उपन्यासोंSolution:लियो टॉल्स्टॉय एक रूसी लेखक थे। लियो टॉल्स्टॉय को उनके उपन्यासों के लिए जाना जाता है।आज भी इन्हें दुनिया के सबसे महान लेखकों में से एक माना जाता है।जीवन परिचयलियो टॉल्स्टॉय (पूरा नाम लेव निकोलायेविच टॉल्स्टॉय) का जन्म 9 सितंबर 1828 को रूस के तुला प्रांत के यास्नाया पोल्याना नामक जागीर में एक कुलीन परिवार में हुआ था।बचपन में ही माता-पिता को खोने के बाद उनका पालन-पोषण रिश्तेदारों ने किया।उन्होंने कजान विश्वविद्यालय में कानून पढ़ा लेकिन डिग्री पूरी नहीं की।युवावस्था में जुए की लत और कर्ज ने उन्हें सेना में भर्ती होने पर मजबूर कियाजहाँ उन्होंने 1853-1856 के क्रीमियन युद्ध में भाग लिया। युद्ध के भयावह अनुभवों ने उनके विचारों को गहराई दी।प्रमुख रचनाएँटॉल्स्टॉय बहुमुखी लेखक थे—उपन्यासकार, कहानीकार, नाटककार, निबंधकार और दार्शनिक। उनकी प्रमुख कृतियाँ इस प्रकार हैं:युद्ध और शांति (1869): नेपोलियन युद्धों की पृष्ठभूमि पर आधारित यह महाकाव्य रूसी समाज के विभिन्न वर्गों, प्रेम, युद्ध, शक्ति और इतिहास में व्यक्ति की भूमिका को चित्रित करता है।इसमें सैकड़ों पात्रों का विस्तृत चरित्र-चित्रण और दार्शनिक चिंतन है।अन्ना कारेनिना (1877)एक विवाहित महिला अन्ना के प्रेम संबंधों, सामाजिक मानदंडों, नैतिकता और परिवार के विषयों पर केंद्रित। इसकी मनोवैज्ञानिक गहराई इसे क्लासिक बनाती है।अन्य उल्लेखनीय रचनाएँ: क्रॉफर्डसनो (बचपन की कहानियाँ), कैथरीन ज़ोना (किसान जीवन पर), द डेथ ऑफ इवान इलिच, द क्रिएचर और नाटकद पावर ऑफ डार्कनेस। बाद में उन्होंने धार्मिक निबंध जैसे 'अ लेटर टू अ हिंदू' लिखे।दार्शनिक विचारटॉल्स्टॉय का दर्शन अहिंसा, सादगी, मानवतावाद और सामाजिक न्याय पर आधारित था।उन्होंने हिंसा, युद्ध और संपत्ति के विरोध में जीवन जिया। रूस लौटकर उन्होंने किसानों के लिए स्कूल खोले।उनके विचारों ने महात्मा गांधी को गहराई से प्रभावित किया—गांधी ने उनकी 'किंगडम ऑफ गॉड इज विदिन यू' पढ़ी और अहिंसा की प्रेरणा ली।विरासत और प्रभावटॉल्स्टॉय को 1902-1906 तक नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया।उनकी मृत्यु 20 नवंबर 1910 को 82 वर्ष की आयु में अस्थमा और सन्यास यात्रा के दौरान हुई।आज भी उनकी रचनाएँ मानव प्रकृति, नैतिकता और समाज पर गहन अंतर्दृष्टि के लिए पढ़ी जाती हैं। वे रूसी साहित्य के शिखर पुरुष हैं।6. राज्य के उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश नियुक्त की जाने वाली पहली भारतीय महिला कौन थीं? [CHSL (T-I) 16 अगस्त, 2023 (IV-पाली)](a) किरण मजूमदार-शॉ(b) अन्ना चांडी(c) लीला सेठ(d) एम. फातिमा बीवीCorrect Answer: (c) लीला सेठSolution:लीला सेठ राज्य के किसी उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश नियुक्त की जाने वाली पहली भारतीय महिला थीं।न्यायमूर्ति लीला सेठ का जन्म लखनऊ, उत्तर प्रदेश में हुआ था।लीला सेठ देश की पहली ऐसी महिला थीं, जिन्होंने लंदन बार परीक्षा में शीर्ष स्थान प्राप्त किया।प्रारंभिक जीवनलीला सेठ का जन्म 20 अक्टूबर 1930 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था।मात्र 11 वर्ष की आयु में उनके पिता का निधन हो गयाजिसके बाद उनकी मां ने उनका पालन-पोषण किया और उच्च शिक्षा सुनिश्चित की।उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री प्राप्त की और लंदन की बार परीक्षा में प्रथम स्थान हासिल कर इतिहास रच दिया, जो भारत की पहली महिला इस उपलब्धि वाली थीं।वह कुछ वर्षों तक वकालत करने के बाद न्यायिक सेवा में आईं।कानूनी करियर की शुरुआत1977 में लीला सेठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय में वकालत शुरू की। 1978 में उन्हें दिल्ली उच्च न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश नियुक्त किया गया, जो उस समय एक क्रांतिकारी कदम था।उनकी नियुक्ति ने महिलाओं को न्यायपालिका में प्रवेश दिलाने का मार्ग प्रशस्त किया। बाद में वे विभिन्न महत्वपूर्ण मामलों में सक्रिय रहीं।उन्हें सुप्रीम कोर्ट द्वारा वरिष्ठ अधिवक्ता (सीनियर एडवोकेट) नामित करने वाली पहली महिलाओं में से एक माना जाता है।मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति5 अगस्त 1991 को लीला सेठ हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश बनीं, जो भारत के किसी राज्य उच्च न्यायालय के लिए पहली बार किसी महिला को यह पद मिला।यह नियुक्ति ऐतिहासिक थी क्योंकि तब तक उच्च न्यायालयों में महिलाओं की भागीदारी नगण्य थी। उन्होंने 22 वर्ष की सेवा के बाद 1992 में सेवानिवृत्ति ली।उनके कार्यकाल में न्यायिक निर्णयों ने सामाजिक न्याय और महिलाओं के अधिकारों को मजबूत किया।अन्य महत्वपूर्ण योगदान1997 से 2000 तक वे भारत के 15वें विधि आयोग की सदस्य रहीं, जहां उन्होंने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 में संशोधन का अभियान चलाया।इस संशोधन से पुत्रियों को पैतृक संपत्ति में पुत्रों के समान अधिकार मिला, जो लैंगिक समानता की दिशा में बड़ा कदम था।निर्भया गैंगरेप मामले (2012) के बाद गठित जस्टिस वर्मा समिति में भी उनकी भूमिका सराहनीय रही, जहां यौन अपराधों पर सख्त कानून बनाने की सिफारिशें की गईं।विरासत और निधनलीला सेठ ने महिलाओं को कानूनी क्षेत्र में प्रेरित किया; उनके बाद कई महिलाएं उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं, जैसे जस्टिस रूमा पाल।उनकी आत्मकथा "मदर-इन-लॉ" लोकप्रिय हुई। 5 मई 2017 को 86 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।उनकी उपलब्धियां आज भी न्यायपालिका में महिलाओं के सशक्तिकरण का प्रतीक हैं।7. निम्नलिखित में से किसे भारत की लौह महिला (Iron Lady of India) के नाम से जाना जाता है? [CHSL (T-I) 16 अगस्त, 2023 (IV-पाली)](a) मैरी कॉम(b) दीपिका पादुकोन(c) लता मंगेशकर(d) इंदिरा गांधीCorrect Answer: (d) इंदिरा गांधीSolution:भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भारत की 'लौह महिला' (Iron Lady of India) के नाम से जाना जाता है।इंदिरा गांधी का जन्म उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद (अब प्रयागराज) जिले में हुआ था।इंदिरा गांधी को भारत की लौह महिला कहा जाता है।प्रारंभिक जीवनइंदिरा प्रियदर्शिनी गांधी का जन्म 19 नवंबर 1917 को इलाहाबाद में हुआ था।वे भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की इकलौती संतान थीं।बचपन से ही राजनीतिक माहौल में पली-बढ़ीं, जिसने उनके व्यक्तित्व को मजबूत बनाया।उन्होंने अपनी मां कमला नेहरू की बीमारी के दौरान घर की जिम्मेदारियां संभालीं।राजनीतिक उदय1966 में वे भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। 1967 से 1977 तक लगातार तीन कार्यकाल और फिर 1980 से 1984 तक चौथा कार्यकाल पूरा किया।कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में भी सेवा की। उनके नेतृत्व ने उन्हें "गूंगी गुड़िया" से "लौह महिला" तक पहुंचाया।प्रमुख उपलब्धियां1971 का भारत-पाक युद्ध: पूर्वी पाकिस्तान को बांग्लादेश बनाया, लाखों शरणार्थियों को मुक्ति दिलाई।हरित क्रांति: कृषि उत्पादन बढ़ाकर खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की।बैंक राष्ट्रीयकरण: 1969 में 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर आर्थिक समानता लाईं।गरीबी हटाओ: 1971 चुनाव में नारा देकर भारी बहुमत जीता।विवादास्पद निर्णयआपातकाल (1975-77) लगाया, जो लोकतंत्र पर सवाल उठाता है।ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984) से पंजाब संकट सुलझाने की कोशिश की, लेकिन सिख समुदाय में आक्रोश फैला। इन फैसलों ने उनकी दृढ़ता को रेखांकित किया।विरासत और निधनउन्हें 1971 में भारत रत्न मिला। 31 अकटूबर 1984 को सिख अंगरक्षकों ने हत्या कर दी।शक्ति स्थल पर लौह अयस्क की चट्टान उनकी स्मृति में है। वे विश्व की शक्तिशाली महिलाओं में शुमार रहीं।8. वह ब्राह्मण पुजारी कौन हैं, जिन्हे बाद में रामकृष्ण परमहंस के नाम से जाना जाने लगा ? [CHSL (T-I) 03 अगस्त, 2023 (I-पाली)](a) नरेंद्र नाथ दत्ता(b) गदाधर चट्टोपाध्याय(c) श्री नारायण गुरु(d) दयानंद सरस्वतीCorrect Answer: (b) गदाधर चट्टोपाध्यायSolution:भारत के प्रसिद्ध अध्यात्मिक संत गुरु एवं विचारक गदाधर चट्टोपाध्याय को बाद में रामकृष्ण परमहंस के नाम से जाना जाने लगा।रामकृष्ण परमहंस का जन्म पश्चिम बंगाल प्रांत के कामारपुकुर ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम खुदीराम तथा माता का नाम चंद्रमणि देवी था।प्रारंभिक जीवनगदाधर चट्टोपाध्याय का जन्म 18 फरवरी 1836 को पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के कामारपुकुर गांव में एक गरीब बंगाली ब्राह्मण परिवार में हुआ था।उनके पिता खुदीराम चट्टोपाध्याय और माता चंद्रमणि देवी थे, जो अत्यंत धार्मिक और सादगीपूर्ण जीवन जीते थे।बचपन से ही गदाधर को भगवान के दर्शन होते थे; वे अक्सर समाधि अवस्था में चले जाते और नृत्य करते हुए भक्ति दिखाते। 7-8 वर्ष की आयु में उनके पिता का देहांत हो गयाजिसके बाद परिवार की जिम्मेदारी बड़े भाई रामकुमार पर आ गई।पुजारी बननाकिशोरावस्था में गदाधर अपने बड़े भाई रामकुमार के साथ कोलकाता आए।1855 में रानी रासमणि द्वारा हुगली नदी के किनारे दक्षिणेश्वर में निर्मित काली मंदिर का उद्घाटन हुआजहां रामकुमार मुख्य पुजारी बने और गदाधर को सहायक के रूप में ले गए।रामकुमार की आकस्मिक मृत्यु के बाद 1858-59 में मात्र 21 वर्ष की आयु में गदाधर ही मंदिर के मुख्य ब्राह्मण पुजारी बन गए।यहां से वे मां काली की तीव्र भक्ति में लीन हो गए; वे मंदिर में रात्रि भर जागरण कर मां से वार्तालाप करते और समाधि प्राप्त करते।आध्यात्मिक साधनाएंपुजारी के रूप में रहते हुए रामकृष्ण ने विविध साधनाओं का अनुष्ठान किया।सबसे पहले भैरवी ब्राह्मणी नामक तांत्रिक संन्यासिन ने उन्हें तंत्र साधना सिखाई, जिसमें वे मधुर भक्ति भाव में श्रीकृष्ण का दर्शन प्राप्त कर बैठे।फिर उन्होंने वेदांत, इस्लाम और ईसाई धर्म की साधनाएं भी कीं, जिससे उन्हें अनुभव हुआसभी धर्म ईश्वर तक पहुंचने के अलग-अलग मार्ग हैं। गुरु तोतापुरी के मार्गदर्शन में उन्होंने निर्विकल्प समाधि प्राप्त कीजो अद्वैत वेदांत की उच्चतम अवस्था है। लगभग 12 वर्षों तक ये साधनाएं चलती रहीं, और वे 'परमहंस' की उपाधि से विभूषित हुए।परिवार और वैवाहिक जीवन1860 के आसपास परिवार वालों ने उनकी 'उन्माद' अवस्था से चिंतित होकर उनका विवाह 5 वर्षीय शारदामणि मुखोपाध्याय (शारदा देवी) से कर दिया।शारदा मां काली की सहयोगिनी बनीं और कभी गृहस्थ जीवन की मांग नहीं की।रामकृष्ण विवाह के बाद भी दक्षिणेश्वर लौट आए और साधना जारी रखी।शिक्षाएं और दर्शनरामकृष्ण परमहंस की मुख्य शिक्षा थी - 'जितो मत तितो पथ' (जितना मुंह तितो पथ), अर्थात सभी धर्म सत्य हैं। वे कहते थे, "भगवान एक हैं, नाम और रूप भिन्न हैं।वे जाति, धर्म की सीमाओं से ऊपर उठकर सभी को ईश्वर प्राप्ति का सरल मार्ग दिखाते।उनकी वाणी सरल, भक्तिमय और अनुभव-आधारित थी। ब्रह्म समाज और अन्य सुधारकों से प्रभावित होकर भी वे हिंदू परंपराओं के प्रति अटल रहे।शिष्य और विरासतउनके प्रमुख शिष्य स्वामी विवेकानंद (नरेंद्रनाथ दत्त) थे, जिन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की।अन्य शिष्यों में स्वामी ब्रह्मानंद, तुरiyanंद आदि थे। रामकृष्ण की संगति से हजारों लोग आध्यात्मिक जागरण के साक्षी बने।उन्होंने कभी संगठन नहीं बनाया, लेकिन उनकी शिक्षाएं रामकृष्ण मठ और मिशन के रूप में आज विश्वव्यापी हैं।अंतिम वर्ष और देहावसानअंतिम वर्षों में उन्हें गले का कैंसर हुआ, लेकिन वे समाधि में लीन रहकर दर्द सहते रहे।16 अगस्त 1886 को 50 वर्ष की आयु में कश्मीरी रोड, कोलकाता में महासमाधि को प्राप्त हुए। उनके उपदेश 'श्री रामकृष्ण कथामृत' में संकलित हैं।9. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), नई दिल्ली की पहली महिला कुलपति के रूप में किसे नियुक्त किया गया था? [CHSL (T-I) 17 अगस्त, 2023 (III-पाली)](a) गीता भट(b) उत्सा पटनायक(c) जयति घोष(d) शांतिश्री पंडितCorrect Answer: (d) शांतिश्री पंडितSolution:शांतिश्री धुलीपुड़ी पंडित को देश के शिक्षण एवं शोध संस्थान जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की प्रथम महिला कुलपति के रूप में नियुक्त किया गया है।शांतिश्री उच्च शिक्षा और संकेतकों पर यूजीसी समिति, भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR) आदि संस्थानों की सदस्य भी रही हैं।प्रोफेसर शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित को जेएनयू की पहली महिला कुलपति नियुक्त किया गया।यह नियुक्ति 2022 में हुई, जब राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने शिक्षा मंत्रालय के माध्यम से उनकी नियुक्ति को मंजूरी दी।जेएनयू की स्थापना 1969 में हुई थी, लेकिन उसके 50+ वर्षों के इतिहास में यह पहली बार था जब किसी महिला को कुलपति पद सौंपा गया।प्रोफेसर ममीडाला जगदीश कुमार के बाद उन्होंने पदभार संभाला, जिन्हें यूजीसी चेयरमैन बनाया गया था।नियुक्ति का विवरणशांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित को 5 वर्ष के लिए नियुक्त किया गया, जो जेएनयू अधिनियम के नियमों के अनुसार था।नियुक्ति की घोषणा फरवरी 2022 में हुई, और वे जेएनयू की 13वीं कुलपति बनीं।इससे पहले वे सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय (Savitribai Phule Pune University) की कुलपति थीं, जहां राजनीति विज्ञान और लोक प्रशासन विभाग में प्रोफेसर थीं।शैक्षणिक पृष्ठभूमिवे जेएनयू की पूर्व छात्रा हैं, जहां से उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एमफिल और पीएचडी प्राप्त की।उनका जन्म रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में हुआ, लेकिन स्कूली शिक्षा चेन्नई से लीजहां उन्होंने राज्य स्तर पर प्रथम स्थान हासिल किया।वे तेलुगु, तमिल, मराठी, हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी, कन्नड़, मलयालम और कोंकणी जैसी कई भाषाओं की ज्ञाता हैं।करियर की शुरुआतउनका शिक्षण करियर 1988 में गोवा विश्वविद्यालय से शुरू हुआ।1993 में वे पुणे विश्वविद्यालय से जुड़ीं और बाद में वहां कुलपति बनीं। जेएनयू नियुक्ति के समय उनकी आयु लगभग 59 वर्ष थी।महत्वपूर्ण संदर्भयह नियुक्ति उस समय हुई जब जेएनयू विवादों में रहा, लेकिन प्रोफेसर पंडित को एक अनुभवी विद्वान के रूप में देखा गया।दिल्ली के दो प्रमुख केंद्रीय विश्वविद्यालयों (जेएनयू और जामिया मिलिया इस्लामिया) में तब महिलाएं कुलपति बनीं।उनकी नियुक्ति जेएनयू के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुई।10. फील्ड मार्शल के पद पर पदोन्नत होने वाले पहले भारतीय सेना अधिकारी कौन थे? [CHSL (T-I) 09 मार्च, 2023 (III-पाली)](a) सैम मानेकशॉ(b) विक्रम बत्रा(c) के.एम. करियप्पा(d) करम सिंहCorrect Answer: (a) सैम मानेकशॉSolution:सैम मानेकशॉ फील्ड मार्शल के पद पर पदोन्नत होने वाले पहले भारतीय सेना अधिकारी हैं।सैम मानेकशॉ भारतीय सेना (सेना प्रमुख) के पहले भारतीय कमांडर-इन-चीफ थे।प्रारंभिक जीवनउनके पिता एक प्रसिद्ध चिकित्सक थे। उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से पढ़ाई की और भारतीय सैन्य अकादमी (IMA) देहरादून से सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त किया।1932 में IMA के पहले बैच में शामिल होकर वे गोरखा रेजिमेंट में पहले स्नातक अधिकारी बने।सैन्य करियर की शुरुआतद्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश भारतीय सेना में सेवा की।बर्मा अभियान में बुरी तरह घायल होने के बावजूद वीरता के लिए मिलिट्री क्रॉस से सम्मानित हुए।स्वतंत्रता के बाद विभिन्न कमांड संभालीं, जैसे जम्मू-कश्मीर में डिवीजन, पूर्वी सीमा पर कोर।1969 में थल सेनाध्यक्ष बने। इंपीरियल डिफेंस कॉलेज से स्नातक होने वाले पहले भारतीय अधिकारी थे।1971 युद्ध में भूमिका1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में सेना प्रमुख के रूप में नेतृत्व किया।पूर्वी पाकिस्तान पर तेजी से हमला कर 13 दिनों में बांग्लादेश मुक्ति संभव बनाया।उनकी रणनीति ने 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों को आत्मसमर्पण कराया।इस जीत ने उन्हें 'सैम बहादुर' का खिताब दिलाया। युद्धकालीन रैंक फील्ड मार्शल का पहला लाभार्थी बने।पदोन्नति और सम्मान1 जनवरी 1973 को राष्ट्रपति वी.वी. गिरी द्वारा फील्ड मार्शल रैंक प्रदान की गई।यह पद आजीवन होता है और सेवानिवृत्ति के बाद भी बना रहता है।पद्म भूषण (1968) और पद्म विभूषण से नवाजे गए। के.एम. करियप्पा दूसरे थे, जिन्हें 1986 में मानद फील्ड मार्शल बना।बाद का जीवन और विरासतसेवानिवृत्ति के बाद वेलिंगटन में रहे। 27 जून 2008 को 94 वर्ष की आयु में वेलिंगटन के मिशन अस्पताल में निधन।उनकी साहसिकता, हास्य और नेतृत्व के लिए याद किए जाते हैं। पाकिस्तान में उनका नाम सुनकर सैनिक डरते थे।फिल्म 'सैम बहादुर' ने उनकी कहानी को लोकप्रिय बनाया। भारतीय सेना में फील्ड मार्शल रैंक अब तक केवल दो अधिकारियों को मिला।Submit Quiz1234Next »