ऋग्वेद के विभिन्न सूक्तों में 'स्तूप' शब्द का प्रयोग किया गया है, जहाँ इसका अर्थ किसी वस्तु के 'ढेर', 'शिखर' या 'ऊपरी सिरे' से संबंधित है। उस काल में 'स्तूप' का अर्थ किसी पवित्र बौद्ध निर्माण से नहीं, बल्कि यज्ञ की अग्नि की लपटों या अग्नि के ढेर के संदर्भ में प्रयुक्त हुआ था।
इसके अतिरिक्त, अथर्ववेद और वाजसनेयी संहिता में भी 'स्तूप' शब्द का प्रयोग क्रमशः 'अग्नि की शिखाओं' और 'स्तंभों के ऊपरी भाग' को दर्शाने के लिए किया गया है। बौद्ध धर्म के संदर्भ में इस शब्द का प्रयोग बाद के समय में हुआ, जब बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनके पवित्र अवशेषों को रखने के लिए अर्धगोलाकार संरचनाओं का निर्माण किया गया, जिन्हें हम आज 'बौद्ध स्तूप' के रूप में जानते हैं। यह वैदिक कालीन 'स्तूप' की अवधारणा और बौद्ध कालीन स्थापत्य के बीच के विकासवादी संबंधों को दर्शाता है।