भारतीय अर्थव्यवस्था का स्वरूप (अर्थव्यवस्था)

Total Questions: 28

1. निम्नलिखित में से कौन-सी आर्थिक प्रणालियां आमतौर पर आर्थिक नीतियां बनाने की योजना बनाने को प्राथमिकता देती हैं? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 3 दिसंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) समाजवादी और मिश्रित अर्थव्यवस्थाएं दोनों
Solution:
  • आर्थिक प्रणाली एक ऐसा साधन है, जिसके द्वारा समाज या सरकारें किसी भौगोलिक क्षेत्र या देश में उपलब्ध संसाधनों, सेवाओं और वस्तुओं को व्यवस्थित और वितरित करती हैं।
  • इसमें आमतौर पर आर्थिक नीतियां बनाने की योजना बनाने को प्राथमिकता समाजवादी और मिश्रित अर्थव्यवस्थाएं दोनों देती हैं।
  • नियोजित अर्थव्यवस्था
    • नियोजित अर्थव्यवस्था में सरकार केंद्रीय योजना आयोग के जरिए पंचवर्षीय योजनाएं बनाती है
    • जो उत्पादन लक्ष्य, वितरण और निवेश तय करती हैं। सोवियत संघ, क्यूबा और उत्तर कोरिया इसके उदाहरण हैं
    • जहां निजी क्षेत्र की बजाय राज्य सभी प्रमुख निर्णय लेता है।
    • इसका उद्देश्य सामाजिक कल्याण, असमानता कम करना और तेज विकास सुनिश्चित करना होता है।​
  • समाजवादी अर्थव्यवस्था
    • समाजवादी प्रणाली में उत्पादन के साधन राज्य के स्वामित्व में होते हैं
    • केंद्रीय प्राधिकरण आर्थिक नीतियों की रूपरेखा तैयार करता है।
    • यहां नियोजन सामूहिक हित को प्राथमिकता देता है, न कि लाभ को।
    • भारत ने स्वतंत्रता के बाद समाजवादी-प्रेरित नियोजन अपनाया, जैसे पंचवर्षीय योजनाएं।​
  • पूंजीवादी बनाम नियोजित
    • पूंजीवादी अर्थव्यवस्था (जैसे अमेरिका) में मूल्य संकेत और निजी पहल नीति निर्माण को निर्देशित करते हैं
    • नियोजन न्यूनतम होता है। नियोजित प्रणालियों में विपरीत रूप से सरकार हस्तक्षेप करती है
    • बाजार विफलताओं को रोका जा सके। मिश्रित अर्थव्यवस्थाएं (जैसे चीन आजकल) दोनों का मिश्रण अपनाती हैं।​
  • ऐतिहासिक उदाहरण
    • भारत में 1951 से 2014 तक योजना आयोग ने नियोजित विकास को बढ़ावा दिया
    • जो समाजवादी मॉडल से प्रेरित था। अब नीति आयोग सहकारी संघवाद पर जोर देता है।
    • सोवियत संघ की पंचवर्षीय योजनाओं ने वैश्विक स्तर पर नियोजन का मॉडल स्थापित किया।​

2. मांग का नियम कहता है कि, ....... के बीच एक विपरीत संबंध है। [CHSL (T-I) 17 मार्च, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (b) किसी वस्तु की मांग और उसकी कीमत
Solution:
  • मांग का नियम कहता है कि यदि मांग के अन्य निर्धारक तत्व अपरिवर्तित रहें
  • तो किसी वस्तु की मांग और उसकी कीमत के बीच एक विपरीत संबंध पाया जाता है।
  • अर्थात मांग के नियमानुसार, किसी वस्तु की कीमत में वृद्धि होने पर उसकी मांग में कमी तथा कीमत में कमी होने पर मांग में वृद्धि होगी।
  • मांग का नियम क्या है?
    • उदाहरणस्वरूप, यदि चाय की कीमत 10 रुपये प्रति कप से बढ़कर 20 रुपये हो जाती है
    • तो उपभोक्ता कम चाय खरीदेंगे, क्योंकि वे विकल्पों की ओर आकर्षित हो जाते हैं।
    • यह नियम अन्य बातें अपरिवर्तित (ceteris paribus) मानने पर लागू होता है
    • जैसे आय, स्वाद या अन्य वस्तुओं की कीमतें स्थिर रहें।​
  • विपरीत संबंध का कारण
    • यह विपरीत संबंध कई कारकों से उत्पन्न होता है:
    • प्रतिस्थापन प्रभाव: कीमत बढ़ने पर सस्ते विकल्पों की ओर रुझान।
    • आय प्रभाव: ऊंची कीमत से उपभोक्ता की क्रय शक्ति घटती है
    • जिससे मांग कम हो जाती है।
    • ह्रासमान सीमांत उपयोगिता का नियम: प्रत्येक अतिरिक्त इकाई से संतुष्टि घटती जाती है
    • इसलिए अधिक कीमत पर कम मात्रा मांगी जाती है।​
    • मांग वक्र (demand curve) हमेशा बाएं से दाएं नीचे की ओर झुका होता है, जो इस संबंध को चित्रित करता है।​
  • अपवाद और सीमाएं
    • हालांकि सामान्य रूप से विपरीत संबंध रहता है, कुछ अपवाद मौजूद हैं:
    • गिफेन वस्तुएं: गरीबों के लिए आवश्यक वस्तुएं (जैसे कम गुणवत्ता वाली रोटी), जहां कीमत बढ़ने पर मांग बढ़ जाती है
    • क्योंकि आय प्रभाव प्रतिस्थापन प्रभाव पर हावी हो जाता है।
    • वेब्लेन वस्तुएं: विलासिता की वस्तुएं (जैसे हीरे), जहां ऊंची कीमत स्थिति का प्रतीक बनती है और मांग बढ़ाती है।
    • अज्ञानता या अटकलें: उपभोक्ता कीमत वृद्धि को गुणवत्ता से जोड़ सकते हैं।​
    • ये अपवाद दुर्लभ हैं और सामान्य बाजार में नियम लागू होता है।​
  • व्यावहारिक महत्व
    • यह नियम मूल्य निर्धारण, नीति निर्माण और बाजार पूर्वानुमान में सहायक है।
    • व्यवसाय कीमतें कम कर बिक्री बढ़ा सकते हैं
    • जबकि सरकारें सब्सिडी देकर आवश्यक वस्तुओं की मांग सुनिश्चित करती हैं।
    • वर्तमान समय (जनवरी 2026) में, मुद्रास्फीति या कर नीतियां इस नियम को प्रभावित करती रहती हैं।​

3. मांग के नियम के अनुसार, किसी वस्तु के लिए उपभोक्ता की मांग ....... होनी चाहिए। [CHSL (T-I) 10 मार्च, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (d) वस्तु की कीमत से प्रतिलोमतः संबद्ध
Solution:
  • मांग का नियम बताता है
  • यदि मांग के अन्य निर्धारक तत्व (जैसे-आय, रुचि, फैशन आदि) अपरिवर्तित रहें
  • तो किसी वस्तु की मांग तथा उसकी कीमत में विपरीत संबंध होता है।
  • अथवा "वस्तु की कीमत गिरने पर वस्तु की मांग बढ़ती है
  • वस्तु की कीमत बढ़ने पर, वस्तु की मांग घटती है।
  • अतः विकल्प (d) सही उत्तर है।
  • मांग का नियम क्या है?
    • वस्तु की कीमत और उसकी मांग के बीच व्युत्क्रम संबंध होता है।
    • सरल शब्दों में, "कीमत जितनी अधिक होगी, मांग उतनी ही कम होगी
    • कीमत जितनी कम होगी, मांग उतनी ही अधिक होगी।
    • यह नियम उपभोक्ता व्यवहार को दर्शाता है
    • जहां उपभोक्ता सीमित आय में अधिकतम संतुष्टि प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।​
  • कारण क्यों लागू होता है?
    • इस नियम के पीछे मुख्यतः तीन कारण कार्य करते हैं:
    • घटती सीमांत उपयोगिता: वस्तु की प्रत्येक अतिरिक्त इकाई की उपयोगिता क्रमशः घटती जाती है
    • इसलिए उपभोक्ता कम कीमत पर अधिक मात्रा खरीदना चाहते हैं।​
    • आय प्रभाव: कीमत घटने पर उपभोक्ता की वास्तविक आय बढ़ जाती है
    • जिससे वे अधिक मात्रा खरीद पाते हैं। उदाहरणस्वरूप, यदि चीनी की कीमत ₹40 से घटकर ₹30 हो जाए
    • तो उपभोक्ता की बचत से अतिरिक्त मात्रा खरीदी जा सकती है।​
    • प्रतिस्थापन प्रभाव: कीमत घटने पर सस्ती वस्तु अन्य महंगी विकल्पों की जगह ले लेती है।​
  • मान्यताएं (अपवादों को छोड़कर)
    • नियम तभी लागू होता है जब:
    • उपभोक्ता की आय स्थिर रहे।
    • स्वाद, आदतें और फैशन अपरिवर्तित रहें।
    • संबंधित वस्तुओं (पूर्णक या प्रतिस्थापन) की कीमतें न बदलें।
    • कोई अपेक्षा परिवर्तन न हो।​
  • अपवाद और सीमाएं
    • कुछ मामलों में नियम विफल हो जाता है
    • जैसे गिफेन वस्तुएं (आवश्यकता प्रधान गरीबों की वस्तुएं, जहां कीमत बढ़ने पर भी मांग बढ़ती है
    • वीब्लेन वस्तुएं (लक्जरी आइटम, जहां ऊंची कीमत स्टेटस बढ़ाती है।
    • हालांकि, सामान्य वस्तुओं के लिए यह नियम मजबूती से लागू होता है।​

4. सरकारी बजट आगामी वित्तीय वर्ष के लिए सरकारी प्राप्तियों और सरकारी व्यय के अनुमानों का विवरण है। भारत में वित्तीय वर्ष की अवधि होती है- [CHSL (T-I) 03 अगस्त, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (b) 1 अप्रैल से 31 मार्च
Solution:
  • भारत में वित्तीय वर्ष की अवधि 1 अप्रैल से 31 मार्च होती है।
  • यह सरकारी बजट में आगामी वित्तीय वर्ष हेतु सरकारी प्राप्तियों और सरकारी व्यय के अनुमानों का विवरण होता है।
  • वित्तीय वर्ष का अर्थ
    • वित्तीय वर्ष (FY) एक 12 माह की निश्चित अवधि है
    • जिसका उपयोग सरकार, कंपनियां और व्यक्ति लेखा-जोखा, कराधान तथा आर्थिक नियोजन के लिए करते हैं।
    • भारत में यह कैलेंडर वर्ष (1 जनवरी से 31 दिसंबर) से अलग है और अप्रैल-मार्च चक्र पर आधारित है।
    • यह व्यवस्था ब्रिटिश काल से चली आ रही है, जब 1867 में इसे 1 अप्रैल से 31 मार्च कर निर्धारित किया गया था ।​
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
    • भारत में वित्तीय वर्ष की शुरुआत ब्रिटिश शासनकाल में हुई
    • जब पहले यह 1 मई से 31 मार्च तक था
    • लेकिन कृषि चक्र (फसल कटाई मार्च-अप्रैल में) और मानसून (जून-जुलाई) को ध्यान में रखते हुए इसे अप्रैल से शुरू किया गया।
    • इससे कर संग्रह और लेखा-परीक्षा में आसानी होती है।
    • स्वतंत्र भारत में भी यही प्रथा बरकरार रही
    • क्योंकि यह त्योहारी मौसम (दिवाली-अक्टूबर-नवंबर) के बाद आर्थिक गतिविधियों का आकलन करने का सही समय देता है ।​
  • बजट की भूमिका
    • सरकारी बजट अनुच्छेद 112 के तहत संवैधानिक रूप से अनिवार्य है
    • दो भागों में विभाजित होता है: राजस्व बजट (कर, गैर-कर आय और रोजाना व्यय) तथा पूंजीगत बजट (पूंजीगत व्यय, ऋण आदि)।
    • यह आगामी वित्तीय वर्ष के लिए प्राप्तियों (टैक्स, उधार) और व्यय (रक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य) के अनुमान प्रस्तुत करता है।
    • उदाहरणस्वरूप, वर्तमान में (जनवरी 2026) बजट 2026-27 वित्तीय वर्ष (1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2027) के लिए होगा ।​
  • महत्वपूर्ण तथ्य
    • बजट प्रस्तुति: केंद्रीय बजट 1 फरवरी को पेश होता है, जिससे अप्रैल से पहले नीतियां लागू हो सकें।
    • आयकर संबंध: वित्तीय वर्ष के बाद मूल्यांकन वर्ष (AY) आता है, जैसे FY 2025-26 का AY 2026-27।
    • लाभ: एकसमान लेखा अवधि से आर्थिक आंकड़ों का सटीक विश्लेषण संभव होता है, जो नीति-निर्माण में सहायक है

5. निम्नलिखित में से कौन-सा भारत में बेरोजगारी को मापने की एक पद्धति नहीं है? [CHSL (T-I) 17 अगस्त, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) मासिक स्थिति पद्धति
Solution:
  • भारत में बेरोजगारी को मापने में दैनिक, सामान्य और साप्ताहिक स्थिति पद्धति की विधियां अपनाई जाती हैं
  • जबकि इसको मापने में मासिक स्थिति पद्धति की विधि नहीं अपनाई जाती।
  • बेरोजगारी मापन की मानक पद्धतियाँ
    • भारत में बेरोजगारी मुख्य रूप से तीन विधियों से मापी जाती है:
    • सामान्य स्थिति और सहायक स्थिति: पिछले एक वर्ष की प्रमुख गतिविधि पर आधारित
    • जहाँ व्यक्ति को यदि 6 माह से अधिक समय नियोजित रहा तो रोजगार में गिना जाता है ।​
    • वर्तमान साप्ताहिक स्थिति : पिछले 7 दिनों में कम से कम एक दिन एक घंटे का काम करने पर नियोजित माना जाता है ।​
    • वर्तमान दैनिक स्थिति (Current Daily Status - CDS): पिछले दिन के 1/2 घंटे या अधिक काम पर आधारित
    • जो सबसे विस्तृत है ।​
    • ये सभी NSSO/NSO के PLFS (आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण) के तहत आते हैं, जो 2017 से वार्षिक आधार पर जारी होते हैं।
  • गैर-मानक विकल्प: NSE क्यों नहीं?
    • राष्ट्रीय स्टॉक एक्सचेंज (NSE) शेयर बाजार लेन-देन और वित्तीय बाजारों से जुड़ा है
    • बेरोजगारी सर्वेक्षण से। यह रोजगार डेटा एकत्र या विश्लेषण नहीं करता।
    • इसी प्रकार, RBI बैंकिंग डेटा प्रकाशित करता है लेकिन NSSO मुख्य एजेंसी है।
    • अन्य गैर-पद्धतियाँ जैसे नेशनल स्टॉक एक्सचेंज या श्रम मंत्रालय के विभाग बेरोजगारी मापने के लिए मानक नहीं हैं ।​
  • बेरोजगारी दर की गणना
    • बेरोजगारी दर = (बेरोजगार व्यक्तियों की संख्या / कुल श्रम शक्ति) × 100।
    • श्रम शक्ति में नियोजित और सक्रिय रूप से नौकरी तलाशने वाले बेरोजगार शामिल हैं।
    • 2022-23 PLFS के अनुसार शहरी बेरोजगारी दर ~6.5% रही ।

6. कारक लागत (Factor cost) को ....... नाम से भी जाना जाता है। [MTS (T-I) 11 सितंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) निवेश लागत
Solution:
  • कारक लागत को निवेश लागत (Factor or Input Cost) के नाम से भी जाना जाता है।
  • कारक लागत का अर्थ है- उत्पादन के सभी कारकों पर आने वाली कुल लागत
  • जिसका उपयोग वस्तु एवं सेवा के उत्पादन के लिए होता है
  • अर्थात किसी वस्तु या सेवा के उत्पादन में उपयोग किए गए उत्पादन के सभी कारकों की कुल लागत है।
  • कारक लागत की परिभाषा
    • क्योंकि बाजार मूल्य में कर और सब्सिडी के प्रभाव जुड़ जाते हैं।
    • उदाहरणस्वरूप, सकल घरेलू उत्पाद (GDP) को कारक लागत पर मापा जाता है
    • जब हम केवल उत्पादन कारकों की आय पर ध्यान केंद्रित करते हैं।​
  • अन्य नाम और समानार्थी शब्द
    • कारक लागत को निम्नलिखित नामों से भी संबोधित किया जाता है:
    • मूल्य वर्धन (Value Added): उत्पादन में सृजित नया मूल्य।​
    • उत्पादन कारकों की आय : भूमि का किराया, श्रम की मजदूरी, पूँजी का ब्याज और उद्यमी का लाभ।​
    • राष्ट्रीय आय लेखांकन में NNP at Factor Cost या राष्ट्रीय आय के रूप में जाना जाता है
    • जो GNP से मूल्यह्रास घटाकर प्राप्त होता है।​
  • महत्व और उपयोग
    • कारक लागत आर्थिक नीति निर्माण में उपयोगी है
    • क्योंकि यह सरकार को उत्पादन की वास्तविक लागत समझने में मदद करती है।
    • भारत जैसे देशों में केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (CSO) GDP को कारक लागत पर ही पहले मापता था
    • हालांकि अब बाजार मूल्य पर संक्रमण हो चुका है।
    • यह अवमूल्यन, शुद्ध कारक आय आदि की गणना में आधार प्रदान करती है।​
  • गणना सूत्र
    • कारक लागत पर NNP = GNP (बाजार मूल्य पर) - मूल्यह्रास - अप्रत्यक्ष कर + सब्सिडी।
    • यह राष्ट्रीय आय के बराबर होता है।​

7. निजीकरण की प्रक्रिया में उपायों के तीन समुच्चय शामिल हैं। निम्नलिखित में से कौन उनमें से एक नहीं है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 1 दिसंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (b) लेखा उपाय
Solution:
  • निजीकरण के उपायों का उद्देश्य सरकारी नियंत्रण को कम करते हुए निजी क्षेत्र की भूमिका को बढ़ाना है।
  • निजीकरण उपायों की प्रक्रिया में दिए गए विकल्पों में से स्वामित्व उपाय, संगठनात्मक उपाय तथा परिचालन उपाय शामिल हैं
  • जबकि लेखा उपाय इसमें शामिल नहीं है।
  • निजीकरण के तीन मुख्य उपाय
    • जैसे इक्विटी को निजी संस्थाओं को बेचना, जिससे सरकार का वित्तीय बोझ कम होता है।
    • संचालन संबंधी उपाय दक्षता बढ़ाने पर केंद्रित होते हैं
    • जिसमें नई तकनीकें अपनाना, बेहतर प्रबंधन पद्धतियाँ और कर्मचारी प्रशिक्षण आते हैं।
    • संगठनात्मक उपाय उद्यम के पुनर्गठन से जुड़े होते हैं
    • जैसे विकेंद्रीकरण, प्रबंधन परतों को कम करना और लचीली संरचना बनाना।​
  • जो उपाय शामिल नहीं है
    • इन तीनों में से "लेखांकन संबंधी उपाय" उनमें से एक नहीं है।
    • यह प्रश्न सामान्यतः प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे SSC या अन्य) में पूछा जाता है
    • जहाँ विकल्पों में स्वामित्व, संचालन, संगठनात्मक के साथ लेखांकन को गलत विकल्प के रूप में रखा जाता है
    • लेखांकन संबंधी उपाय निजीकरण की मूल प्रक्रिया का हिस्सा नहीं माने जाते
    • क्योंकि निजीकरण मुख्य रूप से स्वामित्व हस्तांतरण, संचालन सुधार और संगठनात्मक बदलाव पर जोर देता है
    • केवल लेखा-परीक्षा या वित्तीय रिकॉर्डिंग पर।​
  • निजीकरण की व्यापक प्रक्रिया
    • भारतीय संदर्भ में निजीकरण 1991 के उदारीकरण के बाद तेज़ हुआ
    • जहाँ सार्वजनिक क्षेत्र के घाटे वाले उद्यमों को निजीकरण के माध्यम से दक्ष बनाया गया।
    • इसके उद्देश्य सरकारी बोझ कम करना, प्रतिस्पर्धा बढ़ाना और दक्षता सुधारना हैं।
    • हालांकि, विभिन्न स्रोतों में निजीकरण के रूप थोड़े भिन्न हो सकते हैं
    • aजैसे पूर्ण बिक्री, PPP (सार्वजनिक-निजी भागीदारी) या फ्रैंचाइज़िंग
    • लेकिन प्रश्न के संदर्भ में तीन विशिष्ट समुच्चय ही मान्य हैं।​

8. निजीकरण के उद्देश्य के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें: [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 2 दिसंबर, 2023 (I-पाली)]

(i) यह वित्तीय अनुशासन में सुधार करता है।

(ii) यह आधुनिकीकरण की सुविधा प्रदान करता है।

(iii) यह पी.एस.यू. (PSU) के कार्य-निष्पादन को बेहतर बनाने में मदद करता है।

सही उत्तर का चयन करें।

Correct Answer: (c) (i), (ii) और (iii) सभी सत्य हैं
Solution:
  • निजीकरण का अर्थ सरकारी सेवा या परिसंपत्तियों को निजी क्षेत्र में स्थानांतरित करना है।
  • इसका उद्देश्य वित्तीय अनुशासन में सुधार, आधुनिकीकरण की सुविधा प्रदान करना और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के कार्य-निष्पादन को बेहतर बनाने में मदद करना है।
  • इसके अलावा निजीकरण के माध्यम से बेहतर दक्षता, बढ़ती प्रतिस्पर्धा तथा बाजार की गतिशीलता आदि को बढ़ावा मिलता है।
  • प्रमुख उद्देश्य
    • क्योंकि इससे घाटे वाले सार्वजनिक उद्यमों पर निर्भरता कम होती है और विनिवेश से राजस्व प्राप्त होता है।
    • यह लोक क्षेत्र की कंपनियों के कार्यभार को घटाता है
    • निजी प्रबंधन द्वारा बेहतर संचालन सुनिश्चित करता है।
    • इसके अलावा, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित कर आर्थिक विकास को गति मिलती है।​
  • दक्षता और प्रतिस्पर्धा
    • निजीकरण से सरकारी संगठनों में दक्षता बढ़ती है, क्योंकि निजी क्षेत्र लाभ-उन्मुख होता है
    • संसाधनों का इष्टतम उपयोग करता है। यह स्वस्थ प्रतिस्पर्धा पैदा करता है
    • जिससे उपभोक्ताओं को गुणवत्तापूर्ण वस्तुएं और सेवाएं सस्ते दामों पर मिलती हैं।
    • नौकरशाही तथा राजनीतिक हस्तक्षेप कम होने से निर्णय प्रक्रिया तेज और व्यावसायिक बनती है।​
  • वित्तीय लाभ
    • सरकार को निजीकरण से धन प्राप्ति होती है, जिसे शिक्षा, स्वास्थ्य या बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में लगाया जा सकता है।
    • यह राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करता है और सार्वजनिक ऋण पर निर्भरता घटाता है।
    • भारत जैसे विकासशील देशों में यह आर्थिक सुधारों का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।​
  • अन्य प्रभाव
    • निजीकरण बाजार में एकाधिकार तोड़ता है तथा नवाचार को प्रोत्साहित करता है।
    • हालांकि, इसके कुछ नुकसान जैसे रोजगार हानि भी हो सकते हैं
    • लेकिन समग्र उद्देश्य आर्थिक प्रगति है। भारत में 1991 के उदारीकरण के बाद यह नीति प्रमुख रही।​

9. पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाजार की विशेषताओं के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है? [CHSL (T-I) 14 मार्च, 2023 (IV-पाली)]

(I) बाजार में बड़ी संख्या में क्रेता और विक्रेता होते हैं।

(II) जानकारी पूर्ण होती है।

Correct Answer: (a) I और II दोनों
Solution:
  • पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाजार की विशेषता के रूप में दोनों कथन सही हैं।
  • एक पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाजार में बड़ी संख्या में क्रेता और विक्रेता मौजूद होते हैं।
  • किसी एक क्रेता या विक्रेता के पास बाजार में उत्पाद की कीमत को प्रभावित करने की शक्ति नहीं होती है।
  • सभी फर्म समरूप वस्तुओं का विक्रय करती हैं।
  • क्रेता या विक्रेता को बाजार में प्रवेश अथवा बहिर्गमन की पूर्ण स्वतंत्रता होती है तथा बाजार का पूर्ण ज्ञान होता है।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाजार की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
    • बड़ी संख्या में खरीदार और विक्रेता: बाजार में असंख्य क्रेता और विक्रेता होते हैं
    • जिससे कोई एक व्यक्ति या फर्म बाजार कीमत को प्रभावित नहीं कर पाता।
    • प्रत्येक फर्म का बाजार हिस्सा इतना छोटा होता है
    • वह कीमत निर्माता (Price Maker) नहीं, बल्कि कीमत स्वीकारकर्ता (Price Taker) होता है।​
    • समरूप या एकसमान उत्पाद: सभी फर्में एक ही प्रकार की होमोजीनियस (समान) वस्तु या सेवा बेचती हैं।
    • उत्पादों में कोई अंतर नहीं होता, इसलिए उपभोक्ता किसी एक फर्म के उत्पाद को दूसरे से बेहतर नहीं मानते।​
    • पूर्ण जानकारी: खरीदारों और विक्रेताओं को बाजार कीमत, उत्पाद की गुणवत्ता और उपलब्धता के बारे में पूर्ण ज्ञान होता है।
    • इससे तर्कसंगत निर्णय लेना संभव होता है और कोई छिपी जानकारी नहीं रहती।​
    • स्वतंत्र प्रवेश और निकास: फर्मों को उद्योग में प्रवेश या बाहर निकलने में कोई बाधा नहीं होती।
    • लंबी अवधि में, यदि लाभ हो तो नई फर्में आती हैं
    • यदि हानि हो तो फर्में बाहर चली जाती हैं, जिससे सामान्य लाभ की स्थिति बनी रहती है।​
  • अन्य महत्वपूर्ण लक्षण
    • इस बाजार में कुछ अतिरिक्त विशेषताएँ भी पाई जाती हैं जो इसे पूर्ण रूप से कुशल बनाती हैं:
    • परिवहन लागत का अभाव: सभी फर्में एक ही स्थान पर मानी जाती हैं या परिवहन लागत शून्य होती है
    • जिससे उत्पाद की कीमत हर जगह समान रहती है।​
    • पूर्ण गतिशीलता: उत्पादन के साधन (जैसे श्रम, पूँजी) एक फर्म से दूसरी में स्वतंत्र रूप से स्थानांतरित हो सकते हैं।​
    • कोई बिक्री लागत नहीं: चूँकि उत्पाद समान होते हैं और जानकारी पूर्ण होती है
    • फर्मों को विज्ञापन या ब्रांडिंग पर खर्च करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।​
  • विशेषताओं का आर्थिक महत्व
    • ये विशेषताएँ पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाजार को सामाजिक रूप से इष्टतम बनाती हैं
    • जहाँ संसाधनों का कुशल आवंटन होता है। उदाहरण के लिए
    • कृषि बाजार (जैसे गेहूँ या चावल का बाजार) कभी-कभी इसकी निकटतम मिसाल होते हैं
    • हालाँकि वास्तविक दुनिया में शुद्ध रूप से पूर्ण प्रतिस्पर्धा दुर्लभ है।
    • अपूर्ण प्रतिस्पर्धा (जैसे एकाधिकार) में ये विशेषताएँ अनुपस्थित होती हैं, जहाँ फर्में कीमतें निर्धारित कर सकती हैं।​

10. निम्नलिखित में से किसने सबसे पहले यह तर्क दिया कि उच्च घाटे की स्थिति में लोग अधिक बचत करते हैं? [CGL (T-I) 12 अप्रैल, 2022 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) डेविड रिकार्डो
Solution:
  • सर्वप्रथम डेविड रिकार्डो ने यह तर्क दिया कि उच्च घाटे की स्थिति में लोग अधिक बचत करते हैं।
  • रिकार्डो समतुल्यता का सिद्धांत
    • डेविड रिकार्डो, 19वीं शताब्दी के प्रमुख ब्रिटिश अर्थशास्त्री, ने 1817 में अपनी पुस्तक "राजनीतिक अर्थशास्त्र और कराधान के सिद्धांत" में सरकारी घाटे के प्रभाव पर चर्चा की।
    • उन्होंने प्रस्तावित किया कि जब सरकार बड़े पैमाने पर उधार लेती है
    • तो निजी व्यक्ति भविष्य में कर वृद्धि की आशंका से अधिक बचत करने लगते हैं
    • जिससे घाटे का वित्तपोषण स्वतः हो जाता है। यह "रिकार्डो समतुल्यता के नाम से जाना जाता है
    • जहां कर वृद्धि या उधार दोनों ही उपभोक्ता व्यवहार को समान रूप से प्रभावित करते हैं।
    • रिकार्डो का तर्क था कि तर्कसंगत उपभोक्ता वर्तमान खपत घटाकर बचत बढ़ाते हैं
    • क्योंकि वे जानते हैं कि सरकारी ऋण अंततः करों के माध्यम से चुकाया जाएगा।​
  • सिद्धांत का आधार और तर्क
    • उच्च बजट घाटे में सरकार या तो कर बढ़ाती है या बांड जारी कर उधार लेती है।
    • रिकार्डो के अनुसार, उधार लेने पर लोग इसे भविष्य के कर बोझ के रूप में देखते हैं
    • इसलिए वे वर्तमान में अधिक बचत करते हैं ताकि भविष्य में कर चुकाने लायक धन जमा हो।
    • उदाहरणस्वरूप, यदि सरकार 100 इकाई उधार लेती है
    • तो व्यक्ति अपनी खपत 100 इकाई कम कर बचत बढ़ा देंगे, जिससे अर्थव्यवस्था पर कुल प्रभाव शून्य रहता है।
    • यह सिद्धांत पूर्ण रोजगार वाली अर्थव्यवस्था मानता है और परफेक्ट कैपिटल मार्केट्स की धारणा पर टिका है।​
  • ऐतिहासिक संदर्भ और आलोचना
    • रिकार्डो ने नेपोलियन युद्धों के दौरान ब्रिटेन के उच्च घाटों के संदर्भ में यह विचार रखा, जब सरकारी उधार चरम पर था।
    • हालांकि, रॉबर्ट बारो और अन्य आधुनिक अर्थशास्त्रियों ने इसे पुनर्जीवित किया।
    • आलोचनाएं हैं कि वास्तविक दुनिया में लोग मिथ्या धारणाओं (fiscal illusion) के शिकार होते हैं
    • अमर नहीं होते, और उधार सीमित होता है, इसलिए बचत हमेशा समतुल्य नहीं बढ़ती।
    • कीन्सियन अर्थशास्त्री इसे अस्वीकार करते हैं, क्योंकि यह मांग को नजरअंदाज करता है।