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योग दर्शन के अनुसार, ईश्वर सृष्टि का रचयिता नहीं हैं; बल्कि एक उत्कृष्ट या ऊर्जास्वित आत्मा है जो कभी पदार्थ में विलीन हुए बिना, अस्तित्व में रही है।
योग दर्शन के अनुसार, आठ क्रियाओं द्वारा मोक्ष की प्राप्ति होती है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
(A)
(B)
(C)
(D)
(a)
1
2
3
4
(b)
(c)
(d)
विकल्प में दी गई योग-क्रियाओं तथा उनके अर्थ संबंधी सुमेलन निम्नानुसार हैं-
योग दर्शन के अनुसार, आत्मा समाधि के माध्यम से जीवन-चक्र से मुक्त हो जाती है और परमात्मा में लीन हो जाती है।
न्याय दर्शन उन सभी पदार्थों (श्रेणियों) को मानता है जो विशेषित दर्शन द्वारा स्वीकार किए जाते हैं।
न्याय दर्शन में ईश्वर को संसार का सृष्टिकर्ता मानता है। इसके अनुसार ईश्वर एक ऐसी आत्मा है, जो कर्म और पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त है।
न्याय दर्शन में ज्ञान के स्रोत यानी प्रमाण के विषय में विस्तृत रूप से चर्चा की गई है। न्याय दर्शन के अनुसार प्रमाण चार प्रकार के होते हैं- (1) प्रत्यक्ष (2) अनुमान (3) उपमान (4) शब्द।
न्याय दर्शन में तर्क के प्रयोग का जो महत्व प्रतिपादित हुआ, उससे भारतीय विद्वान प्रभावित होकर तार्किक रीति से सोचने और बहस करने की ओर उन्मुख हुए।
'वैशेषिक' प्रणाली जगत का यथार्थवादी, विश्लेषणात्मक एवं वस्तुवादी दर्शन है। यह भौतिक तत्वों के विवेचना को महत्व देता है।
वैशेषिक दर्शन ने विभिन्न प्रकार की परम वस्तुओं में अंतर करने का प्रयत्न किया है। वैशेषिक दर्शन ने 'परमाणुवाद' की स्थापना भी की है।