भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आधुनिक भारतीय इतिहास)Total Questions: 2011. 1929 में, ....... की अध्यक्षता में, कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज की मांग को औपचारिक रूप से मान लिया गया था। [CHSL (T-I) 14 मार्च, 2023 (IV-पाली), CGL (T-I) 21 जुलाई, 2023 (III-पाली), MTS (T-I) 09 मई, 2023 (II-पाली)](a) जवाहरलाल नेहरू(b) सरदार वल्लभभाई पटेल(c) सुभाष चंद्र बोस(d) महात्मा गांधीCorrect Answer: (a) जवाहरलाल नेहरूSolution:भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने लाहौर अधिवेशन में 'पूर्ण स्वराज' (पूर्ण स्वतंत्रता) का प्रस्ताव 19 दिसंबर, 1929 को पारित किया था।इस अधिवेशन की अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की थी। 31 दिसंबर, 1929 को मध्यरात्रि का घंटा बजा, कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू ने लाहौर में रावी नदी के तट पर भारतीय स्वतंत्रता का झंडा फहराया।जवाहरलाल नेहरू भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक प्रमुख नेता थे और बाद में स्वतंत्र भारत के पहले प्रधान मंत्री बने। Other Informationसरदार वल्लभभाई पटेल, जिन्हें अक्सर भारत के लोह पुरुष के रूप में जाना जाता है, एक प्रमुख राजनीतिक नेता और भारत गणराज्य के संस्थापक पिताओं में से एक थे।उनका जन्म 31 अक्टूबर, 1875 को गुजरात के नडियाद में हुआ था और 15 दिसंबर, 1950 को उनका निधन हो गया।वल्लभभाई पटेल ने ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता के लिए भारत के संघर्ष में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।वह महात्मा गांधी के करीबी सहयोगी थे और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में विभिन्न सविनय अवज्ञा आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लिया।1928 में बारडोली सत्याग्रह के नेता के रूप में, उन्होंने ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारियों द्वारा लगाए गए दमनकारी भूमि करों के खिलाफ किसानों के विरोध का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया।महात्मा गांधी, 2 अक्टूबर, 1869 को पोरबंदर, गुजरात, भारत में मोहनदास करमचंद गांधी के रूप में जन्मे, ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख नेता थे।उन्हें व्यापक रूप से महात्मा के रूप में जाना जाता है, जिसका अर्थ है, "महान आत्मा' और भारत में राष्ट्रपिता के रूप में सम्मानित हैं। गांधी का अहिंसा का दर्शन, जिसे सत्याग्रह कहा जाता है, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत बन गया और दुनिया भर में नागरिक अधिकार आंदोलनों को प्रेरित किया।सुभाष चंद्र बोस, जिन्हें नेताजी के नाम से भी जाना जाता है, ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता के लिए भारत के संघर्ष में एक प्रमुख राष्ट्रवादी नेता और स्वतंत्रता सेनानी थे।उनका जन्म 23 जनवरी, 1897 को कटक, ओडिशा, भारत में हुआ था और उनकी असामयिक मृत्यु 18 अगस्त, 1945 को हुई थी।सुभाष चंद्र बोस ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ भारतीय जनता को लामबंद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने पूर्ण स्वतंत्रता की वकालत की और इसे प्राप्त करने के लिए अधिक मुखर और उग्रवादी उपाय करने में विश्वास किया। बोस एक करिश्माई नेता और एक प्रभावशाली वक्ता थे जिन्होंने कई भारतीयों की कल्पना पर प्रभाव डाला था।12. ....... में, अपने मद्रास अधिवेशन में, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत के संविधान का मसौदा (Draft) तैयार करने के लिए एक सर्वदलीय बैठक की थी। [MTS (T-I) 03 मई, 2023 (III-पाली)](a) 1922(b) 1932(c) 1927(d) 1915Correct Answer: (c) 1927Solution:वर्ष 1927 में मद्रास में हुए कांग्रेस अधिवेशन जिसकी अध्यक्षता डॉ. एम.ए. अंसारी कर रहे थे, में दो महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए।प्रथम कांग्रेस ने साइमन कमीशन के साथ सहयोग न करने का निर्णय लिया तथा दूसरा इसमें भारत के संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए एक सर्वदलीय बैठक आयोजन किए जाने का।मई, 1928 में संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए एक समिति का गठन किया गया।भारत के संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए एक सर्वदलीय बैठक आयोजित करने का निर्णय लिया था।यह निर्णय ब्रिटिश सरकार के सिमोन कमीशन के विरोध और भारत में संविधान बनाने की भारतीय क्षमता को मान्यता देने के लिए था।इस सर्वदलीय बैठक ने एक समिति नियुक्त की थी, जिसकी अध्यक्षता मोतीलाल नेहरू ने की थीजिसने बाद में नेहरू रिपोर्ट (1928) तैयार की। यह रिपोर्ट भारत के लिए पहला व्यापक संविधान का प्रारूप थी, जिसमें डॉमिनियन स्टेटस, मौलिक अधिकारों आदि का उल्लेख था।मद्रास अधिवेशन का महत्वअधिवेशन में सभी राजनीतिक दलों को एक साथ लाने और एक साझा संविधान मसौदा तैयार करने का निर्णय लिया गया।यह एक महत्वपूर्ण कदम था जो स्वतंत्र भारत के संवैधानिक विकास की दिशा में पहला प्रयास माना जाता है।इससे पहले भारत में कोई एक संपूर्ण संविधान नहीं था।नेहरू रिपोर्ट का गठनसर्वदलीय बैठक ने एक समिति बनाई, जिसका नेतृत्व मोतीलाल नेहरू ने किया। इस समिति ने अगस्त 1928 में नेहरू रिपोर्ट प्रस्तुत कीजो भारत का पहला संविधान बनाने का प्रयास था। इस रिपोर्ट में भारत को डोमिनियन स्टेटस देने का प्रस्ताव रखा गया थायानी भारत को ब्रिटिश साम्राज्य के तहत एक स्वायत्त राष्ट्र घोषित करने का सुझाव।रिपोर्ट में नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लेख भी था, जो बाद में भारतीय संविधान की नींव बनी।इसके बाद का इतिहासनेहरू रिपोर्ट को व्यापक समर्थन नहीं मिला, खासकर मुस्लिम लीग ने इसे स्वीकार नहीं किया। परन्तु यह प्रयास भारतीय संविधान के विकास के लिए मील का पत्थर था।बाद में 1946 में संविधान सभा गठित की गई, जिसने 1950 में वर्तमान संविधान को अपनाया। मद्रास अधिवेशन और उसके बाद की रिपोर्टें स्वतंत्र भारत के संविधान के निर्माण में आधारशिला साबित हुईं।इस प्रकार, मद्रास अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा भारतीय संविधान के मसौदे की तैयारी के लिए सर्वदलीय बैठक आयोजित करनास्वतंत्रता संग्राम में संवैधानिक आंदोलन की महत्वपूर्ण घटना थी, जिसने बाद में भारतीय संविधान सभा द्वारा संविधान तैयार करने की प्रक्रिया की नींव रखी.13. बदरुद्दीन तैयबजी ने सन् ....... में अध्यक्ष के रूप में कांग्रेस को संबोधित किया था। [MTS (T-I) 13 जून, 2023 (II-पाली)](a) 1886(b) 1888(c) 1887(d) 1885Correct Answer: (c) 1887Solution:बदरुद्दीन तैयबजी ने 1887 में मद्रास में हुए कांग्रेस के तीसरे अधिवेशन में अध्यक्ष के रूप में संबोधित किया था।वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पहले मुस्लिम अध्यक्ष थे।वह एक प्रमुख वकील और बॉम्बे बार एसोसिएशन के सदस्य थे।उन्होंने 1887 में कांग्रेस सत्र की अध्यक्षता की, जो मद्रास (अब चेन्नई) में आयोजित किया गया था। अपनी अध्यक्षता के दौरान, उन्होंने भारत में विभिन्न समुदायों और क्षेत्रों के बीच एकता की आवश्यकता पर जोर दिया। तैयबजी ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और स्वदेशी आंदोलन के समर्थक थे। Other Informationबदरुद्दीन तैयबजी 1885 में कांग्रेस के अध्यक्ष नहीं थे। उस वर्ष, कांग्रेस की अध्यक्षता आनंद चार्लू ने की थी।बदरुद्दीन तैयबजी 1886 में कांग्रेस के अध्यक्ष थे, लेकिन उन्होंने उस सत्र के दौरान कांग्रेस को संबोधित नहीं किया था।बदरुद्दीन तैयबजी एक प्रमुख वकील और बॉम्बे बार एसोसिएशन के सदस्य थे। उनकी अध्यक्षता का अधिवेशन 1887-88 तक चला।इस अधिवेशन में उन्होंने भारतीय कांग्रेस को भारत के सभी समुदायों के प्रतिनिधि के रूप में परिभाषित किया और सभी वर्गों तथा समुदायों के बीच एकता की आवश्यकता पर जोर दिया।वे स्वदेशी आंदोलन के समर्थक थे और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।उनका क़ानूनी करियर भी उल्लेखनीय था। वे बॉम्बे हाई कोर्ट के पहले मुस्लिम जज बने और अपने न्यायसंगत फैसलों के लिए प्रसिद्ध हुए।उनके कार्यकाल में उन्होंने जाति, समुदाय और क्षेत्रीय मतभेदों को दूर कर एक साझा राष्ट्रीय आंदोलन को बुलंद किया।उनके अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने यह स्पष्ट किया कि कांग्रेस किसी एक वर्ग या समुदाय का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि देश के सभी हिस्सों का प्रतिनिधि है।इस प्रकार, बदरुद्दीन तैयबजी ने 1887 में कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में देश की विभिन्न जातियों और समुदायों को जोड़ने का प्रयास कियाभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को एक धर्मनिरपेक्ष तथा समावेशी आंदोलन बनाने में सहायक सिद्ध हुए। यह उनका एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और सामाजिक योगदान था.14. 1939 के त्रिपुरी कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव में, पट्टाभि सीतारमैया (Pattabhi Sitaramayya) हार गए थे। [MTS (T-I) 13 सितंबर, 2023 (I-पाली)](a) राजेंद्र प्रसाद(b) सुभाष चंद्र बोस(c) जवाहरलाल नेहरू(d) महात्मा गांधीCorrect Answer: (b) सुभाष चंद्र बोसSolution:1939 के प्रसिद्ध त्रिपुरी संकट में, सुभाष चंद्र बोस ने पट्टाभि सीतारमैया को हराया था।सीतारमैया को महात्मा गांधी का समर्थन प्राप्त था। हालांकि, बाद में सुभाष चंद्र बोस ने त्यागपत्र दे दिया और राजेंद्र प्रसाद अध्यक्ष बने थे।1939 के त्रिपुरी अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए हुए चुनाव में डॉ. पट्टाभि सीतारमैया को सुभाष चंद्र बोस ने हरा दिया। यह चुनाव 29 जनवरी 1939 को हुआजिसमें बोस को 1580 वोट मिले जबकि सीतारमैया को 1377 वोट प्राप्त हुए। सुभाष चंद्र बोस 1938 हरिपुर अधिवेशन में निर्विरोध अध्यक्ष चुने गए थे और त्रिपुरी (मध्य प्रदेश के जबलपुर के पास) में लगातार दूसरी बार चुनाव लड़ रहे थे।उम्मीदवारों का चयन और गांधी का समर्थनमहात्मा गांधी ने शुरू में मौलाना अबुल कलाम आजाद को अध्यक्ष बनाना चाहा, लेकिन उन्होंने नाम वापस ले लिया।इसके बाद जवाहरलाल नेहरू को मनाने की कोशिश की गई, जो असफल रही।अंततः गांधी ने आंध्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी के नेता डॉ. पट्टाभि सीतारमैया को अपना उम्मीदवार बनाया, जो एक प्रमुख गांधीवादी और चिकित्सक थे।चुनाव से पहले सरदार वल्लभभाई पटेल सहित कांग्रेस कार्यसमिति के 7 सदस्यों ने बोस से नाम वापस लेने की अपील की ताकि सीतारमैया निर्विरोध चुने जाएं।चुनाव परिणाम और गांधी की प्रतिक्रियाचुनाव में बोस को बंगाल, मैसूर, उत्तर प्रदेश, पंजाब और मद्रास से मजबूत समर्थन मिला, जिससे उनकी जीत हुई।गांधी ने सीतारमैया की हार को अपनी व्यक्तिगत हार बताया और कहा कि "पट्टाभि की हार मेरी हार है"।अधिवेशन में पारित प्रस्ताव के बावजूद गांधी ने कार्यसमिति के सदस्यों के नाम सुझाने से इंकार कर दिया, जिससे बोस को समिति गठित करने में कठिनाई हुई।परिणाम और त्रिपुरी संकटबोस की जीत के बावजूद गांधी और उनके समर्थकों के असहयोग से तनाव बढ़ा। अप्रैल 1939 में बोस ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दियामई में कांग्रेस के अंदर फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की। इसके बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद को नया अध्यक्ष चुना गया।यह घटना कांग्रेस में गांधीवादी मध्यमार्गी गुट और बोस के उग्रवादी दृष्टिकोण के बीच गहरे विभाजन को उजागर करती है।15. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अंतिम लक्ष्य के रूप में स्व-शासन या 'स्वराज'- यह घोषणा दादाभाई नौरोजी ने आई. एन.सी. (INC) के निम्नलिखित में से किस अधिवेशन में की थी ? [CGL (T-I) 20 जुलाई, 2023 (IV-पाली), MTS (T-I) 06 सितंबर, 2023 (III-पाली)](a) बांकीपुर(b) बॉम्बे(c) कलकत्ता(d) मद्रासCorrect Answer: (c) कलकत्ताSolution:भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन, 1906 में प्रथम बार 'स्वराज' शब्द दादाभाई नौरोजी द्वारा व्यक्त किया गया था।दादाभाई नौरोजी ने 'स्वराज' शब्द की व्याख्या करते हुए इसे कलकत्ता अधिवेशन, 1906 में ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का लक्ष्य बताया था।दादाभाई नौरोजी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता सत्र, वर्ष 1906 में, स्व-शासन या 'स्वराज' को कांग्रेस का अंतिम लक्ष्य घोषित किया था।यह घोषणा एक महत्वपूर्ण मोड़ थी क्योंकि इसने कांग्रेस के उद्देश्य को सुधारों की मांग से उठाकर पूर्ण स्वशासन की मांग तक ले जाया।दादाभाई नौरोजी ने इस सत्र की अध्यक्षता करते हुए कहा कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का लक्ष्य ब्रिटेन या ब्रिटिश उपनिवेशों की तरह स्व-शासन प्राप्त करना है।यह घोषणा भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक स्पष्ट दिशा और राजनीतिक उद्देश्य दी, जिससे आंदोलन में नई ऊर्जा आई और स्वराज का विचार व्यापक रूप से लोकप्रिय हुआ।कलकत्ता का 1906 का अधिवेशन इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि यह बंगाल के विभाजन के खिलाफ राष्ट्रव्यापी विरोध की परिणति थी।इस सत्र में स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत भी हुई, जिसका मकसद विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं को प्रोत्साहित करना था।दादाभाई नौरोजी के नेतृत्व में यह सत्र नरमपंथी और उग्रवादी दोनों गुटों के बीच एक समझौते जैसा भी थाजिसमें चरमपंथियों ने स्वराज, स्वदेशी और राष्ट्रीय शिक्षा के लिए जोर दिया।इस सत्र ने कांग्रेस के राजनीतिक एजेंडे को व्यापक कर दिया और देसी राष्ट्रीयता का समर्थन बढ़ाया।'स्वराज' की यह घोषणा बाद के वर्षों में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की नींव बनी, जिसे गांधीजी, लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक जैसे अन्य नेताओं ने आगे बढ़ाया।संक्षेप में, दादाभाई नौरोजी ने 1906 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में स्वराज को कांग्रेस का अंतिम लक्ष्य घोषित किया, जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था16. निम्नलिखित में से किस संगठन की स्थापना 1885 में हुई थी? [CGL (T-1) 27 जुलाई, 2023 (1-पाली)](a) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस(b) मुस्लिम लीग(c) ईस्ट इंडिया संगठन(d) भारतीय कम्युनिस्ट पार्टीCorrect Answer: (a) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसSolution:प्रश्नगत विकल्पों में से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) 1885 ई. में स्थापित सबसे पुराना राजनीतिक दल हैजिसमें कई बार विभाजन हुआ है। इसकी स्थापना ए.ओ. ह्यूम द्वारा की गई थी, जो एक अवकाश प्राप्त ब्रिटिश अधिकारी थे।यद्यपि संगठित राजनीतिक प्रयासों का शुभारंभ करने वाली पहली राजनीतिक संस्था लैंड होल्डर्स सोसायटी (1838 ई.) थी।भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 में एलन ऑक्टेवियन ह्यूम, दादाभाई नौरोजी, दिनशों वाचा और अन्य लोगों द्वारा की गई थी।भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का उद्देश्य ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ भारतीय लोगों को एकजुट करना और संगठित करना और भारतीय हितों और अधिकारों को बढ़ावा देना था।ब्रिटेन से भारत की आजादी का नेतृत्व करने के अतिरिक्त, कांग्रेस का पूरे ब्रिटिश साम्राज्य में अन्य उपनिवेशवाद-विरोधी राष्ट्रवादी आंदोलनों पर बड़ा प्रभाव पड़ा। Other Information भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना 1925 में हुई थी और यह मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा से प्रभावित थी। इसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और उसके बाद की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।मुस्लिम लीग की स्थापना 1906 में भारतीय मुसलमानों के हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए की गई थी, जिन्हें मुख्य रूप से हिंदू कांग्रेस में हाशिए पर जाने का डर था। लीग ने बाद में एक अलग मुस्लिम राज्य की मांग की, जिसके कारण 1947 में भारत का विभाजन हुआ।ईस्ट इंडिया कंपनी एक ब्रिटिश व्यापारिक और औपनिवेशिक संगठन था जिसने 1600 से 1800 के दशक तक भारत में एक प्रमुख भूमिका निभाई।हालांकि कंपनी 1885 से काफी पहले, 1858 में भंग कर दी गई थी।17. कांग्रेस और मुस्लिम लीग के किस अधिवेशन में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक संयुक्त मोर्चा बनाने के लिए सहमति बनी थी ? [CGL (T-I) 27 जुलाई, 2023 (III-पाली), CHSL (T-I) 17 मार्च, 2023 (I-पाली)](a) इलाहाबाद(b) लखनऊ(c) बंबई(d) दिल्लीCorrect Answer: (b) लखनऊSolution:कांग्रेस और मुस्लिम लीग के लखनऊ (1916 ई.) अधिवेशन में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक संयुक्त मोर्चा बनाने के लिए सहमति बनी ताकि संवैधानिक सुधारों की एक ही योजना अपनाई जा सके।इसके फलस्वरूप जारी 19 स्मरण-पत्र' में दोनों दलों के समकालीन राजनैतिक विचारों को साकार रूप दिया गया।ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक संयुक्त मोर्चा बनाने के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के बीच सहमति "लखनऊ समझौता" के दौरान दिसंबर 1916 में बनी थी।यह समझौता लखनऊ में दोनों संगठनों के संयुक्त अधिवेशन में हुआ था, जिसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है।लखनऊ समझौते का परिचयलखनऊ समझौता दिसंबर 1916 में लखनऊ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग द्वारा आयोजित संयुक्त अधिवेशन में हुआ।इस अधिवेशन में दोनों पक्षों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक संयुक्त मोर्चा बनाने पर सहमति दी।यह पहली बार था जब हिंदू और मुसलमान राजनीतिक सुधारों तथा स्वतंत्रता के लिए एक साथ आए थे।इस समझौते के तहत धार्मिक अल्पसंख्यकों को प्रांतीय विधानसभाओं में भागीदारी देने और उनके अधिकारों की सुरक्षा का प्रावधान किया गया था।मुस्लिम लीग ने कांग्रेस के नेतृत्व वाले स्वतंत्रता अभियान में शामिल होने के लिए सहमति दी, जिससे ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध भारतीय राजनीतिक एकता की नींव पड़ी।राजनीतिक और सामाजिक महत्वलखनऊ समझौते से हिन्दू-मुस्लिम एकता बढ़ी और यह भारत में स्वशासन (होम रूल) के विचार को प्रबल बनाने वाला कदम था।इस समझौते ने भारतीय राजनीतिक दलों के बीच सहयोग के नए आयाम स्थापित किए, जिससे ब्रिटिश सरकार को एक मजबूत राष्ट्रीय आंदोलन का सामना करना पड़ा।यह समझौता कांग्रेस के विभिन्न गुटों (उदारवादी और कट्टरपंथी) को भी एकजुट करने में सहायक रहा। लखनऊ अधिवेशन का अध्यक्ष अंबिका चरण मजुमदार थेइस सत्र ने पूरे ब्रितानी भारत में राजनीतिक सक्रियता और विश्वास को बढ़ावा दिया कि भारत को स्वशासन मिल सकता है।समझौते के प्रमुख बिंदुदोनों पक्षों ने भारत के प्रांतीय विधानसभाओं में धार्मिक अल्पसंख्यकों को उचित भागीदारी देने पर सहमति जताई।भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक संयुक्त राष्ट्रीय आंदोलन चलाने का निर्णय किया।सभी प्रांतों को स्वशासन देने और कार्यपालिका तथा न्यायपालिका को अलग करने की मांग की गई।लखनऊ समझौते ने हिंदू-मुस्लिम समन्वय और सहयोग का एक नया युग स्थापित किया।यह समझौता भारतीय राष्ट्रीय आंदोलनों में हिंदू-मुस्लिम एकता के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ थाइसे स्वतंत्रता संग्राम में आगे बढ़ने के लिए एक मजबूत बुनियाद माना गया। यह संगठनों के बीच पहला संयुक्त प्रयास था जो बाद में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच राजनीतिक सहयोग का संदर्भ बना.18. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दूसरा वार्षिक अधिवेशन निम्नलिखित में से किस स्थान पर आयोजित किया गया था? [CHSL (T-I) 11 अगस्त, 2023 (II-पाली)](a) कलकत्ता(b) बंबई(c) मद्रास(d) दिल्लीCorrect Answer: (a) कलकत्ताSolution:भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का पहला अधिवेशन (1885) बॉम्बे में, और दूसरा वार्षिक अधिवेशन (1886) कलकत्ता में आयोजित किया गया था, जिसकी अध्यक्षता दादाभाई नौरोजी ने की थी।इस अधिवेशन की अध्यक्षता दादाभाई नौरोजी ने की थी। यह अधिवेशन कांग्रेस के पहले अधिवेशन के बाद हुआ थाजो 1885 में बोम्बे (मुंबई) में आयोजित हुआ था।दूसरे अधिवेशन में कांग्रेस के सदस्य अपनी गतिविधियों को और अधिक संगठित करने लगे और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की शुरुआत यहाँ से और भी प्रभावी हुई।इस अधिवेशन में कांग्रेस को एक स्थायी राजनीतिक संगठन के रूप में विकसित करने की दिशा में कदम बढ़ाए गए।इसमें 436 प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जो पहली सभा की तुलना में अधिक थाइसमें कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए जो बाद में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए आधार बने। यह अधिवेशन भारतीय जनता के बीच राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने में सहायक रहा।दादाभाई नौरोजी, जो इस अधिवेशन के अध्यक्ष थे, वे पहली बार इस पद पर चयनित हुएउन्होंने भारतीय राजनीतिक परिप्रेक्ष्य को नई दिशा प्रदान की।यह अधिवेशन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जाता हैक्योंकि इसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के शुरुआती चरणों में संगठनात्मक मजबूती मिली। जिसकी अध्यक्षता दादाभाई नौरोजी ने की, और यह अधिवेशन कांग्रेस के विस्तार और राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने में अहम रहा.19. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना तब हुई थी जब दिसंबर 1885 में देश भर के ....... प्रतिनिधि बंबई (मुंबई) में मिले थे। [CHSL (T-I) 13 मार्च, 2023 (I-पाली), CHSL (T-I) 03 अगस्त, 2023 (I-पाली), MTS (T-I) 02 मई, 2023 (I-पाली) MTS (T-I) 20 जून, 2023 (I-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 22 नवंबर, 2023 (I-पाली)](a) 34(b) 156(c) 108(d) 72Correct Answer: (d) 72Solution:भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 ई. में ए.ओ. ह्यूम द्वारा की गई थी, जो एक अवकाश प्राप्त ब्रिटिश अधिकारी थे।इसका पहला अधिवेशन 28 दिसंबर, 1885 को बंबई स्थित गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में आयोजित किया गया।इसमें कुल 72 प्रतिनिधियों ने प्रतिभाग किया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पहले अधिवेशन की अध्यक्षता व्योमेश चंद्र बनर्जी ने की थी तथा इसके प्रथम महासचिव स्वयं ए.ओ. ह्यूम थे।भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 28 दिसंबर 1885 को 72 प्रतिनिधियों के एक समूह द्वारा की गई थी। पहला सत्र बंबई (अब मुंबई) के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में आयोजित किया गया था।एक सेवानिवृत्त ब्रिटिश सिविल सेवक, ए.ओ. ह्यूम ने भारतीयों को अपनी चिंताओं को व्यक्त करने के लिए एक मंच प्रदान करने के लिए की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।वोमेश चंद्र बनर्जी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पहले अध्यक्ष थे।ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, समय के साथ ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए विकसित हुआ। Other Informationए.ओ. ह्यूम की भूमिका:ए.ओ. ह्यूम ने भारतीयों और ब्रिटिश प्रशासन के बीच की खाई को पाटने के लिए INC की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसका उद्देश्य बातचीत के माध्यम से अशांति को रोकना था। उन्हें अक्सर "भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पिता" के रूप में जाना जाता है। INC के प्रारंभिक लक्ष्य: INC का उद्देश्य शिक्षित भारतीयों के बीच नागरिक और राजनीतिक बातचीत के लिए एक मंच बनाना था। प्रारंभिक मांगें प्रशासनिक सुधारों और सरकारी सेवाओं में भारतीयों के लिए अधिक प्रतिनिधित्व तक सीमित थीं।प्रमुख प्रारंभिक नेता: प्रारंभिक नेताओं में दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले और वोमेश चंद्र बनर्जी जैसे लोग शामिल थे।इन नेताओं ने संवैधानिक तरीकों और ब्रिटिश सरकार के साथ बातचीत पर जोर दिया। INC का विकास:समय के साथ, INC एक सुधारवादी संगठन से पूर्ण स्वतंत्रता के लिए एक जन आंदोलन में बदल गया।20वीं सदी की शुरुआत तक, बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल जैसे नेताओं ने अधिक मुखर रुख अपनाया।INC और स्वतंत्रता संग्राम: INC ने असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन जैसे प्रमुख आंदोलनों में केंद्रीय भूमिका निभाई। इसने अंततःमहात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्रता दिलाई।20. लखनऊ समझौता के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है? [CHSL (T-I) 13 मार्च, 2023 (IV-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 20 नवंबर, 2023 (II-पाली)]I. इस पर वर्ष 1916 में हस्ताक्षर किए गए थे। II. यह कांग्रेस के मध्यमार्गी और आमूल परिवर्तनवादी गुटों के बीच हुआ समझौता था।(a) I और II दोनों(b) न तो I और न ही II(c) केवल I(d) केवल IICorrect Answer: (a) I और II दोनोंSolution:दिसंबर, 1916 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 'लखनऊ' अधिवेशन आयोजित हुआ।जिसमें कांग्रेस और मुस्लिम लीग के मध्य एक समझौता हुआ जिसे 'लखनऊ समझौता' या 'कांग्रेस-लीग समझौता' के नाम से जाना जाता है।इसी अधिवेशन में कांग्रेस के दो धड़ों मध्यमार्गी (नरम दल) और अमूल परिवर्तनवादी (गरम दल) का पुनर्मिलन हुआ।कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन की अध्यक्षता अंबिका चरण मजूमदार ने की थी।लखनऊ समझौता दिसंबर 1916 में हुआ था, इस समझौते में दोनों दलों ने मिलकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ एकजुट होकर प्रतिनिधि सरकार के लिए काम करने का निर्णय लिया।यह समझौता हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच पहली बार बड़े राजनीतिक मंच पर एकता का प्रतीक माना जाता है।लखनऊ समझौते का इतिहास और पृष्ठभूमि1916 में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेताओं ने लखनऊ में एक साथ अपनी वार्षिक बैठकों का आयोजन किया।उस समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर नरमपंथी और गरमपंथी गुट भी आपस में एक हुए। बाल गंगाधर तिलक ने कांग्रेस का नेतृत्व कियाजबकि मुस्लिम लीग का नेतृत्व मुहम्मद अली जिन्ना ने किया। यह समझौता ब्रिटिश शासन के बाद भारत में स्वशासन की मांग को लेकर हुआजहां दोनों पक्षों ने मिलकर हिंदू और मुस्लिम समुदायों के हितों और प्रतिनिधित्व की मांग की।लखनऊ समझौते की मुख्य विशेषताएंकांग्रेस ने मुस्लिम लीग की मांगों को मानते हुए अलग निर्वाचक मंडलों को स्वीकार किया, जिससे मुस्लिमों को निश्चित प्रतिनिधित्व मिला।विधान परिषदों में हिंदू और मुसलमानों को समान संख्या में सीटें दी गईं।दोनों संस्थाओं ने मिलकर अधिक स्वशासन और भारतीयों के लिए प्रशासनिक भागीदारी की मांग की।यह पहली बार था जब कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने संयुक्त सत्र में मिलकर अपने साझा राजनीतिक लक्ष्यों को निर्धारित किया।नरमपंथी, गरमपंथी और मुस्लिम लीग को एक साथ लाकर यह एक व्यापक राजनीतिक मंच बना।महत्व और परिणामलखनऊ समझौते ने हिंदू-मुस्लिम एकता के द्वार खोल दिए और इसका प्रभाव 1920 के खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन सहित स्वतंत्रता संग्राम के बाद के आंदोलनों पर पड़ा।यह समझौता ब्रिटिश सरकार के सामने भारतीय राजनीतिक दलों की एकता का संदेश था, जिसने भविष्य में राजनीतिक सुधारों को भी प्रभावित किया।समझौते की तारीखेंकांग्रेस ने लखनऊ समझौते को 29 दिसंबर 1916 को अपने अधिवेशन में अपनाया।मुस्लिम लीग ने इसे 31 दिसंबर 1916 को अपनाया।इस प्रकार लखनऊ समझौता 1916 में दो प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच एक ऐतिहासिक राजनीतिक गठबंधन थाजिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में हिंदू-मुस्लिम सहयोग की नींव रखी और स्वशासन की ओर महत्वपूर्ण कदम बढ़ाए.Submit Quiz« Previous12