मुद्रा एवं बैंकिंग (अर्थव्यवस्था) (भाग-I)

Total Questions: 50

21. भारत में कौन-सा नियामक निकाय माइक्रोफाइनेंस संस्थानों की देखरेख करता है? [CHSL (T-I) 02 अगस्त, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (b) भारतीय रिजर्व बैंक (RBI)
Solution:
  • भारत में सूक्ष्म वित्त संस्थान अर्थात माइक्रोफाइनेंस संस्थान (MFI) उन लोगों को ऋण प्रदान करती है
  • जो समाज के वंचित वर्गों से हैं तथा जिनके पास बैंकिंग सुविधाओं तक पहुंच उपलब्ध नहीं है।
  • ध्यातव्य है कि भारतीय रिजर्व बैंक इस संस्थानों की देखरेख करता है।
  • RBI की भूमिका
    • RBI ने 2011 में माइक्रोफाइनेंस क्षेत्र को विनियमित करने के लिए श्रेणी स्थापित
    • जिसे 2014 में मजबूत दिशानिर्देशों के साथ अपडेट किया गया।
    • यह संस्थान कम आय वाले परिवारों, विशेष रूप से ग्रामीण महिलाओं को छोटे ऋण प्रदान करते हैं
    • RBI ब्याज दरों (36% प्रति वर्ष की अधिकतम सीमा), ऋण पुनर्भुगतान (12 महीने की अवधि
    • एक से अधिक ऋण प्रतिबंध और ग्राहक शिकायत निवारण तंत्र जैसे नियम लागू करता है।
    • RBI एक समर्पित विभाग के माध्यम से इनकी निगरानी करता है
    • जिसमें नियमित निरीक्षण, ऑडिट और अनुपालन जांच शामिल हैं।​
  • प्रमुख दिशानिर्देश
    • पंजीकरण आवश्यकता: MFIs को NBFC-MFI के रूप में RBI के साथ पंजीकृत होना पड़ता है
    • जिसमें न्यूनतम नेट ओन्ड फंड्स (₹10 करोड़) की शर्त है।
    • ऋण सीमाएं: एक उधारकर्ता को कुल बकाया ऋण ₹2 लाख तक सीमित रखा जाता है
    • आय के 50% से अधिक ऋण नहीं दिया जा सकता।
    • रेटिंग और पारदर्शिता: MFIs को क्रेडिट रेटिंग रखनी होती है
    • ब्याज दरें तथा शुल्क स्पष्ट रूप से बताए जाते हैं।
    • 2022 के नए नियम: RBI ने माइक्रोफाइनेंस ऋणों के लिए अलग ढांचा जारी किया
    • जिसमें संपार्श्विक-मुक्त ऋण और जमा खाते पर ग्रहणाधिकार प्रतिबंध शामिल हैं।​
  • अन्य संबंधित निकाय
    • नाबार्ड (NABARD) माइक्रोफाइनेंस को प्रोत्साहन देता है
    • जैसे SHG-BLP के माध्यम से, लेकिन नियामक नहीं है। सेबी या IRDAI जैसे अन्य नियामक MFIs से सीधे जुड़े नहीं हैं।
    • SEC (Section 8 कंपनियां) या सोसाइटियां राज्य रजिस्ट्रार के अधीन होती हैं, लेकिन बड़े MFIs RBI के दायरे में आते हैं।​
  • चुनौतियां और प्रभाव
    • RBI की निगरानी ने अंध्र प्रदेश संकट (2010) जैसी घटनाओं के बाद क्षेत्र को स्थिर किया है
    • लेकिन ओवर-लेंडिंग और उच्च NPAs जैसी समस्याएं बनी रहती हैं।
    • 2023 तक, माइक्रोफाइनेंस पोर्टफोलियो ₹3.93 लाख करोड़ तक पहुंच गया, जो वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देता है।​

22. असत्य कथन की पहचान कीजिए। [CHSL (T-I) 02 अगस्त, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (a) सेबी (SEBI) अर्थव्यवस्था में मुद्रा की पूर्ति को विनियमित करने के लिए खुले बाजार की क्रियाएं करती है।
Solution:
  • भारतीय रिजर्व बैंक साख के नियंत्रण हेतु अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति को विनियमित करने हेतु खुले बाजार की क्रियाएं (शेयरों की खरीद-बिक्री) करती है।
  • ध्यातव्य है कि RBI द्वारा साख का नियंत्रण मुख्यतः दो विधियों द्वारा किया जाता है, जो हैं-
  • मात्रात्मक साख नियंत्रण उपकरण
  • गुणात्मक साख नियंत्रण उपकरण
  • अतः कथन (a) असत्य है।
  • वृत्त से संबंधित उदाहरण
    • वृत्त ज्यामिति का महत्वपूर्ण अध्याय है।
    • एक सामान्य प्रश्न इस प्रकार है: निम्नलिखित में से असत्य कथन चुनिए—
    • वृत्त के किसी भी बिंदु पर कई छेदक रेखाएँ खींची जा सकती हैं (सत्य: अनंत संभव)।
    • वृत्त के बिंदु पर केवल एक स्पर्शरेखा होती है (सत्य)।
    • जीवा वृत्त के दो बिंदुओं को जोड़ने वाली रेखाखंड है (सत्य)।
    • वृत्त के अंदर के बिंदु से केवल दो स्पर्शरेखाएँ खींची जा सकती हैं
    • असत्य: अंदर से कोई स्पर्शरेखा नहीं खिंचती, केवल छेदक रेखाएँ बनती हैं)।
    • यहाँ D असत्य है क्योंकि स्पर्शरेखा वृत्त के बाहर या उसके बिंदु से ही संभव होती है।​
  • गणित सिद्धांत उदाहरण
    • गणित के स्वरूप पर प्रश्न: निम्न में असत्य कथन—
    • एक सामान्यीकरण की तरह नहीं, बल्कि अनुमान के तरह यह सत्य होना चाहिए" (असत्य)।
    • वास्तव में, गणितीय कथन प्रमाण या निगमन पर आधारित होते हैं
    • अनुमान पर। सामान्यीकरण वैध तर्क से आता है।​
  • अपरिमेय संख्याएँ उदाहरण
    • कथन:
    • अपरिमेय संख्याओं की संख्या अनंत है (सत्य)।
    • दो अपरिमेयों का योग हमेशा अपरिमेय (असत्य: √2 + (-√2) = 0 परिमेय है)।
    • परिमेय + अपरिमेय = अपरिमेय (सत्य)।
    • असत्य कथन है।​
  • पहचान के तरीके
    • तथ्य जाँचें: ज्ञात परिभाषाओं से मिलाएँ, जैसे वृत्त में स्पर्शरेखा की स्थिति।
    • उदाहरण खोजें: असत्य सिद्ध करने के लिए काउंटर-उदाहरण दें।
    • तर्क प्रयोज्य: गलत सामान्यीकरण स्पष्ट असत्य होते हैं।
    • ये विधियाँ परीक्षा में पूर्ण विस्तार से उत्तर लिखने में सहायक हैं।​​

23. एक एनबीएफसी-एमएफआई (NBFC-MFI) के लिए पूंजी-पर्याप्तता अनुपात ....... होता है। [C.P.O.S.I. (T-I) 10 नवंबर, 2022 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) जोखिम भारित कुल परिसंपत्तियों का 15%
Solution:
  • एक एनबीएफसी-एमएफआई (NBFC-MFI) के लिए पूंजी पर्याप्तता अनुपात जोखिम भारित कुल संपत्तियों का 15% होता है।
  • CRAR की गणना
    • CRAR की गणना कुल पूंजी (Tier I + Tier II) को कुल जोखिम-भारित संपत्ति से विभाजित करके की जाती है।
    • Tier I पूंजी में कोर कैपिटल जैसे शेयर पूंजी, रिजर्व और अधिशेष शामिल होते हैं
    • जबकि Tier II पूंजी में अधीनस्थ ऋण और रीवैल्यूएशन रिजर्व आते हैं।
    • Tier II पूंजी Tier I पूंजी के 100% से अधिक नहीं हो सकती।​
  • नियमों का इतिहास
    • नए NBFC-MFI के लिए 15% CRAR अनिवार्य है
    • लेकिन आंध्र प्रदेश जैसे क्षेत्रों में 2011-12 में अस्थायी रूप से 12% किया गया था
    • जो बाद में 15% पर बहाल हो गया। RBI ने NBFC-MFI को जमा न लेने वाली संस्थाओं के रूप में विनियमित किया
    • सूक्ष्म वित्त क्षेत्र में पारदर्शिता और जिम्मेदारी सुनिश्चित हो।​
  • अन्य आवश्यकताएँ
    • NBFC-MFI को कुल संपत्ति का कम से कम 75% माइक्रोफाइनेंस ऋणों में निवेश करना होता है।
    • ब्याज दर 26% प्रति वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए
    • प्रत्येक उधारकर्ता के लिए कुल ऋण सीमा 12% से अधिक नहीं।
    • ये नियम ग्रामीण और शहरी कम आय वालों को सशक्त बनाने के लिए हैं।​
  • महत्व और प्रभाव
    • यह अनुपात सुनिश्चित करता है कि संस्थाएँ ऋण डिफॉल्ट या बाजार उतार-चढ़ाव से निपट सकें।
    • हाल के RBI अपडेट्स में NBFC ऋणों पर जोखिम भार कम किया गया है, जो तरलता बढ़ाता है।

24. माइक्रोफाइनेंस सेक्टर (NBFC-MFI) में काम करने वाली एनबीएफसी (NBFCs) के लिए एक अलग श्रेणी का निर्माण किस समिति की सिफारिशों के आधार पर किया जाता है? [CHSL (T-I) 02 अगस्त, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (c) मालेगाम समिति
Solution:
  • मालेगाम समिति की सिफारिश के आधार पर माइक्रोफाइनेंस सेक्टर में काम करने वाली एनबीएफसी के लिए
  • एक अलग श्रेणी का निर्माण किया जाता है। ध्यातव्य है कि यह समिति प्राथमिक पूंजी बाजार जांच क्षेत्र से संबंधित है।
  • मालेगाम समिति का गठन
    • रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने 2010-11 के आसपास आंध्र प्रदेश माइक्रोफाइनेंस संकट के बाद मालेगाम समिति का गठन किया।
    • यह समिति माइक्रोफाइनेंस क्षेत्र की समीक्षा के लिए बनी
    • जिसमें डॉ. यू.आर. मालेगाम की अध्यक्षता में विशेषज्ञ सदस्य शामिल थे।
    • समिति ने जनवरी 2011 में अपनी रिपोर्ट RBI को सौंपी
    • जिसमें क्षेत्र की विनियमन संबंधी कमियों को दूर करने पर जोर दिया गया।​
  • मुख्य सिफारिशें
    • समिति ने NBFC-MFI को एक अलग विनियमित श्रेणी बनाने की सिफारिश की ताकि माइक्रोफाइनेंस गतिविधियों पर निगरानी मजबूत हो।
    • NBFC-MFI को न्यूनतम नेट ओन्ड फंड्स (NOF) 15 करोड़ रुपये रखना अनिवार्य।
    • ऋण सीमाएं निर्धारित: एक उधारकर्ता को अधिकतम 50,000 रुपये का ऋण, और कुल 1 लाख रुपये तक।
    • ब्याज दरें पारदर्शी रखनी होंगी, और कुल ब्याज अधिकतम 26% वार्षिक।
    • कर्ज वसूली पर प्रतिबंध: शाम 7 बजे के बाद या घर के अंदर नहीं।​
  • RBI द्वारा कार्यान्वयन
    • RBI ने जुलाई 2011 में मालेगाम समिति की सिफारिशों को स्वीकारते हुए NBFC-MFI के लिए अलग दिशानिर्देश जारी किए।
    • इससे पहले सामान्य NBFC नियम लागू थे, लेकिन अब NBFC-MFI को अलग पंजीकरण और अनुपालन की जरूरत पड़ी।
    • NBFC-MFI को 85% परिसंपत्तियां योग्य माइक्रोफाइनेंस ऋणों में निवेश करनी पड़ती हैं
    • NPA सीमा 2% सकल व 0.85% शुद्ध रखनी है।​
  • बाद के बदलाव
    • 2022 में RBI ने सिस्टमिक रूप से महत्वपूर्ण NBFC-MFI के लिए NOF को 100 करोड़ रुपये बढ़ाया।
    • हाल ही में 2026 में नए दिशानिर्देश जारी हुए
    • जो लोन कैप और रिपोर्टिंग पर फोकस करते हैं
    • लेकिन मूल संरचना मालेगाम समिति पर ही आधारित है।
    • ये बदलाव क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए हैं।​

25. वर्ष 2010 में सूक्ष्म वित्त संस्थाओं में मुद्दों और चिंताओं का अध्ययन करने के लिए निम्नलिखित में से किस समिति का गठन किया गया था? [CHSL (T-I) 25 जुलाई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (d) मालेगाम समिति
Solution:
  • आरबीआई ने वर्ष 2010 में मालेगाम समिति के गठन के लिए सूक्ष्म वित्त संस्थाओं के क्षेत्रों में वित्तीय और वित्तीय सहायता का अध्ययन करने की सलाह दी।
  • इस समिति की परियोजना में सूक्ष्म वित्त संस्थान, ऑटोमोबाइल को भी शामिल किया गया था।
  • पृष्ठभूमि
    • जहाँ उच्च ब्याज दरें, जबरन वसूली प्रथाएँ और उधारकर्ताओं की आत्महत्याएँ प्रमुख समस्याएँ थीं
    • RBI ने इन मुद्दों का समाधान खोजने और नियामक ढांचे के सुझाव देने हेतु 15 अक्टूबर 2010 को समिति गठित
    • जिसकी अध्यक्षता YH मालेगाम (RBI के केंद्रीय बोर्ड सदस्य) ने की
    • यह समिति MFIs के सतत विकास और उधारकर्ता संरक्षण पर केंद्रित थी.​
  • प्रमुख सिफारिशें
    • समिति ने NBFC-MFIs के लिए अलग श्रेणी बनाने का सुझाव दिया.​
    • ब्याज दरों पर सीमा तय की, जो धन लागत से अधिकतम 10-12% मार्जिन तक सीमित हो.​
    • वसूली के लिए आचार संहिता, प्रसंस्करण शुल्क पर प्रतिबंध (ऋण का 1% से अधिक नहीं)
    • एक उधारकर्ता को अधिकतम दो MFIs से ऋण लेने की सीमा लगाई.​
    • पारदर्शिता बढ़ाने, एकाधिक ऋण रोकने और ग्राहक संरक्षण हेतु उपाय सुझाए.​
  • प्रभाव और कार्यान्वयन
    • RBI ने 2011 में इन सिफारिशों को दिशानिर्देशों में शामिल किया, जिससे MFIs का नियमन मजबूत हुआ.
    • इनका आधार सूक्ष्म वित्त संस्थान (विकास और विनियमन) विधेयक, 2012 बना, जो 2016 में अधिनियमित हुआ
    • समिति ने क्षेत्र में पारदर्शिता, जवाबदेही और उधारकर्ता हितों की रक्षा सुनिश्चित की.​

26. निम्नलिखित में से कौन-सी भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा उपयोग की जाने वाली साख नियंत्रण (credit control) की गुणात्मक माप है ? [CHSL (T-I) 02 अगस्त, 2023 (II-पाली)]

(A) सीआरआर (CRR)

(B) नैतिक दबाव

(C) एसएलआर (SLR)

Correct Answer: (d) केवल B
Solution:
  • भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा साख नियंत्रण की मुख्यतः दो विधियां अपनाई जाती हैं-
  • मात्रात्मक विधि - बैंक दर, रेपो दर, रिवर्स रेपो दर, CRR/SLR आदि।
  • गुणात्मक विधि - नैतिक दबाव, न्यूनतम सीमा, साख मानदंड का निर्धारण आदि।
  • गुणात्मक साख नियंत्रण की अवधारणा
    • RBI साख नियंत्रण को दो भागों में विभाजित करता है: परिणामी (Quantitative) और गुणात्मक (Qualitative)।
    • गुणात्मक विधियाँ कुल साख की मात्रा के बजाय उसके उपयोग की दिशा को नियंत्रित करती हैं
    • जैसे कि प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में ऋण को प्रोत्साहित या गैर-जरूरी क्षेत्रों में प्रतिबंध लगाना ।
    • नैतिक प्रेरणा इसी श्रेणी का एक महत्वपूर्ण उपकरण है
    • जिसमें RBI बैंकों से अनौपचारिक रूप से सहयोग मांगता है
    • जैसे कि उच्च ब्याज दरों या जोखिम भरे ऋणों से बचने का आग्रह ।
    • यह विधि कम खर्चीली और त्वरित प्रभावी साबित होती है ।​​
  • प्रमुख गुणात्मक मापें
    • RBI विभिन्न गुणात्मक मापों का उपयोग करता है, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं:
    • नैतिक प्रेरणा (Moral Suasion): RBI बैंकों को मौद्रिक नीति के अनुरूप ऋण नीतियाँ अपनाने के लिए प्रेरित करता है।
    • उदाहरणस्वरूप, मुद्रास्फीति नियंत्रण के दौरान विलासिता ऋणों पर रोक लगाने का अनुरोध ।​
    • चयनात्मक साख नियंत्रण (Selective Credit Control): सीमांत आवश्यकता तय करना
    • जहाँ संपत्ति ऋण के लिए 40-75% मार्जिन रखना अनिवार्य होता है। यह सट्टेबाजी रोकता है ।​​
    • साख राशनिंग (Credit Rationing): विशिष्ट क्षेत्रों (जैसे रियल एस्टेट) में ऋण सीमा लगाना, ताकि साख का दुरुपयोग न हो
    • प्रत्यक्ष कार्यवाही: असामान्य मामलों में बैंकों को सीधे निर्देश देना ।​
  • नैतिक प्रेरणा का महत्व
    • नैतिक प्रेरणा RBI की सबसे प्रभावी गुणात्मक माप है
    • क्योंकि यह बिना विधिक बाध्यता के बैंकों का सहयोग प्राप्त करती है।
    • महामारी या आर्थिक मंदी के दौरान RBI ने इसका उपयोग कर ऋणों को प्राथमिक क्षेत्रों की ओर मोड़ा ।
    • यह बैंकों की स्वायत्तता बनाए रखते हुए मौद्रिक नीति को मजबूत बनाती है ।
    • अन्य विकल्प जैसे CRR (4%) और SLR (18%) मात्रात्मक हैं, जो साख की कुल मात्रा प्रभावित करते हैं ।​​
  • कार्यान्वयन और प्रभाव
    • RBI मौद्रिक नीति समीक्षा में इन मापों की समीक्षा करता है
    • गुणात्मक नियंत्रण ने भारत में साख के उत्पादक उपयोग को बढ़ावा दिया
    • जैसे कृषि और MSME क्षेत्रों में । हालांकि, इनकी सफलता बैंकों की स्वैच्छिक भागीदारी पर निर्भर करती है
    • वर्तमान में (जनवरी 2026 तक) ये उपाय मुद्रास्फीति नियंत्रण और विकास संतुलन बनाए रखने में सहायक हैं 。​

27. मुद्रा की मांग के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? [CHSL (T-I) 10 अगस्त, 2023 (II-पाली)]

i. जब ब्याज दर अधिक होती है, तो मुद्रा की मांग कम होती है।

ii. जब ब्याज दर कम होती है, तो मुद्रा की मांग भी कम होती है।

iii. जब ब्याज दर अधिक होती है, तो मुद्रा की मांग भी अधिक होती है।

iv. जब ब्याज दर कम होती है, तो मुद्रा की मांग अधिक होती है।

Correct Answer: (b) केवल i और iv
Solution:
  • मुद्रा वह है, जो मुद्रा का कार्य करे। मुद्रा की मांग सामान्य तौर पर तीन कार्यों हेतु की जाती है-
  • 1. लेन-देन (Transaction)
  • 2. सतर्कता (Precautionary)
  • 3. सट्टा (Speculation)
  • गौरतलब है कि मुद्रा की मांग और ब्याज दर में विलोमानुपाती संबंध होता है।
  • अर्थात जब ब्याज दर अधिक होती है, तो मुद्रा की मांग कम होती है
  • जब ब्याज दर कम होती है, तो मुद्रा की मांग अधिक होती है।
  • मुद्रा की मांग के प्रकार
    • जो आय के स्तर पर निर्भर करती है—जब आय बढ़ती है
    • तो सौदों की संख्या बढ़ने से यह मांग भी बढ़ जाती है।
    • सावधानी मांग अप्रत्याशित खर्चों के लिए रखी जाती है और यह भी आय से जुड़ी होती है
    • जबकि सट्टा मांग ब्याज दरों के भविष्य के अनुमानों पर आधारित होती है।​
  • निर्धारक कारक
    • मुद्रा की मांग कई कारकों से प्रभावित होती है। मूल्य स्तर बढ़ने पर (मुद्रास्फीति) अधिक नकद की जरूरत पड़ती है
    • इसलिए मांग बढ़ती है। ब्याज दर का नकारात्मक संबंध होता है
    • उच्च ब्याज दर पर लोग नकद रखने के बजाय बांड या बचत में निवेश करते हैं
    • जिससे मांग घटती है। इसके अलावा, आय, आर्थिक अनिश्चितता और तकनीकी प्रगति (जैसे डिजिटल भुगतान) भी मांग को प्रभावित करते हैं।​
  • ब्याज दर संबंधी कथन
    • प्रश्न में संभावित कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित सही हैं: (i) जब ब्याज दर अधिक होती है
    • तो मुद्रा की मांग कम होती है—क्योंकि अवसर लागत बढ़ जाती है। (iv) जब ब्याज दर कम होती है
    • तो मुद्रा की मांग अधिक होती है—लोग नकद रखना पसंद करते हैं।
    • विपरीत कथन (ii और iii) गलत हैं, क्योंकि कीनेसियन सिद्धांत में ब्याज लोच स्पष्ट रूप से नकारात्मक है।
    • सट्टा मांग विशेष रूप से इस संबंध को दर्शाती है
    • जहां कम ब्याज दर पर बांड मूल्य गिरने की आशंका से नकद पसंद किया जाता है।​
  • प्रभाव और महत्व
    • मुद्रा की मांग और आपूर्ति में असंतुलन से मुद्रास्फीति या मंदी उत्पन्न हो सकती है।
    • उच्च मांग पर नियंत्रण के लिए केंद्रीय बैंक ब्याज दरें समायोजित करते हैं।
    • भारत जैसे विकासशील देशों में, डिजिटल化 से लेन-देन मांग प्रभावित हो रही है
    • लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में नकद मांग बनी हुई है।​

28. इनमें से कौन-सा औपचारिक क्षेत्रक के तहत एक पारंपरिक कमजोर वर्ग ऋणदान है? [CHSL (T-I) 14 अगस्त, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (a) व्यावसायिक बैंक प्राथमिकता क्षेत्रक ऋणदान
Solution:
  • 'व्यावसायिक बैंक प्राथमिकता क्षेत्रक ऋणदान' औपचारिक क्षेत्रक के तहत एक पारंपरिक कमजोर वर्ग ऋणदान है।
  • ध्यातव्य है कि भारतीय रिजर्व बैंक ऋण के औपचारिक स्रोतों के कामकाज का प्रबंधन करता है।
  • गौरतलब है कि सहकारी समितियां भी औपचारिक क्षेत्र के ऋण से संबंधित हैं।
  •  यह भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा विनियमित एक अनिवार्य व्यवस्था है
  • जो समाज के आर्थिक रूप से कमजोर समूहों तक सस्ती क्रेडिट पहुंच सुनिश्चित करती है।​
  • औपचारिक क्षेत्र की परिभाषा
    • औपचारिक क्षेत्र के ऋण वे होते हैं जो बैंकों, सहकारी समितियों और अन्य RBI-नियंत्रित संस्थाओं द्वारा दिए जाते हैं।
    • इनमें निश्चित ब्याज दरें, पारदर्शिता और कानूनी सुरक्षा होती है।
    • प्राथमिकता क्षेत्र ऋण इसी श्रेणी का हिस्सा है
    • जो छोटे किसानों, लघु उद्यमियों, SC/ST समुदायों और महिलाओं जैसे कमजोर वर्गों को लक्षित करता है।
    • यह 40% कुल ऋण पोर्टफोलियो का अनिवार्य हिस्सा होता है।​
  • विकल्पों का विश्लेषण
    • सामान्यतः इस प्रकार के प्रश्नों में निम्नलिखित विकल्प दिए जाते हैं:
    • साहूकार: अनौपचारिक क्षेत्र का हिस्सा, उच्च ब्याज दरें और कोई RBI नियमन नहीं।​
    • स्वयं सहायता समूह (SHG) बैंक लिंकेज: औपचारिक बैंकिंग से जुड़ा लेकिन अपेक्षाकृत नया मॉडल (1990s से), पारंपरिक नहीं।​
    • सूक्ष्म वित्त संस्थान (MFI): NBFC के रूप में कार्यरत, औपचारिक लेकिन मुख्यधारा बैंकिंग से अलग और पारंपरिक PSL नहीं।​
    • वाणिज्यिक बैंकों का PSL ही सबसे पारंपरिक औपचारिक ऋण है।​
  • PSL का महत्व और विशेषताएं
    • PSL की शुरुआत 1974 में हुई, जो कमजोर वर्गों को सशक्त बनाती है।
    • इसमें कृषि (18%), MSME (7.5%), कमजोर वर्ग (10%) आदि शामिल हैं।
    • ब्याज दरें कम होती हैं और समर्थन दस्तावेजों पर आधारित।
    • यह गरीबी उन्मूलन और समावेशी विकास को बढ़ावा देता है।​

29. किसी भी बैंक की नेट वर्थ (net worth) ....... के बराबर होती है। [CHSL (T-I) 14 अगस्त, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (a) (कोष + ऋण) - देनदारियां
Solution:
  • किसी बैंक के नेट वर्थ (Net worth) की गणना संपत्ति अर्थात कोष और ऋण में से सभी देनदारियां को घटाकर की जाती हैं।
  • (कोष + ऋण) - देनदारियां
  • दूसरे शब्दों में, बैंक की नेट वर्थ (कोष + ऋण) देनदारियां के बराबर होती है।
  • नेट वर्थ का फॉर्मूला
    • बैंकों के लिए नेट वर्थ की गणना सरल है: नेट वर्थ = कुल संपत्ति - कुल देनदारियाँ।
    • यहां कुल संपत्ति में बैंक के पास नकदी, निवेश, दिए गए ऋण, भवन और अन्य परिसंपत्तियां शामिल होती हैं
    • जबकि देनदारियां ग्राहकों के जमा, अन्य बैंकों को देय राशि और उधार शामिल करती हैं।
    • यह फॉर्मूला सभी व्यावसायिक संस्थाओं पर लागू होता है, लेकिन बैंकों में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है
    • क्योंकि बैंक मुख्य रूप से जमा और ऋण पर निर्भर होते हैं।​
  • बैंक के संदर्भ में महत्व
    • बैंकों की नेट वर्थ उनकी पूंजीगत पर्याप्तता (Capital Adequacy Ratio - CAR) का आधार बनाती है
    • जो नियामक जैसे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा निर्धारित न्यूनतम स्तर बनाए रखना अनिवार्य होता है।
    • यदि नेट वर्थ ऋणात्मक हो जाती है, तो बैंक दिवालिया होने के कगार पर पहुंच सकता है।
    • यह निवेशकों और जमा धारकों को बैंक की स्थिरता का संकेत देती है, क्योंकि यह दर्शाती है
    • सभी देनदारियों का भुगतान करने के बाद बैंक के पास कितना मूल्य शेष रहता है।​
  • गणना के उदाहरण
    • मान लीजिए एक बैंक की कुल संपत्ति 1000 करोड़ रुपये है (जिसमें 600 करोड़ ऋण, 200 करोड़ भंडार और 200 करोड़ अन्य परिसंपत्तियां शामिल हैं
    • कुल देनदारियां 850 करोड़ रुपये हैं (जिसमें ग्राहक जमा प्रमुख हैं।
    • तब नेट वर्थ = 1000 करोड़ - 850 करोड़ = 150 करोड़ रुपये होगी।
    • वास्तविक बैलेंस शीट में यह शेयरधारकों के फंड, रिजर्व और अधिशेष के योग के रूप में दिखाई देती है।​
  • व्यावहारिक उपयोग और सीमाएं
    • नेट वर्थ बैंक के प्रदर्शन का मूल्यांकन करने, विलय-विभाजन या विनियामक अनुपालन के लिए उपयोगी है
    • लेकिन यह ऐतिहासिक लागत पर आधारित होती है, न कि बाजार मूल्य पर।
    • इसलिए, बाजार पूंजीकरण (मार्केट कैप) से अलग होती है।
    • भारत में RBI के दिशानिर्देशों के तहत बैंकों को अपनी नेट वर्थ को सार्वजनिक रूप से प्रकट करना पड़ता है।​

30. अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति से निपटने के लिए रिज़र्व बैंक द्वारा कौन से उपाय किए जाने की सबसे अधिक संभावना होती है? [CHSL (T-I) 8 अगस्त, 2023 (II-पाली)]

A. रेपो दर में बढ़ोतरी

B. मुद्रा की पूर्ति में बढ़ोतरी

C. नकद आरक्षित अनुपात में कमी

Correct Answer: (d) केवल A
Solution:
  • कीमतों में एक स्थायी वृद्धि की प्रवृत्ति को अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति कहा जाता है।
  • अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति से निपटने हेतु रिजर्व बैंक द्वारा मुख्यतः दो उपाय अपनाए जाते हैं-
  • (1) राजकोषीय उपाय - करारोपण में वृद्धि, आयात में वृद्धि, ऋण में वृद्धि आदि।
  • (2) मौद्रिक उपाय - CRR/SLR में वृद्धि, बैंक दर में वृद्धि रेपो दर में वृद्धि आदि।
  • प्रमुख मौद्रिक उपाय
    • रेपो दर में वृद्धि सबसे सामान्य और प्रभावी उपाय है, क्योंकि यह वाणिज्यिक बैंकों के लिए RBI से उधार लेना महंगा बनाता है
    • जिससे ऋण दरें बढ़ती हैं और व्यय कम होता है।
    • इसी तरह, नकद आरक्षित अनुपात (CRR) बढ़ाने से बैंकों को RBI के पास अधिक धन जमा रखना पड़ता है
    • जिससे बाजार में उपलब्ध तरलता घटती है। रिवर्स रेपो दर बढ़ाना भी अतिरिक्त धन को RBI में खींच लेता है।​
  • कार्यप्रणाली
    • ये उपाय अपनाने पर बैंकों की उधार क्षमता सीमित हो जाती है
    • जिससे उपभोक्ता और व्यवसाय ऋण लेने से हिचकते हैं, मांग घटती है और मूल्यों पर दबाव कम होता है।
    • उदाहरणस्वरूप, उच्च रेपो दर से होम लोन या कार लोन महंगे हो जाते हैं।
    • बैंक दर या स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी (SDF) दर में भी समान वृद्धि की जाती है।​
  • अन्य सहायक उपकरण
    • वैधानिक तरलता अनुपात (SLR) बढ़ाकर भी RBI बैंकों के ऋण योग्य धन को कम करता है।
    • खुले बाजार संचालन (OMO) के तहत सरकारी प्रतिभूतियां खरीदकर बाजार से धन सोखा जाता है।
    • मौद्रिक नीति समिति (MPC) मुद्रास्फीति लक्ष्य (4% ±2%) के आधार पर ये निर्णय लेती है।​
  • वास्तविक उदाहरण
    • मुद्रास्फीति बढ़ने पर RBI ने अतीत में रेपो दर को 6.5% तक बढ़ाया था
    • जिससे मुद्रास्फीति नियंत्रित हुई। हालांकि, विकास को नुकसान न हो, इसलिए ये उपाय चरणबद्ध होते हैं।​