मूल अधिकार (भारतीय राजव्यवस्था) (भाग-I)

Total Questions: 30

11. भारत में मौलिक अधिकारों के संबंध में, निम्नलिखित में से कौन-सा कथन गलत है? [JE मैकेनिकल परीक्षा 22 मार्च, 2021 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) वे अलंघनीय या स्थायी हैं।
Solution:
  • भारत में मौलिक अधिकारों के संबंध में गलत कथन वे अलंघनीय या स्थायी हैं
  • स्पष्टीकरण:
    • मौलिक अधिकार स्थायी (Permanent) नहीं हैं और अलंघनीय (Inviolable) भी नहीं हैं।
    • संसद संवैधानिक संशोधन अधिनियम के माध्यम से उन्हें कम कर सकती है या हटा सकती है
    • बशर्ते कि संशोधन संविधान के मूल ढांचे (Basic Structure) को प्रभावित न करे (केशवानंद भारती मामला, 1973)।
    • राष्ट्रीय आपातकाल (National Emergency) के दौरान, अनुच्छेद 20 और 21 को छोड़कर, अन्य मौलिक अधिकारों को निलंबित किया जा सकता है।
  • तथ्यगत पृष्ठभूमि (संक्षेप में)
    • मौलिक अधिकार भारत के संविधान के भाग III के अंतर्गत अनुच्छेद 12 से 35 तक निर्धारित छह मुख्य समूहों में आते हैं:
    • समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14–18)
    • स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19–22)
    • शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23–24)
    • धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25–28)
    • सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार (अनुच्छेद 29–30)
    • संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32–33; अन्य अनुच्छेदों के माध्यम से भी उपलब्धता)
    • ये अधिकार राष्ट्रपति/केंद्र-राज्य विधानमंडलों की साधारण या संवैधानिक लागत से बदले नहीं जा सकते
    • इनका संरक्षण सुप्रीम कोर्ट/हाई कोर्ट के न्यायिक नियंत्रण के अंतर्गत रहता है।
    • इनमें से कुछ अधिकार परिस्थितियों के अनुसार परिभाषित सीमाओं के साथ लागू होते हैं
    • (उदा. बंधनों, सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, आदि के भीतर सीमाएं संभव हैं)।
    • कुछ अधिकारों पर सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर स्पष्ट निर्देश दिए हैं
    • संवैधानिक अधिकारों का अतिक्रमण नहीं हो सकता और DP/SP जैसे उपायों से उनका दमन नहीं किया जा सकता
    • लेकिन इन अधिकारों के साथ संगत व्यवस्था बनाने के लिए संसद समय-समय पर कानून बना सकती है
    • बशर्ते वे मूल अधिकारों के साथ संगत हों।

12. 'कानून का शासन' की अवधारणा का प्रतिपादन किसने स किया? [MTS (T-I) 11 सितंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) ए.वी. डायसी
Solution:
  • 'कानून का शासन' (Rule of Law) की अवधारणा का प्रतिपादन ए.वी. डायसी (A.V. Dicey) ने किया था।
  • ब्रिटिश न्यायविद् ए.वी. डायसी ने अपनी पुस्तक Introduction to the Study of the Law of the Constitution (1885) में इस अवधारणा को लोकप्रिय बनाया।
  • उनके अनुसार, कानून के शासन में तीन मुख्य तत्व हैं:
  • कानून के समक्ष समानता।
  • कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है।
  • व्यक्तिगत अधिकारों की सर्वोच्चता जो संवैधानिक कानूनों का स्रोत हैं।
  • परिभाषा और मूल विचार
    • कानून का शासन यह मानना है कि कोई भी क्रिया कानून से ऊपर नहीं, और सभी पर कानून बराबरी से लागू होते हैं
    • यह सरकार और नागरिक, दोनों के लिए समान रूप से बाध्य है.​
    • कानून स्पष्ट, सामान्य, और न्यायपूर्ण होने चाहिए
    • न्यायिक नियंत्रण और स्वतंत्र न्यायपालिका के जरिये कानून के अनुप्रयोग की निष्पक्षता सुनिश्चित होनी चाहिए.​
  • ऐतिहासिक उन्नयन
    • Dicey के विचारों ने ब्रिटिश संविधान और फ्रेमवर्क में मौजूदा सिद्धांतों को संरचना दी और बाद में विश्व के अनेक संविधानिक व्यवस्थाओं में इसे मानक के रूप में ग्रहण किया गया.​
    • भारत के संदर्भ में अनुच्छेद 14 (समता के अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) जैसी मौलिक धाराओं के माध्यम से कानून के शासन के सिद्धांतों को संविधानिक संरचना में स्थापित किया गया है.​
  • विवाद और विविध संदर्भ
    • कुछ स्रोत बताते हैं कि कानून के शासन काivée विचार 19वीं सदी के ब्रिटिश विचारक A. V. Dicey के अलावा अन्य दार्शनिकों और ऐतिहासिक अवधारणाओं (जैसे अरस्तु- प्लेटो) के साथ भी जुड़ा हुआ रहा है
    • आधुनिक कानूनी धारणा Dicey के नाम से सबसे अधिक पहचानी जाती है.​
    • भारत में पढ़ाई/अध्ययन के कई पाठ्यक्रम भी Dicey को कानून के शासन का प्रतिपादनकर्ता मानते हैं
    • जबकि कुछ समालोचक इसे ब्रिटिश संवैधानिक परंपरा से जोڑते हैं.​
    • जिनमें प्रतिपादनकर्ता, मूल सिद्धांत, और भारतीय संदर्भ के केंद्र बिंदु स्पष्ट हों।
    • अधिक विस्तार या किसी विशेष पाठ/सोर्स से उद्धरण चाहिए तो बताइए
    • उसी अनुरोध के अनुसार और स्रोतों सहित संपूर्ण विवरण दे दूंगा।​

13. निम्नलिखित में से किसने उस नौ-न्यायाधीशों की सवैधानिक पीठ का नेतृत्व किया, जिसने निजता (Privacy) के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित किया था? [CHSL (T-I) 15 अक्टूबर, 2020 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) जे.एस. खेहर
Solution:
  • नौ-न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ का नेतृत्व, जिसने निजता (Privacy) के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित किया था
  • जे.एस. खेहर (J.S. Khehar) ने किया था।
  • यह ऐतिहासिक निर्णय के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017) मामले में आया था।
  • इस फैसले ने घोषणा की कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत एक मौलिक अधिकार है।
  • संक्षिप्त उत्तर के साथ विस्तृत विवरण
    • कौन leader था: न्यायमूर्ति जे.एस. खेहर ने 24 अगस्त 2017 को वरिष्ठ-न्यायाधीशों की खंडपीठ (Nine-judge Bench) की अध्यक्षता की।
    • यह खंडपीठ K.S. Puttaswamy vs. India संघ (Puttaswamy v. Union of India) मामले में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देने वाला ऐतिहासिक निर्णय दिया ।​
    • निर्णय के मुख्य बिंदु: इस फैसले में निजता को संविधान के भाग III के अंतर्गत मौलिक अधिकार के रूप में स्वीकार किया गया और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) के साथ इसे एक आंतरिक तत्व के रूप में माना गया।
    • खंडपीठ ने कहा कि निजता मानव गरिमा का संवैधानिक मूल है
    • यह व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता और व्यक्तिगत गरिमा की रक्षा के लिए आवश्यक है ।​
    • तात्पर्य और राजनीतिक-वैधानिक प्रभाव: निजता को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता से डेटा सुरक्षा, गोपनीयता और व्यक्तिगत सूचना में नीति-निर्माण पर व्यापक प्रभाव पड़ा।
    • अदालत ने अनुच्छेद 14 (समता), 19 (स्वतंत्रता) और 21 के साथ निजता के अधिकार को संयुक्त रूप से संरक्षित माना
    • ताकि कानून प्रक्रिया के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा बनी रहे ।​
  • संदर्भित स्रोतों के संकेत:
    • केस का नेतृत्व जे.एस. खेहर के नेतृत्त्व में हुआ और निजता को मौलिक अधिकार घोषित किया गया ।​
    • 24 अगस्त 2017 का निर्णय इस विधानसभा-चर्चित प्रकरण का हिस्सा है
    • इससे निजता अधिकार का constitutional status स्पष्ट हुआ ।​
    • पब्लिक प्रतिक्रिया और विश्लेषण जहां न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने भी इसे संविधान की नींव के रूप में उद्धृत किया है
    • 2017 के फैसले के महत्व को दोहराते हैं ।​

14. भारत के संविधान का निम्नलिखित में से कौन-सा अनुच्छेद कहता है कि राज्य-निधि से पूर्णतः पोषित किसी शिक्षण संस्थान में कोई भी धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी? [Phase-XI 27 जून, 2023 (II-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 30 नवंबर, 2023 (I-पाली), CGL (T-I) 26 जुलाई, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (d) अनुच्छेद 28
Solution:
  • भारत के संविधान का वह अनुच्छेद जो कहता है कि राज्य-निधि से पूर्णतः
  • पोषित किसी शिक्षण संस्थान में कोई भी धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी, वह है अनुच्छेद 28
  • अनुच्छेद 28 शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थिति की स्वतंत्रता से संबंधित है।
  • इसके तहत, राज्य के पूर्ण वित्त पोषण वाले संस्थानों में धार्मिक शिक्षा पूरी तरह से निषिद्ध है।
  • अनुच्छेद 28 का पाठ
    • अनुच्छेद 28(1) स्पष्ट रूप से कहता है: "राज्य के निधि से पूर्णतः पोषित किसी शिक्षण संस्थान में धार्मिक शिक्षा दी या धार्मिक उपासना में भाग लेने के लिए किसी व्यक्ति को विवश नहीं किया जाएगा।
    • यह सुनिश्चित करता है कि सरकारी स्कूलों या कॉलेजों में कोई धार्मिक निर्देश न दिया जाए।​
  • उप-खंडों का विवरण
    • अनुच्छेद 28(2): राज्य-निधि से पूर्णतः पोषित संस्थानों में धार्मिक शिक्षा या उपासना स्वैच्छिक हो सकती है
    • लेकिन किसी को बाध्य नहीं किया जाएगा।
    • अनुच्छेद 28(3): राज्य से सहायता प्राप्त संस्थानों में धार्मिक शिक्षा या उपासना तभी दी जा सकती है
    • जब संस्थान धार्मिक या अल्पसंख्यक आधार पर स्थापित हो।
    • ये प्रावधान निजी संस्थानों को लचीलापन देते हैं
    • लेकिन सरकारी फंड पर सख्ती बरतते हैं।​
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
    • संविधान सभा में इस अनुच्छेद पर बहस हुई, जहां धर्मनिरपेक्ष शिक्षा को प्राथमिकता दी गई।
    • डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने जोर दिया कि राज्य धर्म से अलग रहे।
    • यह अनुच्छेद 25-28 के धर्म की स्वतंत्रता समूह का हिस्सा है।​

15. मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए कितने प्रकार की प्रादेश/रिट जारी की जा सकती हैं? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 22 नवंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (d) 5
Solution:
  • मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए 5 प्रकार की प्रादेश/रिट (Writs) जारी की जा सकती हैं।
  • ये रिट सर्वोच्च न्यायालय (अनुच्छेद 32) और उच्च न्यायालयों (अनुच्छेद 226) द्वारा जारी की जाती हैं।
  • बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)
  • परमादेश (Mandamus)
  • प्रतिषेध (Prohibition)
  • उत्प्रेषण (Certiorari)
  • अधिकार पृच्छा (Quo-Warranto)
  • संक्षिप्त उत्तर
    • मौलिक अधिकारों की रक्षा हेतु सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के पास जो रिट-आदेश हो सकते हैं
    • वे पाँच प्रकार की रिट्स हैं: बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus), परमादेश (Mandamus), प्रतिषेध (Prohibition), उत्प्रेषण (Certiorari) और अधिकार-पृच्छा (Prohibition/Quo Warranto). हालांकि कई स्रोत इन्हीं पाँचों को चिन्हित करते हैं
    • कुछ पाठ प्रस्तुतियाँ इन्हें विशिष्ट दायरों के अनुरूप स्पष्ट करती हैं
    • सभी प्रवर्तन-रिट जुड़े अधिकारों के संरक्षण हेतु उपलब्ध हैं
    • यह पांचों रिटें मौलिक अधिकारों के उल्लंघन या अवहेलना के मामलों में तात्कालिक राहत और वैधानिक नियंत्रण प्रदान करती हैं.​
  • आधार और दायरा
    • मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए अनुच्छेद 32 (सीधे सुप्रीम कोर्ट के अधिकार) और अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालयों के अधिकार) के तहत रिट जारी करने की शक्ति है।
    • यह शक्ति सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के पास समान रूप से उपलब्ध है
    • ताकि उल्लंघन रोकना और अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो सके.​
    • यह विकल्प सीधे शिकायतकर्ता को अधिकारों के प्रवर्तन के उपाय देता है
    • अन्य मार्गों (जैसे संवैधानिक remedies के अन्य हिस्से) से पहले या साथ में चल सकता है.​
  • पांच मुख्य रिट्स के प्रकार
    • बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus): यह रिट किसी व्यक्ति की अवैध हिरासत/निज मांध्य में रोकने के लिए सर्वोच्च न्यायालय/हाई कोर्ट के समक्ष दाखिल की जाती है ताकि हिरासत वैधता की जांच हो सके.​
    • परमादेश (Mandamus): यह रिट सार्वजनिक अधिकारी या सरकारी निकाय को उनके कर्तव्यों के पालन के लिए बाध्य करती है
    • जब एक अधिकारी कानूनन कर्तव्य निभाने से इन्कार कर रहा हो, तब यह relief प्रदान करती है.​
    • प्रतिषेध (Prohibition): निचली अदालतों/आयुक्त/ट्रिब्यूनल द्वारा उनके अधिकार-क्षेत्र से ऊपर जाने से रोकने के लिए जारी की जाती है
    • ताकि अवांछित निर्णय/आदेश से बचा जा सके.​
    • उत्प्रेषण (Certiorari): किसी उच्च स्तरीय न्यायिक समीक्षा के लिए निचली अदालत/ट्रिब्युनल के निर्णय का स्थानांतरण/पुनःपरीक्षा के लिए उच्च स्तर पर भेजना
    • यह अनुशासनात्मक/कागजी प्रक्रियाओं में सामान्य है.​
    • अधिकार-पृच्छा (Writ of Plea/Par Rights): यह स्पष्ट रूप से एक व्यक्ति के सार्वजनिक पद पर दावे की वैधता या वैधानिकता की जाँच के लिए होता है
    • कभी-कभी इसे Quo Warranto के रूप में भी देखा जाता है
    • ताकि किसी पद के दुरुपयोग/अनधिकार भरे इरादे की रोकथाम हो सके.​
  • किस तरह की दायरियाँ और दायित्व
    • हर रिट का उद्देश्य भिन्न है
    • जैसे Habeas Corpus हिरासत की legality को चुनौती देना, Mandamus सरकारी कर्तव्यों के पालन को बाध्य करना, Prohibition और Certiorari निचली अदालतों/ट्रायब्यूनल के jurisdiction के भीतर रहने की जाँच करना, और Quo Warranto/आधिकार-पृच्छा पद-दान की वैधता को चुनौती देना।
    • सुप्रीम कोर्ट/हाई कोर्ट इन रिटों के जरिए मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में त्वरित और प्रभावी राहत दे सकती है
    • कुछ स्थितियों में ये अधिकार-उल्लंघन सीधे अदालत में जाने की स्वतंत्र राह भी प्रदान करते हैं (अनुच्छेद 32/226).​
  • समन्वय और सीमित/अनन्य क्षेत्र
    • मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के कई मामलों में कोर्ट एक साथ या वैकल्पिक रूप से उच्च न्यायालय/सुप्रीम कोर्ट के समांतर अधिकार क्षेत्र का प्रयोग कर सकते हैं
    • यह निर्भर करता है कि मामला कितना संविदायिक (conscious) है
    • किस अनुच्छेद के अंतर्गत अधिकार उल्लंघन हुआ है.​
    • अनुच्छेद 359 के अंतर्गत आपात स्थितियों में मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के अधिकार कुछ परिस्थितियों में निलंबित हो सकते हैं
    • सामान्यतः इन रिट्स का प्रवर्तन प्रभावी रहता है.​
  • कानूनी संदर्भ और अभ्यास
    • अनुच्छेद 32 (Right to Constitutional Remedies) और अनुच्छेद 226 (Power of High Courts to issue writs) भारतीय संहिता के अनुसार रिट जारी करने का अधिकार स्पष्ट रूप से देता है
    • सुप्रीम कोर्ट/हाई कोर्ट द्वारा इन्हीं रिट्स के माध्यम से मौलिक अधिकारों की सुरक्षा होती है.​
    • कई शैक्षिक/प्रशासनिक स्रोतों में इन रिट्स को पांच प्रकारों के रूप में सूचीबद्ध किया गया है
    • अधिकार-पृच्छा) के रूप में, जो अभ्यास में लागू होते हैं.​

16. मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सरकार को आदेश और निर्देश कौन दे सकता है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 20 नवंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय
Solution:
  • मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सरकार को आदेश और निर्देश सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय दे सकते हैं।
  • सर्वोच्च न्यायालय को अनुच्छेद 32 के तहत रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है।
  • उच्च न्यायालयों को अनुच्छेद 226 के तहत रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है।
  • इन दोनों न्यायालयों को 'मौलिक अधिकारों का संरक्षक और प्रत्याभूतिदाता' कहा जाता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय (Constitutional Court) के पास अनुच्छेद 32 के अंतर्गत मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए निर्देश, आदेश या रिट जारी करने की प्राथमिक शक्ति है।
  • यह अधिकार सीधे नागरिक के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामले में उपयोग किया जा सकता है।
  • अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका “बिल्ट‑इन नेक” अधिकारों की रक्षा के लिए एक प्रभावी उपाय है ।​
  • उच्च न्यायालयों के पास अनुच्छेद 226 के तहत निर्देश, आदेश या रिट जारी करने की शक्ति है।
  • यह शक्ति राज्यों/राज्य के भीतर मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के विरुद्ध राहत देने के लिए सक्षम है
  • कई बार केंद्रीय कानूनों के अंतर्गत भी इसी क्षेत्र में प्रयोग होती है ।​
  • संसद द्वारा किसी अन्य न्यायालय/न्यायिक निकाय को भी वही प्रकार के निर्देश/आदेश/रिट जारी करने का अधिकार दिया जा सकता है।
  • इस प्रकार की अनुशंसा या प्रावधान कानून बनाकर किया जा सकता है
  • ताकि चारों ओर प्रवर्तन की सुनिश्चित प्रक्रिया बनी रहे (उदा., राज्य/केंद्रीय कानून के तहत अदालतों को रिट जारी करने का अधिकार) ।​
  • स्थिति विशेष: देश की संवैधानिक स्थितियों के अनुसार कुछ सीमायें भी हैं
  • जैसे राष्ट्रीय आपातकाल (Article 359) के दौरान अधिकार सीमित या निलंबित हो सकते हैं
  • सामान्य परिस्थिति में सर्वोच्च निकाय और उच्च न्यायालय ही प्रवर्तन के मुख्य साधन रहते हैं ।​
  • समुच्चयात्मक बिंदु
    • मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए कानूनी ढांचे में चार प्रमुख तत्व हैं:
    • सर्वोच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार (Art. 32)
    • उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार (Art. 226)
    • संसद द्वारा अन्य अदालतों को रिट/आदेश/निर्देश जारी करने की शक्तियाँ देना
    • संविधान द्वारा गारंटीकृत मौलिक अधिकारों की सुरक्षा की प्राथमिकता
    • इनके माध्यम से अधिकार वास्तविक बनते हैं ।​
  • संभाव्य प्रश्नों के उत्तर इस प्रकार स्पष्ट होते हैं
    •  आदेश/निर्देश: सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय, और संसद के द्वारा कानून के अनुसार अन्य न्यायालय भी इसके लिए सक्षम बनाये जा सकते हैं
    • केंद्र और राज्य के प्रशासनिक निर्णयों के विरुद्ध राहत के लिए कोर्ट-आधारित माध्यम सबसे प्रमुख हैं।​
    • किस अनुच्छेद के अंतर्गत: अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय और अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालयों को रिट/आदेश/निर्देश जारी करने का अधिकार है
    • संस्थागत नियंत्रण संविधान के अनुसार बना है ।​
    • किन परिस्थितियों में निलंबन संभव है: सामान्य परिस्थितियों में यह प्रवर्तन पर्याप्त व्यापक होता है
    • राष्ट्रीय आपातकाल जैसे विशेष अवसरों में अधिकारों के प्रवर्तन पर अस्थायी प्रतिबन्ध या निलंबन संभव है
    • यह भी संविधानिक ढांचे के अंतर्गत निर्धारित है ।​
  • ताकि आप इसे एक स्पष्ट संदर्भ में याद रख सकें
    • सर्वोच्च न्यायालय के पास अनुच्छेद 32 के तहत रिट/आदेश/बंदी प्रत्यक्षीकरण/प्रतिषेध आदि जारी करने की पूर्ण शक्ति है
    • यह अधिकार पीड़ित नागरिक के मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए केंद्रीय है ।​
    • उच्च न्यायालयों के पास अनुच्छेद 226 के तहत अनुरोधित राहतों का अधिकार है
    • राज्य/प्रशासनिक कार्रवाइयों के विरुद्ध सुरक्षा मिल सके ।​
    • संसद किसी अन्य न्यायालय को यह अधिकार दे सकती है
    • ताकि प्रवर्तन तंत्र अधिक व्यापक और सुदृढ़ हो सके ।​

17. बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus), न्यायालय द्वारा जारी आज्ञापत्र है जो निम्नलिखित में से किसे न्यायालय के समक्ष लाने के लिए होता है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 29 नवंबर, 2023 (II-पाली), CHSL (T-I) 11 अगस्त, 2021 (II-पाली)]

Correct Answer: (c) गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में लिए गए व्यक्ति
Solution:
  • बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) न्यायालय द्वारा जारी वह आज्ञापत्र है
  • जो निम्नलिखित में से गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में लिए गए व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष लाने के लिए होता है।
  • इस रिट का शाब्दिक अर्थ है "आपके पास शरीर होना चाहिए"।
  • यह गैर-कानूनी निरोध से स्वतंत्रता का सबसे मजबूत बचाव है
  • यह राज्य (कार्यकारी) और निजी व्यक्तियों दोनों के विरुद्ध जारी की जा सकती है।
  • परिचय और उद्देश्य
    • Habeas Corpus शब्द लैटिन है जिसका अर्थ है “शरीर को लेकर आना”।
    • यह रिट न्यायालय के अनुरोध पर हिरासत में लिए गए व्यक्ति की वैध हिरासत की जांच के लिए किया जाता है।​
    • इसका मूल उद्देश्य भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत生命 और प्रतिष्ठा से जुड़ी व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा करना है
    • न्याय प्रक्रिया के दायरे के भीतर हिरासत के वैधानिक आधार की पुष्टि करना है।​
  • किसके लिए जारी किया जाता है
    • यह रिट किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध जारी किया जा सकता है जिसने किसी अन्य व्यक्ति को हिरासत में लिया haya है
    • ताकि हिरासत में लिए गए व्यक्ति को अदालत में लाकर उसकी हिरासत के वैध कारणों की जाँच हो सके।​
    • दायरे में निजी व्यक्ति (जैसे परिवार, मित्र, या निजी संगठन) और सरकारी अधिकारी दोनों आ सकते हैं
    • जब किसी व्यक्ति को गैरकानूनी हिरासत में रखा गया हो।​
  • न्यायालय द्वारा कब जारी होता है
    • अदालत उस स्थिति में Habeas Corpus जारी करती है जब हिरासत के कारणों की वैधता पर संदेह हो या हिरासत कानूनन समर्थ नहीं हो
    • ताकि हिरासत पर असलियत और वैधता की जाँच हो सके।​
    • रिट का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हिरासत के किसी भी कदम में मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न हो और यदि हिरासत अंतत
    • अवैध हो, तो उसे तुरंत समाप्त किया जा सके।​
  • प्रक्रिया और प्रभाव
    • Habeas Corpus की रिट दाखिल होने पर अदालती प्रक्रिया शुरू होती है जिसमें हिरासतधारक को अदालत के समक्ष पेश किया जाता है
    • हिरासत के वैध कारण, कानूनी अधिकारों की पूर्णता आदि पर सवाल उठाए जा सकते हैं।​
    • यह रिट त्वरित, सरल और सक्रीय सुरक्षा उपाय है
    • जो कि न्यायपालिका की कड़ी निगरानी में व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा सुनिश्चित करती है।​
  • Habeas Corpus बनाम अन्य रिट्स
    • यह रिट विशेष रूप से व्यक्तिगत हिरासत की वैधता पर केंद्रित है
    • अन्य writs जैसे Mandamus, Certiorari आदि अलग उद्देश्यों के लिए होते हैं
    • (जैसे प्रशासनिक कार्यों की निगरानी या न्यायालय द्वारा उच्चतर स्तर के निर्णयों की समीक्षा)।​
  • लोकप्रिय पुनर्प्रयोग और महत्व
    • कई नागरिक अधिकारों के संदर्भ में Habeas Corpus को “Great Writ” के रूप में भी जाना जाता है
    • क्योंकि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए एक मजबूत कानूनी उपकरण है।​
    • UPSC/IAS जैसी परीक्षा के लिए भी यह एक प्रमुख सिद्धांत है
    • कानून की अंतर्निहित संरचना में बार-बार पूछे जाने वाले विषयों में से एक है।​
  • नोट्स और अतिरिक्त संदर्भ
    • Habeas Corpus के बारे में वैधानिक परिभाषाओं, दायरे और केस-उदाहरणों के लिए प्रस्तुत स्रोतों में हिंदी संदर्भ भी उपलब्ध हैं
    • इनमें LiveLaw, Testbook और Hastakshep जैसी साइटें उपयोगी विश्लेषण देती हैं ।​

18. निम्नलिखित में से कौन-सा रिट जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करता है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 1 दिसंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) बन्दी प्रत्यक्षीकरण
Solution:
  • जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करने वाली रिट बन्दी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) है।
  • जैसा कि ऊपर बताया गया है, यह रिट किसी भी व्यक्ति को गैर-कानूनी ढंग से हिरासत में लिए जाने पर जारी की जाती है।
  • यह व्यक्ति की दैहिक स्वतंत्रता (personal liberty) की रक्षा करती है, जो अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का मूल आधार है।
  • अनुच्छेद 21 क्या है
    • यह भारतीय संविधान का मौलिक अधिकार है जो कानून द्वारा स्थापित प्रक्रियाओं के अलावा किसी व्यक्ति के जीवन और उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किए जाने की गारंटी देता है
    • साथ ही यह मानव गरिमा और निजता जैसे तत्वों के संरक्षण के लिए आधार माना गया है
    • इसके तहत कई न्यायिक निर्णयों ने विस्तृत व्याख्या दी है
    • गोपनीयता, स्वायत्त निर्णय, शारीरिक अखंडता आदि विषयों को भी अनुच्छेद 21 के दायरे में रखा है.​
  • अनुच्छेद 21 के भीतर कौन से अधिकार शामिल माने जाते हैं
    • प्रारम्भ में यह सिर्फ जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा से संबंधित था
    • परन्तु न्यायालयों ने इसे व्यापक बनाते हुए निजता का अधिकार, वैधानिक प्रक्रिया (due process) के साथ जीवन/स्वतंत्रता की रक्षा, पर्यावरण का मानक, स्वच्छ जल/स्वच्छ हवा,agarिमा के साथ जीने का अधिकार आदि को भी जोड़ा है
    • यह सूची समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों से विस्तार पाती रही है.​
  • रिट (Writ) के अंतर्गत सुरक्षा कैसे मिलती है
    • रिट एक कानूनी उपाय है जिसके द्वारा अदालतें सरकारी पक्ष की कार्रवाई या गैर-कार्रवाई के कारण जीवन, स्वतंत्रता या अन्य मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की स्थितियों में तात्कालिक राहत दे सकती हैं
    • विशेषकर बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas corpus) जैसे रिट्स इस अधिकार की रक्षा के लिए अत्यंत मर्मस्पर्शी और प्रभावी उपकरण हैं
    • इनके जरिए हिरासत/कैद की वैधता और processual legality की जाँच की जाती है.​
  • महत्व और कार्यान्वयन
    • जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण से नागरिक सुरक्षा पाते हैं
    • सरकार कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रियाओं के बाहर किसी को अनावश्यक रूप से परेशान, कैद या जीवन से वंचित न करे
    • सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों ने कई फैसलों में अनुच्छेद 21 के दायरे को स्पष्ट किया है
    • नागरिकों के निजता, गरिमा और पारिस्थितिक अधिकारों की रक्षा को मजबूती दी है.​
  • समेकित दृष्टिकोण
    • अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन की सुरक्षा का दायरा व्यापक है
    • व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ी कट्टर आवश्यकताओं, न्यायिक प्रक्रिया, गोपनीयता और गरिमा के अधिकारों को एक साथ सम्मिलित कर एक समग्र संरक्षण प्रदान करता है
    • यह संविधान के संरचनात्मक आधारों में से एक है
    • लोकतांत्रिक शिक्षा, कार्यस्थल, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी क्षेत्रों में नागरिकों के अधिकारों की रक्षा का केंद्र बनता है.​

19. निम्नलिखित में से कौन-सी रिट केवल न्यायिक और अर्ध-न्यायिक निकायों के विरुद्ध जारी की जाती है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 22 नवंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (d) निषेधाज्ञा और उत्प्रेषण-लेख
Solution:
  • केवल न्यायिक और अर्ध-न्यायिक निकायों के विरुद्ध जारी की जाने वाली रिट निषेधाज्ञा (Prohibition) और उत्प्रेषण-लेख (Certiorari) हैं।
  • निषेधाज्ञा (Prohibition): यह किसी उच्च न्यायालय द्वारा निचली अदालत या न्यायाधिकरण को उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने से रोकने के लिए जारी की जाती है।
  • उत्प्रेषण-लेख (Certiorari): यह किसी उच्च न्यायालय द्वारा निचली अदालत या न्यायाधिकरण को जारी की जाती है
  • तो लंबित मामले को स्थानांतरित करने के लिए, या उनके द्वारा दिए गए फैसले को रद्द करने के लिए
  • जब उन्होंने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया हो या कानूनी त्रुटि की हो।
  • रिट क्या है
    • रिट एक अधिकारिक आदेश है जो न्यायालय जारी कर प्रशासनिक या कार्यपालिका के दायित्व के उल्लंघन या गैर-जोखिमपूर्ण क्रिया-कलापों को रोकता या जारी करता है।
    • यह विशेष रूप से मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की रोकथाम के लिए प्रचलित है ।​
  • मौलिक रिटें (जिन्हें सर्वोच्च/उच्च न्यायालय जारी कर सकता है)
    • Habeas Corpus (बंदी रखना/रिहा करने के लिए)​
    • Mandamus (कार्यपूर्ण आदेश—कर्मचारी/अधिकारिक दायित्व निभाने के लिए)​
    • Prohibition (अधodolist/निषेध—अधिकार क्षेत्र में विवादों के लिए)​
    • Certiorari (क्वेरी/समीक्षा—न्यायिक समीक्षा के लिए)​
    • Quo Warranto (किसी के पदाधिकार के अधिकार का सवाल)​
  • अर्ध-न्यायिक निकाय के विरुद्ध रिट
    • अर्ध-न्यायिक निकाय (quasi-judicial bodies) के निर्णयों के विरुद्ध सामान्यत
    • सीधे रिट की बजाय उच्च न्यायालय/सुप्रीम कोर्ट में वैधानिक पुनर्विचार या अपील/याचनाओं के माध्यम से राहत मिलती है
    • इन निकायों के निर्णय के विरुद्ध रिट के बजाय अपील/रीव्यू अधिक सामान्य प्रचलन है ।​
  • अंतर और सार
    • रिटें: न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से सीधे निष्पादन योग्य आदेश; मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए प्रचलित।
    • अर्ध-न्यायिक निकाय: विशिष्ट क्षेत्रों के लिए विशेषज्ञ निर्णय-निर्माण
    • उनके निर्णय पर अदालतों से अपील/न्यायिक पुनर्विचार संभव, पर रिट के जरिए सीधे रोक लगाने की प्रकृति हमेशा नहीं होती।
  • उदाहरण
    • कानून के अनुसार ITAT, TDSAT आदि अर्ध-न्यायिक निकाय हैं
    • उनके निर्णयों के विरुद्ध अपील/न्यायिक पुनर्विचार संभव होते हैं
    • सामान्य रूप से Habeas Corpus, Mandamus आदि रिटों के सीधे निरसन के लिए।
    • इसके बावजूद कुछ परिस्थितियों में Supreme Court or High Court Habeas Corpus या Mandamus के तहत राहत दे सकता है
    • जब मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो ।​
  • नीति और व्यावहारिक विचार
    • प्रयत्न यह है कि नागरिक को अधिकार और शमन का पर्याप्त उपाय मिले
    • इसलिए न्यायालय केवल वही रिटें जारी करता है
    • जो मौलिक अधिकारों के उल्लंघन, कानूनी दायित्वों के पालन, या तात्कालिक रोकथाम से जुड़ी हों ।​
  • संक्षेप में:
    • जिन रिटों को न्यायिक अदालतें सामान्यतः जारी करती हैं
    • वे Habeas Corpus, Mandamus, Prohibition, Certiorari और Quo Warranto हैं
    • जो न्यायिक निकायों के विरुद्ध विशेष रूप से राहत देने के लिए प्रयुक्त होती हैं ।​
    • अर्ध-न्यायिक निकायों के विरुद्ध रिटें आमतौर पर सीधे नहीं जारी होतीं
    • उनकी निर्णय-प्रक्रिया के विरुद्ध अपील/पुनर्विचार के उपाय अधिक प्रचलित हैं ।​
  • उद्धरण:
    • Habeas Corpus, Mandamus, Prohibition, Certiorari, Quo Warranto की परिभाषा और प्रकृति के लिए देखें: ।​
    • अर्ध-न्यायिक निकाय और उनके विरुद्ध राहत के सिद्धांत के लिए देखें: ।

20. निम्नलिखित में से कौन-सा आज्ञापत्र किसी लोक सेवक को उसके आधिकारिक कर्तव्यों को ठीक से करने या शक्ति का दुरुपयोग न करने का आदेश देने के लिए न्यायालय द्वारा जारी किया जाता है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 17 नवंबर, 2023 (II-पाली), C.P.O.S.I. (T-I) 5 जुलाई, 2017 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) परमादेश (Mandamus)
Solution:
  • वह आज्ञापत्र जो किसी लोक सेवक को उसके आधिकारिक कर्तव्यों को ठीक से करने या शक्ति का दुरुपयोग न करने का आदेश देने के लिए न्यायालय द्वारा जारी किया जाता है, वह है परमादेश (Mandamus)
  • परमादेश का शाब्दिक अर्थ है "हम आदेश देते हैं"।
  • यह रिट तब जारी की जाती है
  • जब कोई सार्वजनिक अधिकारी, निगम, या अधीनस्थ न्यायालय अपने सार्वजनिक कर्तव्य का पालन करने से इनकार करता है या विफल रहता है।
  • यह निजी व्यक्तियों या संस्थानों के विरुद्ध जारी नहीं की जा सकती।
  • परिभाषा और प्रकार
    • writ (आज्ञापत्र): न्यायालय द्वारा किसी लोक सेवक या सरकारी अधिकारी को उसके अधिकार-सीमाओं के भीतर काम करने, कर्तव्यों का प्रदर्शन करने, या कानूनी दायित्वों के अनुरूप कार्य करने के लिए जारी किया गया रिट/आदेश है।
    • यह न्यायालयीय नियंत्रण का एक प्रमुख माध्यम है ताकि प्रशासनिक क्रियाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रहे ।​
  • मुख्य प्रकार:
    • परामर्श writ (Writ of Certiorari): उच्च न्यायालय/सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों या रिकॉर्ड की समीक्षा के लिए।
    • छननी writ (Writ of Prohibition): अवैधानिक या अधिकार-सीमा से बाहर के आर्डर रोकने के लिए।
    • अधिकारात्मक writs (Public Interest Writs): न्यायालय के अधिकार-सीमाओं के भीतर नागरिक अधिकारों की सुरक्षा हेतु।
    • Directives/Compliance writs: किसी सार्वजनिक अधिकारी को उसके कर्तव्यों का पालन कराते हुए निर्देश देने के उद्देश्य से जारी।
  • उदाहरण और उपयोगिता
    • जब किसी लोक सेवक के कर्तव्य के पालन से याचिकाकर्ता को क्षति पहुंचती है
    • नियमित प्रशासनिक उपायों से समाधान संभव नहीं होता, तब न्यायालय सीधे निर्देश दे सकता है
    • अधिकारी अपना कर्तव्य निभाए या विशिष्ट कार्य करें ।​
    • कुछ मामलों में गलत आदेश/उल्लंघन के विरुद्ध अदालत के नियंत्रण की जरूरत पड़ती है
    • ताकि प्रशासनिक कार्यवाही निष्पक्ष और कानूनी ढांचे के भीतर हो सके ।​
  • प्रासंगिकतन और उद्धरण
    • भारत के सन्दर्भ में लोक सेवक द्वारा कर्तव्य के पालन में देरी या असम्पादन पर न्यायालय के हस्तक्षेप से समुचित राहत मिलती है
    • ताकि नागरिक के मौलिक अधिकारों की रक्षा हो सके ।​
    • न्यायिक नियंत्रण के अन्य पहलुओं के बारे में हाईकोर्ट/सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों में भी कहा गया है
    • गलत आदेश merely एक ग़लती हो सकता है
    • परन्तु इसे अपराध के रूप में तुरंत prosecuting का आधार नहीं बनना चाहिए जब तक बाह्य विचारों/परोक्ष निर्देशों का प्रमाण न हो ।​
  • क्लीनअप: सबसे स्पष्ट बिंदु
    • आज्ञापत्र/ writ एक न्यायालयीय निर्देश है जो लोक सेवक को उसके आधिकारिक कर्तव्यों के पालन के लिए बाध्य करता है
    • इसे उद्देश्य के अनुसार न्यायालय के नियंत्रण के भीतर रखा जाता है
    • ताकि प्रशासनिक कार्य निष्पक्ष और कानूनी मानदंडों के अनुरूप हो।
    • यह सीधे कर्तव्य के पालन पर जोर देता है और शक्ति के दुरुपयोग के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करता है ।​