यूजीसी नेट/जेआरएफ परीक्षा, जून-2019 योग (YOGA)

Total Questions: 88

11. प्रश्रोपनिषद् के अनुसार ऋषि सत्यकाम का प्रश्न किस विषय से संबंधित है?

Correct Answer: (c) प्रणव
Solution:

अथर्ववेद की पिप्पलाद शाखा के ब्राह्मण भाग से संबंधित 'प्रश्नोपनिषद् में जिज्ञासुओं द्वारा महर्षि पिप्पलाद से छह प्रश्न पूछे गए हैं - पहला प्रश्न कत्यायन सबन्धी 'भगवान ! यह प्रजा किससे उत्पन्न होती है? दूसरा प्रश्न ऋषि भार्गव हे भगवान ! प्रजा धारण करने वाले देवताओं की संख्या कितनी है और उनमें वरिष्ठ कौन हैं? तीसरा प्रश्न कौसल्य आश्वालायन - 'हे महर्षि ! इस 'प्राण' की उत्पत्ति कहाँ से होती है, यह शरीर में कैसे प्रवेश करता है और कैसे बाहर निकल जाता है तथा कैसे दोनों के मध्य रहता है?

चौथा प्रश्न गार्ग्य ऋषि 'हे भगवान ! इस पुरुष देह में कौन सी इन्द्री शयन करती है और कौन सी जागृत रहती है? कौन सी इन्द्री स्वपन देखती है और कौन-सी सुख अनुभव करती है? ये सब किसमें स्थित हैं? पाँचवा प्रश्न - ऋषि सत्यकाम- 'हे भगवान ! जो मनुष्य जीवन भर 'ॐ' या प्रणव का ध्यान करता है, वह किस लोक को प्राप्त करता है? महर्षि पिप्पलाद हे सत्यकामः यह 'ॐकार' ही वास्तव में 'परब्रह्म' है।

'ॐ' का स्मरण करने वाला ब्रह्मलोक को ही प्राप्त करता है। यह तेजोमय सूर्यलोक ही ब्रह्मलोक है। छठा प्रश्न सुकेशा भारद्वाज- 'हे भगवन !' कौशल देश के राजपुरुष हिरण्यनाभ ने सोलह कलाओं से युक्त पुरुष के बारे में मुझसे प्रश्न किया था, परन्तु मैं उसे नही बता सका। क्या आप किसी ऐसे पुरुष के विषय में जानकारी रखते हैं?

12. 'नाबिन्दु' उपनिषद् के अनुसार ओंकार की कितनी मात्राएँ बताई गई हैं?

Correct Answer: (c) बारह
Solution:

'नाद बिन्दु' उपनिषद के अनुसार प्रारम्भ में 'ॐकार' को हंस के रूप में अभिव्यक्त किया गया है और उसके विविध अंगों का विश्लेषण किया गया है। उसके बाद 'ॐ' की बारह मात्राओं का उल्लेख करते हुए उनके साथ प्राण के विनियोग (सम्बंध) का फल स्थापित किया गया है। तदुपरान्त अनेक प्रकारों और साधना के द्वारा 'नाद' अनुभूति के स्वरूप को समझाया गया है। अन्त में मन के लय होने की स्थिति का वर्णन है।

'ॐकार' प्रणव रुप हंस है। हंस का दक्षिण पंख 'अकार' है और उत्तर पंख 'उकार' है तथा उसकी पूंछ 'मकार' है और अर्धमात्रा उसका शीर्षभाग है। ओंकाररुपी हंस के दोनों पैर 'रजोगुण' एवं 'तमोगुण' हैं और उसका शरीर 'शतोगुण' कहा गया है। उसकी दाई आंख 'धर्म' है और बाई आंख 'अधर्म' है। हंस के दोनों पैरों में भू- लोक (पृथ्वी) स्थित है।

उसकी जंघाओं में भुवः लोक (अन्तरिक्ष) केन्द्रित है। स्वःलोक (स्वर्ग ऊर्ध्व) उसका कटि प्रदेश है और महः लोक (आनन्दलोक) उसकी नाभि में स्थित है। उसके हृदयस्थल में जनलोक और कण्ठ में तपोलोक का वास है। ललाट और भौंहों के मध्य में 'सत्यलोक' स्थित है। इस प्रकार विद्वान साधक प्रणव रूपी हंस पर आसीन होकर अर्थात ओंकार का ज्ञान प्राप्त कर कर्मानुष्ठान तथा ध्यान आदि के द्वारा 'ॐ' का चिन्तन-मनन करता हुआ, सहस्त्रो करोड़ों पापों से मुक्त होकर 'मोक्ष' को प्राप्त कर लेता है।

13. 'त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्' के अनुसार कन्द से निकलने वाली मुख्य नाड़ियाँ कितनी हैं?

Correct Answer: (a) दस
Solution:

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद् के अनुसार कन्द से निकलने वाली मुख्य नाड़ियाँ दस होती हैं। त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद् शुक्ल युजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद् 164 छंद का संचयी कुल के साथ दो अध्याय के रूप में जाना जाता है।

पाठ चार प्रश्नों के समूह के साथ खुलता है, जिनके उत्तर के लिए एक योगी, त्रिशिखी ब्राह्मण, सूर्य की यात्रा करता है। वह पूछता है, शरीर क्या है, आत्म क्या है, जीवन क्या है, और ब्रह्मांड का मूल कारण क्या है?

14. 'योग कुण्डली उपनिषद' में सहित कुम्भक के कितने प्रकार बताये गए हैं?

Correct Answer: (b) चार
Solution:

'योग कुण्डली उपनिषद' में सहित कुम्भक के चार प्रकार बताए गए हैं। किसी भी प्रकार का प्राणायाम करते वक्त तीन क्रिया करते हैं- रेचक, पूरक और कुम्भक। श्वास को अंदर रोकने की क्रिया आंतरिक और बाहर रोकने की क्रिया को बाहरी कुम्भक कहते हैं। कुंभक करते वक्त श्वास को अंदर खींचकर या बाहर छोड़कर रोककर रखा जाता है।

आंतरिक कुंभक के अन्तर्गत नाक के छिद्रों से वायु को अंदर खींचकर जितनी देर तक श्वास को रोककर रखना संभव हो रखा जाता है और फिर धीरे-धीरे श्वास को बाहर छोड़ दिया जाता है। बाहरी कुंभक के अन्तर्गत वायु को बाहर छोड़कर जितनी देर तक श्वास को रोककर रखना संभव हो रोककर रखा जाता है और फिर धीरे-धीरे श्वास को अंदर खींच लिया जाता है।

15. 'योगराज' उपनिषद् के अनुसार षष्ठम् चक्र है

Correct Answer: (d) तालुका चक्र
Solution:

योगियों को योगसिद्धि के लिए 'योगराज' का निरुपण किया जाता है। यह योग, मंत्र, लय, राज तथा हठयोग- इस चार संख्या वाला है। तत्व के द्रष्टा योगियों ने इसके चार प्रकार बताए हैं- आसन, प्राणसंरोध, ध्यान तथा समाधि ।

वत्सराज आदि के द्वारा मंत्र योग सिद्ध किया गया तथा व्यास आदि के द्वारा लययोग को सिद्ध किया गया। योगराज उपनिषद् के अनुसार सभी नौ चक्रों का क्रम निम्नलिखित है-

पहला चक्र - ब्रहाचक्र
दूसरा चक्र - स्वाधिष्ठान चक्र
तीसरा चक्र - नाभि चक्र
चौथा चक्र - हृदय चक्र
पाँचवा चक्र - कष्ट चक्र
छठा चक्र - तालुका चक्र
सातवाँ चक्र - भूचक्र
आठवाँ चक्र - ब्रह्मारन्ध्र चक्र
नौवा चक्र - व्योम चक्र

इन नौ चक्रों में क्रमशः एक-एक ध्यान करने वाले मुनि के हाथ में प्रतिदिन मुक्ति से युक्ति सभी सिद्धियाँ आ जाया करती हैं

16. 'ध्यानबिन्दु' उपनिषद् के अनुसार ओंकार के आकार में कौन से वर्ण और गुण हैं?

Correct Answer: (b) पीत वर्ण और रजोगुण
Solution:

'ध्यान बिन्दु' उपनिषद के अनुसार ओंकार के आकार में पीत वर्ण और रजोगुण के गुण विद्यमान हैं। ओंकार का कूटस्थ एवं सन्निकट क्षेत्र पीतवर्णयुक्त है। योनिमुद्रा के अनवरत अभ्यास से प्राणवायु का संचरण मेरुदण्ड के निम्न भाग में स्थित पृथ्वी केन्द्र से कूटस्थ (भूमध्य केन्द्र) की ओर ऊर्ध्व दिशा में होता है,

इसी कारण से पीतवर्ण दृष्टिगोचर होता है। योनिमुद्रा के अभ्यास से कूटस्थ में दर्शन का मूल प्रयास रजोगुण से उत्पन्न होता है, इसी कारण सर्वप्रथम पीतवर्ण दृष्टिगोचर होता है। उकार सात्विक है एवं शुक्र (श्वेत) वर्ण से युक्त होता है। मकार तामसिक है एवं कृष्ण (स्याह) वर्ण से युक्त होता है।

17. परमेश्वर का स्वरूप व उसकी महिमा श्वेताश्वतर उपनिषद् के किस अध्याय में वर्णित नहीं है?

Correct Answer: (a) द्वितीय अध्याय में
Solution:

परमेश्वर का स्वरुप व उसकी महिमा श्वेताश्वतर उपनिषद् के द्वितीय अध्याय में वर्णित नहीं है। इस उपनिषद् के प्रथम अध्याय में क्षर अक्षर, युक्त अव्यक्त, अज्ञ-ज्ञ, प्रधान-पुरुष आदि का वर्णन है। द्वितीय अध्याय में प्राचीन दृष्टि से योग का निरुपण है। तृतीय से पंचम अध्याय तक शिव (रुद्र) का परम पुरुष के रूप में वर्णन तथा सांख्य, योग और वेदान्त के सिद्धान्तों का प्रतिपादन है। अन्तिम षष्ठम् अध्याय गुरुभक्ति को देवभक्ति का रूप माना गया है।

18. योगसूत्रानुसार 'चित्त परिणामों' का कौन सा क्रम सही है?

Correct Answer: (d) निरोध, समाधि एवं एकाग्रता
Solution:

योगसूत्रानुसार 'चित्त परिणामों' का निम्नलिखित है-
1. निरोध
2. समाधि
3. एकाग्रता

सही क्रम निरोध, समाधि, एकाग्रता इन तीन प्रकार के रुपांतरणों में संयम उपलब्ध करने से अतीत और भविष्य का ज्ञान उपलब्ध होता है। अगर भक्ति 'निरोध' पर एकाग्र होता है, दो विचारों के बीच के अंतराल पर एकाग्र होता है, और अगर उन अंतरालों को जोड़ता चला जाए, उन अंतरालों का संग्रह करता चला जाए तो इसे ही पतंजलि 'समाधि' कहते हैं।

और जब एक ऐसी स्थिति आती है जब व्यक्ति एक हो जाता है- एकाग्र हो जाता है एकाग्रता यदि यह स्थिति घटित हो जाती है तो अतीत और भविष्य का ज्ञान होने लगता है।

19. महर्षि 'पतंजलि' के अनुसार यम नियमों के अनुष्ठान में उत्पन्न बाधा को दूर करने का उपाय निम्न में से क्या है?

Correct Answer: (b) प्रतिपक्ष भावना
Solution:

महर्षि 'पतंजलि' के अनुसार यम् नियमों के अनुष्ठान में उत्पन्न बाधा को दूर करने का उपाय प्रतिपक्ष भावना से है। यमनियमों का पालन करने में कई प्रकार, की विघ्न बाधाएँ हैं, जो हमें योग से विचलित करती हैं। महर्षि पतंजलि कहते हैं- वितर्कबाघने प्रतिपक्षभावनम् ।

(योगसूत्र- 2.33) यम नियमों के अनुष्ठान में, इनके विपरीत हिंसा, असत्य, चोरी, असंयम, परिग्रह तथा अशुचिता, असंतोष, विलासिता, स्वाध्याय का अभाव आत्म विमुखता तथा नास्तिकता ईश्वर से विमुखता अधर्म है। इनके प्रतिपक्ष का चिन्तन करके इनसे बचना चाहिए। साधक को एक बार यह दृढ़ निश्चय कर लेना चाहिए कि मैने इस दुःखमयी संसाराग्नि के ताप से बचने के लिए जो इन हिंसा, असत्य, चोरी, असंयमादि वितकों का परित्याग किया है।

20. 'पातञ्जल' योग सूत्र के अनुसार एकतत्व का अभ्यास किसे दूर करता है?

Correct Answer: (a) विक्षेप
Solution:

'पतंजलि' योग सूत्र के अनुसार एकतत्व का अभ्यास विक्षेप को दूर करता है। पतंजलि के योगसूत्र में वर्णित यह श्लोक इस तथ्य की पुष्टि करता हैं- तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्वाभ्यास । तत्, प्रतिषेधार्थम्, एकतत्व अभ्यासः ।। अर्थात - विक्षेपों को दूर करने के लिए एकतत्व का अभ्यास करना चाहिए।

उन विक्षेपों एवं सह विक्षेपों को रोकने के लिए अथवा सर्वथा हटाने के लिए एकतत्व का अभ्यास करना चाहिए अर्थात शास्त्र द्वारा निश्चित की गई किसी एक पद्धति विशेष, तत्वविशेष का निरन्तर अभ्यास करना चाहिए। एकतत्व के अभ्यास से एकाग्रता निर्मित होगी और आपके चित्त की भूमि विक्षिप्त से एकाग्र बनती जाएगी जिससे आप योग मार्ग पर आगे बढ़ने लग जाएंगे।