यूजीसी नेट/जेआरएफ परीक्षा, जून-2019 योग (YOGA)

Total Questions: 88

21. योग सूत्रानुसार किस अवस्था में स्थित होने पर पूर्वजन्म का ज्ञान होता है?

Correct Answer: (c) अपरिग्रह
Solution:

योगसूत्रानुसार अपरिग्रह की स्थिति में होने पर पूर्वजन्म का ज्ञान होता है। अष्टांग योग - योग के आठ अंग या आठ आयामों वाला मार्ग है, जिसमें आठों आयामों का अभ्यास एक साथ किया जाता है।

(1) यम पाँच सामाजिक नैतिकता। (a) अहिंसा (b) सत्य (c) अस्तेय (d) ब्रह्मचर्य (e) अपरिग्रह अपरिग्रह - आवश्यकता से अधिक संचय नही करना और दूसरों की वस्तुओं की इच्छा नहीं करना। इसी सद्‌गुण के कारण ही पूर्वजन्म का ज्ञान होता है।

(2) नियम - पाँच व्यक्तिगत नैतिकता। (a) शौच (b) संतोष (c) तप (d) स्वाध्याय (e) ईश्वर प्राणिधान (3) आसन - योगासनों द्वारा शारीरिक नियंत्रण (4) प्राणायाम- श्वास लेने सम्बन्धी खास तकनीकों द्वारा प्राण का नियंत्रण।

(5) प्रत्याहार - इन्द्रियों को अंतर्मुखी करना।

(6) धारणा एकाग्रचित होना।

(7) ध्यान निरंतर ध्यान।

(8) समाधि-आत्मा से जुड़ना, शब्दों से परे परम चैतन्य की अवस्था

22. महर्षि पतंजलि ने 'प्रच्छर्दनविधारणाभ्याम् वा प्राणस्य' सूत्र में किसका उपाय बताया गया है?

Correct Answer: (b) चित्तशुद्धि
Solution:

महर्षि पतंजलि ने 'प्रच्छर्दनविधारणाभ्याम् वा प्राणस्य' सूत्र में चित्ताशुद्धि का उपाय बताया है। चित्त शुद्धि परम आवश्यक है। जब चित्त शुद्ध हो जाता है, उसके बाद बुरे विचार बंद हो जाते हैं। जब तक चित्त में अशुद्धि रहती है, तब तक उनका समूल नाश नहीं होता है, इसलिए वे समय-समय पर प्रकट होते रहते हैं।

अतः साधक को चाहिए कि अपने अन्तःकरण को शुद्ध बनाए अर्थात किसी भी प्राणी का अहित न तो क्रिया द्वारा, न वाणी द्वारा और न ही मन के द्वारा करें। सबका हित हो वही कार्य करें और सबका भला हो वही भाव रखें। ऐसा करने से राग द्वेष का नाश होने पर चित्त शुद्ध हो जाता है।

23. योग सूत्रानुसार किस पर विजय से योगी का शरीर दैदीप्यमान्हो जाता है?

Correct Answer: (a) समान वायु
Solution:

योग सूत्रानुसार समान वायु पर विजय से योगी का शरीर देदीप्यमान् हो जाता है। जब योगी श्वास लेते हैं तो भीतर जा रही हवा या वायु पांच भागों में विभक्त हो जाती है। जिसे पंचक के नाम से जाना जाता है। ये पंचक निम्न हैं -

1. व्यान वायु,
2. समान वायु,
3. अपान वायु,
4. उदानवायु,
5. प्राण वायु

वायु के इस पांच तरह के रुप बदलने के कारण ही व्यक्ति की चेतना में जागरण रहता है, स्मृतियाँ सुरक्षित रहती है, पाचन क्रिया सही चलती रहती है और हृदय में रक्त प्रवाह होता रहता है। इसके कारण ही मन के विचार बदलते रहते या स्थिर रहते हैं। मन मस्तिष्क, चरबी मांस, आंत, गुर्दे, मस्तिष्क, श्वास नलिका, स्नायुतंत्र और खून आदि सभी प्राणायाम से शुद्ध और पुष्ट रहते हैं। इसके नियंत्रण में रहने से मन और शरीर नियंत्रण में रहता है।

1. व्यान-व्यान का अर्थ जो चरबी तथा मांस का कार्य करती है।
2. समान समान नामक संतुलन बनाए रखने वाली वायु का कार्य हड्डी में होता है। हड्डियों से ही सन्तुलन बनता है।
3. अपान अपान का अर्थ नीचे जाने वाली वायु । यह शरीर के रस में होती है।
4. उदान-उदान का अर्थ ऊपर ले जाने वाली वायु । यह हमारे स्नायुतंत्र में होती है।
5. प्राण-प्राण वायु हमारे शरीर का हालचाल बताती है। यह वायु मूलतः खून में होती है।

प्राणायाम करते या श्वास लेते समय हम तीन क्रियांए करते हैं -
1. पूरक
2.कुम्भक
3. रेचक ।

24. पातञ्जल योग सूत्रानुसार सूक्ष्म, व्यवधानयुक्त एवं दूर देश में स्थित वस्तुओं की ज्ञान प्राप्ति का उपाय क्या है?

Correct Answer: (b) ज्योतिष्मती प्रवृत्ति
Solution:

पतंजलि योग सूत्रानुसार सूक्ष्म, व्यवधानयुक्त एवं दूर देश में स्थित वस्तुओं की ज्ञान प्राप्ति का उपाय ज्योतिष्मती प्रवृत्ति है। विशोका वा ज्योतिष्मती ।।36।। विशोका ज्योतिष्मती प्रवृत्ति चित्त को स्थिर अवस्था प्राप्त कराती है। चित्त को दुःख रहित अवस्था में लाने का एक अन्य साधन इस सूत्र में किया गया है।

विशोका का नामान्तर ज्योतिष्मती है। परम सुखमय सात्विक भाव का अभ्यस्त होने पर उसके द्वारा चित्त अवसिक्त रहता है, अतः इसका नाम विशोका है। सात्विक प्रकाश या ज्ञानलोक के आधिक्य के कारण इसका नाम ज्योतिष्मती है।

25. 'हठप्रदीपिका' के अनुसार महाक्लेश एवं मृत्यु का भय निम्न में से किस मुद्रा के अभ्यास से दूर होता है?

Correct Answer: (a) महामुद्रा
Solution:

'हठप्रदीपिका के अनुसार महाक्लेश एवं मृत्यु का भय महामुद्रा आसन के अभ्यास से दूर होता है। महामुद्रा अभ्यास के निम्नलिखित लाभ हैं -
1. यह आसन दमा, क्षय, कुष्ठ, बवासीर आदि रोगों में बहुत लाभकारी है।
2. इस आसन के नियमित अभ्यास से पेट पतला होता है।
3. जंघा भाग, रीढ़, कमर, कंधे, फेफड़े बलवान होते हैं।
4. सुषुम्ना नाड़ी अच्छी तरह से चलने लगती है।
5. इस आसन से शरीर में जमी अतिरिक्त चर्बी दूर होने लगती है।
6. कमर और पैरो के दर्द दूर होते हैं। यह आसन लाभ की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है।
7. इस आसन से शरीर में स्फूर्ति आती है।

26. 'हठप्रदीपिका'के अनुसार लय का लक्षण क्या है?

Correct Answer: (d) विषय विस्मृति
Solution:

हठप्रदीपिका योग का एक अनुपम ग्रन्थ है। जिसके रचयिता स्वामी स्वात्माराम हैं। हठयोग साधना के उद्देश्य को बताते हुए स्वामी स्वात्माराम कहते हैं कि इस "हठयोग साधना का उपदेश केवल राजयोग की प्राप्ति के लिए किया जाता है।" इसमें चार उपदेशों, अध्यायों में योग के चार अंगों या प्रकारों का वर्णन किया गया है।

हठप्रदीपिका में सभी अध्यायों को उपदेश कहा गया है। इनमें योग के निम्न अंगों का वर्णन किया गया है।
1. आसन
2. प्राणायाम
3. मुद्रा
4. नादानुसंधान

हठप्रदीपिका के अनुसार लय का लक्षण विषय विस्मृति है।

27. 'हठप्रदीपिका'के अनुसार कुलवधू किसे कहा गया है?

Correct Answer: (e) *
Solution:

प्रश्न पत्र में पूछे गए इस प्रश्न को परीक्षा संस्था NTA ने अंतिम उत्तर कुंजी में निरस्त (Cancelled) कर दिया है।

28. सिद्धसिद्धांत पद्धति में प्राणायाम के कितने प्रकारों का उल्लेख किया गया है?

Correct Answer: (b) चार
Solution:

सिद्ध सिद्धांत पद्धति में प्राणायाम के कुल 4 प्रकारों का उल्लेख किया गया है। सिद्ध सिद्धांत छह मुख्य शैव दार्शनिक परंपराओं में से एक है। अपने संस्थापक गुरु गोरखनाथ के बाद इसे गोरक्षनाथ शिववाद के रूप में भी जाना जाता है।

सिद्ध सिद्धांत पद्धति का अर्थ है प्रत्यक्ष अनुभूत सत्य के निश्चित मत का सूक्ष्म मार्ग एकांत स्थान में गुरु के द्वारा निर्दिष्ट साधना के आश्रयण, से गहन ध्यानावस्था में स्थित रहने से उसका अनुभव होने लगता है तथा इसका समापन पूर्णता अथवा समाधि में होता है।

सिद्ध सिद्धांत पद्धति में छह विषय पर गहन विचार किया गया है -
1. पिण्ड की उत्पत्ति
2. पिण्ड विचार
3. पिण्ड ज्ञान
4. पिण्ड के आधार
5. पिण्ड पद का समरस भाव
6. अवधूत योगी के लक्षण अधिकारी एवं अनाधिकारी शिष्य ।

29. निम्नलिखित में से कौन से ग्रन्थ में नौ कुम्भक का उल्लेख किया गया है?

Correct Answer: (c) हठरत्नावली
Solution:

'हठरत्नावली' ग्रन्थ में नौ कुम्भक का उल्लेख किया गया है। हठयोग की अवधि 9वीं सदी से 18वीं सदी तक मानी जाती है। इसका विकास 14वीं सदी के दौरान अपने चरम पर था। हठयोग के संस्थापक आदिनाथ थे।

विभिन्न हठयोगी और योग पर उनके द्वारा लिखी गई पुस्तकें निम्नलिखित हैं-
1. मत्स्येंद्रनाथ (9वीं सदी) काल ज्ञान निर्णय
2.गोरखनाथ (9वीं सदी) गोरक्षा शतक
3. चौरंगीनाथ (11वीं सदी) चौरंगी शतक
4. स्वात्माराम (14वीं सदी) हठ प्रदीपिका
5. घेरांद (15वीं सदी) घेरांद संहित
6. श्रीनिवास भट्ट (17वीं सदी) - हठ रत्नावली

30. सर्वांग-शोधन किसके द्वारा किया जा सकता है?

Correct Answer: (d) बस्ति और भस्त्राकर्म
Solution:

सर्वांग- शोधन बस्ति और भत्राकर्म द्वारा किया जा सकता है। षट्कर्म (अर्थात छः कर्म) हठयोग में बतायी गयी छः क्रियाएँ हैं। षट्‌कर्म द्वारा सम्पूर्ण शरीर की शुद्धि होती है एवं देह निरोग रहता है।

ये षटकर्म निम्नलिखित हैं -
1. नेति
2. धौति
3. नौलि
4. बस्ति
5. कपालभाति
6. त्राटक

यह क्रिया दो प्रकार की होती है- जल बस्ति और स्थल बस्ति। जल बस्ति में गुदा के अंदर जल का आंकुचन किया जाता हैः इस क्रिया में बड़ी आंत में मौजूद मल को पानी की मदद से बाहर निकाला जाता है। जबकि स्थल बस्ति में अश्विनी मुद्रा में गुदामार्ग का आंकुचन किया जाता है।