यूजीसी नेट/जेआरएफ परीक्षा, जून-2019 योग (YOGA)

Total Questions: 88

31. निम्नलिखित में से किस आसन का सिद्धसिद्धांत पद्धति में उल्लेख नहीं किया गया है?

Correct Answer: (b) उग्रासन
Solution:

'उग्रासन' आसन का सिद्धसिद्धांत पद्धति में उल्लेख नहीं किया गया है। 'उग्रासन' को 'पश्चिमोत्तानासन' भी कहा जाता है। यह आसन बहुत ही उपयोगी आसन है। इसे पश्चिमोत्तानासन इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि यह पूरब की ओर बैठकर किया जाता है। हठयोग प्रदीपका एवं घेरण्ड संहिता दोनों में इस आसन का वर्णन है। हठप्रदीपिका में कहा गया है कि "प्रसार्य पादौ भुवि दण्डरुपो डोभर्या पादग्रद्धितंय गृहीत्वा ।

जानुपरिनयस्तललाट वसेदिंद पश्चिमतानमा ।।" अर्थात दोनों पाँव को भूमि पर दण्ड के समान फैलाकर हाथों से दोनों अँगूठों को पकड़कर घुटनों पर मस्तक लगाकर रखने को पश्चिमोत्तानासर या उग्रासन कहते हैं। घेरण्ड संहिता में कहा गया है कि - "प्रसार्य पादौ भुवि दण्डरुपों सन्यस्तभालनिश्चितयुग्ममध्ये ।

यत्येन पदो च धृतौ कराभ्यां योगिदंरपीठ पश्चिमोत्तानमाहुः ।। भूतल पर अपने दोनों पैरो को दंडवत अर्थात सीधे फैलाकर दोनों हाथों से यत्नपूर्वक पैरो को पकड़ते हुए घुटनों के मध्य में सिर को स्थापित कर स्थिर भाव से अवस्थित होने को योगीश्रेष्ठों ने पश्चिमोत्तानासन कहा है।

32. घेरण्डसंहिता के अनुसार बहिष्कृत धौति किसका प्रकार है?

Correct Answer: (c) अन्तधौति
Solution:

घेरण्डसंहिता के अनुसार बहिष्कृत धौति, अन्तधौति का प्रकार है। धौति हठयोग में बताए गए षट्कर्मों में से एक कर्म है। धौति बारह प्रकार की होती है-

1. वातसार धौति
2. वारिसार धौति
3. बहिष्सार धौति
4. बहिष्कृत धौति
5. दन्तमूल धौति
6. जिव्हामूल धौति
7. कर्णरन्ध्र धौति
8. कपाल रन्ध्र धौति
9. दण्ड धौति
10. वमन धौति
11. वस्त्र धौति
12. मूलशोधन धौति

33. 'घेरण्डसंहिता' में दन्तमूलधौति के लिये किस रस का प्रयोग बताया गया है?

Correct Answer: (b) खदिर रस
Solution:

'घेरण्ड संहिता' में धौतिकर्म के चार निम्न भेद हैं-
1. अन्त धौति,
2. दन्त धौति,
3. हृदधौति,
4. मूलशोधन दन्त धौति

यह भी चार प्रकार की होती है -
(a) दन्तमूल धौति, (b) जिह्वामूल धौति (c) कर्णरन्ध्र धौति (d) कपालरन्ध्र धौति

दन्तमूल धौति  - खैर का रस का खादिर रस सूखी मिट्टी अथवा अन्य किसी औषधि विशेष से दांतों की जड़ों को अच्छी प्रकार साफ किया जाता है।

जिह्वामूल धौति - तर्जनी, मध्यमा और अनामिका अंगुलियों को गलें के भीतर डालकर जीभ को जड़ तक बार-बार घिसा जाता है। इस प्रकार धीरे-धीरे कफ बाहर निकल जाता है।

कर्णरन्ध धौति - तर्जनी और अनामिका अंगुलियों के योग से दोनों कानो के छिद्रों को साफ किया जाता है, इससे एक प्रकार का नाद प्रकट होता है।

कपालरन्ध धौति - निद्रा से उठने पर, भोजन के अन्त में और सूर्य के अस्त होने पर सिर के गढ़े को दाहिने हाथ के अंगूठे द्वारा प्रतिदिन जल से साफ किया जाता है। इससे नाड़ियाँ स्वच्छ हो जाती हैं और दृष्टि दिव्य होती है।

34. 'घेरण्डसंहिता' के अनुसार किस आसन से कुण्डलिनी जागरण संभव है?

Correct Answer: (a) भुजंगासन
Solution:

'घेरण्डसंहिता' के अनुसार भुजंगासन से कुण्डलिनी जागरण संभव है। भुजंगासन, सूर्य नमस्कार के 12 आसनों में से 8वां आसन है। भुजंगासन को सर्पासन, कोबरा आसन या सर्प मुद्रा भी कहा जाता है। इस मुद्रा में शरीर सांप की आकृति बनाता है।

भुजगांसन आसन के निम्नलिखित लाभ हैं-

1. रीढ़ की हड्डी में मजबूती और लचीलापन बढ़ सकता है।
2. पेट के निचले हिस्से में मौजूद सभी अंगों के काम करने की क्षमता बढ़ सकती है।
3. पाचन तंत्र, मूत्र मार्ग की समस्याएं दूर होती हैं और यौनशक्ति बढ़ती है।
4. मेटॉबालिज्म सुधरता है और वजन कम करने में मदद मिल सकती है।
5. कमर का निचला हिस्सा मजबूत बनाया जा सकता है।
6. साइटिका और अस्थमा की बिमारी में भी राहत मिलती है।

35. निम्नलिखित में से किसमें प्रोटीन की सर्वाधिक मात्रा होती है?

Correct Answer: (a) सोयाबीन
Solution:

प्रोटीन हमारे शरीर को अच्छे प्रकार से कार्य करने के लिए आवश्यक पोषक तत्व है। प्रोटीन हमारे शरीर में हर कोशिका का हिस्सा है और मांसपेशियों, ऊतक, त्वचा, नाखून और बालों के निर्माण और मरम्मत के लिए आवश्यक हैं। प्रोटीन हार्मोन और एंजाइम बनाने में भी मदद करता है। बच्चों के विकास के लिए प्रोटीन अत्यधिक आवश्यक है।

तिलहन की फसल सोयाबीन में सबसे अधिक प्रोटीन पाया जाता है इसलिए इसे शाकाहारी मनुष्यों का मांस भी कहा जाता है। सोयाबीन में 38-40% प्रोटीन, 22 प्रतिशत तेल, 21 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 12 प्रतिशत नमी तथा 5 प्रतिशत भस्म होती है। मनुष्य के पोषण के लिए सोयाबीन उच्च गुणवत्ता युक्त प्रोटीन का एक अच्छा स्रोत है। इसके बाद मूंग की दाल में प्रोटीन सबसे अधिक पाया जाता है जिसमें प्रोटीन लगभग 24% होता है।

36. व्यक्तित्व के पदानुक्रम प्रारूप के प्रणेता कौन हैं?

Correct Answer: (a) मैस्लो
Solution:

व्यक्तित्व के पदानुक्रम प्रारुप के प्रणेता एब्राहम मैसलो हैं। एब्राहम मैसलो मानवतावादी मनोविज्ञान के आध्यात्मिक जनक माने गए हैं। मैसलो ने अपने व्यक्तित्व सिद्धांत में प्राणी के अनूठापन का उसके मूल्यों के महत्व पर तथा व्यक्तिगत वर्धन तथा आत्म निर्देश की क्षमता पर सर्वाधिक बल डाला है। इस बल के कारण ही उनका मानना है कि सम्पूर्ण प्राणी का विकास उसके भीतर से संगठित ढंग से होता है। इन आन्तरिक कारकों की तुलना में बाह्य कारकों जैसे गत अनुभूतियों का महत्व नगण्य होता है।

मैसलो के व्यक्तित्व सिद्धांत का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उसका अभिप्रेरण सिद्धांत है। इनका विश्वास था कि अधिकांश मानव व्यवहार की व्याख्या कोई न कोई व्यक्तिगत लक्ष्य पर पहुंचने की प्रवृत्ति से निर्देशित होता है। मैसलो का मत था कि मानव अभिप्रेरक जन्मजात होते हैं और उन्हें प्राथमिकता या शक्ति के आरोही पदानुक्रम में सुव्यवस्थित किया जा सकता है।

37. दुर्भीति (Phobia) कौन सा विकार है?

Correct Answer: (a) सामान्य चिंता विकार
Solution:

दुर्भीति अर्थात् फोबिया एक सामान्य चिंता विकार है। यह एक प्रकार का मनोविकार होता है जिसमें व्यक्ति को विशेष वस्तुओं, परिस्थितियों या क्रियाओं से डर लगने लगता है। यानि उनकी उपस्थिति में घबराहट होती है जबकि वे चीजें उस वक्त खतरनाक नहीं होती हैं। यह एक प्रकार की चिन्ता की बिमारी है। इस बिमारी में पीड़ित व्यक्ति को हल्के अनमनेपन से लेकर डर के खतरनाक दौरे तक पड़ सकते हैं।

दुर्भीति की स्थिति में व्यक्ति का ध्यान कुछ एक लक्षणों पर केन्द्रित हो सकता है, जैसे दिल का जोर-जोर से धड़कना या बेहोशी महसूस होना। इन लक्षणों से जुड़े हुए कुछ डर होते हैं जैसे मर जाने का भय, अपने ऊपर नियंत्रण खो देने या पागल हो जाने का डर आदि।

38. व्यक्तित्व के मनोविश्लेषणात्मक सिद्धान्त के जनक कौन हैं?

Correct Answer: (a) फ्रायड
Solution:

व्यक्तित्व के मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत के जनक आस्ट्रिया के मनोवैज्ञानिक सिग्मंड फ्रायड हैं। यह फ्रायड द्वारा विकसित मनोवैज्ञानिक विचारों (उपायों) का समुच्चय है जिसमें कुछ अन्य मनोवैज्ञानिकों ने भी आगे योगदान किया। मनोविश्लेषण मुख्यतः मानव के मानसिक क्रियाओं एवं व्यवहारों के अध्ययन से संबंधित है किन्तु इसे समाजों के ऊपर भी लागू किया जा सकता है।

मनोविश्लेषण के तीन उपयोग हैं -
1. यह मस्तिष्क की परीक्षा की विधि प्रदान करता है।
2. यह मानव व्यवहार से संबंधित सिद्धान्तों का क्रमबद्ध समूह प्रदान करता है।
3. यह मनोवैज्ञानिक या भावनात्मक रोगों की चिकित्सा के लिए उपाय सुझाता है।

39. एक योगाभ्यासी को मिताहार करते समय उदर का कितना भाग रिक्त रखना चाहिए?

Correct Answer: (b) एक चौथाई भाग
Solution:

एक योगाभ्यासी को मिताहार करते समय उदर का एकचौथाई भाग रिक्त रखना चाहिए। योगिक ग्रंथों के अनुसार हमें सात्विक आहार और मिताहार ही करना चाहिए। सात्विक आहार का मतलब है शुद्ध शाकाहारी और सुपाच्य खाना ही हमें खाना चाहिए। मिताहार का मतलब होता है कि पूरे पेट में जितना खाना आता है।

उसका तीन-चौथाई भाग ही भोजन से भरना चाहिए शेष एक-चौथाई भाग पानी के लिए छोड़ना चाहिए जो घंटे से 45 मिनट के अन्दर पीना चाहिए। हठयोगी ग्रंथों में कहा गया है कि यदि योगाभ्यासी ऐसा भोजन करता है तो वह स्वस्थ, तंदुरुस्त और प्रतिदिन की कार्यविधि में ऊर्जावान महसूस करेगा।

40. मंद और गुरु गुणयुक्त आहार किस प्रकृति के व्यक्तियों के लिए निषिद्ध हैं?

Correct Answer: (c) कफज प्रकृति
Solution:

मंद और गुरू गुणयुक्त आहार कफ्ज प्रकृति के व्यक्तियों के लिए निषिद्ध हैं। मधुर होने के कारण कफ प्रकृति वाले मनुष्य अधिक शुक्र वाले, अधिक मैथुन करने में समर्थ और अधिक संतान वाले होते है। सार गुण होने से और संगठित एवं स्थिर शरीर वाले होते है। कफ के सान्द्र गुण होने से कफ् प्रकृति वाले मनुष्य के सभी अड्ग पुष्ट और परिपूर्ण होते हैं।

कफ के मन्द गुण होने से कफ प्रकृति वाले मन्द, चेष्टा, अल्प आहार-विहार करने वाले होते हैं। कफ के स्तिमित गुण होने से कफ प्रकृति वाले मनुष्य किसी भी कार्य को शीघ्र नहीं करते हैं। कभी भी उनके मन में क्षोभ एवं विकार नही होते अथवा देर से और कम होते हैं। कफ् के गुरू गुण होने के कारण कफ् प्रकृति वालों की गति दृढ़ और निश्चित रुप से होती है। कफ के शीत गुण होने के कारण कफ प्रकृति वाले मनुष्य को भूख, प्यास, ताप, पसीना और दोष कम कष्ट देते हैं।