Solution:'घेरण्ड संहिता' में धौतिकर्म के चार निम्न भेद हैं-
1. अन्त धौति,
2. दन्त धौति,
3. हृदधौति,
4. मूलशोधन दन्त धौति
यह भी चार प्रकार की होती है -
(a) दन्तमूल धौति, (b) जिह्वामूल धौति (c) कर्णरन्ध्र धौति (d) कपालरन्ध्र धौति
दन्तमूल धौति - खैर का रस का खादिर रस सूखी मिट्टी अथवा अन्य किसी औषधि विशेष से दांतों की जड़ों को अच्छी प्रकार साफ किया जाता है।
जिह्वामूल धौति - तर्जनी, मध्यमा और अनामिका अंगुलियों को गलें के भीतर डालकर जीभ को जड़ तक बार-बार घिसा जाता है। इस प्रकार धीरे-धीरे कफ बाहर निकल जाता है।
कर्णरन्ध धौति - तर्जनी और अनामिका अंगुलियों के योग से दोनों कानो के छिद्रों को साफ किया जाता है, इससे एक प्रकार का नाद प्रकट होता है।
कपालरन्ध धौति - निद्रा से उठने पर, भोजन के अन्त में और सूर्य के अस्त होने पर सिर के गढ़े को दाहिने हाथ के अंगूठे द्वारा प्रतिदिन जल से साफ किया जाता है। इससे नाड़ियाँ स्वच्छ हो जाती हैं और दृष्टि दिव्य होती है।