यूजीसी नेट/जेआरएफ परीक्षा, जून-2019 योग (YOGA)

Total Questions: 88

41. उस रोग का नाम बताइए, जिसका योग अभ्यास द्वारा प्रत्यक्ष रूप से उपचार किया जा सकता है।

Correct Answer: (d) एलर्जिक राइनाईटिस
Solution:

एलर्जिक राइनाईटिस ऐसा रोग है जिसका योग अभ्यास द्वारा प्रत्यक्ष रुप से उपचार किया जा सकता है। एलर्जिक राइनाइटिस बुखार के रूप में भी जाना जाता है। इसके लक्षणों में छींकने, आंख मैं पानी, नाक में खुजली, और दर्द, गले में खरोंच शामिल है।

प्राकृतिक वैकल्पिक तरीकों का उपयोग करके चिकित्सा उपचार के बिना एलर्जिक राइनाइटिस को काबू किया जा सकता है। एलर्जी के लक्षणों को कम करने के लिए, बहुत कम पानी के साथ कम वसा, उच्च कार्बोहाइड्रेट आहार की सलाह दी जाती है।

42. "दुःख- दौर्मनस्य- अंगमेजयत्व श्वास - प्रश्वास विक्षेपसहभुवः" यह पतंजलि योग सूत्र किसके लक्षणों के बारे में बतलाता है?

Correct Answer: (b) भौतिक शरीर
Solution:

"दुःख दौमैनस्य अंगमेजयत्व श्वास प्रश्वास विक्षेपसहभुवः" यह पतंजलि योग सूत्र में भौतिक शरीर के लक्षणों के बारे में बताता है। मनुष्य का शरीर जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी और आकाश इन पाँच तत्वों से निर्मित होता है। मृत्यु के पश्चात् जब मनुष्य स्युल शरीर को छोड़कर सूक्ष्म शरीर धारण करता है तो इसमें मात्र दो तत्व शेष रह जाते हैं- वायु और आकाश तत्व। स्थूल शरीर यानी भौतिक शरीर नश्वर शरीर है जो जीव जन्म के समय धारण करता है। यह पाँच तत्वों का बना होता है।

यहा भौतिक शरीर आत्मा का अस्थाई निवास है जो मृत्यु के समय नष्ट हो जाता है। सूक्ष्म और कारण शरीर को हम इंद्रियों द्वारा नही जान सकते इसलिए हम सोचते हैं कि स्थूल शरीर ही सब कुछ है। यह जड़ है, इसमें चेतनता नहीं है। इसी के माध्यम से आत्मा जड़ पदार्थों के सुख दुःख का अनुभव करती है। वैदिक परंपरा में स्थूल शरीर महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यही परमात्मा की प्राप्ति का साधन है।

43. आप योग कक्षा के आयोजन के लिए सर्वप्रथम क्या करते हैं?

Correct Answer: (c) परिवेश का निर्माण
Solution:

योग एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसमें शरीर, मन और आत्मा को एक साथ लाने (योग) का काम होता है। इसलिए जब भी योग कक्षा का आयोजन किया जाता है तब सर्वप्रथम परिवेश का निर्माण आवश्यक करता है। पतंजलि योग दर्शन के अनुसार योगश्चिन्तवृत्त निरोधः अर्थात चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।

सांख्या दर्शन के अनुसार पुरुष एवं प्रकृति के पार्थक्य को स्थापित कर पुरुष का स्व स्वरुप में अवस्थित होना ही योग है। इस प्रकार उपर्युक्त सभी योग की परिभाषा से स्पष्ट है कि योग करना जितना महत्वपूर्ण हैं उतना ही योग करने के लिए उचित परिवेश का होना महत्वपूर्ण है।

44. 'भगवद्‌गीता' के अनुसार ध्यान में बैठने की व्यवस्था में प्रयुक्त होने वाली सामग्रियों का क्रम है

Correct Answer: (d) कुशाघास, चर्म, कपड़ा
Solution:

'भगवदगीता' के अनुसार ध्यान एक योगाक्रिया है. विद्या है, तकनीक है, आत्मानुशासन की एक युक्ति है जिसका प्रयोजन है, एकाग्रता, तनावहीनता, मानसिक स्थिरता व संतुलन धैर्य और सहनशक्ति प्राप्त करना। ध्यान अपने अंदर में ही रमण करने का, अपनी अंतश्चेतना को विकसित करने का, बाहरी विकारों से मुक्त होकर मन की निर्मलता प्राप्त करने का एक उपक्रम है।

गीता के पांचवे एवं छठे अध्याय में ध्यान योग की सरल विधि संक्षेप में वर्णित है। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं -

1.किसी शुद्ध या पवित्र स्थान पर आसन बिछा लेना चाहिए। यह बैठने का स्थान न तो बहुत ऊंचा होना चाहिए और न बहुत नीचा।
2. बैठने का आसन सर्वप्रथम कुशाघास का होना चाहिए। इसके अनुपस्थिति में चर्म या कपड़ा भी हो सकता है। 3. इस आसन पर बैठकर मन और इन्द्रियों की क्रियाओं पर नियंत्रण करने का प्रयत्न करना चाहिए ताकि मन में एकाग्रता आ जाए। फिर अंतःकरण की शुद्धि के लिए ध्यान योग का अभ्यास करना चाहिए।

45. निम्नलिखित में से कौन सा आसन संतुलनात्मक नहीं है?

Correct Answer: (d) एकपादस्कन्धासन
Solution:

एक पाद स्कन्धासन संतुलनात्मक आसन नही है। इस आसन का शाब्दिक अर्थ है- पाद अर्थात पैर को स्कंध अर्थात कंधे से मिलाना। इस आसन को करते समय जमीन पर समानांतर पैर फैलाकर बैठ जाएँ। अब एक पैर धीरे-धीरे उठाकर कंधे पर रखना है। इसके लिए नए अभ्यासी पहले दोनों पैर थोड़े थोड़े मोड़ लें, क्योंकि यह अभ्यास असंतुलनात्मक है।

अब दाहिने पैर के टखने को पकड़े और धीरे-धीरे सिर के ऊपर से दाहिने पैर (पिंडली) को कंधे पर रखने की कोशिश करें। याद रहे दूसरा पैर सीधा जमीन से सटा रहे। एक पैर कंधे पर रखते समय श्वास छोड़े। इस स्थिति को एक पाद स्कंघासन कहते हैं। इस आसन के निम्नलिखित लाभ हैं
1. मेरुदण्ड को अधिक मात्रा में रक्त मिलता है, जिससे संतुलन बनाए रखने वाले चक्रों को ऊर्जा शक्ति मिलती है।
2. कमर एवं नितम्बों में लोच पैदा होती है।
3. प्रजनन-तंत्र सम्बंधी विकार नष्ट होते हैं।
4. शरीर अधिक सुदृढ़ होता है और यह रक्त शुद्धीकरण में बहुत सहयोग प्रदान करता है।

इसके अतिरिक्त वृक्षासन, ताड़ासन, गरुड़ासन, चक्रासन, चंद्रासन, त्रिकोणासन, नटराज आसन, एक पाद विराम आसन, उत्कटासन, उत्तानासन आदि सभी आसन खड़े होकर किए जाने वाले आसन हैं जो संतुलनात्मक हैं।

46. उड्डियान बांध के अभ्यास में मुख्यतः कौन सी माँसपेशियाँ प्रभावित होती हैं?

Correct Answer: (a) उदरीय पेशियाँ
Solution:

उड्डियान बंध के अभ्यास में मुख्यतः उदरीय पेशियाँ प्रभावित होती हैं। उदरीय शाखा के गामक तन्तुओं के कोशिकाकाय मेरुदंड के अन्दर उदरीय सींग में पाये जाते हैं। अतः इन्हे उदरीयसींग कोशिकाएँ भी कहा जाता है। पृष्ठशाखा के तन्तुओं के कोशिकाकाय मेरुदंड के बाहर और उदरीय शाखा के तन्तुओ के कोशिकाकाय मेरुदंड के अन्दर पाये जाते हैं।

47. 'श्रीमद्भगवदगीता' के अनुसार योग शब्द के अर्थ हैं

(A) समाधि
(B) कर्मसुकौशलम्
(C) जीव-परमात्मा योग
(D) समत्व भाव

सही विकल्प चुनिए:

Correct Answer: (b) (B) और (D)
Solution:

'श्रीमद्भगवदगीता' के अनुसार योग शब्द के अर्थ को निम्नलिखित श्लोक के मध्यम से स्पष्ट किया गया है - 'योगः कर्मसु कौशलम्' अर्थात समत्व रुप योग ही कर्मों में कुशलताः है। बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते । जस्माधोगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम।। अर्थात समबुद्धि युक्त पुरुष पुण्य और पाप दोनों को इसी श्लोक में त्याग देता है। अर्थात उनसे मुक्त हो जाता है।

इससे तू समृत्व योग में लग जा, यह समत्व रुप योग ही कर्मों में कुशलता है अर्थात कर्मबंध से छूटने का उपाय है। समत्वयोग विषयक बुद्धि से युक्त हुआ पुरुष अन्तःकरण की शुद्धि के और ज्ञान प्राप्ति के द्वारा सुकृतदुष्कृत को पुण्य पाप दोनों को यही त्याग देता है। इसी लोक में कर्मबन्धन से मुक्त हो जाता है। इसलिए तू समत्वबुद्धिरुप योग की प्राप्ति के लिए यत्न कर चेष्टा कर।

48. 'मुण्डकोपनिषद्' के अनुसार हृदय ग्रन्थियों के छेदन का क्या परिणाम होता है?

(A) समाधि प्राप्त होती है
(B) सभी संशयों का निवारण करता है
(C) सभी पूर्व कर्मों को समूल समाप्त करता है
(D) समृद्धता प्राप्त होती है

सही विकल्प चुनिए:

Correct Answer: (b) (B) और (C)
Solution:

'मुण्डकोपनिषद' के अनुसार हृदय ग्रन्थियों के छेदन का निम्नलिखित परिणाम होता है - 1. सभी संशयों का निवारण करता है। 2.सभी पूर्व कर्मों को समूल समाप्त करता है। मुंडकोपनिषद् दो-दो खंडो के तीन मुंडकों में, अथर्ववेद के मंत्र भाग के अन्तर्गत आता है। इसमें पदार्थ और ब्रह्म विद्या का विवेचन है, आत्मा परमात्मा की तुलना और समता का भी वर्णन है।

मुण्डकोपनिषद् के अनुसार सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, अथर्वा, अंगी, सत्यवह और अंगिरा की ब्रह्मविद्या की आचार्य परंपरा थी। शेनिक की इस जिज्ञासा के समाधान में कि "किस तत्व के जान लेने से सब कुछ अवगत हो जाता है। अंगिरा ऋषि ने उसे ब्रह्मविद्या का उपदेश किया जिसमें उन्होने विद्या के परा और अपरा भेद करके वेद वेदांग को अपरा तथा उस ज्ञान को पराविधा नाम दिया जिससे अक्षर ब्रह्म की प्राप्ति होती है।

49. योगतत्वोपनिषद् में नाड़ीशोधन के लिये प्राणायाम के अभ्यास हेतु निर्देश हैं :

(A) प्रतिदिन चार बार
(B) प्रतिदिन तीन बार
(C) तीन मास तक
(D) चार मास तक

सही विकल्प चुनिए:

Correct Answer: (a) (A) और (C)
Solution:

'योगतत्वोपनिषद्' में नाड़ीशोधन के लिए प्राणायाम के अभ्यास हेतु निर्देश निम्नलिखित हैं (a) प्रतिदिन चार बार (c) तीन मास तक उपनिषदों में मोक्ष प्राप्ति के लिए ज्ञान का होना आवश्यक है। ज्ञान के साथ-साथ योग का ज्ञान होना आवश्यक है। योग तत्वोपनिषद् में कहा गया है-

"योग हीनं कथंज्ञानं मोक्षदं भवति ध्रुवम । योगोऽपि ज्ञान हीनस्तु न क्षमों मोक्षकर्मणि ।।" अर्थात योग के बिना ज्ञान ध्रुव मोक्ष देने वाला नहीं हो सकता तथा ज्ञानहीन योग भी मोक्ष कर्म में असमर्थ है। अतः मोक्ष की प्राप्ति के लिए योग का ज्ञान आवश्यक है।

50. चतुर्योग (मंत्र, लय, हठ और राज) का वर्णन किया गया है :

(A) त्रिशिखिब्राह्मण उपनिषद् में
(B) योगतत्व उपनिषद् में
(C) योगराज उपनिषद्
(D) नादबिन्दु उपनिषद् में

सही विकल्प चुनिए :

Correct Answer: (d) (B) और (C)
Solution:

चतुर्योग (मंत्र, लय, हठ और राज) का वर्जन योगतत्व उपनिषद और योगराज उपनिषद् में किया गया है। योगतत्व उपनिषद में योग विषयक विभिन्न उपादानों का विस्तृत वर्णन किया गया है। भगवान विष्णु के द्वारा पितामह ब्रह्मा के लिए योग विषयक गुण तत्वों के निरुपण के साथ उपनिषद का शुभारंभ हुआ है। केवल्य रूपी परम पद की प्राप्ति के लिए योग मार्ग को ही श्रेष्ठ साधन बताया गया है।

मंत्रयोग, लययोग, हठयोग और राजयोग के क्रम में इसकी चार अवस्थाओं आरंभ, घट, परिचय एवं निष्पत्ति का वर्णन हुआ है। आगे चलकर योगी के आहार-विहार एवं दिनचर्या का उल्लेख किया गया है। योगराज उपनिषद के अनुसार - "योगराजं प्रवक्ष्यामि योगिनां योगसिद्धये। मन्त्रयोगो लयश्चैव राजयोगो हठस्तथा।।" अर्थात अब योगियों के योग सिद्ध के लिए मन्त्रयोग, लययोग, हठयोग एवं राजयोग इन चार प्रकार वाले योग से युक्त योगराज उपनिषद् का वर्णन करते हैं।