यूजीसी नेट/जेआरएफ परीक्षा, जून-2019 योग (YOGA)

Total Questions: 88

51. निम्नलिखित में से कौन-से क्लेश हैं?

(A) स्मिता
(B) अस्मिता
(C) दुःख
(D) राग

सही विकल्प चुनिए :

Correct Answer: (a) (B) और (D)
Solution:

योगदर्शन में पांच प्रकार के क्लेश का उल्लेख किया गया है जो निम्न हैं -
1. अविद्या
2. अस्मिता
3. राग
4. द्वेष
5. अभिनिवेश

अस्मिताः - जीवात्मा और बुद्धि को एक समझना ही अस्मिता है। अभिमान के नाश होने पर ही गुणों के ग्रहण में रुचि होती है।

रागः -जो सुख संसार में भोगे हैं, उन्हे याद करके फिर भोगने की इच्छा करना राग कहलाता है। हर संयोग के पश्चात वियोग होता है- जब ऐसा ज्ञान मनुष्य को हो जाता है तब यह क्लेश मिट जाता है।

द्वेषः जिससे दुःख मिला हो उसके याद आने पर उसके प्रति क्रोध होता है, यही द्वेष है।

अभिनिवेशः सब प्राणियों की इच्छा होती है कि हम सदा जीवित रहें, कभी मरे नहीं, यही अभिनिवेश है। यह पूर्वजन्म के अनुभव से होता है। मरने का भय मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, पंतग सभी को बराबर रहता है।

52. निम्नलिखित में से किन आसनों का 'शिव संहिता' में उल्लेख नहीं किया गया है?

(A) सिद्धासन
(B) उग्रासन
(C) भद्रासन
(D) मुक्तासन

सही विकल्प चुनिए :

Correct Answer: (c) (C) और (D)
Solution:

'शिव संहिता' में भद्रासन और मुक्तासन का उल्लेख नहीं किया गया है। 'शिव संहिता' योग से संबन्धित संस्कृत ग्रंथ है। इस ग्रन्थ में शिव जी पार्वती जी को सम्बोधित करते हुए योग की व्याख्या कर रहे हैं। योग से संबन्धित वर्तमान समय में उपलब्ध तीन मुख मुख्य ग्रन्थों में से यह एक है। दो अन्य ग्रन्थ हैं हठयोग प्रदीपिका और घेरण्ड संहिता।

शिव संहिता में पांच अध्याय है -
1. पहले अध्याय में ज्ञान का वर्णन
2. दूसरे अध्याय में नाड़ी संस्थान का वर्णन
3. तीसरे अध्याय में पांच प्राण उप प्राण का वर्णन तथा आसन व प्राणायाम का वर्णन
4. चौथे अध्याय में मुद्रा का वर्णन
5. पांचवे अध्याय में 200 से अधिक श्लोक तथा साधक प्रकार व सप्त चक्रों का विस्तृत वर्णन है।

53. 'घेरण्डसंहिता' के अनुसार नाड़ीशुद्धि के प्रकार हैं।

(A) समनु
(B) निर्मनु
(D) निगर्भ
(C) सगर्भ

सही विकल्प चुनिए :

Correct Answer: (a) (A) और (B)
Solution:

'घेरण्ड संहिता' के अनुसार नाड़ी शुद्धि दो प्रकार से होती है- 1.समनु 2.निर्मनु प्राणायाम का अभ्यास करने से पहले योगी को नाड़ी शुद्धि का अभ्यास करना चाहिए। इसके लिए उपयुक्त आसन (बैठने के स्थान) बताते हुए कहा है कि साधक को कुश से बने आसन पर, मृग (हिरण) के चमड़े से बने आसन पर, व्याघ्र (शेर) के चमड़े से बने आसन या फिर कम्बल को बिछाकर उसके ऊपर बैठकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके नाड़ी शुद्धि प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए।

"नाड़ी शुद्धिर्द्विघा प्रोक्ता समनुर्निर्मनुस्तथा।
बीजेन समनुं कुर्यात्रिर्मनु धौतकर्मणा ।।”

अर्थात - यह नाड़ी शुद्धि की प्रक्रिया दो प्रकार से की जाती है। एक समनु तथा दूसरा निर्मनु। नाड़ी शुद्धि का अभ्यास बीजमंत्र के साथ करने को समनु कहते हैं और बिना मंत्र के अर्थात धौतिकर्म के द्वारा करने को निर्मनु कहते हैं।

54. निम्नलिखित में से किन आसनों का 'शिव संहिता' में वर्णन किया गया है?

(A) सिद्धासन
(B) पद्मासन
(C) स्वस्तिकासन
(D) भद्रासन

सही विकल्प चुनिए:

Correct Answer: (b) (A),(B) और (C)
Solution:

'शिव संहिता' में निम्नलिखित आसनों का वर्णन किया गया है

1. सिद्धासन
2. पद्मासन
3. स्वस्तिकासन

भद्रासन दो अक्षरों से बना है, भद्र और आसन, जिसमें भद्र का अर्थ है शुभ या अच्छा। अर्थात यह आसन करने वाले के लिए अच्छे परिणाम लाता है। यह आसन हठ योग है, जिसका वर्णन हठ योग प्रदीपिका में जीवन की मूलधारा या रुट चक्र के रुप में किया गया है। इस आसन को बैठ कर किया जाता है। इसका एक अन्य नाम गोरक्षासन भी है। यह आसन कई बिमारियों को दूर करने, थकान मिटाने तथा प्रजनन अंगो के लिए लाभदायक है।

55. ग्लूकोजेनेसिस की प्रक्रिया में निम्नलिखित में से किन से ग्लूकोज का निर्माण होता है?

(A) कार्बोहाइड्रेट
(B) एमिनो अम्ल
(C) वसीय अम्ल
(D) विटामिन

सही विकल्प चुनिए:

Correct Answer: (d) (B) और (C)
Solution:

: 'ग्लूकोजेनेसिस' की प्रक्रिया में निम्नलिखित पदार्थों से ग्लूकोज का निर्माण होता है -

1. एमिनो अम्ल
2. वसीय अम्ल

ग्लूकोजेनेसिस या ग्लाइको अपघटन, श्वसन की प्रथम अवस्था है। जो कोशिका द्रव में होती है। इस क्रिया में ग्लूकोज का आंशिक आक्सीकरण होता है, फलस्वरूप ग्लूकोज के एक अणु से पाइरुविक अम्ल के 2 अणु बनते हैं एवं प्रत्येक चरण में विशिष्ट एन्जाइम उत्प्रेरक का कार्य करता है।

इस क्रिया को EMP पाथवे भी कहा जाता है। इसमें ग्लूकोज में संचित ऊर्जा का 4 प्रतिशत भाग मुक्त होकर एनएडीएच में चली जाती है तथा शेष 94 प्रतिशत ऊर्जा पाइरुविक अम्ल में संचित हो जाती है। ग्लाइकोजेनिसिस की अभिक्रिया कोशिका द्रव्य में संपन्न होती है जबकि क्रेब्स चक्र या साइट्रिक एसिड चक्र माइटोकान्ड्रियाँ के मैट्रिक्स में संपन्न होती है।

56. विटामिन सी के मुख्य स्रोत हैं

(A) ताजे फल
(B) यकृत
(C) हरी पत्तेदार सब्जियाँ
(D) अंडे का पीतक

सही विकल्प चुनिए :

Correct Answer: (b) (A) और (C)
Solution:

विटामिन सी के मुख्य स्रोत निम्नलिखित हैं.

1. ताजे फल
2. हरी पत्तेदार सब्जियाँ

विटामिन सी पानी में घुलनशील है जो हमारे शरीर के लिए अत्यंत आवश्यक है। शरीर को सभी क्रियाएं सुचारु रूप से चलती रहें, इसके लिए आवश्यक है कि हम अपने आहार के माध्यम से जरूरी मात्रा में विटामिन सी का सेवन करते रहे। हमारा शरीर विटामिन सी खुद नही बना सकता।

इसलिए हमें अपने आहार में ऐसे चीजें सम्मिलित करना आवश्यक है जिसमें विटामिन सी मौजूद हों। विटामिन सी युक्त कुछ खाद्य पदार्थ निम्न हैं-

1. संतरा नींबू,
2. अमरूद,
3. पपीता,
4.स्ट्राबेरी,
5. टमाटर,
6. आंवला,
7. केला,
8. शलजम,
9. पालक,
10. हरी धनिया,
11 हरी पत्तेदार सब्जियाँ ।

57. निम्नलिखित में से कौन सी कलाई की अस्थियाँ हैं?

(A) स्थूल (इन्कस)
(B) अर्द्धचंद्राकार (लूनेट)
(C) समुंड (कैपिटेट)
(D) रकाब (स्टेपीज)

सही विकल्प चुनिए :

Correct Answer: (d) (B) और (C)
Solution:

कलाई को बनाने वाली कार्पल हड्डियों की कुल संख्या आठ होती है। ये छोटी-छोटी तथा असमान आकार की होती हैं। ये आठों हड्डियाँ 4-4 की संख्या में दो लाइनों में व्यवस्थित रहती है। ऊपर की लाइन रेडियस एवं अल्ना के पास रहती हैं इसलिए यह पास की लाइन (Proximal row) कहलाती हैं।

दूसरी पंक्ति दूरस्थ पंक्ति (Distal row) कहलाती हैं और यह हथेली के पास रहती है। दोनों लाइनों में हड्डियाँ बाहर से अंदर की ओर निम्न क्रम में स्थित होती हैं -

निकटस्थ पंक्ति (पास की लाइन) (Proximal row) :-

1. स्कैफाइड
2. ल्यूनेट या अर्द्धचंद्राकार
3. ट्राइक्वीट्रल
4. पिसिफार्म

दूरस्थ पंक्ति (हर की लाइन) (Distal row): -

1. ट्रेपिजियम
2. ट्रैपीजाइड
3. कैपीटेट (समुंड)
4. हैमेट

58. नेत्र की संवाहिका परत (वैस्कुलर कोट) निम्नलिखित में से किससे निर्मित होती है?

(A) श्वेतपटल (स्क्लेरा)
(B) स्वच्छ मंडल (कॉर्निया)
(C) रक्तक पटल (कोरॉयड)
(D) परितारिका (आइरिस)

सही विकल्प चुनिए:

Correct Answer: (c) (C) और (D)
Solution:

नेत्र गोलक की निर्माण ऊतकों की निम्न तीन परतों से मिलकर बना होता है-

1. बाह्य तन्तुम परत
2. अभिमध्य वाहिकामयी
3. आन्तरिक तन्त्रिकामयी परत

अभिमध्य वाहिकामयी संयोजी ऊतक का बना पतला स्तर होता है। इसमें वर्णक कोशिकाएँ तथा रुधिर कोशिकाओं का जाल पाया जाता है। यह कार्निया के पीछे का रंगीन गोल पर्दा बनाता है। जिसे उपतारा या परितारिका (आइरिस) कहते हैं। इसके मध्य भाग में एक छिद्र होता है जिसे तारा कहते हैं। यह भाग नेत्र पर पड़ने वाले प्रकाश का नियमन करता है।

यह नेत्र गोलक के बीच की परत होती है, जिसमें अनेक रक्त वाहिकाएँ रहती हैं। इसमें रंजित पटल या कोराइड या रक्तक पटल, रोमक पिण्ड, या सिलियरी बाड़ी तथा उपतारा या आइरिस का समावेश होता है। वहिकामयी परत का पिछला 2/3 भाग एक पतली मेम्ब्रेन का बना होता है, जिसे रंजित पटल या कोराइड कहते हैं।

59. निम्नलिखित में से क्या-क्या सूक्ष्म पोषक तत्त्व हैं?

(A) वसा
(B) विटामिन
(C) खनिज लवण
(D) प्रोटीन

सही विकल्प चुनिए :

Correct Answer: (a) (B) और (C)
Solution:

शरीर के पोषण के लिए पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। संतुलित आहार से शरीर को सभी प्रकार के पोषक तत्व मिलते हैं। पोषक तत्वों को दो भागों में बाँटा गया है -

1. वृहद या बड़े पोषक तत्व (मैक्रोन्यूट्रिएंट)
2. सूक्ष्म या लघु पोषक तत्व (माइक्रोन्यूट्रिएंट)

कार्बोहाइडेट, प्रोटीन और वसा को वृहद पोषक तत्व कहा जाता है, क्योंकि ये ऊर्जा के स्रोत माने जाते हैं। विटामिन और खनिज लवण को सूक्ष्म पोषक तत्व कहा जाता है। क्योंकि ये अन्य पोषक तत्वों की तुलना में बहुत छोटे होते हैं। इसका तात्पर्य यह बिल्कुल नही है। कि यह शरीर के लिए कम महत्वपूर्ण हैं। शरीर को बेहद कम मात्रा में इनकी आवश्यकता होती है।

60. निम्नलिखित में कौन से उपविक्षेप हैं?

(A) द्वेष
(B) दुःख
(C) अनवस्थितत्व
(D) अंगमेजयत्व

सही विकल्प चुनिए :

Correct Answer: (a) (B) और (D)
Solution:

उपविक्षेप या सहभुव की संख्या चार होती है जो निम्न हैं-
1. दुःख
2. दौर्मनस्य
3. अंगमेजयत्व
4. श्वास-प्रश्वास

दुःख, दौर्मनस्य आदि उपविक्षेपों के निराकरण के लिए एकतत्व का अभ्यास करना चाहिए। जब साधक व्याधि, ख्यान आदि विक्षेपों से पीड़ित होता है, तो प्रायः दुःख दौर्मनस्य आदि उपविक्षेप भी पैदा हो जाते हैं अर्थात दुःख आदि उपविक्षेप अवश्य ही पैदा हो जाते हैं। ऐसा नही है।

चूँकि दुःख आदि उपविक्षेप, व्याधि आदि विशेषों के अनुगामी हैं इसलिए जप की प्रक्रिया के द्वारा तो वे भी नष्ट हो ही जायेगें। दुःख, दौर्मनस्य आदि उपविक्षेपों के निवारणार्थ मन को एक विषय वाला बनाने का अभ्यास करना चाहिए अर्थात किसी भी विधि के माध्यम से चित्त को एक विषय वाला बनाने का प्रयास करना चाहिए।