Solution:हठप्रदीपिका के अनुसार एक योगाभ्यासी के लिए मिताहार, अपथ्यकर आहार तथा पथ्यकारक आहार का वर्णन किया गया है- सुस्निगद्ध तथा मधुर भोजन, भगवान को अर्पित कर, अपने पूर्ण आहार का चतुर्थाश कम खाया जाय उसे मिताहार कहते हैं।
ह. प्र. -1/59-60 में अपथ्यकर आहार का वर्णन है - कटु, अम्ल, तीखा, नमकीन, गरम, हरी शाक, खट्टी भाजी, तेल, मत्स्यान, सरसों मद्य, मछली, बकरे आदि का मांस, दही, छाछ, कुथली, कोल (बैर), खल्ली, हींग तथा लहसुन आदि वस्तुएं योग साधकों के लिए अपथ्यकर कहे गए हैं। फिर से गर्म किया गया, रूखा, अधिक नमक या खटाई वाला, अपथ्यकारक तथा उत्कट अर्थात वर्जित शाक युक्त भोजन अहितकर है। अतः इन्हे नही खाना चाहिए।
ह. प्र.-1/62 पथ्यकारक भोजन या आहार - उत्तम साधकों के लिए गेहूँ, चावल, जो, साठी चावल जैसे सुपाच्य अन्य, दूध, घी, खांड, मक्खन, मिसरी, मधु, सुंठ, परवल जैसे फल आदि पाँच प्रकार के शाक (जीवन्ति, बथुआ, चौलाई, मेघनाद तथा पुनर्ववा), मूंग आदि तथा वर्षा का जल पथ्यकारक भोजन है।